॥ श्रीहरि:॥

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सुखी बननेके उपाय

श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

हिन्दी/संस्कृत

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    धर्ममय भगवान् श्रीकृष्ण
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    महाभारतमें श्रीकृष्ण-महिमा
    • जनमेजयके प्रति वैशम्पायनके वचन
    • पाण्डवोंके राजसूय-यज्ञमें शिशुपालके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी अग्रपूजाका विरोध किये जानेपर भीष्मजी कहते हैं
    • धर्मराज युधिष्ठिरके प्रति महर्षि मार्कण्डेय कहते हैं
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    • ऋषि-मुनियोंके पूछनेपर उनके प्रति भगवान् महेश्वरके वचन
    • युधिष्ठिरके प्रति शर-शय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्मके वचन
  • भगवान् श्रीकृष्णके कुछ मन्त्र
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    भगवान् श्रीकृष्णके सार्वभौम
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    • पण्डित (ज्ञानी) अनिवार्य व्यवहार-भेदवाले प्राणियोंमें भी समदर्शी होते हैं
    • पण्डित (ज्ञानी) कौन है?
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    • ज्ञानी पुरुषकी अनुभूति
    • ज्ञानाग्निसे सब कर्म भस्म हो जाते हैं
    • भोगियोंकी रात्रि—मुनियोंके दिन
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    • महात्मा ही निरपेक्ष सुखको जानते हैं
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    • सुखपूर्वक बन्धनसे मुक्त कौन होता है?
    • स्थितप्रज्ञ सम रहता है
    • कर्म करते हुए भी किसको बन्धन नहीं होता?
    • कर्म करते हुए ही निष्पाप कौन रहता है?
    • आत्माकी अमरता
    • कैसे भक्त भगवान् को प्रिय हैं?
    • चार प्रकारके भक्त
    • भक्तका स्वरूप, महत्त्व और उसके प्रति भगवान् का प्रेम
    • भगवान् भक्तके पीछे-पीछे घूमा करते हैं
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    • भगवान् के गुण-श्रवणका फल
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    • शूद्रका भक्तिपूर्वक दिया हुआ पदार्थ भगवान् सिर चढ़ाते हैं
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    • पाप करनेवाला भी अनन्य भजन करनेपर शाश्वत शान्ति पाता है
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    • सब भगवान् के अर्पण करनेवाला कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है
    • भगवत्स्मरणकी महिमा
    • अनन्य चिन्तन करनेवालेके योगक्षेम भगवान् वहन करते हैं
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    • भगवान् संसार-सागरसे तुरंत किसको तार देते हैं?
    • सर्वगुह्यतम परम साधन—शरणागति
    • शरणागतके लिये शोककी वस्तु नहीं रह जाती
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    • भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हैं
    • सारे यज्ञोंके भोक्ता और स्वामी भगवान् ही हैं
    • भगवान् के सिवा और कुछ भी नहीं है
    • भगवान् में सत्य और धर्म
    • सबमें भगवान् का तेज है
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    • भगवान् के जन्म-कर्मको जाननेके फल
    • भगवान् को जो जैसे भजता है, वैसे ही भगवान् उसे भजते हैं
    • श्रीकृष्णका मारनेवालेके साथ भी आदर्श व्यवहार
    • सत्संग तथा भक्तियोग
    • सत्संगकी महिमा
    • संत ही महान् तीर्थ हैं
    • अमूल्य मानवशरीरके द्वारा भगवान् की प्राप्ति करनी चाहिये
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    • ममतासे हानि और ममता-त्यागसे परम लाभ
    • ममतारूपी मलके परित्यागमें ही कल्याण है
    • कामनाओंका निग्रह ही धर्म और मोक्षका मूल है
    • शम-तितिक्षा आदिके यथार्थ अर्थ
    • अहिंसा परम धर्म है
    • सत्कर्मरहित दिन व्यर्थ जाता है
    • श्रद्धाकी महिमा
    • अश्रद्धासे कोई फल नहीं
