॥ श्रीहरि:॥

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श्रीहरिवंशपुराण

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • हरिवंशपर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • मङ्गलाचरण, शौनक-उग्रश्रवा-संवाद, वृष्णिवंशियोंका विस्तृत चरित्र सुननेके लिये जनमेजयकी प्रार्थना और आदिसृष्टिका वर्णन
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • स्वायम्भुव मनुके वंश और दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्तिका वर्णन
  • तृतीयोऽध्याय:
  • दक्ष प्रजापतिद्वारा सृष्टि-विस्तार, नारदजीका दक्षके पुत्रोंको विरक्त कर देना, दक्षकी साठ कन्याओं और उनकी संततिका वर्णन
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • पृथुका उपाख्यान—राज्यवितरण और दिक्पालोंकी प्रतिष्ठा
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • पृथुका उपाख्यान—वेनका अत्याचार करके नष्ट होना और पृथुका जन्म तथा चरित्र
  • षष्ठोऽध्याय:
  • पृथुका उपाख्यान—पृथ्वीका पृथुकी पुत्री बनकर अनेक प्रकारके दूध देना तथा अनेक पात्रों एवं दुहनेवालोंका वर्णन
  • सप्तमोऽध्याय:
  • मन्वन्तर, मनु, देवता और ऋषियोंका पृथक्-पृथक् वर्णन
  • अष्टमोऽध्याय:
  • चारों युगों, मन्वन्तरों और ब्रह्माजीके दिन एवं वर्षका मान
  • नवमोऽध्याय:
  • वैवस्वत मनु, यम, यमी (यमुना), अश्विनीकुमारों एवं शनैश्चरकी उत्पत्ति
  • दशमोऽध्याय:
  • वैवस्वत मनुके वंशजोंका वर्णन और पुरूरवाकी उत्पत्ति
  • एकादशोऽध्याय:
  • धुन्धुमारकी कथा
  • द्वादशोऽध्याय:
  • धुन्धुमारके वंशका वर्णन और गालवकी उत्पत्ति
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • त्रिशङ्कुके चरित्रका वर्णन तथा उनके वंशमें हरिश्चन्द्र आदिका उत्पन्न होना
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • सगरकी उत्पत्ति और चरित्र तथा सगर-पुत्रोंके उद्योगसे समुद्रका ‘सागर’ होना
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • सूर्यवंशका वर्णन
  • षोडशोऽध्याय:
  • श्राद्धकल्प—जनमेजयद्वारा पिताका श्राद्ध तथा पितृस्वरूपनिर्णयसम्बन्धी प्रश्न, शन्तनुका अपने श्राद्धमें स्वयं हाथ बढ़ाकर भीष्मसे पिण्ड माँगना
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • पितृकल्प—भीष्म-मार्कण्डेय-संवाद और मार्कण्डेयजीके साथ सनत्कुमारजीकी बातचीत
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • पितृकल्प—मार्कण्डेय-सनत्कुमार-संवादमें पितरोंके गण, लोक, शक्ति और कन्याओंका वर्णन तथा पितरोंके प्रभावको देखनेके लिये मार्कण्डेयजीको दिव्य दृष्टिकी प्राप्ति
  • एकोनविंशोऽध्याय:
  • पितृकल्प—भरद्वाजके पुत्रोंकी कथा, योगभ्रष्ट पुरुषोंकी गति, योगसिद्धिके अधिकारी पुरुषोंके लक्षण तथा मार्कण्डेय-सनत्कुमार-संवादकी समाप्ति
  • विंशोऽध्याय:
  • पितृकल्प—ब्रह्मदत्त और उग्रायुधके वंश तथा पूजनीया चिड़ियाद्वारा शुक्रनीतिका वर्णन
  • एकविंशोऽध्याय:
  • पितृकल्प—मार्कण्डेयजीद्वारा श्राद्धकी महिमाका वर्णन, श्राद्धके फलसे कौशिक-पुत्रोंको उत्तम जन्मकी प्राप्ति
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • पितृकल्प—शुचिवाक् पक्षीका स्वतन्त्र आदि तीन पक्षियोंको शाप देना, सुमना पक्षीका अनुग्रहपूर्वक उन्हें शापसे मुक्त करना
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • हंसोंका काम्पिल्य नगरमें ब्रह्मदत्त आदिके रूपमें उत्पन्न होना और चार हंसोंका अपने पितासे आज्ञा लेकर मुक्त हो जाना
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • विभ्राजका ब्रह्मदत्तका पुत्र बनकर उत्पन्न होना, रानी संनतिका ब्रह्मदत्तसे रूठना, एक ब्राह्मणके कहे हुए श्लोकोंसे ब्रह्मदत्त, पाञ्चाल्य और कण्डरीकको अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होना तथा ब्रह्मदत्त आदिका तप करके मुक्त हो जाना
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • चन्द्रमाकी उत्पत्ति और राजसूय यज्ञ, देवासुरसंग्राम तथा बुधकी उत्पत्ति
  • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
  • महाराज पुरूरवाके चरित्र और वंशका वर्णन, राजा पुरूरवाका त्रेताग्निकी रचना करना और गन्धर्वोंके लोकमें जाना
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • पुरूरवाके द्वितीय पुत्र अमावसुके वंशका वर्णन, विश्वामित्र और परशुरामकी उत्पत्ति
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • राजा रजि और उनके पुत्रोंका चरित्र, इन्द्रका अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर पुन: उसपर प्रतिष्ठित होना
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • अनेनाके वंशका वर्णन, धन्वन्तरिका काशिराज धन्वके यहाँ पुत्ररूपमें अवतार, दिवोदासके राज्यकालमें भगवान् शिवकी आज्ञासे गणेश्वर निकुम्भके द्वारा वाराणसीको जनशून्य बनानेका प्रयत्न, वहाँ शिव और पार्वतीका निवास, दिवोदासका वाराणसीपर अधिकार और अलर्ककी प्रशंसा
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • नहुष एवं ययातिके वंशका वर्णन तथा ययातिका चरित्र
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • पूरुकी वंशपरम्पराका वर्णन
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • पूरुके वंशके अन्तर्गत ऋचेयुकी वंशपरम्परा—अजमीढवंश, पाञ्चाल एवं सोमकवंश, कौरववंश तथा तुर्वसु, द्रुह्यु और अनुकी संततिका वर्णन
  • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
  • यदुवंशका वर्णन, कार्तवीर्यकी उत्पत्ति एवं चरित्र तथा पाँचों ययाति-पुत्रोंके वंश-वर्णनके श्रवणकी महिमा
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • वृष्णिवंशका वर्णन—अक्रूर, वसुदेव, कुन्ती, सात्यकि, उद्धव, चारुदेष्ण, एकलव्य आदिका परिचय
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका अवतार लेना, श्रीकृष्णके अन्य भाई-बहिनों और कुटुम्बियोंका वर्णन तथा कालयवनकी उत्पत्ति
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • क्रोष्टाके वंशका वर्णन, पुरोहितके गोत्रसे क्षत्रियोंके गोत्रका बदल जाना
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • बभ्रुवंशका वर्णन
  • अष्टत्रिंशोऽध्याय:
  • भजमानके वंशका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • स्यमन्तकमणिके कारण प्रसेन, सत्राजित् और शतधन्वाका मारा जाना, बलदेवजीका दुर्योधनको गदा-विद्या सिखाना, अक्रूरजीका श्रीकृष्णको मणि देना और श्रीकृष्णका पुन: अक्रूरको मणि लौटा देना
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • जनमेजयका भगवान‍्के वराह, नृसिंह, परशुराम, श्रीकृष्ण आदि अवतारोंका रहस्य पूछना
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • भगवान् विष्णुके वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, व्यास तथा कल्कि-अवतारोंकी संक्षिप्त कथा
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • भगवान् विष्णुके ईश्वरत्वका वर्णन एवं आश्चर्यतारकामय संग्रामकी कथा
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • देवताओंके साथ युद्धके लिये उद्यत हुई दैत्यसेनाका वर्णन
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • आश्चर्यतारकामय संग्राममें देव-सेनाकी युद्धके लिये तैयारी
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • देवासुर-संग्राम एवं और्व अग्निकी उत्पत्ति
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • इन्द्रद्वारा चन्द्रमाकी स्तुति, चन्द्रदेव और वरुणदेवके द्वारा दैत्यसेनाका संहार, मयदानवद्वारा मायाका प्रयोग, पवन और अग्निदेवका दैत्यसेनाके साथ संग्राम और कालनेमिका रणमें आगमन
