विश्व-साहित्यमें श्रीमद्भगवद्गीता का अद्वितीय स्थान है। यह साक्षात् भगवान् के श्रीमुखसे नि:सृत परम रहस्यमयी दिव्य वाणी है। इसमें स्वयं भगवान् ने अर्जुनको निमित्त बनाकर मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये उपदेश दिया है। इस छोटे-से ग्रन्थमें भगवान् ने अपने हृदयके बहुत ही विलक्षण भाव भर दिये हैं, जिनका आजतक कोई पार नहीं पा सका और न पा ही सकता है।
हमारे परमश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज ने इस अगाध गीतार्णवमें गहरे उतरकर अनेक गुह्यतम अमूल्य रत्न ढूँढ़ निकाले हैं, जिन्हें उन्होंने इस ‘साधक-संजीवनी’ हिन्दी-टीकाके माध्यमसे साधकोंके कल्याणार्थ उदारहृदयसे वितरित किया है । परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थ-रत्नको अवश्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और यथासाध्य आचरणमें लानेका प्रयत्न करें।