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॥ श्रीहरि:॥
हिन्दी
ई – पुस्तकें
होम
/ ई – पुस्तकें
/ पद रत्नाकर
पद रत्नाकर
लेखक
श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार
भाषा
हिन्दी/संस्कृत
पुस्तक पढ़ें
विषय-सूची
•
प्रथम पृष्ठ
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निवेदन
•
दो शब्द
•
प्रकाशकीय निवेदन
+
‘पद-रत्नाकर’ की वर्णानुक्रमणिका
•
(अ)
•
(आ)
•
(इ-ई)
•
(उ)
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(ऊ)
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(ए)
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(ऐ)
•
(ओ-औ)
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(क)
•
(ख)
•
(ग)
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(घ)
•
(च)
•
(छ)
•
(ज)
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(झ)
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(ट)
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(ठ)
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(ड)
•
(त)
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(थ)
•
(द)
•
(ध)
•
(न)
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(प)
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(फ)
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(ब)
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(भ)
•
(म)
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(य)
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(र)
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(ल)
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(व)
•
(श)
•
(स)
•
(ह)
•
(क्ष)
•
(ज्ञ)
+
वन्दना एवं प्रार्थना (१ से १५२)
•
१- दोउ चकोर, दोउ चंद्रमा..
•
२- मन्मथ-मन्मथ मन..
•
३- जिनका शुचि सौन्दर्य..
•
४- दुर्लभ परम त्यागमय..
•
५- श्रीराधारानी-चरन..
•
६-बंदौं श्रीराधा..
•
७- श्रीराधारानी-चरन..
•
८- बंदौं राधा-पद..
•
९- रसिक स्याम की..
•
१०- बंदौं राधा-पद-रज..
•
११- जिन लक्ष्मीकी रूप..
•
१२- जिन श्रीराधा के..
•
१३- स्वामिनी हे बृषभानु..
•
१४- श्रीराधा! अब देहु..
•
१५- करौ कृपा श्रीराधिका..
•
१६- दयामयि स्वामिनि परम..
•
१७- राधाजू! मोपै आजु..
•
१८- निन्द्य-नीच, पामर परम..
•
१९- हे राधे! हे श्याम..
•
२०- स्याम-स्वामिनी राधिके!..
•
२१-श्रीराधा! कृष्णप्रिया!..
•
२२- श्रीराधामाधव-युगल..
•
२३-कृपा जो राधा..
•
२४- राधा-नयन..
•
२५- जय वसुदेव-देवकीनन्दन..
•
२६- जयति राधिकाजीवन..
•
२७- हे परिपूर्ण ब्रह्म!..
•
२८- सत्-चित्-घन..
•
२९- माधव! नित मोहि..
•
३०- माधव! मुझको भी..
•
३१- रसस्वरूप श्रीकृष्ण परात्पर..
•
३२- सोभित सिर सिखिपिच्छ..
•
३३- राधा-माधव-पद..
•
३४- महाभाव-रसराज स्वयं..
•
३५- राधा-माधव-जुगल..
•
३६- हमारे जीवन लाड़िलि..
•
३७- बंदौं मधुर लाड़िलि..
•
३८- श्रीराधामाधव कर हमपर..
•
३९- मोहन-मन-धन-हारिणी..
•
४०- श्यामा-श्याम युगल..
•
४१- श्रीराधामाधव जुगल दिब्य..
•
४२- हे राधा-माधव! तुम..
•
४३- श्रीराधा-माधव! यह..
•
४४- बसा रहे मन-मधुप..
•
४५- श्रीराधा-माधव-जुगल!..
•
४६- शुद्ध सच्चिदानन्द सनातन
•
४७- बंदौं गोपी-जन-हृदय..
•
४८- श्री ‘ललिता’ लावण्य..
•
४९- ब्रह्म, ब्रह्मकी शक्ति..
•
५०- बंदौं हरि-पद-पंकज..
•
५१. शोभित चारों भुजा सुदर्शन..
•
५२- नारायणं हृषीकेशं गोविन्दं..
•
५३- श्रीगनपति गुरु सारदा..
•
५४- वन्दौं विष्णु विश्वाधार..
•
५५- परम गुरु राम..
•
५६- जयति देव, जयति..
•
५७- अर्पण मेरे हैं..
•
५८- मोपै गिरिधर! कृपा..
•
५९- प्रियतम! बनकर आओ
•
६०- दिन-रजनी, तरु-लता..
•
६१- करो प्रभु! ऐसी..
•
६२- आते हो तुम बार-बार..
•
६३- बिना याचनाके ही..
•
६४- बन जाओ तुम मेरे..
•
६५- प्रभो! मिटा दो मेरा..
•
६६- करुणामय! उदार चूड़ामणि!..
•
६७- सबमें सब देखें निज..
•
६८- केवल तुम्हें पुकारूँ..
•
६९- कहाँ तुच्छ सब..
•
७०- मेरी शक्ति थक गयी..
•
७१- जो चाहो तुम, जैसे..
•
७२- ‘भोगोंमें सुख है’..
•
७३. हमें ऐसा बल दो..
•
७४- कैसैं बिनय सुनावौं..
•
७५- अब मोहि एक भरोसौ..
•
७६- करौ, प्रभु! ऐसी कृपा..
•
७७- मुझे प्रभु! दो वह..
•
७८- दयामय! मोहि दासता..
•
७९- हे मेरे! तुम, प्राण..
•
८०- हौं हरिदास-दास कौ..
•
८१- जला दो उर मेरे..
•
८२- हमें प्रभु! दो ऐसा..
•
८३- प्रभु! तुम अपनौ बिरद..
•
८४- प्रभु! मोहि देउ साँचौ..
•
८५- छुड़ा दो विषयोंका..
•
८६- माधव! मो सम कौन..
•
८७- प्रभो! कृपा कर मुझे..
•
८८- प्रभो! यह कैसा..
•
८९- मैं शरण आ पड़ा..
•
९०- हे यन्त्री! तुम मुझे..
•
९१- हरो अभिमान, मिटा दो..
•
९२- हो परमबन्धु तुम पतितोंके..
•
९३- हर लो हरि! सुख..
•
९४- विपदा है करुणाभा..
•
९५- तोड़-फोड़कर मुझे..
•
९६- किया नहीं मैंने सहर्ष..
•
९७- दु:ख दूर मत करो..
•
९८- आर्त-त्राण-परायण..
•
९९- क्षुद्र स्वार्थका नाश..
•
१००- जबतक जगमें रहते..
•
१०१- किसी कामका नहीं..
•
१०२- ‘भक्त’ नाम लगता..
•
१०३- भेड़िया ओढ़ भेड़..
•
१०४- नहीं नापाक, नालायक..
•
१०५- दीनबन्धु! करुणा-वरुणालय!..
•
१०६- नाथ! हौं केहि बिधि..
•
१०७- नाथ! हौं निपट निरंकुस..
•
१०८- मेरे मनके धन तुम ही..
•
१०९- को अपराधी मो सम..
•
११०- नीच मैं मूढ़ दोष..
•
१११- मलिन यह मन-मन्दिर..
•
११२- जनम सब बीत्यौ अघ..
•
११३- नहीं गर्भगृह ऐसा, जिसमें..
•
११४- मैंने कभी न चाहा..
•
११५- तुमने दिया सदा ही..
•
११६- सर्वरहित, एकाकी वनमें..
•
११७- कोई कहते ‘संत’ मुझे
•
११८- किया न मैंने भूलकर..
•
११९- क्रोध-मोह-मद..
•
१२०- मानव-जन्म सुदुर्लभ..