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    • संन्यासी कौन है?
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    • स्वधर्ममें मरना भी श्रेष्ठ है
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    • वर्णाश्रमधर्मका पालन आवश्यक है
    • भगवान् धर्मके पक्षमें हैं
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    • ब्राह्मणकी महिमा
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    • गौको घास देना महापुण्य है
    • गौको घास चरनेसे रोकना और गौ-ब्राह्मणको मारना महापाप है
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    • माता-पिता-गुरुकी महिमा
    • जैसा चिन्तन, वैसा ही परिणाम
    • विषय-चिन्तन ही सर्वनाशमें कारण है
    • दूसरोंकी निन्दा-स्तुति करनेवाले साधनसे गिर जाते हैं
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    • नरकके तीन द्वार—काम, क्रोध, लोभ
    • काम-क्रोध ही पापमें कारण हैं
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    • शत्रुके घरमें प्रवेश कैसे करें?
    • प्रबल और सुसंगठित शत्रुको जीतनेका उपाय
    • किसको मारना धर्म है?
    • लुटेरोंसे रक्षाके लिये असत्य बोलना भी उचित है
    • कैसे सभासद् नष्ट हो जाते हैं?
    • किसीके घर भोजन किस कारण किया जाता है?
    • गृहस्थाश्रमकी महिमा
    • स्नानकी आवश्यकता
    • समझ-बूझकर कर्म करनेवाले सफल होते हैं
    • कर्मानुसार ही फलकी प्राप्ति
    • कुश्ती समान बलवानोंमें होती है
    • श्रेष्ठ पुरुषोंकी लोग नकल करते हैं
    • पाँच प्रकारकी शुद्धि
    • जीते-जी अपना कल्याण-कार्य कर लेना चाहिये
    • जीव अकेला ही आता-जाता है
    • बड़ोंका अपमान ही उनका वध करना है
    • अपने मुँह अपना गुणगान करना ही आत्महत्या है
    • तीन दान श्रेष्ठ हैं
    • धनका सदुपयोग दानमें ही है
    • दान न करनेवाला दरिद्र तथा पापी होता है
    • विद्यार्थियोंकी सहायताका महत्त्व
    • देहकी अन्तिम शोचनीय अवस्थाएँ
    • तीर्थका फल और उसका अधिकारी
    • पाँच पदार्थ कभी हेय नहीं होते
    • असार-संसारके छ: सार पदार्थ
    • भगवान् को प्रणाम करनेवाले निर्भय होते हैं
  • सर्वधर्मान् परित्यज्य
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    सेवापराध और नामापराध
    • सेवापराध
    • नामापराध
  • महत्त्वपूर्ण उपासना—सर्वभूतहित
  • दया—धर्मका स्वरूप
  • विश्वास-धर्म—भगवान् का प्रत्येक विधान मंगलमय
  • परहित-धर्म
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    • पुराने संस्मरण
  • रामनामका मूल्य
  • अच्युत, अनन्त और गोविन्द-नामकी महिमाका वर्णन
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    भगवन्नाम सर्वोपरि तीर्थ
    • अगस्तिरुवाच
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    तीर्थोंकी महिमा, तीर्थ-सेवन-विधि, तीर्थ-सेवनका फल और विभिन्न तीर्थ
    • संत-महात्मा तीर्थरूप हैं
    • तीन प्रकारके तीर्थ
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    • तीर्थयात्राकी विधि
    • तीर्थ-सेवनके नियम
    • तीर्थसेवनका परम फल
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    • मातृतीर्थ, पितृतीर्थ, गुरुतीर्थ, भार्यातीर्थ और भर्तृतीर्थ
    • नास्ति मातृसमं तीर्थं पुत्राणां च पितु: समम्।
    • तीर्थयात्राके विभिन्न फल
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  • तीर्थयात्रा किसलिये? तीर्थयात्रामें पाप-पुण्य
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  • तीर्थयात्रामें कर्तव्य, तीर्थयात्रामें छोड़नेकी चीजें
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    ‘कल्याण’ में भूत-प्रेत-चर्चा क्यों?—प्रेतयोनि कभी न मिले इसलिये!
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    • प्रेतका आवेश कब, कहाँ होता है? और उससे बचनेके उपाय
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