॥ श्रीहरि:॥

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श्रीजैमिनीयाश्वमेधपर्व

श्रीजैमिनीयाश्वमेधपर्व

भाषा

हिन्दी/संस्कृत

यह बात बहुत प्रसिद्ध है कि व्यासदेवके समान ही महर्षि जैमिनिने भी एक विशालकाय ‘महाभारत’ नामक ग्रन्थकी रचना की थी। वह ‘जैमिनीय महाभारत’ नामसे प्रसिद्ध था। किंतु काल-प्रभावसे अनेक बहुमूल्य ग्रन्थोंके समान उसका भी लोप हो गया और आज उसका एकमात्र ‘आश्वमेधिकपर्व’ ही हमारे बीच अवशिष्ट रह गया है। यह जैमिनीय अश्वमेध व्यासकृत आश्वमेधिकपर्वसे बड़ा है और इसके १२ अध्यायोंमें पद्मपुराण, पातालखण्डोक्त ‘श्रीरामाश्वमेध’ का भी एक विशेषरूप सम्मिलित है। इसमें चार हजारके लगभग श्लोक हैं।  आशा है, पाठक इसके पठन, मनन आदिसे अपना ज्ञान संवर्धनकर सब प्रकार लाभ उठायेंगे। 
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    1. प्रथमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका उन्हें समझाते हुए द्रव्य-प्राप्तिका उपाय, अश्वमेध-यज्ञकी विधि तथा उसमें छोड़े जानेवाले अश्वके लक्षणोंका वर्णन करना, यज्ञके विषयमें युधिष्ठिर-भीमसेन-संवाद और व्यासजीका अश्वका पता बताना
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    2. द्वितीयोऽध्याय:
    • भीमसेनकी अश्व लानेके लिये दृढ़ प्रतिज्ञा, भीमसेनके साथ वृषकेतु और मेघवर्णकी बातचीत, युधिष्ठिरका अश्वमेधयज्ञके लिये चिन्तित होकर भाइयोंसे पूछना, भीमसेनका उत्तर, युधिष्ठिरके स्मरण करनेपर श्रीकृष्णका आगमन और युधिष्ठिरके साथ उनका वार्तालाप
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    3. तृतीयोऽध्याय:
    • भीमसेनका श्रीकृष्णकी बातोंका उत्तर देते हुए उनके गुणोंका वर्णन, श्रीकृष्णकी प्रसन्नता, भीमसेनका वृषकेतु और मेघवर्णके साथ भद्रावतीपुरीमें पहुँचकर वहाँकी शोभा देखना और अश्वकी प्रतीक्षामें पर्वतपर स्थित होना
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    4. चतुर्थोऽध्याय:
    • वृषकेतुद्वारा भीमको प्रोत्साहन, सरोवरमें हाथियों और घोड़ेके स्नान एवं जलपानका वर्णन, श्यामकर्ण अश्वके लिये भीमकी चिन्ता, उस अश्वका सरोवरतटपर आगमन, मेघवर्णका भीमकी आज्ञा लेकर उस अश्वको हर लाना, देवताओंकी शङ्का और मेघवर्णकी बातसे उनका संतुष्ट होना, मेघवर्णकी विजय, वृषकेतुद्वारा अश्वरक्षक सैनिकोंकी पराजय, सेनासहित राजा नीलध्वजका आगमन, वृषकेतुका उसकी सेनाके साथ स्वयं ही युद्ध करने लिये भीमसेनसे आग्रह तथा भीमसेनकी स्वीकृति और वृषकेतु तथा राजा नीलध्वजकी बातचीत
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    5. पञ्चमोऽध्याय:
    • वृषकेतु और यौवनाश्वका युद्ध, उसमें दिव्यास्त्रोंका प्रयोग, वृषकेतुके मूर्च्छित होनेपर भीमसेनका रणभूमिमें आगमन, भीमसेन और सुवेगका युद्ध और दोनोंकी मूर्च्छा, पुन: वृषकेतु और यौवनाश्वका युद्ध, यौवनाश्वके मूर्च्छित होनेपर वृषकेतुद्वारा उनकी जीवनरक्षा और सचेत होनेपर यौवनाश्वद्वारा वृषकेतुका आलिङ्गन
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    6. षष्ठोऽध्याय:
    • राजा यौवनाश्वका भीमसेनसे कृतज्ञता प्रकट करते हुए उन सबको नगरमें ले जाना और प्रभावतीद्वारा उनकी आरती उतारा जाना, राजाद्वारा अपने राज्य आदिका श्रीकृष्णको समर्पण, हस्तिनापुर चलनेके लिये प्रजाको आदेश देना, सुदेवकी माता जरद्‍गवा और राजाका संवाद, जरद्‍गवाको बाँधकर साथ ले चलना, मार्गमें भीमसेनका पहले ही हस्तिनापुर पहुँचना और युधिष्ठिरको अश्वसहित यौवनाश्वके आगमनकी सूचना देना
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    7. सप्तमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी आज्ञासे भीमसेनका द्रौपदीके पास जाना और उसके साथ भीमसेनकी बातचीत, युधिष्ठिरद्वारा राजा यौवनाश्वका स्वागत और उनसे वार्तालाप, सुदेवद्वारा वृषकेतुकी प्रशंसा, श्रीकृष्णका युधिष्ठिरकी आज्ञासे द्वारकापुरीको लौटना, युधिष्ठिरके पूछनेपर व्यासजीका उनसे राजा मरुत्तके यज्ञका वृत्तान्त सुनाना
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    8. अष्टमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका व्यासजीसे धर्मविषयक प्रश्न करना और व्यासजीद्वारा वर्णधर्म, विधवाओंके कर्तव्य और कुलटा स्त्रियोंके स्वरूप एवं लक्षणका निरूपण
