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॥ श्रीहरि:॥
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/ व्यवहार और परमार्थ
व्यवहार और परमार्थ
लेखक
श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार
भाषा
हिन्दी/संस्कृत
पुस्तक पढ़ें
विषय-सूची
•
प्रथम पृष्ठ
•
नम्र निवेदन
•
महान् गुण भक्तिसे ही टिकते हैं
•
निन्दनीय कर्मसे डरना चाहिये, न कि निन्दासे
•
सती-चमत्कार
•
सिद्ध सखीदेह
•
श्रेय ही प्रेय है
•
प्रार्थना
•
स्वाधीनताके नामपर उच्छृंखलता
•
सबकी सफलता एकमात्र भजनमें ही है
•
सच्चे साधकके लिये निराशाका कोई कारण नहीं
•
विपत्तिसे बचनेके उपाय
•
सभी अभीष्ट भजनसे सिद्ध होते हैं
•
श्रेष्ठ साध्यके लिये श्रेष्ठ साधन ही आवश्यक है
•
जगत् पतन तथा दु:खकी ओर जा रहा है
•
पुराणोंकी नागजाति
•
दुष्कर्मसे दुर्गति
•
भगवान्का दिव्यरूप
•
मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है
•
श्रीकृष्ण ही पुरुषोत्तम-तत्त्व हैं
•
खर्च घटानेका उपाय—सादगी
•
श्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहों
•
कुछ कामकी बातें
•
‘कल्याण’ और गीता
•
मानव-शरीरका लाभ
•
उपदेशक या गुरु कैसे हों?
•
भगवान् शिव और राम एक हैं
•
श्राद्धमें ब्राह्मण-भोजन आवश्यक है
•
अपना मत (वोट) किसको दें?*
•
आत्मा अनिर्वचनीय है
•
वर्ण जन्म-कर्म दोनोंसे है
•
भगवान् कहाँ हैं?
•
घर छोड़ना हानिकारक है
•
पवित्र प्रेमका जीवन त्याग है
•
कुसंगका त्याग करें
•
भगवान्की शक्ति ही प्रकृति है
•
धनकी सार्थकता
•
सच्चे प्रेमका व्यवहार कीजिये!
•
दु:ख क्यों होते हैं?
•
धनका दुरुपयोग
•
गृहस्थीकी बेड़ी
•
भगवान्की शरणसे ही विघ्ननाश
•
पिताको राजी कीजिये या उनकी आज्ञा मानिये
•
अपनी तपस्यासे पतित पतिको सुधारिये
•
भगवान्से प्रार्थना कीजिये
•
व्यर्थ संदेह मत कीजिये
•
आडम्बरपूर्ण खर्चीले जीवनसे हानि
•
केवल भगवान् पर भरोसा कीजिये
•
पाप करनेवाले क्यों मजे लूट रहे हैं?
•
संतान दु:खमें ही हेतु है
•
श्रीराधा-कृष्ण एक ही तत्त्व हैं
•
परमार्थके लिये धर्मपर चलना उत्तम है
•
पतिके सामने पत्नीकी मृत्यु अच्छी क्यों?
•
एक ही परमेश्वरके अनेक स्वरूप हैं
•
ईमानदारीका आदर्श
•
संन्यासी और स्त्री
•
सहनशील बनिये
•
मन, बुद्धि आदिके स्वरूप
•
निराश न होकर भगवान् पर विश्वास कीजिये
•
भगवान्के आश्रयसे दोषोंका नाश
•
ईश्वरको माननेमें लाभ
•
प्रणवके संयोगसे लाभ
•
भगवान् विष्णु और श्रीकृष्ण एक ही हैं
•
प्रणवका जप शुद्ध होकर करना चाहिये
•
जीवन्मुक्तके द्वारा वस्तुत:कर्म नहीं होते
•
पुराना सब बुरा, नया सब अच्छा?
•
चोरी-डकैतीसे प्राप्त धनकी पूजा चोरी-डकैतीकी ही पूजा है
•
नारीका गुरु पति ही है
•
वेश्या-सेवन तथा मांस-भक्षण पाप ही हैं
•
मृत्युके बाद कैसा शरीर मिलता है?
