॥ श्रीहरि:॥

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समता अमृत और विषमता विष

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

इस लोकमें जो सच्चे अभ्युदयका हेतु हो और अन्तमें भगवत्प्राप्तिरूप परम नि:श्रेयसकी निश्चितरूपसे प्राप्ति करा दे, वही धर्म है (यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म:)। जो मनुष्य इस धर्मका सम्पादन करके सुखी और कृतार्थ बनना चाहते हैं, उनके लिये इस बातकी बड़ी आवश्यकता है कि वे इसके स्वरूपको भलीभाँति समझें और भूले हुए लोग इस धर्मसे सर्वथा अपरिचित हैं, उनको इसका परिचय प्राप्त कराना इसलिये आवश्यक है कि वे लोग मानव-जीवनके उद्देश्य और उसकी सफलताके साधनोंको जानकर तदनुकूल आचरण करें एवं जीवन सफल बनानेमें समर्थ हों। इस ‘तत्त्व-चिन्तामणि’ के सातवें भागके विविध लेखोंमें उपर्युक्त धर्मके स्वरूपकी झाँकी उदाहरणसहित भलीभाँति करायी गयी है। भगवान् का क्या स्वरूप है, भगवान् की प्राप्ति या मोक्ष क्यों आवश्यक है, उसके साधन क्या हैं, उन साधनोंमें क्या-क्या भेद हैं, साधनमें तीव्रता कैसी होनी चाहिये, भगवान् के नाम-रूप-लीला-धामका महत्त्व, तत्त्व और रहस्य क्या-क्या है, भगवद्भक्तोंका क्या और कैसा प्रभाव है, पारमार्थिक दृष्टिसे मनुष्योंकी कितनी श्रेणियाँ हैं, विभिन्न रुचि और अधिकारके मनुष्योंको स्वधर्ममें रत रहनेकी क्यों आवश्यकता है, साधनमें निष्कामभाव क्या है और पुरुषोंके साथ ही नारीका शास्त्र-सम्मत और भारतीय संस्कृतिके अनुसार क्या धर्म है, इत्यादि विभिन्न आवश्यक प्रश्नोंका इसमें बड़ी ही सुन्दर रीतिसे समाधान किया गया है। साथ ही विशाल हिन्दू सनातनधर्म और महान् भारतीय संस्कृतिके मूर्तिमान् स्वरूप मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामभद्र और उनके सहज अनुयायी बन्धु तथा भक्त श्रीभरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और महावीर हनुमान‍् आदिके महत्त्वपूर्ण आदर्श चरित्रोंका सुन्दर वर्णन किया गया है। इन सभी लेखोंके लेखक हमारे परम आदरणीय और महान् आदर्श श्रीजयदयालजी गोयन्दका हैं।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • परिचय
  • समता अमृत और विषमता विष है
  • मर्यादा-पुरुषोत्तम श्रीराम
  • राम-सेवक श्रीलक्ष्मण
  • भरतका आदर्श चरित्र
  • श्रीरामके दासानुदास श्रीशत्रुघ्न
  • आदर्श भक्त हनुमान‍्
  • वाल्मीकीय रामायणकी महिमा
  • भारतीय संस्कृतिमें नारी-धर्म
  • शास्त्रसम्मत स्त्री-धर्म
  • जीवन-सुधार
  • गो-महिमा और गोरक्षाकी आवश्यकता
  • स्वधर्म-पालनकी आवश्यकता
  • ईश्वर और धर्ममें विश्वासकी आवश्यकता
  • ब्रह्मचर्यकी आवश्यकता
  • अन्तिम पृष्ठ

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