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    9. नवमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका व्यासजीसे लक्ष्मीकी स्थिरता तथा भगवान् की प्रसन्नताका उपाय पूछना, व्यासजीका युधिष्ठिरको उनके प्रश्नका उत्तर देते हुए श्रीकृष्णको बुलानेके लिये आदेश देना, युधिष्ठिरका भीमसेनको श्रीकृष्णको बुलानेके लिये आदेश देना, भीमसेनका द्वारकामें पहुँचना, वहाँ श्रीकृष्णके भोजनका वर्णन और सत्यभामा और देवकीका वार्तालाप, श्रीकृष्णका अपने पास आते हुए भीमसेनको रोकना
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    10. दशमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका भीमसेनको दिखाकर भोजन करना, भीमसेनके श्रीकृष्णके प्रति आक्षेपपूर्ण वचन, श्रीकृष्णका भीमसेनको भोजन कराकर पान देना और नगरवासियोंको कृतवर्माद्वारा नगारा बजाकर हस्तिनापुर चलनेके लिये आदेश देना तथा दल-बलसहित हस्तिनापुरको प्रस्थान, मार्गमें मालिन और तेलिनकी श्रीकृष्णसे बातचीत
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    11. एकादशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण और भीमसेनका विनोदपूर्ण वार्तालाप, मार्गमें ऊँटकी पीठसे गिरी हुई सूतिकाकी प्रार्थना, वसुदेवजीका श्रीकृष्णको उपदेश, भीमसेनद्वारा वसुदेवजीकी बातका खण्डन, श्रीकृष्णका सरोवरपर आना और रुक्मिणीको बुलाकर नलिनीके व्याजसे स्त्रियोंपर आक्षेप करना, रुक्मिणीका उन्हें उत्तर देना, व्रजमें पहुँचकर गोप-गोपियोंकी श्रीकृष्णसे भेंट और उनकी दशाका वर्णन, श्रीकृष्णका देवकी, यशोदा, रुक्मिणी और प्रद्युम्न आदिको कर्तव्यका उपदेश तथा हस्तिनापुरमें याज्ञिक ब्राह्मण, संन्यासी, शम्भली और वन्दियोंद्वारा श्रीकृष्णकी आलोचना
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    12. द्वादशोऽध्याय:
    • जनमेजयके पूछनेपर महर्षि जैमिनिद्वारा स्मार्तोंके भाषणका वर्णन, नर्तकी और श्रीकृष्णका वार्तालाप, श्रीकृष्णका युधिष्ठिरके भवनमें प्रवेश और सत्कार, युधिष्ठिरका दलबलसहित यादवोंके सत्कारार्थ गङ्गातटपर जाना और वहाँ परस्पर मिलन, सत्यभामा-द्रौपदी-संवाद, उषाद्वारा द्रौपदी तथा कुन्तीका सत्कार, सत्यभामाका अश्वको देखनेकी इच्छा प्रकट करना, श्रीकृष्णके कहनेसे युधिष्ठिरका अपने सैनिकोंको आदेश देना, नारियोंद्वारा घोड़ेका दर्शन, अनुशाल्वका आगमन और उसका यज्ञिय अश्वको पकड़कर सैनिकोंको आदेश देते हुए संग्रामभूमिमें डटकर खड़ा होना
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    13. त्रयोदशोऽध्याय:
    • जनमेजयके प्रश्न, श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे वार्तालाप और वीरोंको बीड़ा उठानेका आदेश, प्रद्युम्नका बीड़ा उठाकर युद्धके लिये प्रस्थान, श्रीकृष्णका पुन: वीरोंसे बीड़ा उठानेके लिये कहना, वृषकेतुकी बीड़ा उठाकर प्रतिज्ञा और प्रद्युम्नके साथ युद्धके लिये प्रस्थान, प्रद्युम्नके प्रति अनुशाल्वके आक्षेपपूर्ण वचन, प्रद्युम्नकी मूर्च्छा, श्रीकृष्णका प्रद्युम्नपर पादप्रहार करके उनपर आक्षेप करना, भीमसेनका श्रीकृष्णको रोककर उनका उत्तर देना, प्रद्युम्नके साथ युद्धके लिये प्रस्थान एवं घोर युद्ध, वृषकेतुके साथ बातचीत और अनुशाल्वके प्रहारसे उसका मूर्च्छित होना, श्रीकृष्णका युद्धके लिये जाना, उन्हें देखकर उनके प्रति अनुशाल्वका कथन, अनुशाल्वके प्रहारसे घोड़ोंका रथ लेकर भाग जाना, श्रीकृष्णको न देखकर अनुशाल्वके खेदपूर्ण वचन, श्रीकृष्णका प्रकट होकर अनुशाल्वपर प्रहार करना, अनुशाल्वका उन बाणोंको काटकर श्रीकृष्णको मूर्च्छित कर देना, दारुकका रथ लेकर लौटना, सेनाका पलायन, श्रीकृष्णके प्रति सत्यभामाके कठोर वचन
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    14. चतुर्दशोऽध्याय:
    • वृषकेतु और अनुशाल्वका युद्ध, वृषकेतुका अनुशाल्वको पकड़कर श्रीकृष्णके हाथों सौंपना, अनुशाल्वद्वारा वृषकेतुके प्रति कृतज्ञता-प्रकाश और श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णका अनुशाल्वको युधिष्ठिरके पास ले जाना और युधिष्ठिरका उसे भाईकी तरह ग्रहण करना, युधिष्ठिरका यज्ञकी दीक्षा लेना, घोड़ेका पूजनपूर्वक छोड़ा जाना और अर्जुनका उसकी रक्षामें जाना, अर्जुन और कुन्तीकी बातचीत, वृषकेतु और उसकी पत्नीका संवाद, घोड़ेका माहिष्मतीपुरीमें जाना और पत्नीके कहनेसे प्रवीरद्वारा पकड़ा जाना
