जो भगवान् के कृपाप्राप्त जन हैं, उनमें न संकीर्णता सम्भव है, न भेददृष्टि। भक्तश्रेष्ठ सूरदासजीके आराध्य यद्यपि नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं; किंतु भगवान् श्रीराम और श्रीकृष्णमें सूरदासजीकी तो अभेद-बुद्धि है। सूरदासजीने पूरे श्रीमद्भागवतके चरितोंका अपने पदोंमें गान किया है। सूरदासजीके रामचरित-सम्बन्धी जितने पद उपलब्ध हो सके हैं, वे सब इस संग्रहमें दिये गये हैं। आशा है, सूर-साहित्यके प्रेमियों तथा श्रीरामभक्तोंको सूरदासजीके श्रीरामचरितके पदोंका यह अनुवादयुक्त संग्रह प्रिय लगेगा और इसे पाकर वे प्रसन्न होंगे।