॥ श्रीहरि:॥

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श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी

श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज

हिन्दी/संस्कृत

विश्व-साहित्यमें श्रीमद्भगवद्गीता का अद्वितीय स्थान है। यह साक्षात् भगवान् के श्रीमुखसे नि:सृत परम रहस्यमयी दिव्य वाणी है। इसमें स्वयं भगवान् ने अर्जुनको निमित्त बनाकर मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये उपदेश दिया है। इस छोटे-से ग्रन्थमें भगवान् ने अपने हृदयके बहुत ही विलक्षण भाव भर दिये हैं, जिनका आजतक कोई पार नहीं पा सका और न पा ही सकता है।
हमारे परमश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज ने इस अगाध गीतार्णवमें गहरे उतरकर अनेक गुह्यतम अमूल्य रत्न ढूँढ़ निकाले हैं, जिन्हें उन्होंने इस ‘साधक-संजीवनी’ हिन्दी-टीकाके माध्यमसे साधकोंके कल्याणार्थ उदारहृदयसे वितरित किया है । परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थ-रत्नको अवश्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और यथासाध्य आचरणमें लानेका प्रयत्न करें।
  • प्रथम पृष्ठ
  • नम्र निवेदन
  • साधक-संजीवनी परिशिष्टका नम्र निवेदन
  • साधक-संजीवनी-कोश
  • स्तुति
  • प्राक्‍कथन
  • वन्दना
  • +
    अथ प्रथमोऽध्याय:
    • +
      १-११ पाण्डव और कौरव-सेनाके मुख्य-मुख्य महारथियोंके नामों का वर्णन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
    • +
      १२-१९ दोनों पक्षोंकी सेनाओंके शंखवादनका वर्णन
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
    • +
      २०-२७ अर्जुनके द्वारा सेना-निरीक्षण
      • (श्लोक-२०)
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
      • (श्लोक-२३)
      • (श्लोक-२४)
      • (श्लोक-२५)
      • (श्लोक-२६)
      • (श्लोक-२७)
    • +
      २८-४७ अर्जुनके द्वारा कायरता, शोक और पश्चात्तापयुक्त वचन कहना तथा संजयद्वारा शोकाविष्ट अर्जुनकी अवस्थाका वर्णन
      • (श्लोक-२८)
      • (श्लोक-२९)
      • (श्लोक-३०)
      • (श्लोक-३१)
      • (श्लोक-३२)
      • (श्लोक-३३)
      • (श्लोक-३४)
      • (श्लोक-३५)
      • (श्लोक-३६)
      • (श्लोक-३७)
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      • (श्लोक-३९)
      • (श्लोक-४०)
      • (श्लोक-४१)
      • (श्लोक-४२)
      • (श्लोक-४३)
      • (श्लोक-४४)
      • (श्लोक-४५)
      • (श्लोक-४६)
      • (श्लोक-४७)
  • +
    अथ द्वितीयोऽध्याय:
    • +
      १-१० अर्जुनकी कायरताके विषयमें संजयद्वारा भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादका वर्णन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
    • +
      ११-३० सांख्ययोगका वर्णन
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
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      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
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      • (श्लोक-१९)
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      • (श्लोक-२३)
      • (श्लोक-२४)
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      • (श्लोक-२७)
      • (श्लोक-२८)
      • (श्लोक-२९)
      • (श्लोक-३०)
    • +
      ३१-३८ क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन
      • (श्लोक-३१)
      • (श्लोक-३२)
      • (श्लोक-३३)
      • (श्लोक-३४)
      • (श्लोक-३५)
      • (श्लोक-३६)
      • (श्लोक-३७)
      • (श्लोक-३८)
    • +
      ३९-५३ कर्मयोगका वर्णन
      • (श्लोक-३९)
      • (श्लोक-४०)
      • (श्लोक: ४१ - ७२)
      • (श्लोक-४१)
      • (श्लोक-४२)
      • (श्लोक-४३)
      • (श्लोक-४४ )
      • (श्लोक-४५)
      • (श्लोक-४६)
      • (श्लोक-४७)
      • (श्लोक-४८)
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      • (श्लोक-५१)
      • (श्लोक-५२)
      • (श्लोक-५३)
    • +
      ५४-७२ स्थितप्रज्ञके लक्षणों आदिका वर्णन
      • (श्लोक-५४)
      • (श्लोक-५५)
