॥ श्रीहरि:॥

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श्रीश्रीचैतन्य चरितावली

प्रभुदत्त ब्रह्मचारी

हिन्दी/संस्कृत

महाप्रभु चैतन्यका कलि-पावन चरित्र प्रेम-रसका अथाह सागर है। चाहे कोई कितना ही पी ले, कितना ही उलीच ले, उस अगाध रस-सिन्धुमेंसे अणुमात्र भी कम नहीं हो सकता। जिस किसीने इस परम सुस्वादु आत्मानन्दमय रसका यत्किंचित् भी पान किया, वही धन्य हो गया। ज्ञान-वैराग्य, भक्ति-प्रेम, त्याग और विरहके मूर्तिमान् विग्रह, श्रीकृष्णप्रेमावतार—श्रीगौरांगदेवका करुणा-विगलित जीवन दु:खी प्राणियोंका एक ऐसा ही मनोरम आश्रय-स्थल है। अतएव इस कलि-संतप्त, पाप-ताप-जनित, नाना दु:ख-दैन्य-दाहग्रस्त मनुष्योंको यदि शीतलता, शान्ति और दिव्यप्रेमानन्दकी अनुभूति करनी हो तो वे आनन्द और प्रेमके पर्याय—चैतन्यदेवके इस पावन चरितामृतका पान अवश्य करें।
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