इस पुस्तकमें श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका के लेखोंका संग्रह किया गया है। इन लेखोंमें आस्तिकता, भगवत्प्रेम, मनोनिरोध, श्रद्धा-भक्ति, ज्ञान-वैराग्य, सद्गुण, सदाचार, धर्म, पुरुषार्थ, उत्तम भाव, सत्संग-स्वाध्याय आदि साधनोंका, महापुरुषोंके प्रभावका एवं भगवान् के स्वरूपका बहुत सरलतापूर्वक विवेचन किया गया है; साथ ही सभी मनुष्योंके लिये उपयोगी सब प्रकारकी उन्नति, व्यावहारिक और सामाजिक सुधार, शिष्टाचार, बालकोंके कर्तव्य आदिका एवं तमोगुण, आत्महत्या और ऋण आदिके दुष्परिणामोंका भी निरूपण किया गया है। अत: सभी भाइयों, बहिनों और माताओंसे विनीत प्रार्थना है कि वे इन लेखोंको मननपूर्वक पढ़नेकी कृपा करें और तदनुसार अपना जीवन बनानेका पूर्ण प्रयत्न करें, जिससे वे परम शान्ति और परमानन्दकी प्राप्तिके पथपर अग्रसर हो सकें। इनमें लिखी बातोंको काममें लानेपर मनुष्यका अवश्य कल्याण हो सकता है; क्योंकि ये ऋषि-मुनि, संत-महात्मा, शास्त्र और भगवान् के वचनोंके आधारपर लिखी गयी हैं।