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • कालनेमिका युद्ध और प्रभाव
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • कालनेमि और भगवान् विष्णुका संवाद, श्रीविष्णुद्वारा कालनेमिका वध तथा देवताओंको आश्वासन देकर ब्रह्मलोकको प्रस्थान
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • ब्रह्मलोकमें भगवान् विष्णुका सत्कार
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • नारायणाश्रममें भगवान् विष्णुका शयन और उत्थान तथा पास आये हुए ब्रह्मा आदि देवताओंसे उनके आगमनका प्रयोजन पूछना
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीका भगवान् विष्णुसे जगत‍्की वर्तमान अवस्थाका वर्णन करते हुए पृथ्वीका भार उतारनेके लिये मन्त्रणा करनेका अनुरोध
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भगवान् विष्णु तथा सब देवताओंका मेरुपर्वतकी दिव्य सभामें उपस्थित होना और वहाँ पृथ्वीका भगवान‍्से भार उतारनेके लिये प्रार्थना करना
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका अंशावतरण
  • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भगवान् विष्णुके प्रति देवर्षि नारदका वचन—भूलोककी वर्तमान अवस्थाका परिचय देकर भगवान‍्को अवतार ग्रहण करनेके लिये प्रेरित करना
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भगवान् विष्णुके द्वारा नारदजीके कथनका उत्तर तथा ब्रह्माजीका भगवान‍्से उनके अवतार लेनेयोग्य स्थान और पिता-माता आदिका परिचय देना
  • तत्र विष्णुपर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • मङ्गलाचरण, नारदजीका मथुरामें आकर कंसको आनेवाले भयकी सूचना देना और कंसका अपने सेवकोंके सामने बढ़-बढ़कर बातें बनाना
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • कंसद्वारा देवकीके गर्भके विनाशका प्रयत्न, भगवान् विष्णुका पाताललोकमें स्थित ‘षड्गर्भ’ नामक दैत्योंके जीवोंका आकर्षण करके उन्हें निद्रा देवीके हाथमें देना और देवकीके गर्भमें क्रमश: स्थापित करनेका आदेश देकर अन्य कर्तव्य बताना तथा कार्यसाधनके अनन्तर बढ़नेवाली उस देवीकी महिमाका उल्लेख
  • तृतीयोऽध्याय:
  • आर्याकी स्तुति
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • कंसद्वारा देवकीके नवजात शिशुओंकी हत्या, योगमायाद्वारा सातवें गर्भका संकर्षण, श्रीकृष्णका प्राकटॺ और नन्दभवनमें प्रवेश, कंसद्वारा नन्दकन्याको मारनेका प्रयत्न और उसका दिव्य रूपमें दर्शन देना, कंसद्वारा क्षमा-प्रार्थना और देवकीद्वारा उसे क्षमा-दान
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • वसुदेवजीका नन्दको व्रजमें लौटनेकी सम्मति देना और नन्दजीका गोव्रजकी शोभा निहारते हुए वहाँ पधारना
  • षष्ठोऽध्याय:
  • शकट-भञ्जन और पूतना-वध
  • सप्तमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण और बलरामका व्रजमें घुटनोंके बल चलना तथा श्रीकृष्णका उलूखलमें बँधकर यमलार्जुन-भङ्गकी लीला करना
  • अष्टमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण-बलरामकी बालचर्या, श्रीकृष्णके द्वारा व्रजको अन्यत्र ले जानेकी चेष्टा और अपने शरीरसे भेड़ियोंको उत्पन्न करके उनका समूचे व्रजको डराना
  • नवमोऽध्याय:
  • भेड़ियोंके उत्पातसे व्रजवासियोंका उस स्थानको छोड़कर श्रीवृन्दावनमें जाना
  • दशमोऽध्याय:
  • वर्षा-ऋतुका वर्णन
  • एकादशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णकी अङ्गच्छटा, भाण्डीर वट, यमुना और कालियदहका वर्णन तथा श्रीकृष्णद्वारा कालियनागके निग्रहका विचार
  • द्वादशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णद्वारा कालियनागका दमन, उसका समुद्रको प्रस्थान तथा गोपोंको श्रीकृष्णकी महत्ताका अनुभव
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • बलरामद्वारा धेनुकासुरका वध और भयरहित तालवनमें गौओं तथा गोपोंका विचरण
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • बलरामद्वारा प्रलम्बासुरका वध
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • इन्द्रोत्सवके विषयमें श्रीकृष्णकी जिज्ञासा तथा एक वृद्ध गोपके द्वारा उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन
  • षोडशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके द्वारा गिरियज्ञ एवं गोपूजनका प्रस्ताव करते हुए शरद्-ऋतुका वर्णन
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • गोपोंद्वारा श्रीकृष्णकी बातको स्वीकार करके गिरियज्ञका अनुष्ठान तथा भगवान‍्का दिव्य रूप धारण करके उनकी पूजा ग्रहण करनेके पश्चात् उन्हें वर देना
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • इन्द्रका संवर्तक मेघोंद्वारा वर्षा कराकर गौओं और गोपोंको कष्टमें डालना, श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धनधारण तथा उसके नीचे गौओं और गोपोंसहित व्रजवासियोंका जाना
  • एकोनविंशोऽध्याय:
  • देवराज इन्द्रका आगमन, श्रीकृष्णका गोविन्दपदपर अभिषेक तथा इन्द्रका श्रीकृष्णको भावी कार्य बताकर अर्जुनकी देखभालके लिये कहना और श्रीकृष्णका उसे स्वीकार करना
  • विंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका अलौकिक चरित्र देखकर आशङ्कित हुए गोपोंका उनसे प्रश्न और श्रीकृष्णद्वारा उत्तर तथा उनकी रासलीलाका संक्षेपसे वर्णन
  • एकविंशोऽध्याय:
  • अरिष्टासुरका वध
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • कंसकी आशङ्का, उसका रात्रिके समय यदुवंशियोंको बुलाकर भरी सभामें श्रीकृष्ण और विष्णुके प्रभावको बताना, वसुदेवपर कठोर आक्षेप करना तथा अक्रूरको श्रीकृष्ण आदिको बुला लानेके लिये व्रजमें जानेकी आज्ञा देना
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • अन्धकका कंसको मुँहतोड़ उत्तर
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • केशीके अत्याचार और श्रीकृष्णद्वारा उसका वध
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • अक्रूरका व्रजमें आकर भगवान् श्रीकृष्णको देखना और उनके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें सोचना
  • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
  • अक्रूरका गोपोंके लिये कंसका आदेश सुनाना और वसुदेव-देवकीकी दयनीय दशा बताकर श्रीकृष्ण-बलरामको मथुरा चलनेके लिये प्रेरित करना, मार्गमें अक्रूरको यमुनाजीके जलमें आश्चर्यमय नागलोक एवं भगवान् अनन्त तथा उनकी गोदमें श्रीकृष्णका दर्शन
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण और बलरामका मथुरामें प्रवेश, उनके द्वारा रजकका वध, मालीको वरदान, कुब्जापर कृपा और कंसके धनुषका भञ्जन
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • कंसकी चिन्ता, उसका रंगशालाको देखना और उसे सुसज्जित करनेका आदेश देना, चाणूर एवं मुष्टिकको तथा कुवलयापीडके महावतको श्रीकृष्ण-बलरामके वधके लिये आज्ञा देना, महावतसे द्रुमिलके द्वारा अपनी उत्पत्तिकी कथा कहना—उसकी माताका सुयामुन पर्वतपर द्रुमिलके साथ समागम तथा उन दोनोंका परस्पर वरदान एवं शाप
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • नागरिकोंसे भरी रङ्गशालामें मञ्चों तथा प्रेक्षागृहोंकी शोभा, कंस तथा मल्लोंका आगमन, श्रीकृष्ण और बलरामका रङ्गद्वारपर पदार्पण, कुवलयापीड, महावत तथा हाथीके पादरक्षकोंका वध और दोनों बन्धुओंका रङ्गस्थलमें प्रवेश
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • रङ्गशालामें मल्लयुद्धके विषयमें श्रीकृष्णके विचार, श्रीकृष्ण और बलदेवके द्वारा चाणूर और मुष्टिक आदिका वध, कंसका संहार तथा पिता-माताके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों भाइयोंका उनके घरमें जाना