•
१२१- मेरे अघका पार नहीं..
•
१२२- कैसे लूँ मैं नाम तुम्हारा..
•
१२३- गुनाहोंसे भरी है यह..
•
१२४- भरा अमित दोषोंसे..
•
१२५- परम सत्य जो नित्य..
•
१२६- जीवनको संगीत बना..
•
१२७- कर प्रणाम तेरे चरणोंमें..
•
१२८- अब हरि! एक भरोसो..
•
१२९- प्रभु! तुम अपनो बिरद..
•
१३०- नाथ मैं थारो जी..
•
१३१- नाथ! थाँरै सरणै आयो..
•
१३२- नाथ! थाँरै सरण..
•
१३३- नाथ! मनें अबकी बार..
•
१३४- अब कित जाऊँ जी!..
•
१३५- हे दयामय! दीनबन्धो!..
•
१३६- दीनबन्धो! कृपासिन्धो!..
•
१३७- प्रभु! मेरो मन ऐसो..
•
१३८- हुआ अब मैं कृतार्थ..
•
१३९- नाथ! अब कैसे हो..
•
१४०- खड़ा अपराधी प्रभु..
•
१४१- होगा कब वह सुदिन
•
१४२- बना दो विमल-बुद्धि..
•
१४३- बना दो बुद्धिहीन..
•
१४४- नाथ अब लीजै मोहि..
•
१४५- हे निर्गुण! हे सर्वगुणाश्रय!..
•
१४६- हे नाथ! तुम्हीं सबके..
•
१४७- हे स्वामी! अनन्य..
•
१४८- पतित नहीं जो होते..
•
१४९- प्रभु तव चरन..
•
१५०- आयौ चरन तकि..
•
१५१- बहु जुग बहुत जोनि..
•
१५२- मोहन! राखु पद..
+
श्रीराधा-माधव-स्वरूप-माधुरी (१५३ से २०३)
•
१५३- सुमन-समूह, मनोहर..
•
१५४- कर नवनीत लियें..
•
१५५- कृष्ण-अंग-लावण्य..
•
१५६- सजल-जलद-नीलाभ..
•
१५७- मधुर मनोहर सुंदर..
•
१५८- नव-नीरद-नीलाभ तन..
•
१५९- सजल-जलद-नीलाभ..
•
१६०- जयति जय गोप्रेमी..
•
१६१- कर मुरली, कटि काछनी..
•
१६२- कृष्ण-नील-द्युति तन..
•
१६३- कालिंदी-तट ठाढ़े..
•
१६४- जय जय ब्रजराज..
•
१६५- सजल-जलद-नीलाभ..
•
१६६- नव किशोर नटवर मुरलीधर..
•
१६७- छैल-छबीले लाड़िले..
•
१६८- कोटि-कोटि शत..
•
१६९- शारदीय-पूर्णिमा-सुनिर्मल..
•
१७०- मोरपिच्छ सिर, कर्णिकार..
•
१७१- नित नूतन गुन-रूप..
•
१७२- नित्य, अनन्त, अचिन्त्य..
•
१७३- उड़ा जा रहा प्रकृति..
•
१७४- रूप-सील-सौंदर्य..
•
१७५- मधुर-सुमधुर, मधुर..
•
१७६- जय जय हरि-हृदया..
•
१७७- हरत मन-माधव..
•
१७८- अंग-अंग अप्रतिम..
•
१७९- जुगलबर एक तत्त्व..
•
१८०- दोऊ सदा एक रस..
•
१८१- दुहुनि की प्रीति..
•
१८२- कृष्ण शक्तिमय, शक्ति..
•
१८३- वह सखि! शशधर..
•
१८४- वह सखि! नूतन..
•
१८५- रास-बिहारिनि राधिका..
•
१८६- भावमयी श्रीराधिका, रसमय..
•
१८७- जुगल बर परम..
•
१८८- जयति जय जयति..
•
१८९- परम प्रेम-आनंदमय..
•
१९०- जुगल छबि हरति..
•
१९१- सोहत जुगल राधे..
•
१९२- स्याम-स्यामा सुषमाके..
•
१९३- बिराजत रासेस्वरि..
•
१९४- सोहत सुठि स्याम..
•
१९५- बनहिं बन रस..
•
१९६- लता-निकुंज मध्य..
•
१९७- राधा-माधव माधव..
•
१९८- कलित कल्पतरु-कुंज..
•
१९९- रसमयी संग रसिक..
•
२००. स्थिर बिजली सँग चंचल..
•
२०१- बिराजित स्यामा-स्याम..
•
२०२- मिले श्याम-श्यामा..
•
२०३- गौर सुभग शशि अमित..
+
श्रीकृष्ण-बाल-लीला-माधुरी (२०४ से २३२)
•
२०४- स्मरण-मात्रसे जिनके..
•
२०५- कर-कमलोंसे चरण..
•
२०६. ब्रजेस्वरि-गोद में..
•
२०७- खेलत झुनझुनियाँ ते..
•
२०८- रतनभूमि पर चलत..
•
२०९- नेहभरे नयनन्हि सों..
•
२१०- मचलि रहे ता दिन..
•
२११- लालन! देखु आयौ..
•
२१२- नंदसुत चुपकै माखन..
•
२१३- भूषन-बसन सजाय..
•
२१४- नारद बाबा कही..
•
२१५- बछरा की लै पूँछ कर..
•
२१६- करत विचित्र चरित्र..
•
२१७- सखनि सँग खेलत..
•
२१८- सो छबि छिनहुँ..
•
२१९- मैया! तू भोली है..
•
२२०- पनघट पर हरि..
•
२२१- बरजै क्यूँ नी..
•
२२२- कन्हैया गाय चरावन..
•
२२३- बनहिं बन स्याम..
•
२२४- खेलत ग्वालन सँग..
•
२२५- वृन्दा-विपिन तपन..
•
२२६- नव-पल्लव सुगन्ध..
•
२२७- बजावत मुरली मीठी..
•
२२८- गमन करत रबि..
•
२२९- नयननि कौ इतनौई..
•
२३०- कालीदह-जल ऊपर..
•
२३१- क्रीडत कल कुँमर..
•
२३२- दुर्मति दैत्य महाबलने..
+
श्रीराधा-माधव-लीला-माधुरी (२३३ से ४१६)
•
२३३- नवल बृन्दाबन सोभा
•
२३४- नव कानन, नित नूतन..
•
२३५- निभृत-निकुंज-मध्य..
•
२३६- प्रिया-प्रीतम नित..
•
२३७- देख रहा मैं, करते..
•
२३८- मोहन के हिय..
•
२३९- बटाऊ! वा मग तैं..
•
२४०- स्याम मोरे ढिग तें..
•
२४१- मोहन-मुख-पंकज..
•
२४२- करते कभी छेड़..
•
२४३- गोपी घर तें निकसी..
•
२४४- ग्वालिनी भूली तन..
•
२४५- चली स्याम-गत-चित्ता..
•
२४६- मधुर ब्रजराजकुमर..
•
२४७- नीलमनि धेनु लिये..
•
२४८- नीलमनि मनहर बन..
•
२४९- नंदसुत रसमय बन..
•
२५०- बन तें घर हरि..
•
२५१- देखी आजु अनोखी..
•
२५२- यमुना-तट-संनिकट..
•
२५३- माधुरी मुरली अधर..
•
२५४- बजावत मुरली स्याम..
•
२५५- बजाऔ मति मुरली..
•
२५६- मुरलिया! मत बाजै..
•
२५७- ग्वालिन मुरली-धुनि..
•
२५८- सुनि मधु मुनि..
