भारतीय आर्य-संस्कृतिमें स्त्रियोंका स्थान बड़े ही महत्त्वका है। आर्यशास्त्रोंने स्त्रियोंको जितना ऊँचा स्थान दिया है, उनकी मर्यादाका जितना विचार किया है, साथ ही उनके जीवनको संयम तथा सेवासे अनुप्राणित कर जितना पवित्रतम बनानेकी चेष्टा की है, आदर्श माता, आदर्श भगिनी, आदर्श पत्नी, आदर्श सती, आदर्श त्यागमयी, आदर्श संयममयी, आदर्श सेवामयी, आदर्श बलिदानमयी, आदर्श वीरांगना, आदर्श लोकहितैषिणी, आदर्श राजनीतिनिपुणा, आदर्श कार्यकुशला, आदर्श गृहिणी और आदर्श पतिव्रता निर्माण करनेकी जितनी शिक्षा दी है, वह परम आदर्श है और जगत् के इतिहासमें सर्वथा विलक्षण और अनुकरणीय है।
हमारी आर्य-संस्कृतिमें किस प्रकारकी आदर्श महिलाएँ हुई हैं, स्त्रियोंका क्या कर्तव्य है, उनका आचार-व्यवहार किस प्रकारका होना चाहिये, इन सब बातोंपर संक्षेपसे इस ‘स्त्रियोंके लिये कर्तव्यशिक्षा’ नामक पुस्तकमें विचार किया गया है और बड़ी सुन्दरताके साथ उनके कर्तव्यका प्रतिपादन किया गया है।