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • कंसकी स्त्रियों और माताका विलाप
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका कंसवधके लिये पश्चात्तापपूर्वक उसके औचित्यका समर्थन, उग्रसेनका श्रीकृष्णको सर्वस्व-समर्पणके पश्चात् कंसका अन्त्येष्टि-संस्कार करनेके लिये अनुरोध, श्रीकृष्णका उन्हें समझा-बुझाकर राज्यपर अभिषिक्त करना और समस्त यादवोंके साथ जाकर कंस आदिका अन्त्येष्टि-संस्कार कराना
  • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
  • बलराम और श्रीकृष्णका गुरु सान्दीपनिके यहाँ जाकर विद्या पढ़ना और गुरुदक्षिणामें उनके मरे हुए पुत्रको उन्हें देकर मथुरापुरीको लौट आना
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • जरासंधका अपनी विशाल सेनाके द्वारा आकर मथुरापुरीपर घेरा डालना
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसकी चारों दिशाओंसे मथुरापुरीपर आक्रमणकी योजना, यादवोंके साथ जरासंधकी सेनाका युद्ध, श्रीकृष्ण और बलरामके पराक्रमसे उसकी सेनाका पलायन, जरासंधद्वारा अपने सैनिकोंको प्रोत्साहन तथा उभय-पक्षके वीरोंमें घमासान युद्ध
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • वृष्णिवंशियों तथा जरासंधके सैनिकोंका युद्ध, बलराम और जरासंधका गदायुद्ध तथा जरासंधका पराजित होकर पलायन करना
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • जरासंधके पुन: आक्रमणसे शङ्कित यादवोंकी सभामें विकद्रुका भाषण—राजा हर्यश्वका चरित्र तथा उनसे यदु एवं यादवोंकी उत्पत्तिका वर्णन
  • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
  • विकद्रुद्वारा यदुकी संततिका वर्णन तथा मथुरापुरीको जरासंधका आक्रमण सहनेके अयोग्य बताना
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • बलराम और श्रीकृष्णका पुरी और पुरवासियोंकी रक्षाके लिये मथुरासे दक्षिण भारतकी ओर प्रस्थान, परशुरामजीसे उनकी भेंट तथा उन दोनोंको गोमन्तपर्वतपर चलनेके लिये उनकी सलाह
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण, बलराम और परशुरामजीका गोमन्तपर्वतपर आरोहण, गोमन्तकी शोभाका वर्णन तथा परशुरामजीका श्रीकृष्णको युद्धके लिये प्रोत्साहन देकर वहाँसे प्रस्थान
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • बलरामके पास वारुणी, कान्ति एवं श्री (शोभा)--इन देवाङ्गनाओंका आगमन, गरुड़के द्वारा श्रीकृष्णको वैष्णव मुकुटकी प्राप्ति, श्रीकृष्णका बलरामसे वार्तालाप तथा जरासंधकी सेनाका निरीक्षण करके अपने-आपसे ही मानसिक उद्‍गार प्रकट करना
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसका सेनाको पर्वतपर आक्रमण करनेकी आज्ञा देना, दमघोषकी सम्मतिसे गोमन्तपर्वतमें आग लगाया जाना,पर्वतका जलना तथा बलराम और श्रीकृष्णका पर्वतसे कूदकर राजाओंकी सेनामें आ पहुँचना
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण और बलरामका जरासंध और उसकी सेनाओंके साथ युद्ध, राजा दरदकी मृत्यु, जरासंधका पराजित होकर पलायन तथा चेदिराज दमघोषके साथ श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णद्वारा शृगालका वध तथा उसके पुत्रका करवीरपुरके राज्यपर अभिषेक
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमन और स्वागत
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • बलरामजीकी व्रजयात्रा तथा उनके द्वारा यमुनाजीका आकर्षण
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका यादवोंके साथ रुक्मिणी-स्वयंवरके अवसरपर कुण्डिनपुरमें जाना तथा राजा कैशिकद्वारा उनका सत्कार
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके आगमनसे चिन्तित हुए राजाओंकी सभामें जरासंध और सुनीथका भाषण
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • दन्तवक्त्र और शाल्वका भाषण सुनकर भीष्मकका श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन करते हुए उन्हें प्रसन्न करनेका ही निश्चय करना
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • क्रथ और कैशिकद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको अपने राज्यका समर्पण, देवराज इन्द्रके आदेशसे सब नरेशोंद्वारा भगवान‍्का राजेन्द्रके पदपर अभिषेक तथा भगवान‍्का सबको आश्वासन देना
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण और भीष्मकका संवाद, भीष्मकद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका मथुरागमन
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • शाल्वके कथनानुसार जरासंध आदि नरेशोंका शाल्वको ही कालयवनके पास दूत बनाकर भेजना
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • कालयवनकी विशेषता, राजा शाल्वका उसके यहाँ दूत बनकर आना और उसे जरासंधका संदेश सुनाना
  • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • कालयवनका राजाओंका अनुरोध स्वीकार करके श्रीकृष्णपर विजय पानेके लिये मथुराको प्रस्थान
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • गरुड़का श्रीकृष्णके निवासयोग्य भूमि देखनेके लिये जाना, मथुरामें राजेन्द्र श्रीकृष्णका स्वागत, श्रीकृष्णद्वारा राजा उग्रसेन तथा मथुरावासियोंका सत्कार एवं गरुड़का लौटकर कुशस्थलीके विषयमें बताना
  • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णकी आज्ञासे यादवोंका द्वारकापुरीको प्रस्थान
  • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • कालयवनका वध
  • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • द्वारकापुरीका विश्वकर्माद्वारा निर्माण, निधिपति शङ्ख और सुधर्मासभाका आनयन, श्रीकृष्णद्वारा सुव्यवस्थापूर्वक वहाँ यादवोंको बसाना तथा बलरामजीका रेवतीके साथ विवाह
  • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा रुक्मिणीका हरण तथा यादववीरोंका जरासंध एवं शिशुपाल आदिके साथ घोर युद्ध
  • षष्टितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णद्वारा रुक्मीकी पराजय और रुक्मिणी आदिके साथ श्रीकृष्णका विवाह एवं उनसे उत्पन्न हुई संतानोंका संक्षिप्त परिचय
  • एकषष्टितमोऽध्याय:
  • रुक्मीकी पुत्री शुभाङ्गीद्वारा स्वयंवरमें प्रद्युम्नका वरण, प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्धका
  • रुक्मीकी पौत्री रुक्मवतीके साथ विवाह तथा बलरामद्वारा रुक्मीका वध
  • द्विषष्टितमोऽध्याय:
  • बलदेवजीका माहात्म्य, उनके द्वारा हस्तिनापुरको गङ्गामें गिरानेका अद्भुत प्रयत्न
  • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
  • नरकासुरका परिचय, द्वारकामें इन्द्रका आगमन और श्रीकृष्णसे नरकवधके लिये अनुरोध, सत्यभामासहित श्रीकृष्णका प्राग्ज्योतिषपुरमें गमन तथा उनके द्वारा मुरु, निसुन्द, हयग्रीव, विरूपाक्ष, पञ्चनाद, अन्यान्य असुर तथा नरकासुरका वध
  • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका नरकासुरके भवनमें प्रवेश करके वहाँके धन-वैभव तथा सोलह हजार कुमारियोंको द्वारका भेजना और स्वयं देवलोकमें जा अदितिको कुण्डल दे वहाँसे पारिजात लेकर लौटना
  • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
  • रैवतक पर्वतपर रुक्मिणीके व्रतोद्यापनका उत्सव, उसमें पारिजात-पुष्प देकर श्रीकृष्णद्वारा रुक्मिणीका सम्मान, नारदजीद्वारा रुक्मिणीके सर्वाधिक सौभाग्यकी प्रशंसा तथा सत्यभामाका कोपभवनमें प्रवेश
  • षट्षष्टितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका सत्यभामाको मनाना और सत्यभामाका मानसिक खेद प्रकट करके उनसे तपस्याके लिये अनुमति माँगना
  • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके पूछनेपर सत्यभामाका उन्हें अपने रोष एवं खेदका कारण बताना, श्रीकृष्णका उनके लिये पारिजात-वृक्ष लानेका विश्वास दिलाकर उन्हें संतुष्ट करना, सत्यभामा और श्रीकृष्णद्वारा नारदजीका सत्कार तथा नारदजीके द्वारा पारिजातकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन
  • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका पारिजात-वृक्ष माँगनेके लिये नारदजीके द्वारा इन्द्रके पास संदेश भेजना और न देनेपर उन्हें गदा मारनेकी धमकी देना
  • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
  • स्वर्गमें महादेवजीकी परिचर्याके लिये नृत्य-गीत आदि उत्सव, नारदजीका इन्द्रको श्रीकृष्णका पारिजातके लिये प्रार्थनाविषयक संदेश सुनाना और इन्द्रका अनेक कारण बताकर पारिजातको न देनेका विचार प्रकट करना
  • सप्ततितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके द्वारा गदाप्रहारकी धमकी सुनकर कुपित हुए इन्द्रका नारदजीसे उनके बर्तावकी कटु आलोचना करना और युद्ध किये बिना पारिजात-वृक्षको न देनेका ही निश्चय करना
  • एकसप्ततितमोऽध्याय:
  • नारदजीके द्वारा श्रीकृष्णकी महत्ताका प्रतिपादन सुनकर भी इन्द्रका उन्हें पारिजात देनेको उद्यत न होना
  • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका नारदजीको अमरावतीपर आक्रमण करनेका निश्चय बताकर इन्द्रके पास संदेश भेजना, इन्द्र और बृहस्पतिकी बातचीत, बृहस्पतिका कश्यपजीको यह समाचार बताना और कश्यपजीका युद्धकी शान्तिके लिये भगवान् शंकरकी स्तुति करना
  • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
  • इन्द्र और श्रीकृष्ण, जयन्त और प्रद्युम्न, प्रवर और सात्यकि तथा ऐरावत और गरुड़का युद्ध
  • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
  • रात्रिमें युद्ध स्थगित करके श्रीकृष्णका पारियात्र-पर्वतको वरदान देना, गङ्गाका स्मरण करना, बिल्व और गङ्गाजलपर महादेवजीका आवाहन करके उन बिल्वोदकेश्वरकी पूजा और स्तुति करना, महादेवजीका उन्हें अभीष्ट वर देकर दैत्योंको मारनेका आदेश देना तथा पारियात्र-पर्वतपर भगवान‍्का निवास एवं उनकी प्रतिमाके पूजनकी महिमा
  • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
  • इन्द्र और उपेन्द्रका पुनर्युद्ध, उत्पातोंका प्राकटॺ, ब्रह्माजीकी आज्ञासे कश्यप और अदितिका बीचमें आकर दोनोंका युद्ध बंद कराना, फिर सबका स्वर्गमें गमन, अदितिकी आज्ञासे शची द्वारा उपहार पाकर पारिजातसहित द्वारकागमन, पारिजातसे द्वारकावासियोंकी प्रसन्नता,सत्यभामाके पुण्यक व्रतमें प्रतिग्रहके लिये श्रीकृष्णद्वारा नारदजीका स्मरण
  • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
  • सत्यभामाद्वारा पुण्यक-व्रतमें श्रीकृष्णका नारदजीको दान, नारदजीका निष्क्रय लेकर श्रीकृष्णको छोड़ना और उनसे वर पाना, श्रीकृष्णका सगे-सम्बन्धियोंको पारिजात दिखाकर पुन: उसे स्वर्गमें पहुँचाना
  • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
  • पुण्यक-विधिके वर्णनका उपक्रम
  • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
  • उमाद्वारा सती स्त्रीके महत्त्वका वर्णन करते हुए पुण्यक-व्रतकी विधिका उपदेश
  • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
  • पुण्यक-व्रतसम्बन्धी नियम एवं दानका वर्णन तथा पुत्र आदिके निमित्त किये जानेवाले दूसरे व्रत एवं दानका प्रतिपादन
  • अशीतितमोऽध्याय:
  • नाना प्रकारके व्रतोंका विधान
  • एकाशीतितमोऽध्याय:
  • उमाके द्वारा व्रतकथनका उपसंहार, श्रीनारदजीका देवियोंद्वारा किये गये
  • व्रतोंका वर्णन करना तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंद्वारा व्रतका अनुष्ठान एवं दान
  • द्वॺशीतितमोऽध्याय:*
  • षट्पुरवासी असुरोंका संक्षिप्त परिचय, उन्हें ब्रह्मा और भगवान् शिवका वरदान
  • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
  • ब्रह्मदत्तके यज्ञमें वसुदेव-देवकीका आगमन, दैत्योंद्वारा ब्रह्मदत्तकी कन्याओंका अपहरण और प्रद्युम्नद्वारा उनकी रक्षा, नारदजीके कहनेसे दैत्योंका क्षत्रियनरेशोंको अपने पक्षमें मिलाना तथा श्रीकृष्णका षट्पुरमें आगमन
  • चतुरशीतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णद्वारा यादव-सेनाकी युद्धके लिये नियुक्ति, दानवोंका निष्क्रमण, निकुम्भद्वारा कुछ यादव वीरोंका गुफामें बंदी होना, श्रीकृष्णके द्वारा दानव-सैनिकोंका संहार, प्रद्युम्नद्वारा राजसैनिकोंका गुफामें अवरोध तथा ब्रह्मदत्तको सान्त्वना
  • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
  • निकुम्भका जयन्तसे पराजित होकर भगवान् श्रीकृष्णके साथ युद्ध करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको निकुम्भका चरित्र बताना, आकाशवाणीकी प्रेरणासे सुदर्शन चक्रद्वारा निकुम्भका वध करना और ब्रह्मदत्तको षट्पुरनगर देकर द्वारकाको प्रस्थान करना
  • षडशीतितमोऽध्याय:
  • अन्धकासुरकी उत्पत्ति और अनाचार, उसके वधके लिये ऋषियोंका विचार, नारदजीका मन्दारपुष्पोंकी माला धारण करके अन्धकके यहाँ जाना और उससे मन्दारवनका महत्त्व बताना
  • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
  • मन्दराचलपर गये हुए अन्धकासुरका महादेवजीद्वारा वध
  • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
  • पिण्डारकतीर्थके अन्तर्गत समुद्रमें श्रीकृष्ण तथा अन्य यादवोंका जलविहार
  • एकोननवतितमोऽध्याय:
  • बलराम और श्रीकृष्ण आदि यादवोंकी जलक्रीड़ा एवं गान आदिका वर्णन
  • नवतितमोऽध्याय:
  • निकुम्भद्वारा भानुमतीका अपहरण, श्रीकृष्ण, अर्जुन और प्रद्युम्नके साथ उसका युद्ध, गोकर्णतीर्थमें उसका पतन, प्रद्युम्नका भानुमतीको लेकर द्वारका पहुँचाना, फिर तीनोंका निकुम्भके साथ युद्ध, उसकी अद्भुत मायाका वर्णन और श्रीकृष्णद्वारा निकुम्भका वध
  • एकनवतितमोऽध्याय:
  • वज्रनाभकी तपस्या और वरप्राप्ति, उसका त्रिभुवन-विजयके लिये उद्योग, इन्द्रकी श्रीकृष्णसे वार्ता, भद्रनामा नटको मुनियोंका वरदान, इन्द्रका हंसोंको आवश्यक कर्तव्य बताकर वज्रनाभपुरमें भेजना
  • द्विनवतितमोऽध्याय:
  • हंसोंका वज्रपुरमें निवास, हंसीका प्रभावतीको प्रद्युम्नके प्रति अनुरक्त कराना, प्रभावतीका हंसीसे प्रद्युम्नकी प्राप्ति करानेका अनुरोध, हंसी और वज्रनाभका संवाद, हंसोंके मुँहसे सब समाचार सुनकर श्रीकृष्णका नटवेषमें प्रद्युम्न आदि यादवोंको वज्रपुरमें भेजना
  • त्रिनवतितमोऽध्याय:
  • नटवेशधारी यादवोंका सुपुर और वज्रपुरमें सफल अभिनय करके दानवोंको रिझाकर उनसे उपहार पाना तथा प्रद्युम्नका प्रभावतीके घरमें प्रवेश
  • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
  • प्रद्युम्न और प्रभावतीका गान्धर्व-विवाह एवं समागम; फिर गद और चन्द्रवतीका तथा साम्ब और गुणवतीका गान्धर्व-विवाह
  • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
  • प्रद्युम्नका प्रभावतीसे वर्षाका वर्णन करते हुए उसे अपने कुलका परिचय देना
  • षण्णवतितमोऽध्याय:
  • कश्यपके मना करनेपर भी वज्रनाभका त्रिलोकविजयके लिये प्रस्थान, श्रीकृष्ण और इन्द्रका प्रद्युम्नको संदेश देना और उनकी संततिके प्रभावका उल्लेख करना, दैत्योंका प्रद्युम्न आदिके पुत्रोंको बंदी बनाना, प्रभावती आदिका पतियोंको तलवार देकर युद्धके लिये भेजना, इन्द्रके द्वारा उनकी सहायता तथा प्रद्युम्नका अद्भुत पराक्रम
  • सप्तनवतितमोऽध्याय:
  • प्रद्युम्नद्वारा वज्रनाभका वध तथा प्रद्युम्न आदिके पुत्रोंका राज्याभिषेक
  • अष्टनवतितमोऽध्याय:
  • इन्द्रकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा पुन: परिष्कृत की गयी द्वारकापुरीका वर्णन
  • नवनवतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका द्वारका तथा अन्त:पुरमें प्रवेश और मणिपर्वत एवं पारिजातको यथोचित स्थानमें स्थापित करना
  • शततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका समस्त यादवोंसे मिलकर उन्हें सम्मानित करनेके लिये सभामें बुलाना
  • एकाधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णद्वारा यादवोंका सत्कार तथा नारदजीका यादवोंकी सभामें श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन करना
  • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
  • नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णके अद्भुत कर्मोंका वर्णन
  • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णकी संततिका वर्णन तथा वृष्णिवंशका उपसंहार
  • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
  • प्रद्युम्नका जन्म, शम्बरासुरद्वारा प्रद्युम्नका सूतिकागृहसे अपहरण, प्रद्युम्न-मायावती-संवाद और प्रद्युम्नका शम्बरासुरके सौ पुत्रोंके साथ युद्ध
  • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
  • प्रद्युम्नद्वारा शम्बरासुरकी सेना और मन्त्रियोंका संहार
  • षडधिकशततमोऽध्याय:
  • शम्बरासुर और प्रद्युम्नका मायामय युद्ध, शम्बरकी चिन्ता, देवराज इन्द्रकी आज्ञासे नारदजीका प्रद्युम्नको उनके पूर्वस्वरूपका स्मरण दिलाना और आवश्यक कर्तव्य सुझाना
  • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
  • प्रद्युम्नके द्वारा शम्बरासुरका वध
  • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
  • मायावतीसहित प्रद्युम्नका द्वारकामें आगमन और रुक्मिणीके भवनमें प्रवेश
  • नवाधिकशततमोऽध्याय:
  • बलदेवजीके द्वारा प्रद्युम्नको आह्निकस्तोत्रका उपदेश
  • दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • साम्बकी उत्पत्ति और अस्त्रशिक्षा तथा द्वारकामें पधारे हुए राजाओंके बीच नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी परम धन्यताका प्रतिपादन
  • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णकी महिमा—अर्जुनका श्रीकृष्णसे आज्ञा लेकर ब्राह्मण-बालककी रक्षाके लिये जाना
  • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणबालककी रक्षा न होनेपर ब्राह्मणद्वारा अर्जुनका तिरस्कार और श्रीकृष्णके साथ उनका उत्तर दिशाको गमन
  • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णद्वारा ब्राह्मणपुत्रोंका आनयन
  • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना
  • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णके पराक्रमोंका संक्षेपसे वर्णन
  • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान् शङ्करका बाणासुरको अपने और देवी पार्वतीके पुत्रके रूपमें स्वीकार करना, बाणासुरका उनसे युद्धके लिये वर माँगना और पाना तथा इससे बाणमन्त्री कुम्भाण्डका चिन्तित होना
  • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • शिव-पार्वतीका क्रीडाविहार, पार्वतीका उषाको पतिसमागमके लिये वर देना तथा उषाकी विरह-व्यथाका वर्णन
  • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • उषाका स्वप्नमें प्रियतमके साथ समागम, इससे उषाकी चिन्ता, सखियोंका उसे समझाना, कुम्भाण्डकुमारीके कहनेसे उषाका चित्रलेखाको बुलाकर उसे अपना कष्ट बताना, चित्रलेखाके बनाये हुए चित्रोंसे उषाका अनिरुद्धको पहचानना और उन्हें लानेके लिये चित्रलेखाका द्वारकाको जाना
  • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • चित्रलेखा और नारदजीका संवाद, चित्रलेखाका नारदजीसे तामसी विद्या ग्रहणकर अनिरुद्धको शोणितपुर ले जाना, उषा और अनिरुद्धका गान्धर्व-विवाह, अनिरुद्धका बाणासुरके सैनिकों तथा बाणासुरके साथ युद्ध, उनका नागपाशमें बँधकर बंदी होना तथा नारदजीका द्वारका जाना
  • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अनिरुद्धके द्वारा आर्यादेवीकी स्तुति और देवीका प्रसन्न होकर उन्हें बन्धनके कष्टसे मुक्त करना
  • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अनिरुद्धके अपहरणसे रनिवासमें शोक, श्रीकृष्ण और यादवोंकी चिन्ता, गुप्तचरोंकी नियुक्ति और उनकी विफलता, नारदजीका आगमन और अनिरुद्धका समाचार-निवेदन, श्रीकृष्णके द्वारा गरुड़का आवाहन, गरुड़द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका शोणितपुरको प्रस्थान
  • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण, बलभद्र और प्रद्युम्नका शोणितपुरके लिये प्रस्थान, गरुड़का आहवनीय अग्निको शान्त करना, श्रीकृष्णद्वारा अग्निगणोंकी पराजय, बाणासुरके सैनिकोंके साथ श्रीकृष्ण आदिका युद्ध, त्रिशिरा ज्वरका आक्रमण और श्रीकृष्णके साथ उसका युद्ध
  • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णसे पराजित हुए ज्वरका उनकी शरणमें जाना, उनसे वर पाना और उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर रणभूमिसे हट जाना
  • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • बाणासुरकी सेनाका पलायन, भगवान् शङ्करका अपने गणोंके साथ युद्धके लिये आगमन, भगवान् श्रीकृष्ण और रुद्रका युद्ध तथा बाणासुरका युद्धभूमिमें पदार्पण
  • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके जृम्भास्त्रसे भगवान् शङ्करका जँभाईके वशीभूत होना, ब्रह्माजीके द्वारा शिवजीको विष्णुके साथ उनकी एकताका स्मरण दिलाना तथा ब्रह्माजीके पूछनेपर मार्कण्डेयजीका हरिहरकी एकता स्थापित करते हुए माहात्म्यसहित हरिहरात्मक स्तोत्रका वर्णन करना
  • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • स्वामी कार्तिकेय और श्रीकृष्णके युद्धमें स्वामी कार्तिकेयकी पराजय, कोटवीदेवीका कार्तिकेयकी रक्षा करना, बाणासुर और श्रीकृष्णका युद्ध, श्रीकृष्णका बाणासुरकी हजार भुजाओंको काटना, महादेवजीका बाणासुरको महाकाल होनेका वरदान देना
  • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अनिरुद्धका नागपाशसे छुटकारा और उनके द्वारा श्रीकृष्ण आदिकी वन्दना, नारदजीके कहनेसे उनका वीर्य-विवाह, उषाकी विदाई, सबका द्वारकाको प्रस्थान, मार्गमें श्रीकृष्णद्वारा वरुण देवतापर विजय, वरुणद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और पूजा, श्रीकृष्णके आगमनसे द्वारकावासियोंका हर्ष, भगवान‍्के आदेशसे पुरवासियोंद्वारा देवताओंकी वन्दना, इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी प्रशंसा और सब देवताओं तथा ऋषियों आदिका अपने-अपने स्थानको जाना
  • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • द्वारकामें उत्सव, उषाका अन्त:पुरमें प्रवेश और सत्कार, श्रीकृष्ण और विष्णुपर्वकी महिमा तथा पर्वका उपसंहार
  • भविष्यपर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • जनमेजयकी संतति एवं पौरव तथा पाण्डववंशकी प्रतिष्ठाका वर्णन
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • राजा जनमेजयका अश्वमेध यज्ञ करनेका विचार, व्यासजीका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार, आपने पाण्डवोंको राजसूय यज्ञ करनेसे क्यों नहीं रोका—यह जनमेजयका प्रश्न और उसके उत्तरमें व्यासजीद्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन
  • तृतीयोऽध्याय:
  • व्यासजीद्वारा कलियुगकी स्थितिका वर्णन
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • कलियुगका वर्णन
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • व्यासजी आदिका गमन, जनमेजयके अश्वमेध यज्ञमें इन्द्रका विघ्न डालना, जनमेजयद्वारा इन्द्रको शाप, ब्राह्मणोंका निर्वासन तथा अपनी पत्नीकी भर्त्सना, विश्वावसुका जनमेजयको समझाना
  • षष्ठोऽध्याय:
  • जनमेजयका संतुष्ट होकर राज्यशासन करना तथा इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणकी महिमा
