॥ श्रीहरि:॥

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साधन-कल्पतरु

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

प्रस्तुत ग्रन्थ— साधन-कल्पतरु परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन श्रीजयदयालजी गोयन्दका के अनुभूत उच्चकोटिके विचारपूर्ण लेखोंका बृहत्  संग्रह है। साधनोपयोगी इस ग्रन्थमें श्रीगोयन्दकाजीके अनेक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक तथा व्यावहारिक लेखोंका संग्रह है। जिनमें ज्ञान, वैराग्य, सेवा, सदाचार, त्याग, परोपकार और लोक-व्यवहार आदि लौकिक तथा ईश्वर-प्रेम, भगवद्भक्ति, आत्मोद्धारके उपाय, निष्काम-कर्मकी महत्ता, मनुष्य-जीवनका लक्ष्य आदि अनेक पारमार्थिक विषयोंका अति सरलरूपमें प्रतिपादन किया गया है। लेखोंकी भाषा सरल, सुबोध है, जो शीघ्र समझनेयोग्य (कथा-कहानीवाली) सुगम शैलीमें होनेसे हृदयग्राही प्रभाव छोड़ती है। अतएव इसकी मार्मिक और सर्वजनोपयोगी सामग्री विचारवान् साधकोंसहित सर्वसाधारणके लिये भी प्रेरक और मार्ग-दर्शक है।

सभी श्रद्धालुजनों तथा प्रेमी पाठकोंसे हमारा विनम्र अनुरोध है कि इस प्रस्तुत सत्साहित्यके अधिकाधिक अध्ययन-अनुशीलनद्वारा विशेष लाभ उठाना चाहिये। साथ ही, अपने प्रेमी-परिचितोंको भी इसे एक बार अवश्य पढ़नेके लिये प्रेरित करके आप आध्यात्मिक भावोंके प्रचार-प्रसारमें भी सहयोगी बन सकते हैं।
  • प्रथम पृष्ठ
  • नम्र निवेदन
  • +
    महत्त्वपूर्ण शिक्षा
    • +
      हिंदू-संस्कृतिका स्वरूप
      • हिंदू-संस्कृति और रामायण
      • रामायणमें श्रीरामका आदर्श चरित्र
      • रामायणमें सीताजीका अनुकरणीय चरित्र
    • +
      रामायणमें भ्रातृ-प्रेम
      • ईश्वरवाद
      • अवतारवाद
      • परलोकवाद
      • ईश्वरोपासना
    • +
      बड़ोंका आदर-सत्कार
      • सद्गुण-सदाचारका सेवन
      • कानूनसे हिंदू-धर्मकी रक्षा
    • +
      त्रिविध कर्म
      • प्रारब्ध
      • संचित
      • क्रियमाण
    • आदर्श नारी सुशीला एक शिक्षाप्रद कहानी
    • सत्सङ्गकी कुछ सार बातें
    • राजा चक्ववेणके त्यागका प्रभाव
    • +
      स्कन्दपुराणके कुछ महत्त्वपूर्ण विषय
      • भगवान् स्कन्दका जन्म
      • तीर्थोंकी महिमा तथा दानका महत्त्व
      • दानका रहस्य
      • कलियुगकी विशेषता
      • पापोंके भेद
      • सदाचारका निरूपण
      • संसारसे वैराग्यका निरूपण तथा परमार्थ-चर्चाका अद्भुत प्रभाव
      • राजा शङ्ख और अगस्त्य मुनिको भगवद्दर्शन
      • भगवद्भक्ति और भक्तोंके लक्षण एवं जगन्नाथ क्षेत्रकी महिमा
      • श्रीबदरी और केदारक्षेत्रका माहात्म्य
      • कार्तिकमासका माहात्म्य
      • भक्त विष्णुदास और राजा चोलकी कथा
      • श्रीकृष्णनाम-माहात्म्य
    • +
      वैशाखमासमें भगवद्भक्तिकी महिमा
      • सेतुबन्ध श्रीरामेश्वरका माहात्म्य
      • भगवान् श्रीरामका हनुमान् को ज्ञानोपदेश
      • पतिव्रता और विधवाओंके कर्तव्य
