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॥ श्रीहरि:॥
हिन्दी
ई – पुस्तकें
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/ ई – पुस्तकें
/ सुखी बननेके उपाय
सुखी बननेके उपाय
लेखक
श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार
भाषा
हिन्दी/संस्कृत
पुस्तक पढ़ें
विषय-सूची
•
प्रथम पृष्ठ
•
नम्र निवेदन
•
धर्मके विविध रूप
+
श्रीभगवत्पूजन-पद्धतिका सामान्य परिचय
•
अष्ट-काल
•
प्रात:-स्नान
•
पुष्प-चयन-विधि
•
तुलसी-चयन-विधि
•
बिल्वपत्र-चयन-विधि
•
पूजाके उपकरण
•
अष्टांग अर्घ्य
•
मधुपर्क
•
पूजार्थ जल-ग्रहण
•
जल-शुद्धि
•
पूजोपकरण-स्थापन-प्रणाली
•
घण्टा-स्थापन-विधि
•
दिग्बन्धन
•
विघ्न-निवारण
•
पूजाके लिये आसन
•
आसन-शुद्धि
•
उपवेशन-विधि
•
तिलक-धारण-विधि
•
आचमन-विधि
•
पाद्यादि-अर्पणके नियम
•
श्रीभगवत्स्नान-विधि
•
स्नान-विधि
•
पंचामृतसे श्रीभगवदभिषेक
•
चन्दन घिसनेका नियम
•
गन्ध-अर्पण-विधि
•
पुष्प-शुद्धि
•
पत्र-पुष्प आदिके अर्पणकी विधि
•
तुलसी-अर्पण-विधि
•
धूप-अर्पण-विधि
•
दीप-अर्पण-विधि
•
षोडशोपचार-पूजा-विधि
+
धर्ममय भगवान् श्रीकृष्ण
•
श्रीकृष्णका ब्रह्मभूत स्तोत्र
+
महाभारतमें श्रीकृष्ण-महिमा
•
जनमेजयके प्रति वैशम्पायनके वचन
•
पाण्डवोंके राजसूय-यज्ञमें शिशुपालके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी अग्रपूजाका विरोध किये जानेपर भीष्मजी कहते हैं
•
धर्मराज युधिष्ठिरके प्रति महर्षि मार्कण्डेय कहते हैं
•
जयद्रथके प्रति भगवान् शंकरके वचन
•
दुर्योधनके प्रति धृतराष्ट्रके वचन
•
दुर्योधनके प्रति विदुरके वचन
•
धृतराष्ट्रके प्रति संजयके वचन
•
धृतराष्ट्र संजयसे कहते हैं
•
धृतराष्ट्रके प्रति दुर्योधनके वचन
•
विदुर कहते हैं—
•
पितामह भीष्म दुर्योधनसे कहते हैं
•
दुर्योधनके प्रति पितामह भीष्मके वचन
•
संजयके प्रति धृतराष्ट्रके वचन
•
ऋषि-मुनियोंके पूछनेपर उनके प्रति भगवान् महेश्वरके वचन
•
युधिष्ठिरके प्रति शर-शय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्मके वचन
•
भगवान् श्रीकृष्णके कुछ मन्त्र
+
भगवान् श्रीकृष्णके सार्वभौम
•
कल्याणकारी वचनामृत
•
पण्डित (ज्ञानी) अनिवार्य व्यवहार-भेदवाले प्राणियोंमें भी समदर्शी होते हैं
•
पण्डित (ज्ञानी) कौन है?
•
समदर्शी महात्माका व्यवहार
•
ब्रह्मज्ञानी न हर्षित होता है, न उद्विग्न
•
आत्मा और भगवान् को सर्वत्र देखनेवाला योगी श्रेष्ठ है
•
ज्ञानी पुरुषकी अनुभूति
•
ज्ञानाग्निसे सब कर्म भस्म हो जाते हैं
•
भोगियोंकी रात्रि—मुनियोंके दिन
•
उत्तम योगी कौन है?
•
महात्मा ही निरपेक्ष सुखको जानते हैं
•
शान्तिको कौन प्राप्त होता है?
•
कृतकृत्य कौन है?
•
सुखपूर्वक बन्धनसे मुक्त कौन होता है?
