॥ श्रीहरि:॥

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सम्पूर्ण दु:खोंका अभाव कैसे हो?

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

भक्तियोग, ज्ञानयोग, तथा कर्मयोग— भगवत्प्राप्तिके ये तीन स्वतंत्र साधन माने गये हैं। मनुष्यमें तीन प्रकारकी शक्तियाँ भगवान‍्से प्राप्त हैं—श्रद्धा-विश्वास करनेकी, जाननेकी तथा करनेकी, इन तीन प्रकारकी शक्तियोंके आधारपर क्रमश: उपरोक्त तीन साधन हैं। गीताप्रेसके संस्थापक श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका विशेष पढ़े-लिखे व्यक्ति नहीं थे, परन्तु उन्होंने ज्ञानयोगका साधन सीढ़ी-दर-सीढ़ी स्वयं किया था और तत्त्वकी प्राप्ति की। उन्हें निष्कामभावका आचार्य भी कहा जाय तो अत्युक्ति नहीं होगी, उनके अणु-अणुमें निष्कामभाव था। उन्होंने स्वयं एक बात कही थी कि भक्तिकी प्राप्ति उन्हें भगवत्कृपासे हुई। भगवान‍्से जो वस्तु प्राप्त होती है वह पूरी-की-पूरी होती है, अत: उन्हें भगवत्प्रेम भी पूरा प्राप्त था। इस प्रकार तीनों प्रकारके साधनोंमें पारंगत महापुरुष बहुत कम मिलते हैं।
ऐसे महापुरुषने जीवोंके कल्याणके लिये इन तीनों प्रकारके साधनोंका विवेचन समय-समयपर अपने प्रवचनोंमें किया है। वे प्रवचन भी एकान्तमें गंगाके किनारे महान् पवित्र भूमि स्वर्गाश्रममें, जंगलमें, वटवृक्षके नीचे दिये गये थे। वे प्रवचन किन्हीं सज्जनने लिख लिये थे। उन प्रवचनोंको पुस्तकरूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ऐसा करनेका हमारा उद्देश्य यही है कि जिस साधनमें हम चल रहे हैं, उसका मर्म समझकर हम शीघ्र-से-शीघ्र अपने लक्ष्य परमात्मप्राप्तिको प्राप्त कर लें। इन प्रवचनोंमें ऐसे भी प्रवचन हैं जिनसे हम गृहस्थमें रहते हुए अपने व्यवहारको कैसे सुधारें। हमें आशा है इस पुस्तकसे पाठकोंका विशेषरूपसे आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक लाभ होगा। इसलिये विनम्र प्रार्थना है कि इन्हें मनोयोगपूर्वक स्वयं पढ़ें और यदि आपको लाभ मालूम दे तो अपने मित्र-बान्धवोंको भी पढ़नेकी प्रेरणा दें।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • सम्पूर्ण दु:खोंका अभाव कैसे हो?
  • भगवान‍्में प्रेम कैसे हो?
  • वैराग्यका प्रभाव
  • वटवृक्षके स्थानकी महिमा
  • भगवल्लीलाका तत्त्व एवं रहस्य
  • अपना जीवन दूसरोंके हितके लिये हो
  • कलहसे बचो
  • भगवद्विषयक आनन्दकी महिमा
  • वैराग्ययुक्त उपरति रखें
  • गीताजीकी महिमा
  • प्राण देकर भी आनन्द प्राप्त करें
  • पर हित सरिस धर्म नहिं भाई
  • भगवान‍्का मूल्य प्रेम ही है
  • निष्कामताका महत्त्व
  • भक्तिकी महिमा
  • महात्माओंके प्रभावकी बातें
  • साधनमें व्यवहारकी अनमोल बातें
  • अहंकार तथा स्वार्थका त्याग ही सार है
  • निमित्तमात्रं भव
  • अन्तिम पृष्ठ

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