      • (श्लोक-५६)
      • (श्लोक-५७)
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      • (श्लोक-६१)
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      • (श्लोक-६६)
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      • (श्लोक-७०)
      • (श्लोक-७१)
      • (श्लोक-७२)
  • +
    अथ तृतीयोऽध्याय:
    • +
      १-८ सांख्ययोग और कर्मयोगकी दृष्टिसे कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकताका निरूपण
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
    • +
      ९-१९ यज्ञ और सृष्टिचक्रकी परम्परा सुरक्षित रखने के लिये कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकताका निरूपण
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
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      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
    • +
      २०-२९ लोक-संग्रहके लिये कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकताका निरूपण
      • (श्लोक-२०)
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
      • (श्लोक-२३)
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      • (श्लोक: २५ - ४३)
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      • (श्लोक-२६)
      • (श्लोक-२७)
      • (श्लोक-२८)
      • (श्लोक-२९)
    • +
      ३०-३५ राग-द्वेषरहित होकर स्वधर्मके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेकी प्रेरणा
      • (श्लोक-३०)
      • (श्लोक-३१)
      • (श्लोक-३२)
      • (श्लोक-३३)
      • (श्लोक-३४)
      • (श्लोक-३५)
    • +
      ३६-४३ पापोंके कारणभूत 'काम'को मारनेकी प्रेरणा
      • (श्लोक-३६)
      • (श्लोक-३७)
      • (श्लोक-३८)
      • (श्लोक-३९)
      • (श्लोक-४०)
      • (श्लोक-४१)
      • (श्लोक-४२)
      • (श्लोक-४३)
  • +
    अथ चतुर्थोऽध्याय:
    • +
      १-१५ कर्मयोगकी परम्परा और भगवान‍्के जन्मों तथा कर्मोंकी दिव्यताका वर्णन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
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      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
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      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
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      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
    • +
      १६-३२ कर्मोंके तत्त्वका और तदनुसार यज्ञोंका वर्णन
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
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      • (श्लोक-२७)
      • (श्लोक-२८)
      • (श्लोक-२९)
      • (श्लोक-३०)
      • (श्लोक-३१)
      • (श्लोक-३२)
    • +
      ३३-४२ ज्ञानयोग और कर्मयोगकी प्रशंसा तथा प्रेरणा
      • (श्लोक-३३)
      • (श्लोक-३४)
      • (श्लोक-३५)
      • (श्लोक-३६)
      • (श्लोक-३७)
      • (श्लोक-३८)
      • (श्लोक-३९)
      • (श्लोक-४०)
      • (श्लोक-४१)
      • (श्लोक-४२)
  • +
    अथ पञ्चमोऽध्याय:
    • +
      १-६ सांख्ययोग तथा कर्मयोगकी एकताका प्रतिपादन और कर्मयोगकी प्रशंसा
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
    • +
      ७-१२ सांख्ययोग और कर्मयोगके साधनका प्रकार
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
    • +
      १३-२६ फलसहित सांख्ययोगका विषय
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
      • (श्लोक-२०)
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      • (श्लोक-२२)
      • (श्लोक-२३)
      • (श्लोक-२४)
      • (श्लोक-२५)
      • (श्लोक-२६)
    • +
      २७-२९ ध्यान और भक्तिका वर्णन
      • (श्लोक-२७-२८)
      • (श्लोक-२९)
  • +
    अथ षष्ठोऽध्याय:
    • +
      १-४ कर्मयोगका विषय और योगारूढ़ मनुष्यके लक्षण
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
    • +
      ५-९ आत्मोद्धारके लिये प्रेरणा और सिद्ध कर्मयोगीके लक्षण
