सभी देशों तथा धर्मोंमें व्रतका महत्त्वपूर्ण स्थान है। व्रतसे मनुष्यकी अन्तरात्मा शुद्ध होती है। इससे ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति तथा पवित्रताकी वृद्धि होती है; अकेला एक उपवास सैकड़ों रोगोंका संहार करता है, नियमत: व्रत तथा उपवासोंके पालनसे उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घजीवनकी प्राप्ति होती है— यह सर्वथा निर्विवाद है।
व्रत-परिचय के लेखक पं० श्रीहनूमानजी शर्मा बड़े उच्चकोटिके विद्वान्, शास्त्रानुरागी तथा धर्मपरायण व्यक्ति थे। व्रतकथा-प्रेमियों तथा विद्वान् ब्राह्मणोंकी उपयोगिताके लिये परिशिष्टमें कुछ मूल आवश्यक कथाएँ दे दी गयी हैं।