॥ श्रीहरि:॥

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तत्त्वचिन्तामणि

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

शास्त्रोंके अवलोकन तथा सत्पुरुषों संग करनेसे आत्मकल्याणकी जो बातें मेरी समझमें आयी हैं, वही सब बातें इन लेखोंमें बतायी गयी हैं। मेरा विश्वास है, जो कोई भी मनुष्य इन बातोंको काममें लायेंगे, उन्हें अवश्य लाभ हो सकता है; क्योंकि ये सब बातें अधिकांशमें साक्षात् भगवान् कृष्णके मुखसे कथित गीता तथा ऋषि-मुनि-प्रणीत सत्-शास्त्रोंके आधारपर ही लिखी गयी हैं अतएव इन लेखोंसे सभी मनुष्य लाभ उठा सकते हैं। इनमेंसे बहुत-सी बातें ऐसी सुगम हैं कि जिन्हें बिना पढ़े-लिखे साधारण स्त्री-पुरुष और बालक-वृद्ध भी काममें लाकर लाभ उठा सकते हैं; क्योंकि मनुष्यको अपना जीवन किस प्रकार बिताना एवं किसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये, यह सब बातें भी उनमें बतायी गयी हैं।
- श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका
  • प्रथम पृष्ठ
  • विनम्र-निवेदन
  • +
    तत्त्वचिन्तामणि भाग—१
    • ज्ञानीकी अनिर्वचनीय स्थिति
    • ज्ञानकी दुर्लभता
    • भ्रम अनादि और सान्त है
    • निराकार-साकार-तत्त्व
    • कल्याणका तत्त्व
    • कल्याण-प्राप्तिके उपाय
    • +
      भगवान् क्या हैं?
      • ध्यान कैसे करना चाहिये?
      • ध्यानकी दूसरी विधि
      • भक्तोंके लिये भगवान् साकार कैसे बनते हैं?
      • भगवान् गुणातीत हैं, बुरे-भले सभी गुणोंसे युक्त हैं और केवल सद्गुणसम्पन्न हैं
      • भगवान् का स्वरूप और निराकार-साकारकी एकता
    • +
      त्यागसे भगवत्-प्राप्ति
      • (१) निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग।
      • (२) काम्य कर्मोंका त्याग।
      • (३) तृष्णाका सर्वथा त्याग।
      • (४) स्वार्थके लिये दूसरोंसे सेवा करानेका त्याग।
      • (५) सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंमें आलस्य और फलकी इच्छाका सर्वथा त्याग।
      • (क) ईश्वर-भक्तिमें आलस्यका त्याग।
      • (ख) ईश्वर-भक्तिमें कामनाका त्याग।
      • (ग) देवताओंके पूजनमें आलस्य और कामनाका त्याग।
      • (घ) माता-पितादि गुरुजनोंकी सेवामें आलस्य और कामनाका त्याग।
      • (ङ) यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कर्मोंमें आलस्य और कामनाका त्याग।
      • (च) आजीविकाद्वारा गृहस्थ-निर्वाहके उपयुक्त कर्मोंमें आलस्य और कामनाका त्याग।
      • (छ) शरीरसम्बन्धी कर्मोंमें आलस्य और कामनाका त्याग।
      • (६) संसारके सम्पूर्ण पदार्थोंमें और कर्मोंमें ममता और आसक्तिका सर्वथा त्याग।
      • (७) संसार, शरीर और सम्पूर्ण कर्मोंमें सूक्ष्म वासना और अहंभावका सर्वथा त्याग।
      • उपसंहार
    • +
      शरणागति
      • सर्वस्व अर्पण
      • भगवान् के प्रत्येक विधानमें सन्तोष
      • भगवान् के आज्ञानुसार कर्म
      • भगवान् का निरन्तर चिन्तन
    • अनन्य प्रेम ही भक्ति है
    • गीतामें भक्ति
    • +
      श्रीप्रेम-भक्ति-प्रकाश
      • परमात्माकी शरणमें प्राप्त हुए पुरुषका मन परमात्मासे प्रार्थना करता है—
      • जीवात्मा अपने मनसे कहता है—
      • मन फिर परमात्मासे प्रार्थना करता है—
      • जीवात्मा अपने मनसे फिर कहता है—
      • जीवात्मा अपनी बुद्धि और इन्द्रियाें से कहता है—
      • जीवात्मा परमात्मासे कहता है—
      • जीवात्मा ज्ञाननेत्रों द्वारा परमेश्वरका ध्यान करता हुआ आनन्दमें विह्वल होकर कहता है—
      • जीवात्मा परमात्माके आश्चर्यमय सगुण रूपको ध्यानमें देखता हुआ अपने मन-ही-मनमें उनकी शोभा वर्णन करता है—
      • मानसिक पूजाकी विधि
    • +
      ईश्वर-साक्षात्कारके लिये नामजप सर्वोपरि साधन है
      • महिमाका दिग्दर्शन
      • मेरा अनुभव
      • नामजप किसलिये करना चाहिये?