•
स्थितप्रज्ञ सम रहता है
•
कर्म करते हुए भी किसको बन्धन नहीं होता?
•
कर्म करते हुए ही निष्पाप कौन रहता है?
•
आत्माकी अमरता
•
कैसे भक्त भगवान् को प्रिय हैं?
•
चार प्रकारके भक्त
•
भक्तका स्वरूप, महत्त्व और उसके प्रति भगवान् का प्रेम
•
भगवान् भक्तके पीछे-पीछे घूमा करते हैं
•
भक्त त्रिभुवनको पवित्र करता है
•
भगवान् के गुण-श्रवणका फल
•
भगवान् के कीर्तनका महत्त्व
•
भगवान् किसके द्वारा खरीदे गये?
•
भगवत्प्रेमसे आनन्द
•
चाण्डाल भक्तकी भी महत्ता
•
शूद्रका भक्तिपूर्वक दिया हुआ पदार्थ भगवान् सिर चढ़ाते हैं
•
भगवान् भक्तमें, भक्त भगवान् में
•
पाप करनेवाला भी अनन्य भजन करनेपर शाश्वत शान्ति पाता है
•
भक्तिसे शीघ्र कर्मक्षय
•
भगवान् को छोड़कर दूसरी ओर दौड़नेवाला मूर्ख है
•
भक्तिपूर्वक अर्पित पदार्थ भगवान् खाते हैं
•
सब भगवान् के अर्पण करनेवाला कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है
•
भगवत्स्मरणकी महिमा
•
अनन्य चिन्तन करनेवालेके योगक्षेम भगवान् वहन करते हैं
•
अपने कर्मसे भगवान् की पूजा
•
ध्यानका साधन
•
भगवान् संसार-सागरसे तुरंत किसको तार देते हैं?
•
सर्वगुह्यतम परम साधन—शरणागति
•
शरणागतके लिये शोककी वस्तु नहीं रह जाती
•
असम्मूढ़ कौन है?
•
मूढ़ कौन है?
•
गोपियोंका स्वरूप
•
गोपी-महिमा
•
भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हैं
•
सारे यज्ञोंके भोक्ता और स्वामी भगवान् ही हैं
•
भगवान् के सिवा और कुछ भी नहीं है
•
भगवान् में सत्य और धर्म
•
सबमें भगवान् का तेज है
•
भगवान् का अवतार कब और क्यों होता है?
•
भगवान् के जन्म-कर्मको जाननेके फल
•
भगवान् को जो जैसे भजता है, वैसे ही भगवान् उसे भजते हैं
•
श्रीकृष्णका मारनेवालेके साथ भी आदर्श व्यवहार
•
सत्संग तथा भक्तियोग
•
सत्संगकी महिमा
•
संत ही महान् तीर्थ हैं
•
अमूल्य मानवशरीरके द्वारा भगवान् की प्राप्ति करनी चाहिये
•
अहंकार महान् विष है
•
ममतासे हानि और ममता-त्यागसे परम लाभ
•
ममतारूपी मलके परित्यागमें ही कल्याण है
•
कामनाओंका निग्रह ही धर्म और मोक्षका मूल है
•
शम-तितिक्षा आदिके यथार्थ अर्थ
•
अहिंसा परम धर्म है
•
सत्कर्मरहित दिन व्यर्थ जाता है
•
श्रद्धाकी महिमा
•
अश्रद्धासे कोई फल नहीं
•
सांख्ययोग और कर्मयोग फलरूपमें एक ही हैं
•
संन्यासी कौन है?
•
निष्कामकर्मयोग
•
स्वधर्ममें मरना भी श्रेष्ठ है
•
ब्राह्मण, गौ, देश आदिके लिये प्राण-त्याग करनेवाला स्वर्गको जाता है
•
वर्णाश्रमधर्मका पालन आवश्यक है
•
भगवान् धर्मके पक्षमें हैं
•
साधारण धर्म
•
ब्राह्मणकी महिमा
•
गोदानकी महत्ता
•
गौको घास देना महापुण्य है
•
गौको घास चरनेसे रोकना और गौ-ब्राह्मणको मारना महापाप है
•
माता-पिताकी सेवाका महत्त्व
•
माता-पिता-गुरुकी महिमा
•
जैसा चिन्तन, वैसा ही परिणाम
•
विषय-चिन्तन ही सर्वनाशमें कारण है
•
दूसरोंकी निन्दा-स्तुति करनेवाले साधनसे गिर जाते हैं
•
मित्रका धर्म
•
पाण्डवबन्धु श्रीकृष्ण
•
असंतोषी ही दरिद्र है
•
संतोषके बिना सुख नहीं
•
तृष्णा
•
किन कर्मोंसे बन्धन होता है?