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    15. पञ्चदशोऽध्याय:
    • प्रवीरके साथ वृषकेतु और अनुशाल्वका युद्ध, नीलध्वजका अर्जुनके साथ युद्ध, उनके द्वारा अग्निका बाणरूपमें छोड़ा जाना, अग्निद्वारा अर्जुनकी सेनाका संहार, अर्जुनद्वारा अग्निका स्तवन, जनमेजयके पूछनेपर जैमिनिजीका अग्निके नीलध्वजके जामाता होनेका वृत्तान्त सुनाना, अर्जुनद्वारा नारायणास्त्रका संधान और अग्निका शान्त होकर अपने उद्दीप्त होनेका कारण बताना तथा नगरमें जाकर नीलध्वजको युद्ध बंद करनेके लिये कहना, पत्नीके कहनेसे नीलध्वजका पुन: अर्जुनके साथ युद्ध करना और मूर्च्छित होकर घर लौटना, वहाँ पत्नीको फटकारकर घोड़ा तथा भेंट-सामग्री लेकर अर्जुनसे मिलना और उनके साथ घोड़ेकी रक्षामें जाना, ज्वालाका अपने भाई उल्मुकको अर्जुनको मारनेके लिये उकसाना और उससे ठुकराये जानेपर गङ्गातीरपर जाना, वहाँ गङ्गामें डूबकर बाणरूपमें बभ्रुवाहनके तूणीरमें प्रवेश करना तथा गङ्गाजीद्वारा अर्जुनको शाप
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    16. षोडशोऽध्याय:
    • घोड़ेका विन्ध्यपर्वतपर जाना और वहाँ एक शिलासे चिपक जाना, अर्जुनका दूतोंको शिलाका वृत्तान्त पूछनेके लिये मुनियोंके पास भेजना, दूतके कथनानुसार अर्जुनका सौभरि मुनिके आश्रमपर जाना और शिलाका वृत्तान्त पूछना, सौभरिका उसका वृत्तान्त सुनाते हुए उद्दालक और चण्डीका वृत्तान्त वर्णन करना, अर्जुनके कर-स्पर्शसे चण्डीकी मुक्ति और घोड़ेका मुक्त होकर आगे बढ़ना
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    17. सप्तदशोऽध्याय:
    • अर्जुनके यज्ञिय अश्वका चम्पापुरीमें प्रवेश और राजा हंसध्वजद्वारा उसका पकड़ा जाना तथा राजसैनिकोंका युद्धके लिये प्रस्थान, अट्टालिकाओंपर बैठी हुई स्त्रियोंकी परस्पर विनोदवार्ता, राजाकी घोषणा, खौलते हुए तैलपूर्ण कड़ाहका आयोजन, सुधन्वाका रणके लिये उद्यत हो माता और बहिनको प्रणाम करके उनकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करनेका आश्वासन देना, प्रभावतीका अपने पति सुधन्वाकी आरती उतारना, दोनोंके संवाद, पत्नीके आग्रहसे विवश हुए सुधन्वाका उसे रति-दान देकर युद्धके लिये जाना, राजाका रोष, यवन-सैनिकोंद्वारा सुधन्वाको बुलवाकर फटकारना, शङ्ख मुनिसे उसके विषयमें पूछना, शङ्खका राज्य छोड़कर जाना, राजाका सुधन्वाको कड़ाहमें डालनेके लिये सचिवको आज्ञा देकर जाना, शङ्ख और लिखितको लेकर लौटना, सुधन्वाके द्वारा कड़ाहमें भगवान् का स्मरण, उसके जीवनकी रक्षा तथा तैलकी परीक्षाके समय शङ्ख और लिखितके ललाटमें नारियलके टुकड़ोंसे चोट पहुँचना
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    18. अष्टादशोऽध्याय:
    • शङ्खमुनिका सुधन्वाको अक्षत देखकर नौकरोंसे कारण पूछना, स्वयं तेलके कड़ाहेमें कूदना, सुधन्वाको हृदयसे लगाकर उसकी प्रशंसा करना और युद्धक्षेत्रमें राजा हंसध्वजके पास ले जाना, हंसध्वजका घोड़ेको पकड़वा लेना और वीरोंके साथ युद्धके लिये डटकर खड़ा होना, अर्जुन, प्रद्युम्न और वृषकेतुका वार्तालाप, वृषकेतुका युद्धके लिये प्रस्थान, सुधन्वाके साथ बातचीत और युद्ध, वृषकेतुका मूर्च्छित होकर युद्धक्षेत्रसे हटना, सुधन्वाका प्रद्युम्नको मूर्च्छित करना, कृतवर्माको खदेड़ना और अनुशाल्वको पराजित करके घोर पराक्रम प्रकट करना
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    19. एकोनविंशोऽध्याय:
    • सुधन्वा और सात्यकिके युद्धमें सात्यकिका मूर्च्छित होना, सुधन्वा और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनका सारथिके मारे जानेपर श्रीकृष्णका स्मरण करना, श्रीकृष्णका वहाँ पधारना, तीन बाणोंद्वारा सुधन्वाका वध करनेके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा, सुधन्वाद्वारा तीनों बाणोंका काटा जाना और तीसरे बाणके आधे भागसे सुधन्वाकी मृत्यु
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    20. विंशोऽध्याय:
    • सुधन्वाके मुखसे निकली हुई ज्योतिका भगवान् श्रीकृष्णमें प्रवेश, श्रीकृष्णद्वारा सुधन्वाके सिरका राजा हंसध्वजके रथपर फेंका जाना, पुत्रके सिरको उठाकर हंसध्वजका विलाप करना, सुरथ और हंसध्वजकी बातचीत, हंसध्वजका सुधन्वाके सिरको श्रीकृष्णके पास वापस फेंकना, श्रीकृष्णका उसे आकाशमें उछाल देना और उसका अन्तर्धान होकर शिवजीकी मुण्डमालामें स्थान पाना, सुरथका युद्धके लिये प्रस्थान और अद्भुत पराक्रम करते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास पहुँचकर अर्जुनके साथ युद्ध करना और अर्जुनद्वारा मारा जाना
