॥ श्रीहरि:॥

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शान्ति कैसे मिले?

श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • भगवान‍्के भजनकी महिमा
  • भोग, मोक्ष और प्रेम सभीके लिये भजन ही करना चाहिये
  • भजन—साधन और साध्य
  • भजनके लिये श्रद्धापूर्वक प्रयत्न करना चाहिये
  • भजनसे ही जीवनकी सफलता
  • भवसागरसे तरनेका उपाय—एकमात्र भजन
  • लगन होनेपर भजनमें कोई बाधा नहीं दे सकता
  • नामसे पापका नाश होता है
  • नामनिष्ठाके सात मुख्य भाव
  • श्रीभगवान् ही गुरु हैं—भगवन्नामकी महिमा
  • भगवन्नामका महत्त्व
  • जप परम साधन है
  • भगवान‍्के नामोंमें कोई छोटा-बड़ा नहीं
  • भवरोगकी दवा
  • भगवच्चिन्तनसे बेड़ा पार
  • कीर्तन और कथासे महान् लाभ
  • भगवान‍्के लिये अभिमान छोड़ो
  • महान् गुण भक्तिसे ही टिकते हैं
  • भगवत्कृपासे भगवत्प्रेम प्राप्त होता है
  • श्रीगोपांगनाओंकी महत्ता
  • गोपीभावकी प्राप्ति
  • प्रेममें विषय-वैराग्यकी अनिवार्यता
  • प्रियतम प्रभुका प्रेम
  • सिद्ध सखीदेह
  • प्रेमास्पद और प्रेमी
  • प्रेम मुँहकी बात नहीं है
  • श्रीकृष्ण-भक्तिकी प्राप्ति और काम-क्रोधके नाशका उपाय
  • प्रियतमकी प्राप्ति कण्टकाकीर्ण मार्गसे ही होती है
  • गीतगोविन्दके अधिकारी
  • नि:संकोच भजन कीजिये
  • सभी अभीष्ट भजनसे सिद्ध होते हैं
  • भगवद्भजन सभी साधनोंका प्राण है
  • जीव भजन क्यों नहीं करता?
  • भजनकी महत्ता
  • श्रेय ही प्रेय है
  • आत्मविसर्जनमें आत्मरक्षा
  • मनुष्य-जीवनका उद्देश्य
  • भगवत्-सेवा ही मानव-सेवा है
  • मन-इन्द्रियोंकी सार्थकता
  • प्रतिकूलतामें अनुकूलता
  • भगवान‍्का मंगल-विधान
  • भविष्यके लिये शुभ विचार कीजिये
  • परिस्थितिपर फिरसे विचार कीजिये
  • दूसरेके नुकसानसे अपना भला नहीं होगा
  • किसीको दु:ख पहुँचाकर सुखी होना मत चाहो!
  • बदला लेनेकी भावना बहुत बुरी है
  • निन्दनीय कर्मसे डरना चाहिये, न कि निन्दासे
  • निन्दासे डर नहीं, निन्दनीय आचरणसे डर है
  • पाप कामनासे होते हैं—प्रकृतिसे नहीं
  • काम नरकका द्वार है
  • बुराईका कारण अपने ही अंदर खोजिये
  • मनुष्य-शरीर पाप बटोरनेके लिये नहीं है
  • परदोष-दर्शनसे बड़ी हानि
  • संकुचित स्वार्थ बहुत बुरा है
  • पापसे घृणा कीजिये
  • संकटमें कोई सहायक नहीं होगा
  • उपदेशक बननेके पहले योग्यता-सम्पादन करना आवश्यक है
  • साधकोंके भेद
  • परमार्थके साधन
  • सच्चे साधकके लिये निराशाका कोई कारण नहीं
  • श्रेष्ठ साध्यके लिये श्रेष्ठ साधन ही आवश्यक है
  • साधनका फल
  • शान्ति कैसे मिले?
  • त्यागसे शान्ति मिलती ही है
  • भगवच्चिन्तनमें ही सुख है
  • प्रसन्नता-प्राप्तिका उपाय
  • सुख-शान्ति कैसे हो?
  • शाश्वत शान्तिके केन्द्र भगवान् हैं
  • शान्तिका अचूक साधन
  • धनसे शान्ति नहीं मिल सकती
  • सेवाका रहस्य
  • अपनी शक्ति-सामर्थ्यसे सदा सेवा करनी चाहिये
  • सेवा और संयमसे सफलता
  • दु:खियोंकी सेवामें भगवत्सेवा
  • कुछ प्रश्नोत्तर
  • कुछ आध्यात्मिक प्रश्न
  • कुछ पारमार्थिक प्रश्नोत्तर
  • प्रार्थनाका महत्त्व
  • प्रार्थना
  • विश्वासपूर्वक प्रार्थनाका महत्त्व
  • गुरु कैसे मिले
  • भगवान् परम गुरु हैं
  • भोग-वैराग्य और बुद्धियोग-बुद्धिवाद
  • जीवनमें उतारने लायक उपदेश
  • पीछे पछतानेके सिवा और कुछ भी न होगा
  • जगत‍्की असारता
  • संयोगका वियोग अवश्यम्भावी है
  • आसक्तिनाशके उपाय
  • भोगत्यागसे ही इन्द्रियसंयम सम्भव है
  • ब्रह्मज्ञान या भ्रम
  • चार द्वारोंकी रक्षा
  • चार काम अवश्य कीजिये
  • तीन श्रेष्ठ भाव
  • तीन विश्वास आवश्यक हैं
  • आत्मा अनश्वर है और देह विनाशी है
  • अन्तिम पृष्ठ

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