      • नामजप कैसे करना चाहिये?
      • सत्संगसे ही नामजपमें श्रद्धा होती है !
      • नाममें पापनाशकी स्वाभाविक शक्ति है
      • नामकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये
      • नामजपमें प्रमाद और आलस्य करना उचित नहीं
    • भगवान् के दर्शन प्रत्यक्ष हो सकते हैं
    • प्रत्यक्ष भगवद्दर्शनके उपाय
    • उपासनाका तत्त्व
    • +
      सच्चा सुख और उसकी प्राप्तिके उपाय
      • सच्चा सुख
      • साधनमें क्यों नहीं लगते?
      • अभेदोपासनाके अनुसार ध्यानकी विधि
      • विश्वरूप परमात्माके ध्यानकी विधि
      • श्रीविष्णुके चतुर्भुज रूपका ध्यान करनेकी विधि
      • दूसरी विधि
    • घर-घरमें भगवान् की पूजा
    • +
      वैराग्य
      • वैराग्यका महत्त्व
      • वैराग्यका स्वरूप
      • वैराग्य-प्राप्तिके उपाय
      • वैराग्यका फल
    • +
      गीतासम्बन्धी प्रश्नोत्तर
      • एक सज्जनके प्रश्न हैं—
    • +
      गीतोक्त संन्यास या सांख्ययोग
      • एक सज्जनका प्रश्न है कि—
    • धर्म क्या है?
    • +
      गीतोक्त निष्काम कर्मयोगका स्वरूप
      • सकाम कर्म—
      • निष्काम कर्म—
      • गीतामें निष्काम कर्मका आरम्भ
      • मदर्पण और मदर्थका भेद—
      • भगवत्प्राप्तिके लिये किया जानेवाला कर्म ही निष्काम कर्मयोग है।
    • धर्म और उसका प्रचार
    • व्यापारसुधारकी आवश्यकता
    • व्यापारसे मुक्ति
    • मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है या परतन्त्र?
    • +
      कर्मका रहस्य
      • संचित
      • प्रारब्ध
      • क्रियमाण
      • त्रिविध कर्मोंका भोग बिना नाश होता है या नहीं?
      • कर्मका फल कौन देता है?
      • ईश्वरभजनकी आवश्यकता क्यों है?
    • मृत्यु-समयके उपचार
  • +
    तत्त्वचिन्तामणि भाग—२
    • मनुष्यका कर्तव्य
    • हमारा कर्तव्य
    • धर्मकी आवश्यकता
    • शीघ्र कल्याण कैसे हो?