•
२५९- स्याम ने मुरली..
•
२६०- मुरलिया बाजी रे..
•
२६१- मधुर मुरलि कर..
•
२६२- स्याम-दरस-परसन
•
२६३- थीं वे विकसित..
•
२६४- तुम लोगोंसे हुआ..
•
२६५- परम प्रेममयी श्रीराधा
•
२६६- उदय हुए जब श्रीवृन्दावन..
•
२६७- कुसुमित कुंज कल्पतरु..
•
२६८- रुचिर तपन-तनया..
•
२६९- मंद-मंद मुसकावत..
•
२७०- निरखि मुखचंद तुम्हारौ..
•
२७१- राधा! हम-तुम..
•
२७२- करत निज कर..
•
२७३- थके पर छके..
•
२७४- तत्सुख-सुखी त्यागमय..
•
२७५- प्रिया-प्रीतम दोउ..
•
२७६- कानन नव निकुंज..
•
२७७- हँसि-हँसि झूलत..
•
२७८- झूलत फूल हंडोरे..
•
२७९- हंडोरें झूलत स्यामा..
•
२८०- झुलावत निज कर..
•
२८१- झुलावति स्यामा स्याम..
•
२८२- झूलत अभिराम स्याम..
•
२८३- झूलत कुंजनि प्रेम..
•
२८४- झूलत हरित कुंज..
•
२८५- झूलत सघन कुंज..
•
२८६- भीजत रीझत दोऊ..
•
२८७- आश्विन मास, शरद..
•
२८८- नित्य मधुर ब्रज-धाम..
•
२८९- खेलत सुन्दर स्याम..
•
२९०- खेलत स्यामा-स्याम..
•
२९१- होरी में गए हार..
•
२९२- याद पड़ रहा है..
•
२९३- लता-वल्लरी रही..
•
२९४- कहाँ गये तुम, कहाँ..
•
२९५- बिरहातुर, अति कातर..
•
२९६- अति एकान्त, बिकल..
•
२९७- देखा स्वप्न राधिकाने..
•
२९८- विषम बिछुड़नेकी बेलामें..
•
२९९- माधव! हौं तुम्हरे..
•
३००- सखी री! मो सम..
•
३०१- स्याम बिनु छिनहूँ..
•
३०२- स्याम-घन कब..
•
३०३- बज्र सम मेरौ..
•
३०४- तिहारौ बिरह दु:ख..
•
३०५- अहो हरि! मो..
•
३०६- स्याम मोहिं तुम..
•
३०७- स्याम! अब मत..
•
३०८- माधव! करौ बचन..
•
३०९- प्रानधन सुंदर स्याम..
•
३१०- सखी! मोय कारौ..
•
३११- परत मन छिन..
•
३१२- बिरह-दुख सजनी!..
•
३१३- झूर रहे दृग रूप..
•
३१४- एक-एक पल बना..
•
३१५- दिन नहिं चैन..
•
३१६- गये श्यामसुन्दर जब..
•
३१७- मधुपुरी गवन करत..
•
३१८- जब ते हरि मधुपुरी..
•
३१९- ब्रज की सुरत मोहिं..
•
३२०- ऊधौ! बिसरत नहिं
•
३२१- ब्रज-बनितनि की..
•
३२२- ब्रज-बनिता नहिं..
•
३२३- राधा की सुधि..
•
३२४- ऊधौ! निठुर मो सम
•
३२५- प्राणेश्वरि! जबसे मैं..
•
३२६- मत समझना तुम..
•
३२७- हे राधे! उस दिन..
•
३२८- राधे! तुम जो अनुभव..
•
३२९- ऊधौ! तुम ते कहौं..
•
३३०- मुझसे करके प्रेम..
•
३३१- माधव-सखा मनीषी..
•
३३२- ऊधौ! स्याम बड़े ही..
•
३३३- ऊधौ! कहा सिखावौ..
•
३३४- ऊधौ! मोहन स्याम..
•
३३५- ऊधौ! हम क्यौं स्याम..
•
३३६- ऊधौ! प्रिय तें कहियो..
•
३३७- ऊधौ! तुम तो बड़े..
•
३३८- स्याम तव मूरति..
•
३३९- ऊधौ! सो मनमोहन..
•
३४०- ऊधो मधुपुरका बासी..
•
३४१- ऊधौ! तुम्हरे नैन अधूरे..
•
३४२- ऊधौ! मो मैं नैकु न..
•
३४३- उद्धव! तुम मुझको किसका..
•
३४४- ऊधौ! सोई प्रीति अनन्य..
•
३४५- उद्धव! राधा-सी अभागिनी..
•
३४६- उद्धव! मुझमें तनिक नहीं..
•
३४७- राधे! क्या संदेश सुनाऊँ..
•
३४८- उद्धव! सत्य सुनाया..
•
३४९- कहने लगे राधिकासे..
•
३५०- माधव दशा सुनाऊँ..
•
३५१- प्यारे कान्ह सखाकी..
•
३५२- स्याम! तुम परम..
•
३५३- तुम सम निठुर दूजौ..
•
३५४- मैं छोड़, प्रिये! तुमको..
•
३५५- जबसे सुना सुधामय..
•
३५६- चित्रपट देखत भूली..
•
३५७- श्रीमती मूरति अंकित..
•
३५८- कृष्ण-सुखैक-वासना..
•
३५९- स्वर्णपिंजरस्थित मगन मन..
•
३६०- राधिका आई कुंज..
•
३६१- स्याम पाकर निकुंज..
•
३६२- सखी ने आकर बात..
•
३६३- स्याम आ पहुँचे तुरत..
•
३६४- स्याम-सरोज-बदन सुचि..
•
३६५- कृष्ण-प्रिया राधा-चरन..
•
३६६- प्यारी-पग काँटौ चुभ्यौ..
•
३६७- कदँब-बृच्छ-छाया सुखद..
•
३६८- लै मुरली प्रिय छिप गए..
•
३६९- विरह-व्यथा-पीड़ित..
•
३७०- मलयज पवन, उल्लसित..
•
३७१- विरहाकुल अति व्यथित..
•
३७२- सखी! वह कैसौ मीठौ..
•
३७३- नियत समयपर पहुँच न..
•
३७४- जग रही थी रात भर..
•
३७५- सखी! न कोई और..
•
३७६- नाथ! अब मो पै कृपा..
•
३७७- मधुर मनोहर नील-श्याम..
•
३७८- बैठी राधा थीं यमुना-तट..
•
३७९- नित्य उन्होंने चाहा मुझको..
•
३८०- प्रियतम-भामिनि, मधुमय..
•
३८१- एक दिना मिलि प्यारी..
•
३८२- खड़े हुए थे लिये सहारा
•
३८३- उस कैतवके लिये कर..
•
३८४- सखि! सुख-दान करो..
•
३८५- मग जोहति मन व्यथित..
•
३८६- आय दूती ने बात..
•
३८७- आय दूती ने बात..
•
३८८- आय दूती ने बात..
•
३८९- अनुपम मोरें मन अभिलास..
•
३९०- सखी! यह कैसी भूल..
•
३९१- कान्ह बर धरॺो..
•
३९२- मेरे हे जीवन-जीवन!..
•
३९३- प्राण-प्राण! हे प्राणनाथ!..
•
३९४- तुम बिनु बीतत छिन..
•
३९५- कोटि-कोटि कंदर्प-दर्पहर..
•
३९६- श्रीमती! छमा करौ..
•
३९७- तुम कुछ भी कहो भले..
•
३९८- स्याम-मन उमग्यौ आनँद..