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    21. एकविंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका अर्जुनको पृथ्वीपरसे उठाकर रथपर बैठाना, अर्जुनद्वारा सुरथके सिरकी वन्दना, श्रीकृष्णका गरुडको बुलाकर सुरथके सिरको प्रयागमें डालनेके लिये भेजना, मार्गमें गरुडको जाते हुए देखकर शिवजीका भृंगीको मस्तक लानेके लिये भेजना, भृंगीका गरुडके पास जाना और उनके पंखकी वायुसे उड़कर शिवजीके पास गिरना, पुन: शिवजीकी आज्ञासे नन्दीश्वरका गरुडके पास जाना और अपने श्वाससे गरुडको चक्करमें डाल देना, गरुडका उड़ते हुए प्रयागमें जाकर सिर गिरा देना और नन्दीश्वरका उसे लाकर शिवजीको समर्पित करना, शिवजीद्वारा उसे अपनी मुण्डमालामें पिरोना, श्रीकृष्णका हंसध्वज और अर्जुनमें मेल कराकर हस्तिनापुर लौट जाना, घोड़ेका आगे जाकर घोड़ी और व्याघ्री होना, जनमेजयके पूछनेपर महर्षि जैमिनिका इसका कारण बताना, घोड़ेका घूमते हुए स्त्री राज्यमें पहुँचना और वहाँ पकड़ा जाना
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    22. द्वाविंशोऽध्याय:
    • प्रमीलाकी अर्जुनसे प्रणय-याचना, अर्जुनके अस्वीकार करनेपर युद्धारम्भ, युद्धमें प्रमीलाद्वारा अर्जुनके सम्मोहनास्त्रका छेदन, अर्जुनके पुन: युद्धोद्योग करनेपर आकाशवाणीद्वारा उनका निवारण, अर्जुनद्वारा प्रमीलाका वरण और प्रमीलाका हस्तिनापुरगमन, घोड़ेका अनेक भयानक देशोंमें घूमते हुए राक्षस भीषणके नगरमें जाना, भीषण और उसके पुरोहित मेदोहाकी बातचीत, भीषणका युद्धके लिये प्रस्थान, राक्षसीका अपने स्तनोंद्वारा सेनाका संहार करना, अर्जुनके पराक्रमसे प्राण-संकट आनेपर भीषणद्वारा राक्षसी मायाका प्रयोग, अर्जुनद्वारा भीषणका वध, अर्जुनका घोड़ेके साथ मणिपुर नगरमें जाना
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    23. त्रयोविंशोऽध्याय:
    • राजा हंसध्वजका अर्जुनको बभ्रुवाहनका परिचय बताना, अर्जुनके मुकुटपर गीधका बैठना, बभ्रुवाहनका घोड़ेको पकड़वाकर उसके स्वर्णपत्रको बाँचना और विषादमग्न होकर मन्त्री सुमतिसे उसका उपाय पूछना, मन्त्रीकी सलाहसे भेंट-सामग्रीसहित जाकर अर्जुनके चरणोंमें पड़कर उन्हें अपना राज्य समर्पित करना, अर्जुनके फटकारनेपर युद्धके लिये उद्यत होना, अनुशाल्व और बभ्रुवाहनका युद्ध और अनुशाल्वकी पराजय, प्रद्युम्न और बभ्रुवाहनके युद्धमें प्रद्युम्नका भयंकर पराक्रम
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    24. चतुर्विंशोऽध्याय:
    • प्रद्युम्न और बभ्रुवाहनके युद्धमें रणभूमिकी भीषणताका वर्णन, बभ्रुवाहनका अर्जुनकी सेनाको पराजित करके हाथी, घोड़ा, रथ, सैनिक तथा अन्य सामग्रियोंको अपने नगरमें ले जाना
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    25. पञ्चविंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—लंकाविजयके पश्चात् भगवान् रामका अयोध्यामें प्रवेश, उनका स्वागत और सबसे मिलन तथा रामराज्यका वर्णन
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    26. षड्विंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान-श्रीरामका स्वप्न, सीताका पुंसवन-संस्कार, गुप्तचरका अर्धरात्रिके समय श्रीरामके पास आकर सीताके विषयमें रजककी बात सुनाना, श्रीरामका चिन्तित होना और सीता-परित्यागके लिये भाइयोंको बुलवाना
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    27. सप्तविंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—सीता-परित्यागके विषयमें श्रीरामके साथ तीनों भाइयोंकी बातचीत, श्रीरामका लक्ष्मणको सीता-परित्यागके लिये आदेश, लक्ष्मणजीका रथ लेकर सीताजीके महलमें जाना, सीताजीका सासुओंकी आज्ञा लेकर सामग्रीसहित रथपर बैठना और गङ्गातटके लिये प्रस्थान
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    28. अष्टाविंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—लक्ष्मणका सीताजीको गङ्गाके उस पार वनमें छोड़कर लौटना, सीताकी मूर्च्छा और पुन: उठकर विलाप करना, वाल्मीकिजीका आगमन और उनका सीताजीको देखना