•
विषयासक्तिकी निवृत्ति कब होती है?
•
स्त्री-संगसे बड़ी हानि
•
स्त्री-महिमा
•
सती-महिमा
•
नरकके तीन द्वार—काम, क्रोध, लोभ
•
काम-क्रोध ही पापमें कारण हैं
•
काम-क्रोधसे नरकप्राप्ति
•
क्षत्रियधर्म
•
सुभद्राके प्रति क्षात्रधर्मकी महत्ताका कथन
•
शत्रुके घरमें प्रवेश कैसे करें?
•
प्रबल और सुसंगठित शत्रुको जीतनेका उपाय
•
किसको मारना धर्म है?
•
लुटेरोंसे रक्षाके लिये असत्य बोलना भी उचित है
•
कैसे सभासद् नष्ट हो जाते हैं?
•
किसीके घर भोजन किस कारण किया जाता है?
•
गृहस्थाश्रमकी महिमा
•
स्नानकी आवश्यकता
•
समझ-बूझकर कर्म करनेवाले सफल होते हैं
•
कर्मानुसार ही फलकी प्राप्ति
•
कुश्ती समान बलवानोंमें होती है
•
श्रेष्ठ पुरुषोंकी लोग नकल करते हैं
•
पाँच प्रकारकी शुद्धि
•
जीते-जी अपना कल्याण-कार्य कर लेना चाहिये
•
जीव अकेला ही आता-जाता है
•
बड़ोंका अपमान ही उनका वध करना है
•
अपने मुँह अपना गुणगान करना ही आत्महत्या है
•
तीन दान श्रेष्ठ हैं
•
धनका सदुपयोग दानमें ही है
•
दान न करनेवाला दरिद्र तथा पापी होता है
•
विद्यार्थियोंकी सहायताका महत्त्व
•
देहकी अन्तिम शोचनीय अवस्थाएँ
•
तीर्थका फल और उसका अधिकारी
•
पाँच पदार्थ कभी हेय नहीं होते
•
असार-संसारके छ: सार पदार्थ
•
भगवान् को प्रणाम करनेवाले निर्भय होते हैं
•
सर्वधर्मान् परित्यज्य
+
सेवापराध और नामापराध
•
सेवापराध
•
नामापराध
•
महत्त्वपूर्ण उपासना—सर्वभूतहित
•
दया—धर्मका स्वरूप
•
विश्वास-धर्म—भगवान् का प्रत्येक विधान मंगलमय
•
परहित-धर्म
+
रामनाम और गाँधीजी
•
पुराने संस्मरण
•
रामनामका मूल्य
•
अच्युत, अनन्त और गोविन्द-नामकी महिमाका वर्णन
+
भगवन्नाम सर्वोपरि तीर्थ
•
अगस्तिरुवाच
+
तीर्थोंकी महिमा, तीर्थ-सेवन-विधि, तीर्थ-सेवनका फल और विभिन्न तीर्थ
•
संत-महात्मा तीर्थरूप हैं
•
तीन प्रकारके तीर्थ
•
तीर्थयात्रा क्यों करनी चाहिये?
•
तीर्थयात्राकी विधि
•
तीर्थ-सेवनके नियम
•
तीर्थसेवनका परम फल
•
तीर्थोंमें और क्या-क्या करना चाहिये?
•
मातृतीर्थ, पितृतीर्थ, गुरुतीर्थ, भार्यातीर्थ और भर्तृतीर्थ
•
नास्ति मातृसमं तीर्थं पुत्राणां च पितु: समम्।
•
तीर्थयात्राके विभिन्न फल
•
तीर्थोंकी वर्तमान बुरी स्थिति
•
तीर्थयात्रा किसलिये? तीर्थयात्रामें पाप-पुण्य
•
तीर्थमें जाकर
•
तीर्थयात्रामें क्या करें?