  • सप्तमोऽध्याय:
  • पुष्कर-प्रादुर्भावके विषयमें जनमेजयका प्रश्न और वैशम्पायनजीका उत्तर—भगवान् नारायणकी महिमाका प्रतिपादन
  • अष्टमोऽध्याय:
  • सत्ययुग आदिके परिमाणका वर्णन
  • नवमोऽध्याय:
  • प्रलयके पश्चात् एकार्णवके जलमें भगवान् नारायणका शयन
  • दशमोऽध्याय:
  • एकार्णवमें भगवान् और मार्कण्डेयजीका संवाद
  • एकादशोऽध्याय:
  • परमात्माके द्वारा भूतोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीको प्रकट करनेके लिये उनकी नाभिसे एक महान् पद्मका प्रादुर्भाव
  • द्वादशोऽध्याय:
  • नारायणके नाभिकमलके दलोंमें समस्त लोकोंकी कल्पना
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • मधु और कैटभका ब्रह्माजीके साथ संवाद तथा भगवान् विष्णुके द्वारा वध
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीके तीन पुत्रोंको परम पदकी प्राप्ति, फिर उनके द्वारा मैथुनी सृष्टिका विस्तार, दक्ष-कन्याओंकी संततिका वर्णन
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • जनमेजयके द्वारा महाभारत-वर्णित चरित्रकी प्रशंसा
  • षोडशोऽध्याय:
  • सृष्टिविषयक वर्णनके प्रसंगमें ज्ञान और योगका विचार
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • मैनाककी स्थिति, मेरुपृष्ठपर परमात्मासे ब्रह्माजीका प्राकटॺ, मेरुकी विशालता, ब्रह्माजीके द्वारा सृष्टि, ब्रह्म और ब्रह्माके स्वरूपका वर्णन, गङ्गाका प्रादुर्भाव, सोमकी उत्पत्ति, धर्मके पाद, योग-साधना, ऐश्वर्यसे हानि, वेदोंका प्राकटॺ, यज्ञपुरुषका वर्णन, योगवेत्ताकी महिमा, चित्तकी उपलब्धिमें कारण, मोक्षसम्बन्धी कर्म करनेका विधान और कर्मफलके त्यागसे मुक्ति
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • योगके उपसर्ग (विघ्न), योगीकी विष्णुरूपसे स्थिति, कर्मलयसे मुक्ति, सकाम कर्मियोंकी धूममार्गसे गति और पुनरावृत्ति, ज्ञानी एवं योगीको तत्त्वका साक्षात्कार तथा ब्रह्मयुगका वर्णन
  • एकोनविंशोऽध्याय:
  • योगीकी स्थिति तथा उसके समक्ष आनेवाले विघ्नरूप ऐश्वर्योंका वर्णन
  • विंशोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीके द्वारा योगधारणपूर्वक की गयी मानसिक सृष्टिका वर्णन
  • एकविंशोऽध्याय:
  • क्षत्रयुगके प्रसंगमें ज्ञानसिद्ध ब्राह्मणोंका वर्णन, प्रजापति दक्षद्वारा प्राणियों एवं चारों वर्णोंकी सृष्टि तथा उनका अपने पुत्रोंको धात्रीका अन्त जाननेके लिये आदेश
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • दक्षका अपने आधे अङ्गसे स्त्रीरूप होकर बहुत-सी कन्याओंको उत्पन्न करना और उनका धर्म, कश्यप एवं सोमको दान कर देना, कश्यप और दक्षकन्याओंकी संतानोंका वर्णन तथा देवलोकमें उत्पन्न होनेवालोंकी योग्यता
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीके महायज्ञका वर्णन
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • चारों आश्रमोंमें स्थित हुए ब्राह्मणोंकी ब्रह्माजीके यज्ञस्थलके पुण्य-प्रदेशमें निवासकी इच्छा
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • नारद आदिके द्वारा ब्राह्मणों तथा ब्रह्माजीका सत्कार, ब्रह्माजीके द्वारा कश्यपको यज्ञका आदेश, देवता-दानव-युद्ध तथा विष्णुके द्वारा मधुकी पराजय
  • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
  • मधु और विष्णुका घोर युद्ध, देवताओं और ऋषियोंद्वारा श्रीविष्णुकी स्तुति, हयग्रीवरूपधारी विष्णुद्वारा मधुका वध और पृथ्वीको मेदिनी नामकी प्राप्ति
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • मधुके पतनसे समस्त प्राणियोंको हर्ष, वहाँ एकत्र हुए पर्वतों और वसन्त-ऋतुका वर्णन, मधुवाहिनी नदीका प्राकटॺ और गौरीसिद्धाका माहात्म्य
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • पुष्करमें श्रीविष्णु आदिकी तपस्या और उसके प्रभावका वर्णन
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • तपस्याके प्रभावसे देवताओंका उत्कर्ष
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • पृथुका राज्याभिषेक तथा दैत्यों और देवताओंद्वारा मन्दराचलके मन्थनदण्डद्वारा समुद्रका मन्थन, समुद्रसे अन्य रत्नोंके साथ अमृतका प्राकटॺ और राहुके सिरका छेदन
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • बलिके यज्ञमें वामनद्वारा त्रिलोकीके राज्यका अपहरण तथा कालान्तरमें देवताओंद्वारा बलिका राज्याभिषेक
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • दक्षयज्ञ-विध्वंस
  • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
  • वाराहावतारका उपक्रम
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • भगवान् यज्ञवराहके द्वारा पृथ्वीका उद्धार
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • भगवान् वाराहके द्वारा विभिन्न दिशाओंमें पर्वतों और नदियोंका निर्माण
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • जगत‍्की सृष्टिका वर्णन
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीद्वारा विभिन्न वर्गके अधिपतियोंकी नियुक्ति
  • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
  • देवासुर-संग्राम तथा हिरण्याक्षद्वारा देवराज इन्द्रका स्तम्भन
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • भगवान् वाराहद्वारा हिरण्याक्षका वध
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • देवताओंको अपने प्रभुत्वकी प्राप्ति, देवराज इन्द्रकी सम्पूर्ण लोकोंके आधिपत्यपर प्रतिष्ठा, सत्-असत् पुरुषोंकी यथोचित गतिके लिये आदेश देकर भगवान‍्का अन्तर्धान होना तथा देवेन्द्रद्वारा पर्वतोंके पंखका छेदन
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • हिरण्यकशिपुकी तपस्या, वरप्राप्ति, अत्याचार, देवताओंको ब्रह्माजीका आश्वासन, भगवान् विष्णुका नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी सभामें जाना तथा उस सभाका वर्णन
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • भगवान् नरसिंहका देवता, गन्धर्व, अप्सराओं तथा दैत्योंसे सेवित हिरण्यकशिपुको देखना
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • प्रह्लादको नरसिंह-विग्रहमें समस्त त्रिलोकीका दर्शन
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • दैत्यों तथा हिरण्यकशिपुद्वारा नृसिंहपर विभिन्न अस्त्रोंका प्रहार
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • दैत्योंद्वारा किये गये प्रहारों और रची गयी मायाओंकी निष्फलता
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • दैत्योंके विनाशकी सूचना देनेवाले महान् उत्पात, हिरण्यकशिपुका गदा लेकर धावा करना तथा उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी, पर्वत, नदी एवं देशोंका कम्पित होना
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • देवताओंके अनुरोधसे भगवान् नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा देवताओं और ब्रह्माजीद्वारा उनकी स्तुति
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • वामनावतारका उपक्रम, बलिका अभिषेक तथा दैत्योंका उनसे त्रैलोक्यविजयके लिये अनुरोध
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • देवताओंके साथ युद्धके लिये दैत्योंकी तैयारी
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • पुलोमा, हयग्रीव, प्रह्लाद और शम्बरासुरका युद्धके लिये उद्योग
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • अनुह्राद, विरोचन, कुजम्भ, असिलोमा, वृत्र, एकचक्र, वृत्रभ्राता, राहु, विप्रचित्ति, केशी, वृषपर्वा तथा बलिका युद्धके लिये तैयार होकर आगे बढ़ना
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • इन्द्र आदि देवताओं और लोकपालोंका युद्धके लिये उद्योग और प्रस्थान