•
स्वतन्त्र विवाह
•
सकाम भक्ति और सकाम कर्म
•
भगवत्प्रेम और अनुकूलताकी खोज
•
मोहका स्वरूप
•
पत्नीका सुधार
•
सत्संगकी इच्छा
•
कुसंगका त्याग तुरन्त कीजिये
•
पतिका अत्याचार
•
धोखेसे बचिये
•
भगवान्की सब लीलाओंका अनुकरण नहीं हो सकता
•
प्रायश्चित्त
•
साध्वी धर्मपत्नीके साथ दुर्व्यवहार करना बड़ा अशुभ है
•
ईश्वर-विश्वास
•
अतिप्रश्न
•
ईश्वर-चर्चा
•
अंडे फल नहीं हैं
•
भूल करनेवाले दयाके पात्र हैं
•
पतिकी भूल
•
पुरुषका पाप
•
पापको घटाइये
•
दो प्रकारकी आत्महत्या
•
कुछ प्रश्नोंका उत्तर
•
ईश्वर सत्य है और सर्वत्र है
•
भगवद्दर्शनके लिये तीव्र उत्कण्ठाकी आवश्यकता
•
भगवान् विश्वम्भर हैं
•
सृष्टि भगवान्का नाटक है
•
भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य मथुरा और गोकुल दोनोंमें हुआ था
•
गोवधबंदीके लिये क्या करें?
•
श्रीराधाकृष्णका स्वरूप
•
ईश्वरकी सत्यता
•
मरणमें भी कल्याण
•
भगवान्का मंगलमय विधान
•
मैत्रीभावना कीजिये
•
स्वभाव-सुधार
•
चिन्ता छोड़कर भगवान्का चिन्तन करें
•
भगवान्के साथ कोई भी सम्बन्ध मानिये
•
निष्काम और सकामका भेद
•
अंतिम पृष्ठ
सम्बंधित ई-पुस्तकें
सुख-शान्ति का मार्ग
परमार्थ की मन्दाकिनी
दिव्य सुख की सरिता
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दीन-दु:खियों के प्रति कर्तव्य
श्रीरामचरितमानस (सटीक)
सुन्दरकाण्ड (सटीक)
गीता चिन्तन
सुखी बननेके उपाय
पद रत्नाकर
प्रार्थना
श्रीराधा माधव चिन्तन
साधन पथ
अमृत कण
श्री भगवन्नाम-चिन्तन
दाम्पत्य जीवन का आदर्श
ब्रह्मचर्य
श्रीराधा माधव रस सुधा (षोडश गीत)
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मानव जीवन का लक्ष्य
महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
तुलसी दल
संत वाणी
मन को वश करने के कुछ उपाय
श्रीभगवन्नाम
श्री राम चिन्तन
दैनिक कल्याण सूत्र
गोपी प्रेम
भगवच्चर्चा (सभी छहों भाग एक साथ)
गो सेवा के चमत्कार
नैवेद्य
उपनिषदों के चौदह रत्न
प्रेम दर्शन (नारद भक्ति सूत्र की व्...
ईश्वर की सत्ता और महत्ता
स्त्री धर्म प्रश्नोत्तरी
सत्संग सुधा
पूर्ण समर्पण
नारी शिक्षा
साधकों का सहारा
भवरोग की रामबाण दवा
दु:ख क्यों होते हैं?
भगवान् सदा तुम्हारे साथ हैं
दु:ख में भगवत्कृपा
भगवच्चर्चा
कल्याण कुंज
भगवत्प्राप्ति एवं हिंदू संस्कृति
महाभाव कल्लोलिनी
कल्याणकारी आचरण
मधुर
विवाह में दहेज
शान्ति कैसे मिले?
सिनेमा – मनोरञ्जन या विनाश का साधन
मानव धर्म
लोक परलोक का सुधार
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गोवध भारत का कलंक
आनन्द की लहरें
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सफलता के शिखर की सीढ़ियाँ
आनन्द का स्वरूप
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