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    29. एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—सीताका महर्षि वाल्मीकिके साथ आश्रमपर जाना, वहाँ दो पुत्रोंको जन्म देना, वाल्मीकि मुनिका उन पुत्रोंका संस्कार करके उन्हें साङ्ग वेद तथा रामचरित्रकी शिक्षा प्रदान करना, मुनियोंद्वारा उन्हें अस्त्रदान, श्रीरामका अश्वमेध यज्ञके लिये घोड़ा छोड़ना, आश्रममें जानेपर लवद्वारा उसका पकड़ा जाना
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    30. त्रिंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—लवका शत्रुघ्नके साथ युद्ध और मूर्च्छित होना तथा शत्रुघ्नका उसे अपने रथपर बैठाकर प्रस्थान करना
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    31. एकत्रिंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—मुनिकुमारोंद्वारा लवका समाचार पाकर सीताका विलाप, कुशका वनसे लौटकर युद्धके लिये जाना, कुशद्वारा शत्रुघ्नके सेनापति तथा उसके भाई नगका वध, बची हुई सेनाका अयोध्याकी ओर पलायन
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    32. द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—कुशके बाणोंसे शत्रुघ्नका मूर्च्छित होना, शेष सैनिकोंका भागकर अयोध्यामें श्रीरामसे सूचित करना, श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणका सेनासहित युद्धस्थलमें पहुँचना
  • +
    33. त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—कुश और लवकी बातचीत, धनुषके लिये लवद्वारा सूर्यदेवकी स्तुति और सूर्यका उसे धनुष प्रदान करना, लवका भयंकर पराक्रम, लवद्वारा मन्त्री सुज्ञके दस पुत्रोंका तथा राक्षस रुधिराक्षका वध
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    34. चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—कुश और लक्ष्मणका युद्ध, कुशद्वारा कालजित् का वध और लक्ष्मणकी मूर्च्छा
  • +
    35. पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—श्रीरामका भरतकी सलाहसे दूतोंको आदेश देकर लक्ष्मणके पास भेजना, उसी समय घायल सैनिकोंका आना, श्रीरामका भरतको युद्धके लिये आदेश देना, भरतका हनुमान् आदि वानरों तथा विशाल सेनाके साथ वहाँ पहुँचना और हनुमान् जी द्वारा शत्रुघ्न और लक्ष्मणकी खोज करके उनकी सुरक्षा करना
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    36. षट्त्रिंशोऽध्याय:
    • कुशलवोपाख्यान—कुश और लवका भरतके साथ युद्ध, भरतका मूर्च्छित होना, दूतोंके खबर देनेपर श्रीरामका युद्धके लिये आना, कुशद्वारा वानरोंसहित मूर्च्छित होना, लवका हनुमान् और जाम्बवान् को पकड़कर सीताके पास ले जाना, सीताद्वारा उनकी मुक्ति, वाल्मीकिजीका आगमन और कुश-लवद्वारा सारा वृत्तान्त सुनकर अमृतमय जलसे सींचकर श्रीराम आदिको उठाना, श्रीरामका अयोध्या लौटना, वाल्मीकि मुनिका पुत्रोंसहित सीताको श्रीरामके समीप ले जाना, अश्वमेधयज्ञकी समाप्ति
  • +
    37. सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • बभ्रुवाहन और हंसध्वजके युद्धमें हंसध्वजका पतन, सुवेग और बभ्रुवाहनका भयंकर युद्ध और सुवेगकी मृत्यु, बभ्रुवाहन और वृषकेतुका अद्भुत युद्ध, जिसमें बभ्रुवाहनकी विजय और उसके द्वारा वृषकेतुका वध
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    38. अष्टत्रिंशोऽध्याय:
    • वृषकेतुके मरनेपर अर्जुनका विलाप, अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध, बभ्रुवाहनद्वारा अर्जुनका वध, बभ्रुवाहनका मणिपुरमें स्वागत, चित्राङ्गदाका विलाप, बभ्रुवाहनका अग्निप्रवेश करनेका विचार, उलूपीका मणिके लिये पुण्डरीकनागको शेषनागके पास पातालमें भेजना, शेषनाग और पुण्डरीककी बातचीत, शेषनागके मणि देनेके लिये उद्यत होनेपर धृतराष्ट्र नागद्वारा उसका विरोध
  • +
    39. एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • पुण्डरीकका विफलमनोरथ होकर लौटना और बभ्रुवाहनका पाताललोकपर चढ़ाई, नागोंके साथ घोर संग्राम, नागोंकी पराजय होनेपर शेषनागका मणि तथा अन्य वस्तुओंद्वारा बभ्रुवाहनको शान्त करना, बभ्रुवाहनका मणिपुर लौटना, अर्जुनके मस्तकका धृतराष्ट्रपुत्र दुर्बुद्धिद्वारा चुराया जाना, श्रीकृष्णका भीमसेन, कुन्ती, देवकी और यशोदासहित मणिपुरमें आना और उनके सामने बभ्रुवाहनका विलाप करना
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    40. चत्वारिंशोऽध्याय:
