॥ श्रीहरि:॥

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शतश्लोकी

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • गुरुमहिमा
  • आत्मानात्मविवेक
  • आत्माकी परमप्रियता
  • अन्तर्निष्ठ मुमुक्षुका लक्षण
  • दो प्रकारका वैराग्य
  • कामादिका त्याज्यत्व
  • देव और अतिथिपूजन
  • जगत‍्की ब्रह्मरूपता
  • मायानिरूपण
  • जीव और ईश्वरका स्वरूप
  • जीव प्रपञ्चमें कैसे फँसता है?
  • आवरणशक्ति किसको ढकती है?
  • जागृति भी स्वप्नवत् है
  • ज्ञानप्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता
  • जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति
  • ब्रह्म ही सारवस्तु है
  • उपाधिसे ब्रह्मकी असंगता
  • ब्रह्म ही सबका प्रकाशक और आश्रय है
  • सब ब्रह्मरूप ही है
  • आनन्दमय कोशका स्वरूप
  • सुषुप्ति और जीवन्मुक्तिका भेद
  • आत्मानन्दकी उत्कृष्टता
  • स्वप्नविषयक शंका
  • शंकाका परिहार
  • संसारकी स्वप्नतुल्यता
  • कर्मफलदाता ईश्वर ही है
  • आत्मा ही सबका प्रकाशक और प्रेरक है
  • जीवन्मुक्तका स्वरूप
  • साक्षी साक्षी ही है
  • जीवन्मुक्तकी स्थिति
  • भगवच्चिन्तनका विधान
  • स्वात्माभिवन्दन
  • अन्तिम पृष्ठ

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