•
तीर्थयात्रामें कर्तव्य, तीर्थयात्रामें छोड़नेकी चीजें
•
राजनीति, धर्म और तीर्थ
•
मधुर
•
परमार्थकी पगडंडियाँ
+
‘कल्याण’ में भूत-प्रेत-चर्चा क्यों?—प्रेतयोनि कभी न मिले इसलिये!
•
प्रेतयोनि सत्य है
•
प्रेतयोनि क्यों मिलती है?
•
प्रेतयोनिसे छूटनेके उपाय
•
कौन प्रेत नहीं होते?
•
प्रेतका आवेश कब, कहाँ होता है? और उससे बचनेके उपाय
+
वर्तमान विश्व-संकटके निवारणके लिये प्रार्थना और भगवन्नामका आश्रय आवश्यक
•
वाल्मीकीय रामायणमें सम्पुट
•
अन्तिम पृष्ठ
सम्बंधित ई-पुस्तकें
सुख-शान्ति का मार्ग
परमार्थ की मन्दाकिनी
दिव्य सुख की सरिता
समाज सुधार
दीन-दु:खियों के प्रति कर्तव्य
श्रीरामचरितमानस (सटीक)
सुन्दरकाण्ड (सटीक)
गीता चिन्तन
पद रत्नाकर
प्रार्थना
श्रीराधा माधव चिन्तन
साधन पथ
अमृत कण
श्री भगवन्नाम-चिन्तन
दाम्पत्य जीवन का आदर्श
ब्रह्मचर्य
श्रीराधा माधव रस सुधा (षोडश गीत)
सत्संग के बिखरे मोती
मानव जीवन का लक्ष्य
महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
तुलसी दल
संत वाणी
मन को वश करने के कुछ उपाय
श्रीभगवन्नाम
श्री राम चिन्तन
दैनिक कल्याण सूत्र
गोपी प्रेम
भगवच्चर्चा (सभी छहों भाग एक साथ)
गो सेवा के चमत्कार
नैवेद्य
उपनिषदों के चौदह रत्न
प्रेम दर्शन (नारद भक्ति सूत्र की व्...
ईश्वर की सत्ता और महत्ता
स्त्री धर्म प्रश्नोत्तरी
सत्संग सुधा
पूर्ण समर्पण
नारी शिक्षा
साधकों का सहारा
भवरोग की रामबाण दवा
दु:ख क्यों होते हैं?
भगवान् सदा तुम्हारे साथ हैं
दु:ख में भगवत्कृपा
भगवच्चर्चा
कल्याण कुंज
भगवत्प्राप्ति एवं हिंदू संस्कृति
महाभाव कल्लोलिनी
कल्याणकारी आचरण
मधुर
विवाह में दहेज
शान्ति कैसे मिले?
सिनेमा – मनोरञ्जन या विनाश का साधन
व्यवहार और परमार्थ
मानव धर्म
लोक परलोक का सुधार
दिव्य सन्देश
सुखी बनो
गोवध भारत का कलंक
आनन्द की लहरें
मानव कल्याण के साधन
सफलता के शिखर की सीढ़ियाँ
आनन्द का स्वरूप
भगवान् की पूजा के पुष्प
वर्तमान शिक्षा
भगवच्चर्चा (भाग-५)
सुख-शान्ति का मार्ग
परमार्थ की मन्दाकिनी
दिव्य सुख की सरिता
समाज सुधार
दीन-दु:खियों के प्रति कर्तव्य
श्रीरामचरितमानस (सटीक)
सुन्दरकाण्ड (सटीक)
गीता चिन्तन
पद रत्नाकर
प्रार्थना
श्रीराधा माधव चिन्तन
साधन पथ
अमृत कण
श्री भगवन्नाम-चिन्तन
दाम्पत्य जीवन का आदर्श
ब्रह्मचर्य
श्रीराधा माधव रस सुधा (षोडश गीत)
सत्संग के बिखरे मोती
मानव जीवन का लक्ष्य
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तुलसी दल
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श्रीभगवन्नाम
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गो सेवा के चमत्कार
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व्यवहार और परमार्थ
मानव धर्म
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दिव्य सन्देश
सुखी बनो
गोवध भारत का कलंक
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दीन-दु:खियों के प्रति कर्तव्य