      • द्वादशाक्षर मंत्र, राम-नाम-महिमा और ध्यानयोग
      • मानसतीर्थ, काशी-माहात्म्य एवं गङ्गाकी महिमा
      • मानस-तीर्थ
    • +
      काशी-माहात्म्य
      • गङ्गाजीकी महिमा
      • महाकालक्षेत्रकी महिमा
      • अतिथि-सत्कारका माहात्म्य
      • प्रभासक्षेत्रकी महिमा
      • नृसिंहावतार एवं प्रह्लादकी कथा
      • द्वारका-माहात्म्य
    • +
      सत्सङ्ग और कुसङ्ग
      • महापुरुषोंकी महिमा और उनके सङ्गका फल
      • दुराचारी पुरुष और दुराचारियोंके कुसङ्गका फल
    • सर्वभूतहिते रता:
    • महत्त्वपूर्ण प्रवचन*
    • जीवनकी सफलताके लिये अनुपम शिक्षा
    • +
      श्रीभरतजीमें नवधा भक्ति
      • (१) श्रवण-भक्ति
      • (२) कीर्तन-भक्ति
      • (३) स्मरण-भक्ति
      • (४) पादसेवन-भक्ति
      • (५) अर्चन-भक्ति
      • (६) वन्दन-भक्ति
      • (७) दास्य-भक्ति
      • (८) सख्य-भक्ति
      • (९) आत्मनिवेदन-भक्ति
      • उपसंहार
    • भगवान् के परम दिव्य-गुणसम्पन्न स्वरूपका ध्यान
    • ईश्वरभक्ति, सदाचार और गीताकी महिमा
    • श्रद्धा-प्रेम और साधनमें तत्परताकी आवश्यकता
    • +
      सिद्धान्त
      • १—सांख्यके साधनमें समता
      • २—योगके साधनमें समता
    • समताकी महिमा
    • आत्मा और परमात्माका रहस्य एवं सिद्धान्त
  • +
    स्त्रियोंके लिये कर्तव्यशिक्षा
    • व्यवहार
    • पतिव्रता शुभा
    • पतिव्रता सुकला
    • स्त्रियोंके लिये स्वतन्त्रताका निषेध
    • विवाह
    • अनुचित हँसी-मजाक और गंदे गीतका त्याग आवश्यक
    • अनावश्यक भोजनका त्याग आवश्यक
    • लज्जाशीलता और पर-पुरुषका त्याग
    • सदाचरण
    • कन्याओंको उत्तम शिक्षा
    • आलस्य-प्रमादका त्याग आवश्यक
    • विद्याकी उपादेयता
    • सद्गुणोंकी शिक्षा
    • द्विज बालकोंका यज्ञोपवीत-संस्कार आवश्यक
    • विपत्तिमें भी धर्मका त्याग न करे
    • पातिव्रत्य-धर्म
    • द्रौपदी-सत्यभामा-संवाद
    • पतिव्रता शाण्डिली
    • भगवान् श्रीकृष्णका उपदेश
    • यमराजका उपदेश
    • पतिव्रता सतीकी महिमा
    • पतिव्रता सावित्री
    • सती दमयन्तीकी कथा
    • श्रीलक्ष्मीजीका उपदेश
    • जरत्कारु मुनिका उपदेश
    • सती लोपामुद्राकी कथा
    • विधवाओंके साथ व्यवहार और उनका धर्म
    • कुन्तीदेवीकी कथा
    • कुन्तीका वीरमातृत्व
    • कुन्तीका परोपकार
    • कुन्तीकी सत्यप्रियता
    • कुन्तीकी भक्ति
    • कुन्तीका त्याग
    • विधवा बहिनोंके कर्तव्य
  • +
    परम साधन
    • +
      बालकोंके कर्तव्य
      • प्राचीन भारतीय शिष्टाचार या धर्मके सेवनसे लाभ
      • भौतिक, बौद्धिक, व्यावहारिक, सामाजिक, नैतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नतिके स्वरूप और उनका फल
      • उन्नतिके साधन
      • विद्याका अभ्यास
      • ब्रह्मचर्यका पालन
      • माता-पिताकी सेवा
      • गुरु-सेवा
      • ईश्वर-भक्ति
    • +
      श्रीरामचरितमानस और श्रीमद्भगवद्गीताकी शिक्षासे अनुपम लाभ
