यह चरित्र एकनाथ महाराजका है। इनका नाम महाराष्ट्रमें अत्यन्त लोकप्रिय है। श्रीज्ञानेश्वरका नाम गम्भीर बना देता है, तुकारामके नाममें लीनता है, रामदासके नामकी धाक है, वैसे ही इनके नाममें सबको प्रसन्न कर देनेकी शक्ति है। कारण इनका चरित्र ऐसा ही है जो पाठक आगे पढ़ेंगे। काशीमें जैसे गंगा बहती हैं, वैसे ही महाराष्ट्रमें, विशेषकर पैठणमें एकनाथकी स्मृतिगंगा बहती है। आज भी महाराष्ट्रमें सर्वत्र एकनाथषष्ठी मनायी जाती है और पैठणमें तो इस दिन सब दिशाओंसे यात्री एकत्र होते और इस स्मृतिगंगामें स्नानकर कृतार्थताका अनुभव करते हैं। प्रतिष्ठान या पैठण किसी समय विद्याका एक प्रधान केन्द्रस्थान था, पर आज पैठणमें और तो कुछ नहीं, पर एकनाथकी दिव्य स्मृति है। पैठणकी विद्या सफल हो गयी जब एकनाथ उत्पन्न हुए। पैठणमें एकनाथ महाराजका स्थान अभीतक है, ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ के न्यायसे उनके वंशधरोंको मिली हुई जागीर भी है, वंशधर भी हैं, एकनाथ महाराजकी स्मृति और उनका कार्य भी है। स्मृतिके उत्सव भी होते हैं।