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
    • +
      १०-१५ आसनकी विधि और फलसहित सगुण-साकारके ध्यानका वर्णन
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
    • +
      १६-२३ नियमोंका और फलसहित स्वरूपके ध्यानका वर्णन
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
      • (श्लोक-२०)
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
      • (श्लोक-२३)
    • +
      २४-२८ फलसहित निर्गुण-निराकारके ध्यानका वर्णन
      • (श्लोक-२४)
      • (श्लोक-२५)
      • (श्लोक-२६)
      • (श्लोक-२७)
      • (श्लोक-२८)
    • +
      २९-३२ सगुण और निर्गुणके ध्यान-योगियोंका अनुभव
      • (श्लोक-२९)
      • (श्लोक-३०)
      • (श्लोक-३१)
      • (श्लोक-३२)
    • +
      ३३-३६ मनके निग्रहका विषय
      • (श्लोक-३३)
      • (श्लोक-३४)
      • (श्लोक-३५)
      • (श्लोक-३६)
    • +
      ३७-४७ योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन और भक्ति-योगीकी महिमा
      • (श्लोक-३७)
      • (श्लोक-३८)
      • (श्लोक-३९)
      • (श्लोक-४०)
      • (श्लोक-४१)
      • (श्लोक-४२)
      • (श्लोक-४३)
      • (श्लोक-४४)
      • (श्लोक-४५)
      • (श्लोक-४६)
      • (श्लोक-४७)
  • +
    अथ सप्तमोऽध्याय:
    • +
      १-७ भगवान‍्के द्वारा समग्ररूपके वर्णनकी प्रतिज्ञा करना तथा अपरा-परा प्रकृतियोंके संयोगसे प्राणियोंकी उत्पत्ति बताकर अपनेको सबका मूल कारण बताना
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
    • +
      ८-१२ कारणरूपसे भगवान‍्की विभूतियोंका वर्णन
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
    • +
      १३-१९ भगवान‍्के शरण होनेवालोंका और शरण न होनेवालोंका वर्णन
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
    • +
      २०-२३ अन्य देवताओंकी उपासनाओंका फलसहित वर्णन
      • (श्लोक-२०)
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
      • (श्लोक-२३)
    • +
      २४-३० भगवान‍्के प्रभावको न जाननेवलोंकी निन्दा और जाननेवालोंकी प्रशंसा तथा भगवान‍्के समग्ररूपका वर्णन
      • (श्लोक-२४)
      • (श्लोक-२५)
      • (श्लोक-२६)
      • (श्लोक-२७)
      • (श्लोक-२८)
      • (श्लोक-२९)
      • (श्लोक-३०)
  • +
    अथाष्टमोऽध्याय:
    • +
      १-७ अर्जुनके सात प्रश्न और भगवान‍्के द्वारा उनका उत्तर देते हुए सब समयमें अपना स्मरण करनेकी आज्ञा देना
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
    • +
      ८-१६ सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-साकारकी उपासनाका फलसहित वर्णन
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
    • +
      १७-२२ ब्रह्मलोकतककी अवधिका और भगवान‍्की महत्ता तथा भक्तिका वर्णन
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
      • (श्लोक-२०)
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
    • +
      २३-२८ शुक्ल और कृष्ण-गतिका वर्णन और उसको जाननेवाले योगीकी महिमा
      • (श्लोक-२३)
      • (श्लोक-२४)
      • (श्लोक-२५)
      • (श्लोक-२६)
      • (श्लोक-२७)
      • (श्लोक-२८)
  • +
    अथ नवमोऽध्याय:
    • +
      १-६ प्रभावसहित विज्ञानका वर्णन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
    • +
      ७-१० महासर्ग और महाप्रलयका वर्णन
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
    • +
      ११-१५ भगवान‍्का तिरस्कार करनेवाले एवं आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेनेवालोंका कथन तथा दैवी प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले भक्तोंके भजनका वर्णन
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
    • +
      १६-१९ कार्य-कारणरूपसे भगवत्स्वरूप विभूतियोंका वर्णन
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
    • +
      २०-२५ सकाम और निष्काम उपासनाका फलसहित वर्णन
      • (श्लोक-२०)
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
      • (श्लोक-२३)
      • (श्लोक-२४)