      • श्रीरामचरितमानस
      • श्रीमद्भगवद्गीता
    • +
      मनुष्य-जीवनकी दुर्लभता, भगवत्प्राप्तिमें कुछ सामयिक विघ्न और उनसे छूटनेके उपाय
      • मनुष्य-जीवनकी दुर्लभता और हमारा कर्तव्य
      • व्यापारमें सत्य और समताका अभाव
      • व्यापारियोंका कर्तव्य
      • गंदा साहित्य और सिनेमा
      • विधवाओंके धनपर अनुचित लोभ
      • दहेजसे हानि
      • साधनकी आवश्यकता
      • साधनके नियम
    • +
      सत्य, श्रद्धा, प्रेम और निष्कामभावपर विचार
      • सत्य
      • श्रद्धा
      • प्रेम और निष्कामभाव
    • सत्यनिष्ठासे भगवत्प्राप्ति
    • +
      देशके कल्याणके लिये संस्कृत, आयुर्वेद, हिंदी तथा गीता-रामायणके प्रचारकी आवश्यकता
      • संस्कृत भाषा
      • आयुर्वेद-विज्ञान
      • हिंदुस्थान और हिंदी भाषा
      • गीता-रामायणका प्रचार
    • सभी वर्णाश्रमोंमें मुक्ति
    • +
      नाम-कीर्तनसे शत्रुपर विजय
      • राजा गोपालसिंहका भगवान् में अद्भुत विश्वास पूर्वजोंका संक्षिप्त परिचय
      • मल्ल हम्बीरकी वीरता और वैष्णवता
      • राजा रघुनाथका भगवत्प्रेम और श्रीमदनमोहनजीकी स्थापना
      • ‘राजा गोपालसिंहकी बेगार’
      • विष्णुपुरपर आक्रमण और सामुदायिक कीर्तन
      • मदनमोहनजीके द्वारा तोपोंका चलाया जाना और शत्रुकी पराजय
      • गोपालसिंहके राजत्वकालमें राज्यकी सुव्यवस्था
      • उपसंहार
    • भक्त बननेका सरल साधन
    • गोपियोंका विशुद्ध प्रेम अथवा रासलीलाका रहस्य
    • +
      एक क्षणमें भगवत्प्राप्ति कैसे हो सकती है?
      • भगवान् का ध्यान और मानस-पूजा
      • सत्सङ्ग और महात्माओंका प्रभाव
    • महापुरुषोंकी महिमा और उनका प्रभाव
    • +
      गीतामें उपासना
      • भेदोपासना
      • अभेदोपासना
    • प्रकृति-पुरुष-विचार
  • +
    मनुष्य-जीवनकी सफलता
    • श्रीनारद और श्रीविष्णुपुराणके कुछ महत्त्वपूर्ण विषय
    • सब प्रकारकी उन्नति
    • देशवासियोंके हितकी कुछ बातें
    • दानका रहस्य
    • स्त्रियोंके लिये स्वार्थत्यागकी शिक्षा
    • मानव-जीवनका सर्वोत्तम उद्देश्य
    • +
      संत-महापुरुषोंके सिद्धान्त
      • अद्वैत-सिद्धान्त
      • निष्काम कर्मयोग
      • भक्तिमिश्रित कर्मयोग
      • भगवद्भक्ति
      • आत्मज्ञान
      • दुर्गुण-दुराचारोंके रहते मुक्ति नहीं होती
      • ईश्वर, परलोक और पुनर्जन्म सत्य हैं
      • मुक्त पुरुष लौटकर नहीं आते
      • सभी देश, सभी काल, सभी आश्रमोंमें मनुष्यमात्रकी मुक्ति हो सकती है
      • निराश नहीं होना चाहिये
      • कर्तव्य-पालनसे मुक्ति
      • उच्च निष्कामभावका स्वरूप
      • कर्तव्यपालनकी आवश्यकता
    • तीन प्रकारकी श्रद्धाका तत्त्व-रहस्य
    • श्रद्धा और अच्छी नीयत
    • महापुरुषोंके गुण-प्रभाव
    • भक्तिसहित निष्काम कर्मयोगसे भगवत्प्राप्ति
    • आत्मोन्नतिमें सहायक बातें