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • देवताओं और असुरोंका द्वन्द्वयुद्ध, भीषण उत्पात, ब्रह्माजी तथा सनकादि योगेश्वरोंका युद्ध देखनेके लिये आगमन
  • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • देवताओं और असुरोंके युद्धका यज्ञके रूपमें वर्णन, दोनों सेनाओंका तुमुल युद्ध तथा सावित्र और ध्रुवकी पराजय
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • नमुचिद्वारा धर नामक वसुकी, मयासुरद्वारा त्वष्टाकी, वायुदेवद्वारा पुलोमाकी, हयग्रीवद्वारा पूषा देवताकी, शम्बरासुरद्वारा भगकी तथा चन्द्रदेवद्वारा समूची दैत्यसेनाकी पराजय
  • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • देवताओं और दानवोंका घोर संग्राम—विरोचनका विष्वक्सेनके साथ और कुजम्भका अंश देवताके साथ युद्ध करते समय घोर पराक्रम प्रकट करना
  • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • देवासुरसंग्राममें कुजम्भ, असिलोमा और वृत्रासुरके उत्कर्षका वर्णन तथा हरि एवं अश्विनीकुमारकी पराजय
  • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • रणाजि और एकचक्रके, मृगव्याध और बलासुरके, अजैकपाद् और राहुके तथा सुधूम्राक्ष एवं केशी दैत्यके युद्धका वर्णन
  • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
  • वृषपर्वा और निष्कुम्भ नामक विश्वेदेवके तथा प्रह्लाद और कालके घोर युद्धका वर्णन
  • षष्टितमोऽध्याय:
  • कुबेर और अनुह्रादका भयंकर युद्ध
  • एकषष्टितमोऽध्याय:
  • वरुणका विप्रचित्तिके साथ युद्ध और पराजय
  • द्विषष्टितमोऽध्याय:
  • अग्निद्वारा दैत्योंकी पराजय तथा बृहस्पतिके द्वारा अग्निदेवका स्तवन
  • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा बलिके प्रति प्रह्लादका वचन तथा बलिका देवसेनापर आक्रमण
  • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
  • बलि और इन्द्रका युद्ध तथा इन्द्रका रणभूमिसे पलायन
  • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
  • विजयी बलिके पास राजलक्ष्मी आदिका शुभागमन
  • षट्षष्टितमोऽध्याय:
  • अदिति और कश्यपजीके साथ देवताओंका ब्रह्मलोकमें जाना
  • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीकी आज्ञासे कश्यप और अदितिसहित देवताओंका क्षीरसागरके उत्तर तटपर जाकर तपस्यामें संलग्न होना
  • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
  • कश्यपद्वारा परमपुरुष परमात्माका स्तवन
  • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
  • कश्यप, अदिति और देवताओंको भगवान् विष्णुका वरदान देना और अदितिके गर्भसे प्रकट होना
  • सप्ततितमोऽध्याय:
  • ऋषियों और विविध देवताओंका वामनजीको नमस्कार करना, गन्धर्वों तथा अप्सराओंका नाचना-गाना,भगवान‍्के वैशिष्टॺका वर्णन, भगवान‍्का देवताओंसे उनका मनोरथ पूछकर बृहस्पतिजीके साथ बलिके यज्ञमें जाना, वहाँ अपनी वाक्पटुतासे सबको चकित कर देना और राजा बलिका उनसे परिचय तथा आगमनका प्रयोजन पूछना
  • एकसप्ततितमोऽध्याय:
  • वामनद्वारा बलिके यज्ञकी प्रशंसा, बलिसे माँगनेके लिये प्रेरित होनेपर वामनका उनसे तीन पग भूमि माँगना, शुक्राचार्य और प्रह्लादका बलिको दान देनेसे रोकना, बलिद्वारा दानका समर्थन तथा दान पाते ही वामनका अपने विराट्‍‍रूपको प्रकट करना
  • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
  • विराट् रूपधारी वामनपर आक्रमण करनेवाले दैत्योंके नाम, रूप और आयुधोंका परिचय, भगवान‍्का तीनों लोकोंको नापकर राज्यका विभाजन करना, बलिको पातालका राज्य दे मर्यादा बाँधकर उन्हें वहाँ भेजना, जीविकाकी व्यवस्था करना, नारदजीका बलिको मोक्षविंशक स्तोत्रका उपदेश देना, उसके प्रभावसे बलिका बन्धनमुक्त होना और उस स्तोत्रकी महिमा
  • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
  • रुक्मिणीदेवीकी भगवान् श्रीकृष्णसे पुत्रके लिये प्रार्थना और भगवान‍्का उन्हें आश्वासन देते हुए कैलास जानेका विचार प्रकट करना
  • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णका यादवसभामें अपनी कैलासयात्राका विचार प्रकट करते हुए नगरकी रक्षाके लिये यादवोंको सावधान रहनेका आदेश देना
  • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णकी सात्यकि और उद्धवसे नगरकी रक्षाके विषयमें बातचीत तथा बलराम आदि यादवोंको भी रक्षाका भार सौंपकर उनका कैलासयात्राके लिये उद्यत होना
  • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
  • गरुड़पर आरूढ़ होकर श्रीकृष्णका बदरिकाश्रममें जाना, मार्गमें देवताओं-मुनियोंद्वारा उनकी स्तुति
  • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
  • देवताओंसहित श्रीकृष्णका बदरिकाश्रममें ऋषियोंद्वारा आतिथ्य-सत्कार
  • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णकी समाधि, महान् कोलाहल और उनके पास भागते हुए मृग आदिका आगमन
  • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णके समक्ष दो पिशाचोंका आगमन
  • अशीतितमोऽध्याय:
  • घण्टाकर्ण और भगवान् श्रीकृष्णका एक-दूसरेको अपना परिचय देना तथा घण्टाकर्णद्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन एवं समाधि-लाभ
  • एकाशीतितमोऽध्याय:
  • पिशाचको समाधि-अवस्थामें भगवान् विष्णुका साक्षात्कार
  • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
  • घण्टाकर्णद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति
  • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
  • घण्टाकर्णद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको उपहार-समर्पण, भगवान‍्का उसे वर देना और एक मरे हुए ब्राह्मणको जीवित करना
  • चतुरशीतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका कैलासपर पहुँचकर वहाँ बारह वर्षोंके लिये कठोर तपस्यामें संलग्न होना
  • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णके समीप इन्द्र आदि देवताओं तथा उमासहित भगवान् शिवका आगमन
  • षडशीतितमोऽध्याय:
  • पिशाचों, मुनियों और अप्सराओंके साथ उमासहित भगवान् शङ्करका श्रीकृष्णके समीप गमन
  • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णद्वारा महादेवजीकी स्तुति
  • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
  • भगवान् शिवद्वारा श्रीविष्णुकी स्तुति
  • एकोननवतितमोऽध्याय:
  • भगवान् शङ्करका ऋषियोंको श्रीकृष्णतत्त्वका उपदेश देना
  • नवतितमोऽध्याय:
  • भगवान् शंकरद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका कैलाससे बदरिकाश्रममें लौटना
  • एकनवतितमोऽध्याय:
  • पौण्ड्रकका राजाओंकी सभाओंमें अपनेको शङ्ख, चक्र आदिसे युक्त वासुदेव घोषित करना और श्रीकृष्णको पराजित करनेका मनसूबा बाँधना
  • द्विनवतितमोऽध्याय:
  • पौण्ड्रकके यहाँ नारदजीका आगमन और उसके साथ उनकी बातचीत
  • त्रिनवतितमोऽध्याय:
  • नारदजीका श्रीकृष्णके पास जाना और पौण्ड्रकका द्वारकापर आक्रमण
  • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
  • यादववीरोंद्वारा पौण्ड्रककी सेनाका और एकलव्यद्वारा यादवसेनाका संहार
  • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
  • पौण्ड्रकद्वारा पूर्वद्वारके परकोटोंको तोड़नेका प्रयत्न, सात्यकि आदि यादववीरोंका रक्षाके लिये पहुँचना, सात्यकिका वायव्यास्त्रद्वारा पौण्ड्रकसैनिकोंको भगाकर पौण्ड्रकको युद्धके लिये ललकारना और पौण्ड्रककी गर्वोक्ति
  • षण्णवतितमोऽध्याय:
  • पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्ध
  • सप्तनवतितमोऽध्याय:
  • सात्यकि और पौण्ड्रकका युद्ध
  • अष्टनवतितमोऽध्याय:
