॥ श्रीहरि:॥

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उद्धव संदेश

डॉ. महानामव्रत ब्रह्मचारी

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • श्रीभगवान‍्की भक्त-दु:खकातरता
  • व्रजगमनकी असमर्थता
  • दूत-प्रेषणकी सार्थकता
  • प्रस्तुतिका आन्तरिक हेतु
  • व्रजकी शुभ यात्रा
  • व्रज-प्रवेशका अनधिकार
  • नन्दराजके संग निरानन्द वार्तालाप
  • अप्रत्याशित व्यर्थताका अनुभव
  • सांत्वना-योग्य भाषाका दारिद्रॺ
  • नन्दराजका दीनभाव
  • श्रीकृष्णकी भगवत्ता
  • माधुर्यावगाहनकी अक्षमता
  • व्रजवधुओंकी निकटवर्तिता
  • यदुपतिकी मित्रता
  • आगमनका प्रयोजन
  • गोपियोंकी मर्मव्यथा
  • श्रीराधाविरह-वेदनाका प्राकट्य
  • चित्रजल्पकी मूल कथा
  • प्रजल्प—भ्रमर, कपटीका मित्र परिजल्प—निष्ठुरतापूर्ण शठता
  • विजल्प—न गावो उनकी गुण-गाथा उज्जल्प—गर्वगर्भित कुहकता
  • संजल्प—प्रशंसाके माध्यमसे विद्रूप अवजल्प—काठिन्यपूर्ण धूर्तता
  • अभिजल्प—आलापमें कुटिलता, आजल्प—कार्यका दु:खदायित्व, प्रतिजल्प—सम्मानयुक्त दैन्य और सुजल्प—गाम्भीर्यपूर्ण ऋजुता
  • उद्धवकी व्याकुलता
  • प्रेमकी सर्वात्मकता
  • प्रेम-विवर्धन-परायणता
  • कृष्ण-प्रीतिकी सुगभीरता
  • नन्दनन्दनकी नवरूपता
  • विरह-व्यथाका उपशमन
  • उद्धवकी परमप्रियता
  • उद्धवद्वारा लतागुल्म होनेकी कामना
  • पदरजकी प्रार्थनाकी चमत्कारिता
  • वेदनापूर्ण व्रजवार्ता
  • अन्तिम पृष्ठ

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