    • +
      सन्ध्योपासनकी आवश्यकता
      • अनुरोध*
    • +
      बलिवैश्वदेव
      • आवश्यक सूचना
    • +
      बलिवैश्वदेवविधि
      • (१) देवयज्ञ।
      • (२) भूतयज्ञ।
      • (३) पितृयज्ञ।
      • निर्णेजनम्।
      • (४) मनुष्ययज्ञ।
    • एक निवेदन
    • +
      भगवत्प्राप्तिके विविध उपाय
      • दस उपाय
      • नौ उपाय
      • आठ उपाय
      • सात उपाय
      • छ: उपाय
      • पाँच उपाय
      • चार उपाय
      • तीन उपाय
      • दो उपाय
      • एक ही उपाय
    • +
      श्रद्धा और सत्संगकी आवश्यकता
      • प्रश्नोंका उत्तर
    • ईश्वर-सम्बन्धी वक्ता और श्रोता
    • +
      महात्मा किसे कहते हैं?
      • महात्मा शब्दका अर्थ और प्रयोग
      • महात्माओंके लक्षण
      • महात्माओंके आचरण
      • महात्माओंकी महिमा
      • महात्मा बननेके उपाय
    • महापुरुषोंकी महिमा
    • जन्म कर्म च मे दिव्यम्
    • भगवान् का अवतार-शरीर
    • भगवान् श्रीकृष्णका प्रभाव
    • ईश्वर दयालु और न्यायकारी है
    • भगवान् की दया
    • ईश्वर सहायक हैं
    • +
      प्रेमसे ही परमात्मा मिल सकते हैं
      • प्रेमका स्वरूप क्या है?
    • प्रेमका सच्चा स्वरूप
    • आत्मनिवेदन
    • ध्यानकी आवश्यकता
    • भक्तराज प्रह्लाद और ध्रुव
    • भावनाके अनुसार फल
    • +
      सत्यकी शरणसे मुक्ति
      • सत्यका स्वरूप
      • सत्य-भाषण
      • सत्य आहार
      • सद्भाव और सद्‍व्यवहार
      • सत्कर्म
      • राग
      • द्वेष
      • उपसंहार
    • ईश्वर और संसार
    • +
      रामायणमें आदर्श भ्रातृ-प्रेम
      • श्रीरामका भ्रातृ-प्रेम
      • श्रीभरतका भ्रातृ-प्रेम
      • श्रीलक्ष्मणका भ्रातृ-प्रेम
      • श्रीशत्रुघ्नजीका भ्रातृ-प्रेम
      • उपसंहार
    • +
      श्रीसीताके चरित्रसे आदर्श शिक्षा
      • नैहरमें प्रेम-व्यवहार
    • माता-पिताका आज्ञा-पालन
    • पतिसेवाके लिये प्रेमाग्रह
    • पतिसेवा में सुख
    • सास-सेवा
    • सहिष्णुता
    • निरभिमानिता
    • गुरुजन-सेवा और मर्यादा
    • निर्भयता
    • धर्मके लिये प्राण-त्याग-की तैयारी
    • सावधानी
    • दाम्पत्य-प्रेम
    • पर-पुरुषसे परहेज
    • वियोगमें व्याकुलता
    • अग्नि-परीक्षा
    • गृहस्थ-धर्म
    • समान-व्यवहार
    • सीता-परित्याग
    • पाताल-प्रवेश
    • सीता- परित्यागके हेतु
    • उपसंहार
    • तेईस प्रश्न
    • शंका-समाधान
    • +
      जीव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
      • तीन प्रकारकी गति
      • आवागमनसे छूटनेका उपाय
    • जीवात्मा
    • +
      तत्त्व-विचार
      • प्रकृति, पुरुष और संसार
      • हम कौन हैं?
      • राग-द्वेषादिका नाश हो जाता है
      • हमारा क्या कर्तव्य है?