    • शेषनागकी अर्जुनको जीवित करनेके लिये श्रीकृष्णको प्रेरणा, श्रीकृष्णकी प्रतिज्ञासे धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्बुद्धि और दु:स्वभावकी मृत्यु, अर्जुनके सिरका रणभूमिमें वापस आना, श्रीकृष्णका मणिस्पर्शसे वृषकेतु और अर्जुनको जीवित करना, सबका मणिपुरमें प्रवेश और स्वागत, श्रीकृष्णका पाँच रातके बाद धन-सम्पत्ति तथा स्त्रियोंसहित भीमसेनको हस्तिनापुर भेजना
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    41. एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • मणिपुरसे घोड़ेका आगे बढ़ना, ताम्रध्वजद्वारा उसका पकड़ा जाना, दोनों सेनाओंकी व्यूह-रचना तथा श्रीकृष्ण और ताम्रध्वजकी बातचीत
  • +
    42. द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनकी सेनाके साथ ताम्रध्वजका युद्ध और उसका घोर पराक्रम
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    43. त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • ताम्रध्वजका अर्जुनके साथ लगातार सात दिनोंतक युद्ध करके अपना घोर पराक्रम प्रकट करना, श्रीकृष्णका ताम्रध्वजसे युद्ध करनेके लिये आना और उसके कहनेसे अर्जुनका सारथि बनना तत्पश्चात् पुन: सुदर्शन चक्रसे उसकी सेनाका संहार करना
  • +
    44. चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • ताम्रध्वजका श्रीकृष्ण और अर्जुनको जीते-जी पकड़ लेना और श्रीकृष्णके झटकेसे उसका मूर्च्छित होना तथा ताम्रध्वजके घसीटनेसे अर्जुन और श्रीकृष्णका मूर्च्छित होकर गिरना, मूर्च्छा भंग होनेपर दोनों घोड़ोंको नगरकी ओर जाते हुए देखकर ताम्रध्वजका सेनासहित नगरको लौटना, वहाँ मन्त्री बहुलाश्वके मुखसे सारा वृत्तान्त सुनकर मयूरध्वजका अपने पुत्रको फटकारना और श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये उद्यत होना, इधर श्रीकृष्ण और अर्जुनकी मूर्च्छाका टूटना, दोनोंका रत्ननगरमें जाना, वहाँ नगरनिवासियोंकी रात्रिचर्या देखना और प्रात:काल मयूरध्वजके दर्शन करना
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    45. पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ यज्ञमण्डपमें मयूरध्वजके पास जाना, उनसे बातचीत करना और छलसे उनके आधे शरीरकी याचना करना, मयूरध्वजका अपना शरीर चिरवानेके लिये उद्यत होना
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    46. षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • रानी कुमुद्वती और पुत्र ताम्रध्वजद्वारा आरेसे मयूरध्वजके शरीरका चीरा जाना, बायें नेत्रसे आँसू टपकनेके कारण श्रीकृष्णका उसे त्यागकर चल देना, पुन: मयूरध्वजके स्पष्टीकरण करनेपर लौटना और प्रसन्न होकर राजाको चतुर्भुजरूपमें दर्शन देना, राजाद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, तत्पश्चात् मयूरध्वजका अर्जुनके साथ घोड़ेकी रक्षाके लिये प्रस्थान
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    47. सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • दोनों घोड़ोंका राजा वीरवर्माके नगरमें जाना और वीरवर्माकी आज्ञासे उनका पकड़ा जाना, वीरवर्माके पुत्रोंके साथ बभ्रुवाहनका युद्ध, यमराजका युद्धके लिये आना, अर्जुनके पूछनेपर श्रीकृष्णद्वारा यमराजका वीरवर्माके जामाता बननेकी कथाका वर्णन
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    48. अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • वररूपमें यमराजकी प्राप्तिके लिये राजा वीरवर्मा और मालिनीका यमराजकी आराधना करना, नारदजीका यमलोकमें जाकर यमराजसे मालिनीका वृत्तान्त कहना, यमराजका विवाहतिथिको निश्चय करके नारदजीको वीरवर्माके पास भेजना और बारातमें चलनेके विषयमें इनका राजयक्ष्माके साथ संवाद तथा यमराजका नाना प्रकारके रोगोंकी उत्पत्तिका कारण बताते हुए उनसे छूटनेके उपायका निरूपण करना
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    49. एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • यमराजका सारस्वतपुरमें आकर मालिनीका पाणिग्रहण करना और वीरवर्माको वर प्रदान करना, वीरवर्माका अर्जुनके साथ युद्धमें भयंकर पराक्रम प्रकट करके अर्जुन, श्रीकृष्ण और हनुमान् को पकड़ लेना, श्रीकृष्णद्वारा उसपर चरणप्रहार, वीरवर्माका आत्मसमर्पण और वीरवर्माकी सहायतासे अर्जुनका सेनासहित महानदके पार उतरना