    • जप, ध्यान, सत्सङ्ग, स्वाध्यायसे उत्तरोत्तर उन्नतिका दिग्दर्शन
    • नामका माहात्म्य
    • +
      अनन्य भक्ति और भरत आदिका प्रेम
      • केवल स्मरणमात्रसे परमात्माकी प्राप्ति
      • केवल पूजासे परमात्माकी प्राप्ति
      • केवल नमस्कारसे परमात्माकी प्राप्ति
      • केवल भक्तिसे परमात्माकी प्राप्ति
    • परमात्माकी प्राप्तिके लिये निराश नहीं होना चाहिये
    • गीतामें ईश्वर-भक्ति
    • +
      श्रद्धा-विश्वास, मिलनकी तीव्र इच्छा और निर्भरता
      • आस्तिकभाव या भगवान् की सत्तामें विश्वास
      • शास्त्र और महात्माओंपर श्रद्धा
      • ईश्वरके मिलनेकी तीव्र इच्छा
      • भगवान् पर निर्भरता
    • अनन्य विशुद्ध भगवत्प्रेम और भगवान् की सुहृदता
    • सभी साधनोंमें वैराग्यकी आवश्यकता तथा प्रेमाभक्तिका निरूपण
    • श्रद्धा, प्रेम और तीव्र इच्छासे भगवत्प्राप्ति
    • भगवन्नाम-महिमा
    • ब्राह्मी स्थिति
    • परमात्माके आनन्दमय स्वरूपका ध्यान
  • +
    परमशान्तिका मार्ग
    • धर्मयुक्त उन्नति ही उन्नति है
    • +
      शारीरिक उन्नति
      • भौतिक उन्नति
      • ऐन्द्रियिक उन्नति
      • मानसिक उन्नति
      • बौद्धिक उन्नति
      • व्यावहारिक उन्नति
      • सामाजिक उन्नति
      • नैतिक उन्नति
      • धार्मिक उन्नति
    • श्रीगीताजयन्ती और गीताकी महिमा
    • प्राचीन सिद्धान्तको माननेमें परम लाभ और न माननेमें हानि
    • तीर्थोंकी महिमा, प्रयोजन और उत्पत्ति तथा तीर्थ-यात्राके पालनीय नियम
    • भारतका परम हित
    • बालकोंके लिये कर्तव्य तथा ईश्वर और परलोकको माननेसे लाभ एवं न माननेसे हानि
    • काममें लानेयोग्य आवश्यक बातें
    • सर्वोपयोगी सार-सार बातें
    • आत्मकल्याणके लिये तमोगुणके त्यागकी विशेष आवश्यकता
    • आत्महत्या करने अथवा घर छोड़कर निकल भागनेका दुष्परिणाम
    • प्रतिग्रह और पापसे भी ऋण अधिक हानिकर है
    • वर्तमान पतन और उससे बचनेके उपाय
    • परम पुरुषार्थ
    • मन-इन्द्रियोंको वशमें करके परमात्माको प्राप्त करे
    • परम सेवासे कल्याण
    • +
      यम-नियमोंके पालनसे परमात्माकी प्राप्ति
      • यम
      • नियम
    • गायत्री-जपकी महिमा
    • हृदयके उत्तम भावोंसे परम लाभ
    • सर्वोत्तम सत्सङ्गका स्वरूप और उसकी महिमा
    • महात्माओंके सङ्गसे लाभ उठानेके प्रकार
    • सत्सङ्ग और भगवद्भक्तोंके लक्षण, उनकी महिमा, प्रभाव और उदाहरण
    • +
      श्रीमद्भगवद्गीतामें भक्तियोग
      • महापुरुषोंका तत्त्व, रहस्य और प्रभाव
    • भगवान् की प्राप्ति करानेवाले उत्तम गुण और आचरण
    • संसारसे वैराग्य और भगवान् में प्रेम होनेका उपाय
    • तुम मुझे देखा करो और मैं तुम्हें देखा करूँ
    • अनन्यभक्तिका स्वरूप और रहस्य
    • अवतार और अधिकारी महापुरुषोंका अलौकिक प्रभाव
    • भगवान् का विस्मरण कभी न हो
    • +
      सर्वधर्मपरित्यागका रहस्य
      • १. तू सम्पूर्ण धर्मोंका मुझमें त्याग कर दे