      • परमात्मा, जीवात्मा, संसार और प्रकृतिका विषय
      • बन्धन और मुक्ति
    • अनन्य शरणागति
    • +
      गीतोक्त सांख्ययोग
      • उत्तर
    • गीतोक्त सांख्ययोगका स्पष्टीकरण
    • गीताका उपदेश
    • +
      गीता और योगदर्शन
      • पातंजलयोगदर्शन
      • श्रीमद्भगवद्गीता
    • गीताके अनुसार जीवन्मुक्तका लक्षण
    • गीताके अनुसार जीव,ईश्वर और ब्रह्मका विवेचन
    • +
      गीताके अनुसार कर्म, विकर्म और अकर्मका स्वरूप
      • कर्म
      • विकर्म
      • अकर्म
    • गीतोक्त क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम
    • गीता मायावाद मानती है या परिणामवाद?
    • +
      गीतामें ज्ञान, योग आदि शब्दोंका पृथक्-पृथक् अर्थोंमें प्रयोग
      • ज्ञान
      • योग
      • योगी
      • युक्त
      • आत्मा
      • ब्रह्म
      • अव्यक्त
      • अक्षर
    • +
      श्रीमद्भगवद्गीताका प्रभाव
      • गीताका विषय-विभाग
      • गीतोपदेशका आरम्भ और पर्यवसान
    • तेरह आवश्यक बातें
    • +
      मनन करनेयोग्य
      • विशेष महत्त्वका भजन वह है जिनमें ये छ: बातें होती हैं—
      • ध्यानके सम्बन्धमें—
      • साधकोंके लिये आवश्यक बातें—
    • सार बातें
  • +
    तत्त्वचिन्तामणि भाग—३
    • धर्मसे लाभ और अधर्मसे हानि
    • +
      नारीधर्म
      • स्वतन्त्रताके लिये स्त्रियोंकी अयोग्यता
      • वर्तमान कालमें स्त्री-शिक्षाकी कठिनाई
      • प्राचीन कालकी स्त्री-शिक्षा
      • मनुष्यमात्रके कर्तव्य
    • यम
    • नियम
    • धर्मके दस लक्षण
    • स्त्रीमात्रके कर्तव्य कर्म
    • समता
    • नवधा भक्ति
    • कुरीतियाँ
    • +
      पर्दा
      • कन्याओंके कर्तव्य
      • विवाहिता स्त्रियोंके कर्तव्य
      • विधवाओंके कर्तव्य
    • पुरुषोंका स्त्रियोंके साथ व्यवहार
    • मिल और नीलसे हानि
    • प्रतिकूलताका नाश
    • पाप और पुण्य
    • +
      मांस-भक्षण-निषेध
      • मांस न खानेका फल
    • चित्त-निरोधके उपाय
    • मनुष्य-जीवनका अमूल्य समय
    • +
      समयका सदुपयोग
      • तत्त्व
      • रहस्य
      • प्रभाव
      • गुण
    • विषयसुखकी असारता
    • +
      कर्मयोगका रहस्य
      • (क) भगवत्-अर्थ कर्म
      • (ख) भगवत्-अर्पण कर्म
    • ध्यानसहित नाम-जपकी महिमा
    • +
      प्रेम और शरणागति
      • मनसे प्रभुको पकड़ना
      • वाणीसे प्रभुको पकड़ना
      • कर्मसे प्रभुको पकड़ना
    • भावनाशक्ति
    • +
      सर्वोच्च ध्येय
      • एक सज्जनके दो प्रश्न हैं—
      • अनन्य शरणका स्वरूप
      • कार्यक्रम
    • तत्त्व-विचार
    • अमूल्य शिक्षा
    • सर्वोपयोगी प्रश्न
    • परमार्थ-प्रश्नोत्तरी
    • प्रश्नोत्तर
    • भगवत्प्राप्तिके उपाय
    • भगवान् के लिये काम कैसे किया जाय?
    • ईश्वर और परलोक
    • ईश्वर-तत्त्व
    • मैं कौन हूँ और मेरा क्या कर्तव्य है?