•
३९९- मो ते भईं चूक अन..
•
४००- नहीं तुम्हारा अन्तर देखा..
•
४०१- स्याम बतावत प्रेम-मूर्ति..
•
४०२- स्याम-स्यामा दोउ करत..
•
४०३- नव-निकुंज सुख-पुंज..
•
४०४- मुरली ली, प्रिय छिप गये..
•
४०५- बच रहे थे दो, नहीं..
•
४०६- महामहिम मुनि-मनहर..
•
४०७- खड़ा यह कौन कुंजके..
•
४०८- प्रिय-बियोगमें अबिरत स्मृति..
•
४०९- सूखकर काँटा हुआ तन..
•
४१०- समझ रही मैं लाभ चित्त..
•
४११- मेरे इस प्रणको सुन लो..
•
४१२- सखी! मैं भई अति..
•
४१३- मधुर-मधुर, सुन्दर-सुन्दर..
•
४१४- प्रानप्रिय मथुरा जाय बसे..
•
४१५- औचक चौंकि उठे हरि..
•
४१६- नव-निकुंजमें कृष्ण प्रेष्ठतम..
+
प्रेम-समुद्रकी मधुर तरंगें (४१७ से ५३३)
•
४१७- प्रियतमसे मिलनेको जिसके..
•
४१८- अब तो कुछ भी नहीं..
•
४१९- छलकि रहि गोपी..
•
४२०- प्रियतमको अति मधुर मनोहर..
•
४२१- भई गति कैसी सुनु..
•
४२२- लग्यौ तब हिय मीठौ..
•
४२३- बंदीजन आए गुन..
•
४२४- सखी सौं सुनि वा..
•
४२५- स्याम विमल गुन सुनत..
•
४२६- सुनि सहसा सुर मधुर..
•
४२७- गयौ मन मेरौ..
•
४२८- जा दिन तैं मुरली-धुनि..
•
४२९- सोवत रही सखी!..
•
४३०- सखी! मैं कहा कहूँ..
•
४३१- आजु देखि आई हौं..
•
४३२- देखे जब मन-मोहन..
•
४३३- मन की मन ही
•
४३४- हौं जल भरन गई री..
•
४३५- जब तैं मैं देखे मन-मोहन..
•
४३६- सखी! मैं स्याम लुभानी..
•
४३७- जब तैं मैं देखे नँद..
•
४३८- आजु इन नयनन्हि निरखे..
•
४३९- कहौं का मन-नयननि..
•
४४०- गई हुती वा दिनाँ किसोरी..
•
४४१- देखा मैंने उस दिन..
•
४४२- मेरौ मन रूप-समुद्र..
•
४४३- मेरौ मन मोहन छबि..
•
४४४- बरजी मैं काहू की..
•
४४५- श्याम ने कहा ठगोरी..
•
४४६- निरखु सखि! कैसौ..
•
४४७- जल भरिबे कूँ आज..
•
४४८- मेरे जीवन-धन प्यारे!..
•
४४९- प्यारे मोहन मनभावन!..
•
४५०- मैं तुमको श्याम बुलाऊँ..
•
४५१- चतुर चंचल चपल चित..
•
४५२- सखी! मैं जाऊँ जमुना..
•
४५३- प्यारे आकर हँसकर..
•
४५४- सौंप दिये मन प्राण..
•
४५५- होय पद-कंज..
•
४५६- सजनी! चलु वा पिय
•
४५७- बनी रहे नित बिरह..
•
४५८- तरस रहीं अँखियाँ देखन..
•
४५९- हों चाहे वे परम अनिर्वचनीय..
•
४६०- बने रहें प्रभु एकमात्र..
•
४६१- नहीं चाहती मनोनाश मैं..
•
४६२- स्वर्ग जायँ या पड़ी रहें..
•
४६३- मन की बात मन हि..
•
४६४- मेरे जीवनके जीवन..
•
४६५- राजी रहो सदा प्यारे!..
•
४६६- तुम ही मेरे प्राण..
•
४६७- मेरा मन, मनके सारे..
•
४६८- हो चाहे तुम खुद ब्रह्म..
•
४६९- हो चाहे शंकर शुचि..
•
४७०- दृढ़ रति, मन विश्वास..
•
४७१- ‘मैं, बस, उनकी ही’,..
•
४७२- हुआ समर्पण प्रभु-चरणोंमें..
•
४७३- वे प्रियतम मेरे श्याम..
•
४७४- कृष्ण उठत, कृष्ण चलत
•
४७५- देश कृष्ण, काल कृष्ण..
•
४७६- श्याम हमारे तन-मन-धन..
•
४७७- श्याम नित्य सुन्दर..
•
४७८- श्याम हमारे वस्त्राभूषण..
•
४७९- श्यामकी चर्चा हमारा..
•
४८०- राधा घर, काननमें राधा..
•
४८१- प्रियतम नित्य प्राण हैं..
•
४८२- हटे वह सामनेसे..
•
४८३- प्यारे प्रियतम प्रभु अवश्य..
•
४८४- रहते नित हृदयमें मेरे..
•
४८५- नहीं छोड़ते हैं पलभर..
•
४८६- नित्य सुदारुण विरह भयानक..
•
४८७- स्याम मो मन में आय..
•
४८८- कहाँ असीम अनन्त परम..
•
४८९- सखी! हो गयी क्या मैं पगली..
•
४९०- हरि मेरे प्रियतम सदा..
•
४९१- नहीं चाहती याद रखूँ मैं..
•
४९२- दीर्घकालके बाद हुआ..
•
४९३- लालची लोचन मधुप..
•
४९४- हुआ मधुर सम्बन्ध प्रेमका..
•
४९५- रहते हैं प्यारे नित सारे..
•
४९६- कैसे देखूँ दूर मैं..
•
४९७- हो गया उनका सब..
•
४९८- मिल्यौ स्याम कौ मधु..
•
४९९- सजनी! जो कटा अँग..
•
५००- मिटे सब शोक..
•
५०१- पलभर नहीं छोड़ते प्यारे..
•
[५०२]
•
५०३- बिछुरे होयँ जु मिलैं..
•
५०४- सरबस छीन लै गयौ..
•
५०५- पता नहीं कुछ रात..
•
५०६- सखि! क्या हुआ?
•
५०७- सुनौ सखि! यह..
•
५०८- नैन-मन जब तैं..
•
५०९- सखी री! यह अनुभव..
•
५१०- निरखि सखि! मोहनकी..
•
५११- सखी! हौं स्याम..
•
५१२- सखी! हौं प्रीतम..
•
५१३- प्रियतम मेरे, मैं प्रियतमकी..
•
५१४- रूप अनूप सुधा-रस..
•
५१५- स्याम-सो साँचौ स्नेही..
•
५१६- शुद्ध सच्चिदानन्द, परम निज..
•
५१७- मैं तो सदा बस्तु हूँ..
•
५१८- मेरे इक जीवन-धन..
•
५१९- मैं हूँ एकमात्र उनकी ही..
•
५२०- सखि! संयोग-वियोग..
•
५२१- तुम उनकी, वे नित्य तुम्हारे..
•
५२२- सखी! यह अतुल अनोखी..
•
५२३- स्रवननि भरि निज गिरा..
•
५२४- मिले रहते मुझसे..
•
५२५- हृदय-भवनमें बसे निरन्तर..
•
५२६- सखी री! तू क्यौं भई..
•
५२७- सखी! जो रूठे स्याम..
•
५२८- अरी सखि! मेरे तन..
•
५२९- सखी! जनि करौ अयानी..
•
५३०- सुनु प्यारी मम बैन..