      • २. तू केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा
      • ३. मैं तुम्हें सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा
      • ४. तू शोक मत कर
    • +
      गीतोक्त कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग—तीनों ही मार्ग श्रेष्ठ और स्वतन्त्र हैं
      • कर्मयोग
    • +
      भक्तियोग
      • ज्ञानयोग
    • शीघ्रातिशीघ्र परमात्माकी प्राप्ति होनेके साधन
    • परमात्माका तत्त्व-रहस्यसहित स्वरूप
    • भगवान् के निराकार-तत्त्वका रहस्य
  • +
    मनुष्यका परम कर्तव्य
    • गीताके अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करनेमें स्वतन्त्र है
    • +
      मानवता और वर्णाश्रमधर्म
      • ब्रह्मचर्याश्रम
      • गृहस्थाश्रम
      • वानप्रस्थाश्रम
      • संन्यासाश्रम
      • ब्राह्मणके धर्म
      • क्षत्रियके धर्म
      • वैश्यके धर्म
      • शूद्रके धर्म
    • इन्द्रियों और मनका विषयोंसे सम्बन्ध-विच्छेद, संयम और वैराग्य
    • भक्तों और ज्ञानियोंके लिये भी शास्त्रविहित कर्मोंकी परम आवश्यकता
    • लोकसंग्रहका रहस्य
    • संयमसे आत्मोद्धार
    • सत्यकी महिमा
    • प्रारब्ध और पुरुषार्थका रहस्य
    • अपने उत्थानके प्रयत्नकी परम आवश्यकता
    • साधन तेज न होनेमें अश्रद्धा ही प्रधान कारण है
    • साधनको साध्यसे भी अधिक आदर देना चाहिये
    • आद्याशक्ति भगवती देवी और ब्रह्मकी एकता
    • भगवदर्थ कर्म और भगवान् की दयाका रहस्य
    • भगवत्प्रेमकी प्राप्ति और वृद्धिके विविध साधन
    • मानवताके पूर्ण आदर्श मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम
    • गीतामें भजन
    • गीता पढ़नेके लाभ
    • +
      सुखोंके भेद और यथार्थ सुखकी महत्ता
      • १—तामस सुख
      • २—राजस सुख
      • ३—सात्त्विक सुख
      • ४—यथार्थ सुख
    • +
      परमानन्दस्वरूप निरतिशय असली सुखकी प्राप्तिके साधन
      • परिणामदु:ख
      • तापदु:ख
      • संस्कारदु:ख
      • गुणवृत्तिविरोधजन्य दु:ख
    • ज्ञानकी सात भूमिकाएँ
    • +
      चतु:श्लोकी भागवत
      • चतु:श्लोकी भागवत
    • ज्ञान और भक्तिके साधनसे अहंता-ममताका अभाव
    • समताका स्वरूप और महिमा
  • +
    आत्मोद्धारके साधन
    • +
      महाभारतमें जीवनको उन्नत बनानेवाले कुछ शिक्षाप्रद प्रसङ्ग
      • आश्रमधर्म
      • वर्ण-धर्म
    • सत्कथाकी महिमा
    • धर्मपालनार्थ प्राणोत्सर्गसे श्रेय-प्राप्ति
    • लोकसंग्रहरूप आदर्श कर्मका तत्त्व-रहस्य
    • वर्तमान दोषोंके निवारणकी आवश्यकता
    • निष्कामभावका तत्त्व-रहस्य
    • +
      कर्मयोगके पाँच भेद
      • १-केवल कर्मयोग
      • २-भक्ति-गौण कर्मयोग
      • ३-भक्ति-सामान्य कर्मयोग
      • ४-भक्तिप्रधान कर्मयोग
      • ५-केवल भक्तियोग
    • सर्वदु:ख दोषनाशक तप
    • पतन या उत्थानमें मनुष्य स्वतन्त्र है
    • निष्काम कर्मसे परमात्माकी प्राप्ति