    • +
      सांख्ययोग और कर्मयोग
      • उपसंहार
    • +
      ईश्वर-महिमा
      • (२) ईश्वरके दण्डविधानमें भी दया है
      • जीवमात्रकी सर्वांगीण उन्नति और उन्हें परम श्रेयकी प्राप्ति
      • (३) ईश्वर-प्रेम ही विश्व-प्रेम है
      • चेतनके साथ प्रेम
      • जडके साथ प्रेम
    • ईश्वरमें विश्वास
    • शिव-तत्त्व
    • +
      शक्तिका रहस्य
      • शक्तिके रूपमें ब्रह्मकी उपासना
      • शक्ति और शक्तिमान् की उपासना
      • सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी उपासना
    • +
      गीतामें चतुर्भुज रूप
      • उत्तर
    • +
      गीतोक्त साम्यवाद
      • मनुष्योंमें समता
      • मनुष्यों और पशुओंमें समता
      • सम्पूर्ण जीवोंमें समता
    • देश-काल-तत्त्व
  • +
    तत्त्वचिन्तामणि भाग—४
    • अमूल्य वचन
    • +
      महाराज युधिष्ठिरके जीवनसे आदर्श शिक्षा
      • निर्वैरता
      • धैर्य
      • अक्रोध, क्षमा
      • सत्य
      • विद्वत्ता, बुद्धिमत्ता, समता
      • पवित्रताका प्रभाव
      • उदारता
      • त्याग
      • उपसंहार
    • +
      संत-महिमा
      • संतभावकी प्राप्ति भगवत्कृपासे होती है
      • संतकी विशेषता
      • संतोंकी दया
      • संतोंमें समता
      • संतोंमें विशुद्ध विश्वप्रेम
      • संतोंके आचरण और उपदेश
    • भगवद्भक्तोंकी महिमा
    • गीताके अनुसार स्थितप्रज्ञ, भक्त और गुणातीतके लक्षण तथा आचरण
    • +
      भगवत्प्राप्तिके कुछ साधन
      • (१) सांख्ययोग
      • (२) कर्मयोग
    • भगवत्प्राप्तिके चार साधनोंकी सुगमताका रहस्य
    • कल्याणप्राप्तिकी कई युक्तियाँ
    • परमानन्दकी प्राप्तिके लिये साधनकी आवश्यकता
    • ब्राह्मणत्वकी रक्षा परम आवश्यक है
    • +
      बाल-शिक्षा
      • सदाचार
      • संयम
      • ब्रह्मचर्य
      • विद्या
      • माता, पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंकी सेवा
      • गुरुकी सेवा
      • माता-पिताकी सेवा
      • भक्ति
    • कर्मयोगकी सुगमता
    • भगवान् अवतार कब लेते हैं?
    • गीतोक्त दिव्यदृष्टि
    • आज्ञापालन और प्रणाम
    • भगवद्दर्शनकी उत्कण्ठा
    • चेतावनी
    • +
      नवधा भक्ति
      • श्रवण
      • कीर्तन
      • स्मरण
      • पाद-सेवन
      • अर्चन
      • वन्दन
      • दास्य
      • सख्य
      • आत्मनिवेदन
    • अर्थ और प्रभावसहित नाम-जपका महत्त्व
    • ध्यानावस्थामें प्रभुसे वार्तालाप
    • परमात्माके ज्ञानसे परम शान्ति
    • +
      भगवत्कृपा
      • (पद-पदपर दर्शन करनेका प्रकार)
    • शरणागतिका स्वरूप और फल
    • +
      भगवान् की शरणसे परमपदकी प्राप्ति
      • बुद्धिका अर्पण
      • मनका अर्पण
      • इन्द्रियोंका अर्पण
      • शरीरका अर्पण
    • गीताका रहस्य
    • प्रकृति-पुरुषका विवेचन
    • +
      समाधियोग
      • (१) सवितर्क
      • (२) निर्वितर्क
    • +
      अष्टांगयोग
      • १—यम
      • २—नियम
      • ३—आसन और आसनसिद्धिका फल