•
५३१- याद आ रही थी मुझको..
•
५३२- सखी री! हौं अवगुन की..
•
५३३- सखी! तुम इतनौ करियो
+
श्रीकृष्णके प्रेमोद्गार (५३४ से ६०७)
•
५३४- बरबस करषौं मुनि-मनहि..
•
५३५- राधा बिना अशोभन नित..
•
५३६- मैं हूँ पूर्णानन्द परम शुचि..
•
५३७- मुझ ‘रस’ को, मेरे..
•
५३८- नहीं चुका सकता मैं बदला..
•
५३९- कहत स्याम निज मुख..
•
५४०- अन्त-विहीन, अनादि, नित्य..
•
५४१- दूर रहें या पास, नित्य..
•
५४२- कैसे किसे बताऊँ अब..
•
५४३- मो मन राधा-छबि पै..
•
५४४- राधासे भी लगता मुझको..
•
५४५- जिह्वाके मम अग्रभागपर..
•
५४६- मानो या मत मानो..
•
५४७- ‘मैं प्रियतम, तू प्रेयसि मेरी’..
•
५४८- प्रिये! लखौ तुम सर्व..
•
५४९- सुन्दर-मधुर सदा मैं..
•
५५०- राधिके! तुम मम जीवन..
•
५५१- हे आराध्या राधा!..
•
५५२- हे वृषभानुराजनन्दिनि!..
•
५५३- हे प्रियतमे राधिके!..
•
५५४- राधे, हे प्रियतमे..
•
५५५- मेरा तन-मन सब तेरा..
•
५५६- राधे! तू ही चित्तरंजनी..
•
५५७- राधा! तुम-सी तुम्हीं..
•
५५८- राधे! तुम-सी तुम्हीं..
•
५५९- हे राधे वृषभानुनन्दिनी..
•
५६०- प्रिये! तुम्हारा-मेरा यह..
•
५६१- प्राणेश्वरि! निश्चय ही तू..
•
५६२- प्रिये! तुम्हारी महान महिमा..
•
५६३- मिली सदा रहतीं तुम..
•
५६४- सुमधुर स्मरण तुम्हारा..
•
५६५- तेरी चिन्ता, तेरी पीड़ा..
•
५६६- आतुर मैं अत्यन्त सदा..
•
५६७- विषय-कामना, भोग-रति..
•
५६८- प्रिये! तुम्हारी मूर्ति नित..
•
५६९- राधे! क्यों मैं रीझा तुमपर..
•
५७०- है कर्तव्य नहीं कुछ मुझको..
•
५७१- एक तुम्हारे सिवा न राधे!..
•
५७२- नहीं जानता मैं भगवत्ता..
•
५७३- कभी न होता, कभी न होगा..
•
५७४- जिससे मुझ ‘आनन्द-रूप’..
•
५७५ प्रिये! तुम्हारी मधुर मनोहर..
•
५७६- अन्तरकी रस-धाराकी..
•
५७७- एक तुम्हींमें मन अटका है..
•
५७८- प्रिये! प्राण-प्रतिमे!..
•
५७९- प्रिये! तुम्हारी वाणी..
•
५८०- पल भर नहीं छोड़ते...
•
५८१- तेरे उरकी शुचि सुन्दरता..
•
५८२- देख छबीली छटा..
•
५८३- कैसे तुम्हें दिखाऊँ..
•
५८४- जब तुम कहती हो..
•
५८५- तुम्हें क्या कहूँ..
•
५८६- मैं न तुमसे एक क्षण..
•
५८७- तुमने मुझे दिया सुख..
•
५८८- रोजकी आदत मेरी..
•
५८९- प्रियतमे! मैं नित रिनी..
•
५९०- तुम कभी मनमें..
•
५९१- प्राणाधिके! प्रियतमे! मुझको..
•
५९२- तोसे मिलहौं, हे राधिके!..
•
५९३- जबसे छूटा था राधे!..
•
५९४- भूल गया मैं अन्य सभी..
•
५९५- राधा! तेरे दर्शनको..
•
५९६- प्रिये! तुम्हारी विरह..
•
५९७- विधु-बदनी श्रीराधिके!..
•
५९८- राधिके! तुम सलिल..
•
५९९- तुम्हारी स्मृति नित बन..
•
६००- रहता पुरी द्वारिकामें मैं..
•
६०१- तुम यह शायद समझ..
•
६०२- हे ब्रजरमणि-मुकुटमणि राधे!..
•
६०३- सर्वनियन्ता सर्वेश्वर मैं..
•
६०४- राधा मेरी प्राण-प्रतिमा..
•
६०५- राधिके! तुम सौं होड़..
•
६०६- गोपिका! (प्रिया सब) हौं..
•
६०७- निर्मल प्रेम नित्य यौं..
+
श्रीराधाके प्रेमोद्गार—श्रीकृष्णके प्रति (६०८ से ६६०)
•
६०८- हौं तो दासी नित्य तिहारी..
•
६०९- मेरी इस विनीत विनतीको..
•
६१०- सुन्दर श्याम कमल..
•
६११- सदा सोचती रहती हूँ मैं..
•
६१२- मेरे धन-जन-जीवन..
•
६१३- तुमसे सदा लिया ही मैंने..
•
६१४- तुम अनन्त सौन्दर्य..
•
६१५- तुम हो यन्त्री, मैं यन्त्र..
•
६१६- हे प्रियतम! माधुर्य..
•
६१७-प्रियतम! तव रूप-सुधा..
•
६१८- तुम अपनी असमोर्ध्व..
•
६१९- यहाँ-वहाँ कुछ कहीं..
•
६२०- एकमात्र उनकी ही हूँ..
•
६२१- तुम करते रहो रसिकवर!..
•
६२२- स्याम! तोय नैननि..
•
६२३- रहते घुले-मिले ही..
•
६२४- नहीं चाहती तुमसे कुछ..
•
६२५- देख रही सुन रही सभी..
•
६२६- मिलती अगर सान्त्वना..
•
६२७- हो चाहे तुम सर्वदोषमय..
•
६२८- दुतकारो-डाँटो सदा..
•
६२९- मिलो कभी मत, नहीं..
•
६३०- हो चाहे तुम सबके स्वामी..
•
६३१- बहुत दूर तुम, बहुत..
•
६३२- देह-प्राण, मन-बुद्धि..
•
६३३- नहीं चाहती दु:ख मिटाना..
•
६३४- तन कौ कन-कन..
•
६३५- देउँ कहा तुम कहँ..
•
६३६- मेरे तुम, मैं नित्य तुम्हारी..
•
६३७- करना तुम मत नाश कभी..
•
६३८- खूब जानती हूँ मैं..
•
६३९- अतुल रूप-सौन्दर्य..
•
६४०- मैं अति दीन, मलिन मति..
•
६४१- नहीं शक्ति, सामर्थ्य न..
•
६४२-नहीं एक भी सद्गुण..
•
६४३- मैं अपराधिनि, अघी..
•
६४४- ‘काया’ मैं न, ‘जीव’..
•
६४५- कैसी दिव्य तुम्हारी ममता..
•
६४६-अनोखौ प्रेम तुम्हारौ स्याम!..
•
६४७- पियारे! तुम ही तुम्हरे..
•
६४८- क्षणभर मुझे उदास देख..
•
६४९- कभी मत मिलो..
•
६५०- प्रियतम! मीठी नित..
•
६५१- कभी मत मिलें..
•
६५२- कितने तुम अनुपम..
•
६५३- तुम्हारी स्मृति ही है..
•
६५४- चाहता मन है नित..