    • युक्त आहार-विहारसे परमात्माकी प्राप्ति
    • पति-पत्नीके परस्पर कर्तव्य
    • साधनकी सफलताके उपाय
    • धर्मकी हानि और पापकी वृद्धिके निवारणके उपाय
    • केवल निष्काम कर्मसे भगवत्प्राप्ति
    • सब अनर्थोंके मूलभूत राग-द्वेषके नाशके उपाय
    • मनको संयत और एकाग्र करनेके उपाय
    • +
      गीतोक्त अनन्य प्रेमका साधन और उसका फल
      • ‘मच्चित्ता:’
      • ‘मद्गतप्राणा:’
      • ‘बोधयन्त: परस्परम्’
      • ‘कथयन्तश्च माम्’
      • ‘नित्यं तुष्यन्ति च’
      • ‘रमन्ति च’
    • अन्तकालमें हुए परमात्मचिन्तनका महत्त्व
    • +
      अनन्य भक्ति-साधनका स्वरूप
      • एक कन्याका दृष्टान्त
    • निरन्तर भगवच्चिन्तनकी महिमा
    • ईश्वर और महापुरुषोंका प्रभाव
    • +
      परमात्माकी प्राप्तिमें श्रद्धा-विश्वासकी प्रधानता
      • १-ईश्वरपर श्रद्धा-विश्वास
      • (२) ज्ञानी महात्मा पुरुषपर श्रद्धा-विश्वास
      • (३) गीतादि शास्त्रोंपर श्रद्धा-विश्वास
      • (४) अपनी आत्मापर श्रद्धा-विश्वास
    • +
      अनन्य भक्तिसे भगवत्प्राप्ति
      • ऐकान्तिक साधन-काल
      • व्यवहारकाल
      • शयनकाल
      • भगवत्प्राप्तिका सरल उपाय—अनन्य शरणागति
    • भगवान् के स्वभावका रहस्य
    • भगवन्नामजपका प्रभाव
    • आत्मोद्धारकी प्रधान-प्रधान दो-दो बातें
    • भगवत्प्राप्तिके विविध साधन
    • +
      सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके तत्त्वका विवेचन
      • सत्ता
      • चेतनता
      • आनन्द
      • समता
      • अनन्तता
      • व्यापकता
  • +
    आत्मोद्धारके सरल उपाय
    • +
      भगवान् के स्वरूप, जन्म, चरित्र, गुण, प्रभाव और वचनोंका तत्त्व-रहस्य
      • भगवान् के स्वरूपका तत्त्व-रहस्य
      • भगवान् के जन्मका तत्त्व-रहस्य
      • भगवान् के चरित्रका तत्त्व-रहस्य
      • भगवान् के गुणोंका तत्त्व-रहस्य
      • भगवान् के प्रभावका तत्त्व-रहस्य
      • भगवान् के वचनोंका तत्त्व-रहस्य
    • निर्गुण-निराकार परमात्माकी उपासना
    • सारा समय परमोपयोगी बनानेका साधन
    • श्रद्धा और निष्कामभावका रहस्य
    • सबसे भगवद्‍बुद्धिपूर्वक समान और निष्काम प्रेम करनेसे भगवत्प्राप्ति
    • समताका महत्त्व
    • मानव-जीवनकी सफलता
    • भगवान् के नामकी महिमा और उनसे प्रार्थना
    • परम शान्तिकी प्राप्तिके उपाय
    • दहेजकी प्रथाके और व्यापारके सुधारसे भी कल्याण
    • निष्काम सेवासे शीघ्र कल्याण
    • परदोषदर्शन और कुसङ्गसे हानि तथा गुणदर्शन और सत्सङ्गसे लाभ
    • रामायणमें श्रद्धा, प्रेम और आचरण आदिकी शिक्षा*
    • परमात्माकी प्राप्तिके लिये सार-सार बातें
    • रामायणमें भरतकी अनुकरणीय परम श्रद्धा और प्रेम
    • राग-द्वेषके त्यागकी, वैराग्य और निष्कामभावकी महिमा
    • आत्मोद्धारके लिये महापुरुषोंके अनुकरणकी विशेष आवश्यकता
  • अंतिम पृष्ठ

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