      • (श्लोक-२५)
    • +
      २६-३४ पदार्थों और क्रियाओंको भगवदर्पण करनेका फल बताकर भक्तिके अधिकारियोंका और भक्तिका वर्णन
      • (श्लोक-२६)
      • (श्लोक-२७)
      • (श्लोक-२८)
      • (श्लोक-२९)
      • (श्लोक-३०)
      • (श्लोक-३१)
      • (श्लोक-३२)
      • (श्लोक-३३)
      • (श्लोक-३४)
  • +
    अथ दशमोऽध्याय:
    • +
      १-७ भगवान‍्की विभूति और योगका कथन तथा उनको जाननेकी महिमा
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
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      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
    • +
      ८-११ फलसहित भगवद्भक्ति और भगवत्कृपाका प्रभाव
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
    • +
      १२-१८ अर्जुनके द्वारा भगवान‍्की स्तुति और योग तथा विभूतियोंको कहनेके लिये प्रार्थना
      • (श्लोक-१२)
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      • (श्लोक-१६)
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      • (श्लोक-१८)
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      १९-४२ भगवान‍्के द्वारा अपनी विभूतियोंका और योगका वर्णन
      • (श्लोक-१९)
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      • (श्लोक-३६)
      • (श्लोक-३७)
      • (श्लोक-३८)
      • (श्लोक-३९)
      • (श्लोक-४०)
      • (श्लोक-४१)
      • (श्लोक-४२)
  • +
    अथ एकादशोऽध्याय:
    • +
      १-८ विराट्‍रूप दिखानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना और भगवान‍्के द्वारा अर्जुनको दिव्यचक्षु प्रदान करना
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
    • +
      ९-१४ संजयद्वारा धृतराष्ट्रके प्रति विराट्‍रूपका वर्णन
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
    • +
      १५-३१ अर्जुनके द्वारा विराट्‍रूपको देखना और उसकी स्तुति करना
      • (श्लोक-१५)
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      • (श्लोक-१७)
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      • (श्लोक-२१)
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      • (श्लोक-२८)
      • (श्लोक-२९)
      • (श्लोक-३०)
      • (श्लोक-३१)
    • +
      ३२-३५ भगवान‍्के द्वारा अपने अत्युग्र विराट्‍रूपका परिचय और युद्धकी आज्ञा
      • (श्लोक-३२)
      • (श्लोक-३३)
      • (श्लोक-३४)
      • (श्लोक-३५)
    • +
      ३६-४६ अर्जुनके द्वारा विराट्‍रूप भगवान‍्की स्तुति-प्रार्थना
      • (श्लोक-३६)
      • (श्लोक-३७)
      • (श्लोक-३८)
      • (श्लोक-३९)
      • (श्लोक-४०)
      • (श्लोक-४१)
      • (श्लोक-४२)
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      • (श्लोक-४४)
      • (श्लोक-४५)
      • (श्लोक-४६)
    • +
      ४७-५० भगवान‍्के द्वारा विराट्‍रूपके दर्शनकी दुर्लभता बताना और भयभीत अर्जुनको आश्वासन देना
      • (श्लोक-४७)
      • (श्लोक-४८)
      • (श्लोक-४९)
      • (श्लोक-५०)
    • +
      ५१-५५ भगवान‍्के द्वारा चतुर्भुजरूपकी महत्ता और उसके दर्शनका उपाय बताना
      • (श्लोक-५१)
      • (श्लोक-५२)
      • (श्लोक-५३)
      • (श्लोक-५४)
      • (श्लोक-५५)
  • +
    अथ द्वादशोऽध्याय:
    • +
      १-१२ सगुण और निर्गुण-उपासकोंकी श्रेष्ठताका निर्णय और भगवत्प्राप्तिके चार साधनोंका वर्णन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
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      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
    • +
      १३-२० सिद्ध-भक्तोंके उनतालीस लक्षणोंका वर्णन
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
      • (श्लोक-२०)
  • +
    अथ त्रयोदशोऽध्याय:
    • +
      १-१८ क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा), ज्ञान और ज्ञेय (परमात्मा)-का भक्ति-सहित विवेचन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
    • +
      १९-३४ ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुषका विवेचन
