भारतीय संस्कृतिमें मनुष्य-जीवनको चार आश्रमोंमें बाँटा गया है— ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। यों तो सभी आश्रम-धर्मोंका श्रद्धा-विश्वासपूर्वक, नियमानुसार दृढ़तापूर्वक पालन करनेका विशेष महत्त्व है। किंतु उन सबमें ब्रह्मचर्यकी महिमा सर्वाधिक है। ब्रह्मचर्यके पालनसे बल, बुद्धि, तेज एवं आयुकी वृद्धि, आरोग्यकी प्राप्ति, लोक-परलोकमें सुख-शान्ति और परमात्माकी प्राप्तितक सम्भव है। ब्रह्मचर्य-पालनके महत्त्वके साथ ही सन्ध्योपासन और गायत्री-उपासनाकी भी बड़ी महिमा है। गायत्री-उपासना वस्तुत: परब्रह्म परमात्माकी ही उपासना है। इसकी नित्यप्रति उपासनाद्वारा सभी प्रकारके सांसारिक अभ्युदयके साथ मनुष्य-जीवनके परम लक्ष्य ‘आत्मकल्याण’ को भी प्राप्त किया जा सकता है।
भारतीय संस्कृति और धर्म-विधानके अनुसार यज्ञोपवीतधारी द्विजमात्र (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)-को नित्य-नियमित दो समय तो प्रात:-सायं सन्ध्योपासन अवश्य ही करना चाहिये। ‘स्व-कल्याण’ के साथ देश, जाति और विश्व-मंगलके लिये गायत्री-उपासना एवं सन्ध्योपासनद्वारा परमात्माकी पूजा नित्यप्रति बहुत आवश्यक है।