॥ श्रीहरि:॥

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श्रीहनुमानचालीसा (लाल रंग में)

हिन्दी/संस्कृत

श्रीहनुमानजी की महिमा और उनके भक्तहितकारी स्वभाव को दृष्टिगत रखते हुये गोस्वामी तुलसीदास जी ने उनको प्रसन्न करने के लिये हनुमानचालीसा लिखी।

आजकी इस विषम परिस्थितिमें मनुष्यमात्रके लिये, विशेषतया युवकों एवं बालकों के लिये, भगवान् हनुमानकी उपासना अत्यन्त आवश्यक है। हनुमानजी बुद्धि-बल-वीर्य प्रदान करके भक्तोंकी रक्षा करते है। भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस आदि उनके नामोच्चारणमात्रसे ही भाग जाते हैं और उनके स्मरणमात्रसे अनेक रोगोंका प्रशमन होता है। मानसिक दुर्बलताओंके संघर्षमें उनसे सहायता प्राप्त होती है। गोस्वामी तुलसीदासजीको श्रीरामके दर्शनमें उन्हींसे सहायता प्राप्त हुई थी। वे आज भी जहाँ श्रीराम-कथा होती है, वहाँ पहुँचते हैं और मस्तक झुकाकर, रोमाञ्च-कण्टकित होकर, नेत्रोंमें अश्रु भरकर श्रीराम-कथाका सादर श्रवण करते हैं। इस प्रकार वे भगवद्भक्तोंमें अव्यक्तरूपसे उपस्थित होकर उनकी भक्ति-भावनाओंका पोषण करते हैं। आज भी अधिकांश भक्तोंको उनके अनुग्रहका प्रसाद मिलता है।

हनुमान चालीसा के पठन-पाठन और श्रवण करने के असंख्य लाभ हैं। यह चालीसा पाठकर्ता की दैहिक-दैविक तथा भौतिक उन्नति में प्रभावशाली है। ऐसी आस्था है कि यदि पूर्ण मनोयोग से इसका नित्य पाठ किया जाये तो साधक की प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है तथा हनुमानजी की असीम अनुकम्पा की प्राप्ति होती है।

श्रीसीताराम के परमोपासक, श्रीहनुमानजी को गुरु मानने वाले, श्रीरामचरितमानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज द्वारा लिखित श्रीहनुमान चालीसा संसार की समस्त विपत्तियों से पार जाने का अचूक उपाय है।

भले ही आस्तिक समाज जाति, प्रवृत्ति, प्रकृति, आकृति, उपासनापद्धति को दृष्टि से भिन्न भिन्न वर्गों में बंटा हो, भले ही सभी की विपत्तियां भिन्न हो, परन्तु संकट पङने पर लोगों का ध्यान बरबस हनुमानचालीसा की ओर जाता है। और पाठ करते ही समाधान भी प्राप्त होता है। संकट कट जाता है।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरे हनुमत बलबीरा॥
हनुमानचालीसा पापराशि नाश के लिए पुण्य सलिला गंगा है।

दुःख दावानल में दग्ध प्राणियों के लिए अमृतोपय उपचार है।

मनोरथ पूर्ति के लिए प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है।

अज्ञान तिमिर को हरने के लिए ज्ञान प्रकाश युक्त दिव्य दिवाकर है।

अनाथों असहायों दोनों का सम्बल है।  श्रद्धाविश्वास वल्लरी का परिपोषक है।

श्री तुलसीदास जी कहते हैं, भवबन्धन काटने की बात हो अथवा सामान्य कारागार का बन्धन काटने की बात हो हनुमानचालीसा के १०० पाठ नित्य नियम से करने पर सफलता होती है।
जो सत बार पाठ करे कोई।
छूटहि बंदि महासुख होई॥
सबसे अन्त में श्री गोस्वामीजी महाराज ने अपने पक्ष को परिपुष्ट और प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए साक्षी के रूप में भगवान शिव को प्रस्तुत कर दिया।
जो यह पढे हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
सैकड़ों वर्षों से आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी एवं ज्ञानी भक्तों के हृदय का हार बनकर निरन्तर संकट संहारक की भूमिका निवाहने वाले हनुमानचालीसा की महिमा को व्यक्त करना सागर की गहराईं नापना तथा आकाश की ऊंचाई नापने के जैसा ही होगा।

आप सभी के हृदय में रूद्रावतार श्री हनुमानजी महाराज की कृपा उद्‍भासित हो।
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