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    50. पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • घोड़ोंका राजा चन्द्रहासके नगर कुन्तलपुरमें पहुँचना और पकड़ा जाना, नारदजीका आगमन, अर्जुनके पूछनेपर नारदजीद्वारा चन्द्रहासकी कथाका वर्णन
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    51. एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • चन्द्रहासका जीवन-वृत्तान्त—वनमें पक्षियों और हरिणियोंद्वारा उस बालककी परिचर्या, कुलिन्दाधिपतिका वहाँ आना और उसे अपने घोड़ेपर बैठाकर नगरमें ले जाना, वहाँ राजाद्वारा बालककी शिक्षाका प्रबन्ध
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    52. द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • चन्द्रहासोपाख्यान—अर्जुनके पूछनेपर नारदजीका चन्द्रहासकी तरुण-अवस्थाके चरित्रोंका वर्णन करना, चन्द्रहासका दिग्विजय करके बहुत-सी सम्पत्तिके साथ चन्दनावतीपुरीको लौटना, कुलिन्दद्वारा उसका स्वागत तथा अपने पदपर अभिषेक, चन्द्रहासका अपनी प्रजाको एकादशीका माहात्म्य बतलाते हुए व्रत-पालनका आदेश देना, कुलिन्दके कहनेसे कररूपमें बहुुत-सी धनराशि कुन्तलपुर भेजना, राजमन्त्री धृष्टबुद्धिका चन्दनावतीपुरीमें आना और चन्द्रहासको देखकर सशङ्कित होना
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    53. त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • चन्द्रहासोपाख्यान—धृष्टबुद्धिका चन्द्रहासको पत्र देकर कुन्तलपुरमें मदनके पास भेजना, चन्द्रहासका कुन्तलपुरमें पहुँचकर क्रीडोद्यानके सरोवर-तटपर शयन करना, राजकन्या चम्पकमालिनी और मन्त्रिकन्या विषयाका सखियोंके साथ उद्यानमें आकर विहार करना, सरोवरमें जलक्रीडा करना, तत्पश्चात् विषयाका चन्द्रहासको देखना
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    54. चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • विषयाका गुप्तरूपसे अकेले ही चन्द्रहासके समीप जाना, उसके जेबसे पत्र निकालकर उसे पढ़ना और ‘विष’ की जगह ‘विषया’ बनाकर पत्रको बंद करके पुन: जेबमें डाल देना, फिर लौटकर सखियोंके साथ घर जाना, चन्द्रहासका जागना और मन्त्रीके भवनपर पहुँचकर द्वारपालद्वारा अपने आगमनका समाचार भेजवाना, द्वारपालकी बात सुनकर मदनका द्वारपर आकर चन्द्रहासको सभामें ले जाना, चन्द्रहासके दिये हुए पत्रको सभामें पढ़ना, विषयाका चन्द्रहासको पतिरूपमें पानेके लिये पार्वतीजीसे प्रार्थना करना
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    55. पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अर्जुनके पूछनेपर नारदजीद्वारा चन्द्रहास और विषयाके विवाहका वर्णन
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    56. षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • चन्दनावतीपुरीमें कुलिन्दको कैद करनेके पश्चात् धृष्टबुद्धिका भीषण अत्याचार, वहाँ लोभको अधिकारी बनाकर उसका कुन्तलपुरको प्रस्थान, मार्गमें तरह-तरहके अपशकुन होना, कुन्तलपुर पहुँचकर विवाहोत्सवके दर्शनसे कुपित होना और मदनको फटकारना, मदनके उसका पत्र दिखानेपर शान्त होना और चन्द्रहासके वधका उपाय सोचना
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    57. सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • धृष्टबुद्धिका चन्द्रहासका वध करनेके लिये चाण्डालोंको चण्डिका-मन्दिरमें भेजना और सायंकालमें चन्द्रहासको देवी-पूजनका आदेश देना, कुन्तल-नरेशका गालवमुनिद्वारा अरिष्टाध्याय सुनना और चन्द्रहासको अपनी कन्या चम्पकमालिनी तथा राज्य समर्पित करके वनमें जाकर निर्वाण प्राप्त करना, चन्द्रहासका चम्पकमालिनीके साथ गान्धर्व विवाह और राज्याभिषेक, चन्द्रहासके बदले मदनका चण्डिका-मन्दिरमें जाना और वहाँ चाण्डालोंद्वारा उसका वध
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    58. अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • चन्द्रहासका चम्पकमालिनीके साथ धृष्टबुद्धिसे मिलने जाना, चन्द्रहासके मुखसे देवीमन्दिरमें मदनके जानेकी बात सुनकर धृष्टबुद्धिका मन्दिरमें जाना और विलाप करके प्राण-त्याग करना, प्रात:काल एक तपस्वीका चन्द्रहासको इसकी सूचना देना, चन्द्रहासका मन्दिरमें जाकर अपना मांस काटकर आहुति देना तथा अपना सिर काटनेको उद्यत होना, देवीका प्राकटॺ और चन्द्रहासको वर-प्रदान, धृष्टबुद्धि और मदनका जीवित होना, चन्द्रहासका कुलिन्द और उसकी पत्नीको कुन्तलपुर ले आना, शालग्राम-शिलाका माहात्म्य, नारदजीका स्वर्गलोक-गमन और अर्जुनका कुन्तलपुरको प्रस्थान
