महाभारतके अनुशासन पर्वमें भगवान् के अनन्य भक्त पितामह भीष्म द्वारा भगवान् के जिन पवित्र सहस्र नामों का उपदेश किया गया, उसीको श्रीविष्णुसहस्रनाम कहते हैं भगवान् के नामों की अनन्त महिमा है।
भगवान् के नाममें इतनी विलक्षण शक्ति है कि कोई भी मनुष्य किसी भी भावसे नाम ले, उसका मंगल ही होता है—
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
(मानस १। २८। १)
भगवान् का नाम अवहेलना, संकेत, परिहास आदि किसी भी प्रकार से लिया जाय, वह पापोंका नाश करता ही है—
साङ्केत्यं परिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥
(श्रीमद्भा. ६। २। १४)
नामी (भगवान्) से नाम अलग नहीं है। अतः नामी का, भगवान् का नाम लेनेसे भगवान मिल जाते हैं। नामी प्रकट हो जाता है।
भगवान् के नाम का जप संसार के प्रायः सभी धर्मों में बहुत श्रेष्ठ और सुगम साधन माना गया है। यह ‘सहस्रनाम’ भगवान् के हजार नामों की एक माला है। कविताबद्ध होने के कारण यह शीघ्र कंठस्थ हो जाता है, पाठ में स्वर से उच्चारण करने पर बड़ा आनंददायक है। भगवान् के हर नाम में उनका प्रभाव-माहात्म्य भरा है। जो भक्तिमान् पुरुष सदा प्रात:कालमें उठकर स्नान करके पवित्र हो मनमें विष्णुका ध्यान करता हुआ इस वासुदेव-सहस्रनामका भली प्रकार पाठ करता है, वह महान् यश पाता है, अचल सम्पत्ति पाता है और अति उत्तम कल्याण पाता है तथा उसको कहीं भय नहीं होता। वह वीर्य और तेजको पाता है तथा आरोग्यवान्, कान्तिमान्, बलवान्, रूपवान् और सर्वगुणसम्पन्न हो जाता है। रोगातुर पुरुष रोगसे छूट जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ पुरुष बन्धनसे छूट जाता है, भयभीत भयसे छूट जाता है और आपत्तिमें पड़ा हुआ आपत्तिसे छूट जाता है। सर्वगुण सम्पन्न हो जाता है। वह शीघ्रही समस्त संकटोंसे पार होकर सनातन परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।