•
६५५- बिसारूँ कैसे स्याम..
•
६५६- मैं भूली थी अपने..
•
६५७- मैं थी पहले मलिना..
•
६५८- प्रेमाधीन शिरोमणि हो..
•
६५९- दूर करो, ठुकराओ चाहे..
•
६६०- चाह-कुचाह मिट गयी..
+
प्रेम-तत्त्व एवं गोपी-प्रेमका महत्त्व (६६१ से ७५२)
•
६६१- प्रेम-राज्यके सभी..
•
६६२- ‘कर्म-राज्य’ से उच्च..
•
६६३- सबहि सौं पृथक..
•
६६४- प्रेम हृदय की बस्तु है..
•
प्रेमका महत्त्व
•
प्रेमके साधन
•
प्रेमके विघ्न
•
प्रेमकी स्थिति
•
ज्ञान और प्रेम
•
प्रेमीका स्वरूप
•
६६५- प्रेम सदा पावन..
•
६६६- परम गोप्य, अतिसय..
•
६६७- उत्कट काम, अमर्ष..
•
६६८- अति निर्मल, अति ही मधुर
•
६६९- प्रेम पवित्र, परम उज्ज्वल
•
६७० काहू कौं जानौं..
•
६७१- सुनै सदा चाहे न..
•
६७२ जो परतन्त्र सदा..
•
६७३- पावन पावक प्रेम..
•
६७४- जितने सब हैं भाव..
•
६७५- सुद्ध सत्त्वकी वृत्ति..
•
प्रेमके आठ स्तर
•
६७६- प्रेम-अमिय के पियत..
•
६७७- जन्म-मरण न दु:ख..
•
६७८- भोग-मोक्ष-इच्छा..
•
६७९- इत-उत जो धावत..
•
६८०- लौकिक भोग-काम है..
•
६८१- श्याम प्रेम तब जानिये..
•
६८२- शुद्ध-प्रेम राधा-माधवका..
•
६८३- उड़ता नहीं निरा भ्रम..
•
६८४- भोगासक्ति-कामना करती..
•
६८५- ‘काम’ रहेगा, तबतक होंगें..
•
कामके उच्च-नीच स्वरूप
•
६८६- प्रेम कौ एक मधुर..
•
६८७- प्रेम-राज्यमें निज..
•
६८८- स्व-सुख-वासना..
•
६८९- समय-स्थानकी दूरी..
•
६९०- हमको दुखी देखकर प्यारे..
•
६९१- प्यारे! हँसो, रहो ही हँसते..
•
६९२- कैसे वह दुखिया माने..
•
६९३- सुमधुर स्मृतिमें होता..
•
६९४- मिला जिसको हरि..
•
६९५- ज्यों-ज्यों प्रभु-समीपता..
•
६९६- शुद्ध प्रेमरूप हैं केवल..
•
६९७- शुद्ध प्रेम राधा-माधवका..
•
६९८- इन्द्रिय-सुख-इच्छासे..
•
६९९- नित्य सर्वकारण कारण..
•
७००- मिलौ न चाहें तुम..
•
७०१- जहाँ पवित्र भाव हैं..
•
७०२- ‘सर्व-त्याग’ हो गया सहज..
•
७०३- नहीं वासना, नहीं कामना..
•
७०४- प्रथम सीस अरपन..
•
७०५- विषय-रस नीरस सदा..
•
७०६- प्रानसहित या देह..
•
७०७- जिसने अपने तन-मन..
•
७०८- जाकौं प्रभु अपनो..
•
७०९- पूर्ण समर्पण हो सदा..
•
७१०- देह-प्राण-मन, वस्तु..
•
७११- निज सुख वांछा नैकु..
•
७१२- मिले नेत्र नेत्रोंमें जाकर..
•
७१३- जिससे परम सुखी हों..
•
७१४- नहीं मिलनमें तृप्ति..
•
७१५- लग जाती है होड़ परस्पर..
•
७१६- प्रेम-रस-सागर नागरि..
•
७१७- धन्य-धन्य ब्रजकी..
•
७१८- जितना-जितना मनसे..
•
७१९- ‘मेरे साथ बिहार करैं..
•
७२०- सकल साधनोंकी फलरूपा..
•
७२१- गोपिन की उपमा..
•
७२२- गोपीजन की महिमा..
•
७२३- गोपिन पटतर नहिं..
•
७२४- जिसकी कहीं न कोई..
•
७२५- कृष्ण-प्रियतमा राधा रानी..
•
७२६- पूर्ण त्यागमय सर्वसमर्पणका..
•
७२७- कामगन्धसे शून्य सर्वथा..
•
७२८- निज-सुख-काम..
•
७२९- श्रीराधा श्रीकृष्ण नित्य..
•
७३०- प्रथम साधना है..
•
७३१- स्यामकी लीला सुखकी..
•
७३२- राधा नहीं चाहतीं निज..
•
७३३- सेवा करती नित प्रियतमकी..
•
७३४- शुद्ध प्रेम श्रीराधाका है..
•
७३५- मेरी उन राधाके शुचितम..
•
७३६- राधारानी देतीं प्रियको..
•
७३७- कृष्णमना, श्रीकृष्ण-मति..
•
७३८- प्रेम जो प्रगट्यौ ब्रज..
•
७३९- अलौकिक राधा-माधव..
•
७४०- अनोखी राधा-माधव..
•
७४१- है अति सुखकर मिलन..
•
७४२- धन-जन-अभिजन..
•
७४३- लज्जा, शील, मोह..
•
७४४- बरसत आनँद-रस..
•
७४५- नित्य नयी क्षमता है..
•
७४६- देह-प्राण-मन-बुद्धि..
•
७४७- राधा-मानस-सिन्धु में..
•
७४८- राधा-गोपी नहीं..
•
७४९- राधाराधन के परम..
•
७५०- सकल सदगुन नित..
•
७५१- वे हैं एकमात्र सब मेरे..
•
७५२- निज सुख-लेश वासनाका..
+
श्रीराधा-कृष्ण-जन्म-महोत्सव एवं जय-गान (७५३ से ८१७)
•
७५३- सर्वातीत, सर्वविरहित, जो..
•
७५४- नव-नीरद-नीलाभ कृष्ण..
•
७५५- जन्म अजन्मा, अविनाशीका..
•
७५६- प्रकट हुए थे धराधाममें..
•
७५७- कंस तमोमयका था..
•
७५८- शुद्ध सच्चिदानन्द परात्पर..
•
७५९- काल हो गया अतिशय..
•
७६०- उदय हो गये जैसे..
•
७६१- कृष्नचंद्र उदय भए..
•
७६२- हरि अवतरे कारागार..
•
७६३- सुन्यौ नँद-घर लाला..
•
७६४- प्रगटे अभिराम स्याम रसिक..
•
७६५- चकित-थकित अपलक..
•
७६६- श्रीराधा माधव, श्रीमाधव..
•
७६७- कीर्ति-कुक्षिकी कीर्ति..
•
७६८- आजु वृषभान भवन..
•
७६९- प्रगटीं अनूप भूप..
•
७७०- प्रगटीं राधा रावलमें..
•
७७१- प्रकट हुईं वृषभानु..
•
७७२- आए मुनि भानु..
•
७७३- सुन्दर सुभग कुँवरि..
•
७७४- रानी कीरति कुँवरी..
•
७७५- जन्मोच्छव राधिका कुँवरि..
•
७७६- हरि-प्रिय-भामिनि..
•
७७७- हृदय आनन्द भर..
•
७७८- स्यामघन दामिनि प्रगट..
•
७७९- सुभ निसान बाजत..