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    59. एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • चन्द्रहासका श्रीकृष्णके दर्शनकी इच्छासे अपने पुत्र मकरध्वजको घोड़ोंको पकड़नेके लिये आदेश देना, श्रीकृष्णका चन्द्रहासको चतुर्भुजरूपमें दर्शन देना, उसका अर्जुनके साथ मेल कराना और कुन्तलपुरका राज्य चन्द्रहासके पुत्रको देकर आगे बढ़ना
  • +
    60. षष्टितमोऽध्याय:
    • चन्द्रहासका अपने पुत्र मकरध्वजको राज्यपर अभिषिक्त करके श्रीकृष्णके साथ घोड़ेकी रक्षामें जाना, घोड़ोंका उत्तर दिशामें जाकर समुद्रमें घुस जाना, हंसध्वज, बभ्रुवाहन, प्रद्युम्न और मयूरध्वजके साथ अर्जुनका समुद्रमें प्रवेश करना, वहाँ बकदाल्भ्य ऋषिसे भेंट और वार्तालापके प्रसंगमें ऋषिका वैराग्य और श्रीकृष्णकी महिमा तथा अनेक मुखवाले ब्रह्माओंकी कथाका वर्णन करना, श्रीकृष्णका ऋषिको पालकीपर बैठाकर ले चलना
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    61. एकषष्टितमोऽध्याय:
    • घोड़ोंका जयद्रथके नगरमें पहुँचना, अर्जुनके आगमनकी बात सुनकर जयद्रथ-पुत्रका भयसे प्राणत्याग करना, दु:शलाकी पुत्रको जीवित करनेके लिये श्रीकृष्णसे प्रार्थना, श्रीकृष्णद्वारा उसके पुत्रको जीवनदान, अर्जुनका दु:शलाको निमन्त्रित करके हस्तिनापुरको प्रस्थान
  • +
    62. द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • हस्तिानुपरके निकट पहुँचनेपर श्रीकृष्णका घोड़ोंसहित सबको एक उपवनमें रोककर स्वयं नगरमें जाना, युधिष्ठिरसे मिलना और यात्राका सारा समाचार सुनाना, फिर अर्जुनके स्वागतकी व्यवस्था करना, नागरिकों तथा श्रीकृष्णपत्नियोंका सज-धजकर स्वागत-समारोहमें सम्मिलित होना
  • +
    63. त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका आकर दल-बलसहित श्रीकृष्णसे मिलना, राजाओंद्वारा हस्तिनापुरके वैभवका वर्णन, अर्जुनद्वारा धृतराष्ट्रको समागत राजाओंका परिचय देना, राजाओंका धृतराष्ट्रको तत्पश्चात् युधिष्ठिरको प्रणाम करना, यज्ञ-सम्भारका एकत्र किया जाना, युधिष्ठिरका समाजसहित गङ्गा-तटपर जाकर जल ले आना और उससे यज्ञिय अश्वको पवित्र करना
  • +
    64. चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • अश्वमेध यज्ञका आरम्भ, भीमसेनद्वारा घोड़ेका वध, घोड़ेके सिरका आकाशमें चला जाना, ज्योति निकलकर श्रीकृष्णमें समा जाना और उसके शरीरका कपूर हो जाना, उस कपूरसे हवन, इन्द्रादि देवताओंका आकर अपना भाग ग्रहण करना, युधिष्ठिरका मुनियोंको दान देना
  • +
    65. पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • भीमसेनका यज्ञान्तमें ब्राह्मणों तथा राजाओंको नाना प्रकारके व्यञ्जन जिमाकर तृप्त करना, दो ब्राह्मणोंका अपना झगड़ा निपटानेके लिये युधिष्ठिरके पास आना, भगवान् श्रीकृष्णका कलियुगमें होनेवाले दोषोंका वर्णन करना
  • +
    66. षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • यज्ञकी समाप्तिपर गर्वयुक्त होकर बैठे हुए युधिष्ठिरकी सभामें एक नकुलका आना और इनके यज्ञसे कुरुक्षेत्रनिवासी शिलोञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणके सत्तूयज्ञको उत्कृष्ट बताना, आश्चर्यचकित हुए सभासदोंके पूछनेपर नकुलद्वारा सत्तू-यज्ञका वर्णन
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    67. सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • जनमेजयकी नेवलेके विषयमें जिज्ञासा और जैमिनिजीद्वारा नेवलेका पूर्वचरित्र-वर्णन
  • +
    68. अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • जैमिनीयाश्वमेधपर्वके श्रवणकी महिमा
  • अंतिम पृष्ठ

भक्तराज हनुमान्

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प्रेमी भक्त

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भक्त नरसिंह मेहता

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श्रीभीष्मपितामह

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सती द्रौपदी

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