विदुरनीति महाभारतका एक अत्यन्त प्रसिद्ध और परम उपादेय प्रसंग है, इसमें महामना विदुरजीने राजा धृतराष्ट्रको लोक-परलोकमें कल्याण करनेवाली बहुत-सी बातें समझायी हैं। उद्योगपर्वके आठ अध्याय ३३ वेंसे ४० वेंतक इस प्रसंगके हैं। विदुरनीतिपर संस्कृत टीकाएँ भी हैं। इसमें व्यवहार, बर्ताव, नीति, सदाचार, धर्म, सुख-दु:ख-प्राप्तिके साधन, त्याज्य और ग्राह्य गुणों तथा कर्मोंका निर्णय, त्यागकी महिमा, न्यायका स्वरूप, सत्य, परोपकार, क्षमा, अहिंसा, मित्रके लक्षण, कृतघ्नकी दुर्दशा, निर्लोभता आदिका विशद वर्णन करते हुए राजधर्मका सुन्दर निरूपण किया गया है। यह पुस्तक अपठित, विद्वान्, तरुण, वृद्ध, बालक, स्त्री, शासक, प्रजा, धनी, गरीब, विद्यार्थी, शिक्षक, सेवावर्ती और शुद्ध तथा सुखी जीवनका निर्माण चाहनेवाले प्रत्येक व्यक्तिके कामकी है। श्लोकोंका अर्थ बड़ी सरल भाषामें किया गया है। आशा है, इससे भारतके सभी वर्गों तथा श्रेणियोंके नर-नारी लाभ उठावेंगे।