•
७८०- द्वार वृषभानु के आजु..
•
७८१- बज रही गाँव रावलमें..
•
७८२- भानु घर उत्सव..
•
७८३- वह धन्य घड़ी है..
•
७८४- भानुपुर बाजत बिपुल..
•
७८५- जग उठे भाग्य..
•
७८६- अतुल आनन्द भर..
•
७८७- (अब तो) जागे भाग हमारे..
•
७८८- अब जो हरष भयौ..
•
७८९- नन्द-यशोदाके घर..
•
७९०- मंगल बधाइयाँ हो..
•
७९१- सुदंर सुभग कुँवरि..
•
७९२- धन्य-धन्य द्वापर जुग..
•
७९३- धन्य घरी, धनि भादौं..
•
७९४- राधा जाई, आनँद लाई..
•
७९५- प्रेम की मूरति नागर..
•
७९६- जसुमति लै संग नंद..
•
७९७- त्यागमूर्ति श्रीराधा आयीं..
•
७९८- बरसगाँठि बृषभानु-कुँवरि..
•
७९९- बरसगाँठि बृषभानु-कुँवरि..
•
८००- राधाने दे दर्शन सुर..
•
८०१- जय राधे, जय जय..
•
८०२- जय राधे जय श्रीराधे..
•
८०३- बोलो जय राधे, राधे..
•
८०४- रटे जा राधे-राधे..
•
८०५- जय राधे! जय राधे..
•
८०६- बृंदावन-रानी श्रीराधा..
•
८०७- वृषभानु-दुलारी जय..
•
८०८- कृष्णप्रेयसी कान्तागणमें..
•
८०९- जय परमेश्वरि, जयति..
•
८१०- जय जय राधा, रासेश्वरि..
•
८११- जय जय जय राधा अभिराम..
•
८१२- जयति जय श्रीबृषभानु..
•
८१३- जय नँद-नन्दन..
•
८१४- जय वसुदेव-देवकी-नन्दन..
•
८१५- जय नँद-नंदन प्रेम..
•
८१६- देवकी-नन्दनकी जय..
•
८१७- एक लकड़िया चन्दन की..
+
आरतियाँ (८१८ से ८२३)
•
८१८- आरति कीजै श्रीनटवर की..
•
८१९- आरति श्रीवसुदेव-तनय की..
•
८२०- आरति श्रीवृषभानुलली की..
•
८२१- आरति श्रीबृषभानुसुता की..
•
८२२- आरति राधा-राधाबर की..
•
८२३- समुद सुगन्धित सुमन लै..
+
श्रीराम-गुण-गान (८२४ से ८५४)
•
८२४- चित्र-विचित्र मण्डपोंसे..
•
८२५- शौर्य-वीर्य-ऐश्वर्य..
•
८२६- रामचंद्र मुख-मंजु मनोहर..
•
८२७- अतुल अनन्त अचिन्त्य..
•
८२८- मात-पिता-गुरु-भक्ति..
•
८२९- जय श्रीराम, भरत, लक्ष्मण..
•
८३०- सीता-राम, उर्मिला..
•
८३१- मज्जन करि सुभ..
•
८३२- राम-लखन नृप-सुअन..
•
८३३- अति प्रसन्न-मन..
•
८३४- प्रभु! मैं नहिं नाव..
•
८३५- प्रभु बोले मुसुकाई..
•
८३६- मधुर मृदु सुंदर..
•
८३७- लक्ष्मण अनुज सती..
•
८३८- चरन-पादुका नेह..
•
८३९- सहित सहस्र चतुर्दश..
•
८४०- विप्रवेशधारी वैश्वानर..
•
८४१- मधुर सु-सेवासे प्रसन्न..
•
८४२- ओजस्वी सौमित्रि करो..
•
८४३- सीता अति कृस गात..
•
८४४- सीताका कर हरण..
•
८४५- पता लगाकर सीताका खुद..
•
८४६- रिपु रन जीति राम..
•
८४७- नील कमल, नव-नील..
•
८४८- गो-द्विज-रक्षा-हेतु..
•
८४९- पूर्णब्रह्म परात्पर राम..
•
८५०- ध्यानमग्न हनुमान नाचते..
•
८५१- कांचनाद्रि-कमनीय कलेवर..
•
८५२- आरति कीजै श्रीरघुबर की..
•
आरती भगवान् मर्यादापुरुषोत्तम
•
८५३- आरति श्रीजनक-दुलारी की..
•
आरती श्रीजानकीजी
•
८५४- आरति श्रीअंजनि कुमारकी..
•
आरती श्रीअंजनीकुमारकी
+
भगवान् के विविध स्वरूपोंका गुण-गान (८५५ से ९२९)
•
८५५- एक सत्य जो परम तत्त्व..
•
सब नामरूपोंमें एक ही सत्यकी उपासना
•
८५६- एक परम प्रभु चिदानन्दघन..
•
एक ही परम प्रभु पाँच उपास्यरूपोंमें
•
८५७- नीरद श्यामवर्ण अति शोभित..
•
श्रीमहाविष्णु
•
८५८- वज्र-ध्वजा-अंकुश-सरसिजके..
•
भगवान् श्रीविष्णुका मनोहर ध्यान
•
८५९-है जो त्रिगुणातीत..
•
८६०- दिव्य ज्योति-मण्डल..
•
भगवान् विष्णु
•
८६१- लक्ष्मी नारायण स्वयं..
•
संयुक्त लक्ष्मी-नारायण
•
८६२- नील-स्याम अद्भुत..
•
अद्भुत बालक
•
८६३- देते सूर्य-सोम-मण्डलको..
•
सर्वप्रकाशक ज्योतिर्मय भगवान्
•
८६४- जय अनन्त वैभवमयि..
•
वरदायिनी श्रीलक्ष्मीमाता
•
८६५- कमलासन-आसीन देवि..
•
भगवती श्री (महालक्ष्मी) की झाँकी
•
८६६- शक्ति-शक्तिधर श्रीलक्ष्मी..
•
लक्ष्मीनारायण, लक्ष्मी, सरस्वती
•
८६७- एकार्णवकी उस अगाध..
•
एकार्णवमें वटवृक्षपर बाल भगवान्
•
८६८- कहाँ वयस सुकुमार..
•
भगवान् नृसिंहकी प्रह्लादसे क्षमा-प्रार्थना
•
८६९- जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा..
•
पुरीधाममें श्रीजगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्रजीके मंगल-विग्रह
•
८७०- असुरोंने आ किया आक्रमण..
•
धनुष-टंकारसे ज्वाला भड़की
•
८७१- देव-दानवोंने मथा..
•
लक्ष्मीद्वारा श्रीहरिका वरण
•
८७२- हरि सँग समर रत..
•
हरि-हर-युद्ध
•
८७३- परम परात्पर देव..
•
गोलोकाधीश्वर
•
८७४- मथुरामें सानन्द पधारे..
•
कंसकी धनुषशालामें श्रीकृष्णके द्वारा धनुषभंग
•
८७५- ब्राह्मणके गो-धनकी..
•
प्रभास क्षेत्रमें श्रीकृष्णार्जुन मिलन
•
८७६- अज अव्यय अखिलेश..
•
८७७- संजय बोले—‘नृपति!..
•
श्रीकृष्णार्जुनका दिव्य प्रेम
•
८७८- शुद्ध सच्चिदानन्द दिव्य..
•
संधि-दूत-श्रीकृष्ण
•
८७९- बिदुर-घर स्याम..
•
विदुर-घर स्याम पाहुने आये
•
८८०- बढ़ते चले, शूल-मद..
