॥ श्रीहरि:॥

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व्यवहार सुधार और परमार्थ

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

इस पुस्तकमें श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका के ऋषिकेशमें स्थित वटवृक्ष तथा अन्य स्थानोंपर दिये हुए प्रवचनोंका संग्रह है। व्यवहार-सुधारकी जीवनमें कितनी आवश्यकता है, इसको कई ढंगसे इसमें समझाया गया है। इस प्रकारके सुधारके बिना ही भगवत्प्राप्तिमें विलम्ब हो रहा है। भगवान् की प्राप्तिमें क्या-क्या बाधाएँ हैं एवं वे किस प्रकार सुगमतासे शीघ्र दूर की जायँ, इन बातोंका विवेचन इन प्रवचनोंमें है। इनमेंसे कुछ प्रवचन स्वामी श्रीरामसुखदासजी तथा सेठजीके अन्तरंग सत्संगियोंके साथ प्रश्नोत्तर रूपमें भी हैं। इन प्रवचनोंकी गृहस्थ भाई-बहनोंके लिये बड़ी उपादेयता है। हमें आशा है, सभी भाई-बहन इस पुस्तकको पढ़कर लाभ उठायेंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • साधकोंके लिये अमूल्य बातें
  • व्यवहार-सुधारकी बातें
  • नित्य व्यवहारकी कल्याणकारी बातें
  • भगवान् कैसे मिलें?
  • स्वयंके भावकी महिमा
  • कामनाके त्यागकी महिमा
  • साधक मान-बड़ाईका त्याग करें
  • निष्काम सेवा तथा भगवत्स्मृतिसे शीघ्र भगवत्प्राप्ति
  • मित्रको पत्र
  • गीताके अनुसार जीवनका विशेष महत्त्व
  • अपना भाव तथा दूसरोंके कल्याणकी चेष्टाकी महत्ता
  • निरन्तर भगवत्स्मृति तथा प्रेमका प्रभाव
  • निष्काम सेवाका प्रभाव
  • आदर्श जीवन कैसे बने?
  • आसक्तिका त्याग और महापुरुषोंका संग करे
  • ईश्वर-भक्ति ही श्रेष्ठ है
  • परमार्थमें श्रद्धाकी प्रधानता
  • रामनामकी महिमा
  • पाप, ऋण, सकाम भाव—मुक्तिमें बाधक हैं
  • शरणागतिसे भय-निवृत्ति
  • राग-द्वेषसे बचो
  • सत्संगके बिखरे मोती
  • भजन-ध्यान तत्परतासे करें
  • निष्कामभावपूर्वक कर्तव्यपालनसे परम कल्याणकी प्राप्ति
  • अंतिम पृष्ठ

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