      • ४—प्राणायाम
      • प्राणायामका फल
      • ५—प्रत्याहार और उसका फल
      • ६—धारणा
      • ७—ध्यान
      • ८—समाधि
    • विद्या, अविद्या और सम्भूति, असम्भूतिका तत्त्व
    • आध्यात्मिक प्रश्नोत्तर
    • आचरण करने योग्य पचीस बातें
  • +
    तत्त्वचिन्तामणि भाग—५
    • +
      मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामके गुण और चरित्र
      • गुरुभक्ति
      • पितृभक्ति
      • मातृभक्ति
      • भ्रातृप्रेम
      • पत्नीप्रेम और एकपत्नीव्रत
      • भक्तवत्सलता
      • शरणागतवत्सलता
      • सखाओंसे प्रेम
      • दयालुता
      • प्रजावत्सलता
      • सब लोग भरतजीके साथ चित्रकूट गये।
    • हमारा लक्ष्य और कर्तव्य
    • जीवनका रहस्य
    • कुछ धारण करनेयोग्य अमूल्य बातें
    • +
      ब्रह्मचर्य
      • ब्रह्मचर्यकी रक्षासे लाभ और उसके नाशसे हानियाँ
      • ब्रह्मचर्यरक्षाके उपाय
    • त्रिविध तप
    • धर्मके नामपर पाप
    • सच्ची वीरता
    • +
      समाजके कुछ त्याग करनेयोग्य दोष
      • रहन-सहन
      • खान-पान
      • वेष-भूषा
      • रस्म-रिवाज
      • चरित्रगठन और स्वास्थ्य
      • कुविचारोंका प्रचार
      • बहम और मिथ्या विश्वास
      • व्यवहार-बर्ताव
      • व्यापारके नामपर जूआ
    • प्राचीन तथा आधुनिक संस्कृति
    • धर्म-तत्त्व
    • पशु-धन
    • वनस्पति घीसे हानि
    • प्राचीन हिन्दू राजाओंका आदर्श
    • परलोक और पुनर्जन्म
    • तीर्थोंमें पालन करने योग्य कुछ उपयोगी बातें
    • शोकनाशके उपाय
    • श्रद्धा-विश्वास और प्रेम
    • कुछ साधनसम्बन्धी बातें
    • काम करते हुए भगवत्-प्राप्तिकी साधना
    • +
      कुछ उपयोगी साधन
      • अचिन्त्य ब्रह्मकी उपासना
      • चराचररूप ब्रह्मकी उपासना
      • संकल्पब्रह्मकी उपासना
      • शब्दब्रह्मकी उपासना
      • नि:स्वार्थ कर्म-साधन
      • सेवा-साधन
      • पंच महायज्ञ-साधन
      • विषय-हवनरूप साधन
    • सन्ध्या-गायत्रीका महत्त्व
    • अवतारका सिद्धान्त
    • भगवान् की दया
    • अनन्य प्रेम और परम श्रद्धा
    • नामकी अनन्त महिमा
    • ध्यान-साधन
    • प्रेम और समता
    • शरणागति और प्रेम
    • प्रेम-साधन
    • +
      श्रीमद्भगवद्गीताका तात्त्विक विवेचन
      • गीता-महिमा
      • गीताका तात्पर्य
      • सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठाका स्वरूप
      • (१) निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग।
      • (२) काम्य कर्मोंका त्याग।
      • (३) तृष्णाका सर्वथा त्याग।
      • (४) स्वार्थके लिये दूसरोंसे सेवा करानेका त्याग।
      • (५) सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंमें आलस्य और फलकी इच्छाका सर्वथा त्याग।
      • (६) संसारके सम्पूर्ण पदार्थोंमें और कर्मोंमें ममता और आसक्तिका सर्वथा त्याग।
      • (७) संसार, शरीर और सम्पूर्ण कर्मोंमें सूक्ष्म वासना और अहंभावका सर्वथा त्याग।
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