      • (श्लोक-१९)
      • (श्लोक-२०)
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
      • (श्लोक-२३)
      • (श्लोक-२४)
      • (श्लोक-२५)
      • (श्लोक-२६)
      • (श्लोक-२७)
      • (श्लोक-२८)
      • (श्लोक-२९)
      • (श्लोक-३०)
      • (श्लोक-३१)
      • (श्लोक-३२)
      • (श्लोक-३३)
      • (श्लोक-३४)
  • +
    अथ चतुर्दशोऽध्याय:
    • +
      १-४ ज्ञानकी महिमा और प्रकृति-पुरुषसे जगत‍्की उत्पत्ति
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
    • +
      ५-१८ सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणोंका विवेचन
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
    • +
      १९-२७ भगवत्प्राप्तिका उपाय एवं गुणातीत पुरुषके लक्षण
      • (श्लोक-१९)
      • (श्लोक-२०)
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
      • (श्लोक-२३)
      • (श्लोक-२४)
      • (श्लोक-२५)
      • (श्लोक-२६)
      • (श्लोक-२७)
  • +
    अथ पञ्चदशोऽध्याय:
    • +
      १-६ संसार-वृक्षका तथा उसका छेदन करके भगवान‍्के शरण होनेका और भगवद्धामका वर्णन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
    • +
      ७-११ जीवात्माका स्वरूप तथा उसे जाननेवालेका वर्णन
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
    • +
      १२-१५ भगवान‍्के प्रभावका वर्णन
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
    • +
      १६-२० क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमका वर्णन तथा अध्यायका उपसंहार
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
      • (श्लोक-२०)
  • +
    अथ षोडशोऽध्याय:
    • +
      १-५ फलसहित दैवी और आसुरी सम्पत्तिका वर्णन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
    • +
      ६-८ सत्कर्मोंसे विमुख हुए आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंके दुराचारों और मनोरथोंका फलसहित वर्णन
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
    • +
      ९-१६ आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंके दुराचारों और मनोरथोंका फलसहित वर्णन
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
    • +
      १७-२० आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंके दुर्भाव और दुर्गतिका वर्णन
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
      • (श्लोक-२०)
    • +
      २१-२४ आसुरी-सम्पत्तिके मूलभूत दोष-काम, क्रोध और लोभसे रहित होकर शास्त्रविधिके अनुसार कर्म करनेकी प्रेरणा
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
      • (श्लोक-२३)
      • (श्लोक-२४)
  • +
    अथ सप्तदशोऽध्याय:
    • +
      १-६ तीन प्रकारकी श्रद्धाका और आसुर निश्चयवाले मनुष्योंका वर्णन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
    • +
      ७-१० सात्त्विक, रजस और तामस आहारीकी रुचिका वर्णन
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
    • +
      ११-२२ यज्ञ, तप और दानके तीन-तीन भेदोंका वर्णन
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
      • (श्लोक-१९)
      • (श्लोक-२०)
      • (श्लोक-२१)
      • (श्लोक-२२)
    • +
      २३-२८ 'ॐ तत्सत्'के प्रयोगकी व्याख्या और असत्-कर्मका वर्णन
      • (श्लोक-२३)
      • (श्लोक-२४)
      • (श्लोक-२५)
      • (श्लोक-२६)
      • (श्लोक-२७)
      • (श्लोक-२८)
  • +
    अथाष्टादशोऽध्याय:
    • +
      १-१२ संन्यास और त्यागके विषयमें मतान्तर और कर्मयोगका वर्णन
      • (श्लोक-१)
      • (श्लोक-२)
      • (श्लोक-३)
      • (श्लोक-४)
      • (श्लोक-५)
      • (श्लोक-६)
      • (श्लोक-७)
      • (श्लोक-८)
      • (श्लोक-९)
      • (श्लोक-१०)
      • (श्लोक-११)
      • (श्लोक-१२)
    • +
      १३-४० सांख्ययोगका वर्णन
      • (श्लोक-१३)
      • (श्लोक-१४)
      • (श्लोक-१५)
      • (श्लोक-१६)
      • (श्लोक-१७)
      • (श्लोक-१८)
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