  • बलभद्र और एकलव्यका युद्ध तथा बलभद्रद्वारा निषादोंका संहार
  • नवनवतितमोऽध्याय:
  • बलभद्र और एकलव्यका तथा पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्ध
  • शततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका द्वारकामें आगमन और पौण्ड्रकसे उनकी बातचीत
  • एकाधिकशततमोऽध्याय:
  • पौण्ड्रक और श्रीकृष्णका युद्ध तथा पौण्ड्रकका वध
  • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
  • एकलव्यका द्वीपान्तरगमन, भगवान् श्रीकृष्णका यादवोंको अपनी यात्राका संक्षिप्त वृत्तान्त बताना तथा अन्त:पुरमें रुक्मिणी और सत्यभामासे मिलकर उन्हें संतोष देना
  • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
  • हंस और डिम्भकके विषयमें जनमेजयका प्रश्न
  • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा ब्रह्मदत्तको भगवान् शङ्करकी आराधनासे हंस और डिम्भक नामक पुत्रोंकी प्राप्ति तथा राजसखा विप्रवर मित्रसहको भगवान् विष्णुकी उपासनासे जनार्दन नामक पुत्रका लाभ
  • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
  • हंस और डिम्भककी तपस्या, वरप्राप्ति, जनार्दनसहित उन दोनोंका विवाह तथा तीनों कुमारोंकी धर्मनिष्ठा
  • षडधिकशततमोऽध्याय:
  • हंस और डिम्भककी मृगया
  • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
  • सेनासहित हंस और डिम्भकका पुष्कर-तटपर विश्राम, महर्षि कश्यपके वैष्णवसत्रका दर्शन तथा दुर्वासा आदि यतियोंके समुदायमें जाकर उनके प्रति अपनी अश्रद्धाका प्रदर्शन
  • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
  • हंस और डिम्भकद्वारा संन्यासकी निन्दा तथा जनार्दनद्वारा संन्यास-आश्रमका मण्डन
  • नवाधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्वासाका रोष, हंसद्वारा उनका तिरस्कार, दुर्वासाद्वारा उन दोनोंके लिये शाप और जनार्दनके लिये वरदान
  • दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्वासा आदि मुनियोंका द्वारकागमन
  • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णकी गोलक्रीडा, सुधर्मा-सभामें दुर्वासा आदि मुनियोंका आगमन तथा यादवों और श्रीकृष्णद्वारा उनका सत्कार, श्रीकृष्णका उनसे वहाँ आनेका कारण पूछना, दुर्वासाका भगवान‍्की स्तुति एवं उपालम्भपूर्वक उनके प्रश्नका प्रतिवाद करके अपनी दुर्दशाका वृत्तान्त सुनाना
  • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णकी हंस और डिम्भकके वधके लिये प्रतिज्ञा तथा क्षमाप्रार्थनापूर्वक उनका यतियोंको भोजन कराना
  • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • जनार्दनका हंसको समझाना; किंतु हंसका उनकी बात न मानकर उन्हें दूत बनाकर द्वारकाको भेजना
  • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • जनार्दनकी भगवद्-दर्शनविषयक उत्कण्ठा
  • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • जनार्दनका सुधर्मा-सभामें जाकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे संतुष्ट हो उनकी आज्ञासे भगवत्स्तवनपूर्वक हंस और डिम्भकका संदेश सुनाना और उसे सुनकर यादवोंका उपहास करना
  • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका जनार्दनको संदेश देकर लौटाना
  • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिसहित जनार्दनका शाल्वनगरमें जाना, हंससे मिलना तथा हंसका जनार्दनसे कार्यसिद्धिके विषयमें पूछना
  • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • जनार्दनका हंसको श्रीकृष्णदर्शनजनित अपना उल्लास बताना, द्वारकामें हंसके संदेशकी प्रतिक्रियाका वर्णन करके उसे राजसूय न करनेकी सलाह देना, हंसका उसे रोषपूर्वक तिरस्कृत करके चले जानेके लिये कहना, फिर सात्यकिका हंसको श्रीकृष्णका संदेश सुनाते हुए फटकारना
  • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • हंस और डिम्भकके सात्यकिके प्रति रोषपूर्ण वचन तथा सात्यकिका उन्हें वैसा ही उत्तर देकर द्वारकाको प्रस्थान
  • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्ण तथा यादवसेनाका पुष्करतीर्थमें जाकर हंस और डिम्भककी प्रतीक्षा करना
  • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • हंस और डिम्भककी सेनाओंका पुष्करतीर्थमें प्रवेश
  • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • उभयपक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध
  • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण और विचक्रका घोर युद्ध तथा विचक्रका वध
  • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • हंस और बलभद्रका युद्ध
  • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकि और डिम्भकका युद्ध
  • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • हिडिम्बके साथ वसुदेव और उग्रसेनका युद्ध तथा बलभद्रके द्वारा हिडिम्बका वध
  • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • गोवर्धन पर्वतके समीप हंस और डिम्भकके साथ यादवोंका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भूतेश्वरोंकी पराजय तथा श्रीकृष्ण और हंसका घोर युद्ध
  • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णद्वारा हंसका वध
  • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • डिम्भककी आत्महत्या
  • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • गोप-गोपियोंसहित यशोदा और नन्दका गोवर्धन पर्वतपर आकर श्रीकृष्ण और बलभद्रसे मिलना
  • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • द्वारका जाते हुए श्रीकृष्णका पुष्करमें ऋषियोंसे मिलना तथा ऋषियोंद्वारा उनका स्तवन
  • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • महाभारत और हरिवंशके श्रवणकी विधि और फल, वाचकके गुण, प्रत्येक पर्वपर दान देने योग्य वस्तु, एकसे लेकर दस पारणाओंकी महत्ता तथा महाभारत एवं हरिवंशका माहात्म्य
  • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • त्रिपुर-वधकी कथा
  • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • हरिवंशमें वर्णित वृत्तान्तोंका संग्रह
  • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • हरिवंश-श्रवणकी दक्षिणा, फल एवं माहात्म्यका वर्णन
  • श्रीहरिवंशमाहात्म्यम्
  • प्रथमोऽध्याय:
  • हरिवंश-श्रवणका माहात्म्य, नारीके पाँच दोष और हरिवंशश्रवणसे उनकी निवृत्ति, पाठके उत्तम, मध्यम आदि भेद तथा गोव्रतकी विधि
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • (१) हरिवंशश्रवणकी विधि और फल
  • तृतीयोऽध्याय:
  • (२) हरिवंशश्रवणकी विधि और फल
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • नवाहव्रती श्रोताओंके पालन करने योग्य नियम, उनके द्वारा त्याज्य वस्तुओंका उल्लेख, न्यायविरुद्ध कथाश्रवण करनेवालोंकी दुर्गति, कथामें विघ्न डालनेके कारण एक नारीको नरकयातना एवं राक्षसयोनिकी प्राप्ति तथा श्रोताओंके चौदह भेद
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • हरिवंशके नवाह-पारायणका उद्यापन, उसमें किये जानेवाले दान, पुस्तकपूजा और वाचक-पूजन आदिका विधान एवं माहात्म्य
  • षष्ठोऽध्याय:
  • हरिवंश आरम्भ करनेके लिये उत्तम मास, तिथि, नक्षत्र आदिका निर्देश, देवपूजन, व्यासपूजन तथा कथा-समाप्तिपर दी जानेवाली दक्षिणा एवं दान आदिका उल्लेख तथा श्रवणका माहात्म्य
  • संतानगोपाल-मन्त्रविधि
  • (१) संतानगोपालमन्त्रविधि:
  • अङ्गन्यास
  • (२) संतानगोपालमन्त्र
  • (३) सनत्कुमारोक्त संतानगोपालमन्त्र
  • संतानगोपालस्तोत्रम्
  • श्रीविष्णुशतनामस्तोत्रम्
  • वन्ध्यानां पुत्रोत्पत्त्यर्थं संतानगोपालमन्त्रविधि:
  • अंतिम पृष्ठ

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