•
भक्तवत्सल भगवान् के द्वारा अश्वोंकी परिचर्या
•
८८१- अज अविनाशी अखिल..
•
कुरुक्षेत्रकी समर-भूमिमें वरदहस्त श्रीकृष्ण
•
८८२- चिन्तन किया श्यामने..
•
सत्यभामाजीके द्वारा नारदजीको श्रीकृष्णका दान
•
८८३- व्याध बिनवत दोऊ..
•
व्याधकी विनय
•
८८४- श्रीमहेशकी अंगकान्ति..
•
भगवान् श्रीशिवका मनोहर ध्यान
•
८८५- नित्य सच्चिदानन्द सदाशिव..
•
ध्यानमय भगवान् शिव
•
८८६- अचल सरल उन्नत..
•
ध्यानस्थ शिव सच्चिदानन्द
•
८८७- वर्ण गौर कर्पूर..
•
पंचमुख परमेश्वर
•
८८८- शुभ कर्पूरगौर तन..
•
जय मृत्युंजय
•
८८९- शंख-गौर पट..
•
जय महेश
•
८९०- ध्यानमग्न शुचि शान्त..
•
भगवान् चन्द्रमौलिसे प्रार्थना
•
८९१- हिमगिरिमें हिमसे आच्छादित..
•
हिमालयमें छिपे भगवान् शंकर
•
८९२- शिव शिव हर हर..
•
शिव-शिव हर-हर जप
•
८९३- अचल अमल अज अनघ..
•
हर हर भज
•
८९४- कालीसे गौरी हुई..
•
शिव-गौरी
•
८९५- हिमगिरि छाइ रहे..
•
श्रीगौरी-शंकर
•
८९६- खुलता नेत्र तीसरा..
•
रुद्रका तीसरा नेत्र खुला
•
८९७- नाचत नटराज रुचिर..
•
नटराजका ताण्डव नृत्य
•
८९८- जय जय शंकर शूल..
•
जय शंकर-गौरी-गणपति
•
८९९- शीश जटा सुरसरि..
•
रुद्रमूर्तिकृत शिवस्तुति-चालीसा
•
९००- अज अनादि अविगत..
•
श्रीशिवचालीसा
•
९०१- आदि अनादि अनंत..
•
श्रीशिवाष्टक
•
९०२- जय जय, अव्यय..
•
नागरीवर्णानुक्रम जययुक्त अष्टोत्तरशिवसहस्रनाम
•
९०३- एकदन्त, गजवदन, चतुर्भुज..
•
भगवान् गणेश और शंकरकी जय-जय
•
९०४- करता तुम्हें प्रणाम..
•
सिद्धिदायक गणनाथ
•
९०५- रक्तवर्ण शुभ, एकदन्त..
•
श्रीसिद्धि-गणराज
•
९०६- जय अष्टादशभुजाधारिणी..
•
जय अष्टादशभुजा दुर्गा
•
९०७- लिएँ हाथ असि..
•
महिषमर्दिनी दशभुजा दुर्गा
•
९०८- दुर्गा दुर्गा रटत ही..
•
दुर्गाकी कृपा
•
९०९- खड्ग परशु, खट्वांग..
•
माता सारिका देवी
•
९१०- भानु-सहस्र-सदृश..
•
संतान-सुंदरी माताकी जय
•
९११- कान्ति धवल कर्पूरकुन्द..
•
श्रीहंसवाहिनी
•
९१२- विद्यादायिनि ‘सरस्वती’..
•
प्रसिद्ध छ: देवी माताओंकी जय
•
९१३- रक्त वर्ण, रक्ताम्बर..
•
जय श्रीललिताम्बा
•
९१४- गौरारुण शुभ वर्ण..
•
भगवती गौरी देवी
•
९१५- जय भव-भामिनि..
•
जगज्जननी अन्नपूर्णा
•
९१६- जय दुर्गे दुर्गतिनाशिनि..
•
जययुक्त श्रीदेवी-अष्टोत्तर-सहस्रनाम [श्रीदेवीजीके १००८ नाम]
•
९१७- कालमेघ-श्यामल..
•
बटुक भैरव
•
९१८- आदिदेव, आदित्य, दिवाकर..
•
भगवान् सूर्य नारायणकी जय
•
९१९- जय जगदीश हरे..
•
आरती—श्रीजगदीश्वर हरि
•
९२०- आरति भक्तकल्पतरु हरि..
•
आरती—श्रीनृसिंहभगवान्
•
९२१- आरति परम साम्ब-शंकर..
•
आरती—भगवान् शंकर
•
९२२- हर हर हर महादेव!..
•
आरती—भगवान् महादेव
•
९२३- आरति गजवदन विनायक..
•
आरती—भगवान् श्रीगणेशजी
•
९२४- जगजननी जय! जय..
•
आरती श्रीदुर्गाजी
•
९२५- आरति श्री गायत्रीजी की..
•
आरती श्रीगायत्रीजी
•
९२६- गायत्री माता, जय गायत्री..
•
आरती श्रीगायत्रीजी—२
•
९२७- आरति अतिपावन पुरान की..
•
श्रीमद्भागवतकी आरती
•
९२८- आरति जग पावन पुरान की..
•
श्रीदेवीभागवतकी आरती
•
९२९- आरति श्रीगैया-मैया की..
•
श्रीगोमाताकी आरती
+
भगवान् का स्वभाव (९३० से ९६०)
•
९३०- मेरे प्रभु हैं कितने सहज..
•
९३१- हरि सम हरि ही..
•
९३२- हरिकों हरि-जन अतिहि..
•
९३३- जिसका कोई नहीं जगतमें..
•
९३४- कैसे अति विचित्र करुणामय..
•
९३५- जो अनन्त ब्रह्माण्डोंके हैं..
•
९३६- साँवरे सदा प्रेमाधीन..
•
९३७- मैं नित भगतन हाथ..
•
९३८- जिसने उनको चाहा..
•
९३९- प्रेम-रस-मधुर भावयुक्त..
•
९४०- प्रियतमकी मधुर स्मृति..
•
९४१- प्रेमी-जनके प्रेमास्पद..
•
९४२- गोपोंके आँगन-कीचड़में..
•
९४३- बरस रही है सबपर..
•
९४४- कृपा कृपामयकी सदा..
•
९४५- भय मत करो..
•
९४६- नित्य-निरन्तर सहज..
•
९४७- जिसने प्रभुसे कहा..
•
९४८- एक बार शरणागत..
•
९४९- जो अनन्त ऐश्वर्य..
•
९५०- सब प्रकारसे मलिन..
•
९५१- जिसको पतित समझकर..
•
९५२- दैन्य-मूर्ति जो प्रभुकी..
•
९५३- भरा हुआ दुस्तर दोषोंसे..
•
९५४- सारे यज्ञ-तपोंके..
•
९५५- घोर असाधु, मलिन-मन..
•
९५६- मृत्युरूप बन तुम..
•
९५७- शब्दोंके मिथ्याडम्बरसे..
•
९५८- भोग रहे हैं सुख-दुख..
•
९५९- प्रियतम प्रभु ऐसे स्नेही हैं..
•
९६०- तू भाइ म्हारो रे..
+
श्रीमद्भगवद्गीताके विविध प्रसंग (९६१ से ९९७)
•
९६१- धर्मभूमि शुचि कुरुक्षेत्रमें..
•
[श्रीमद्भगवद्गीताके प्रथम अध्यायका पद्यानुवाद]
•
९६२- उठो! कायरता छोड़ो वीर..
•
९६३- अपना धर्म देखकर भी..
•
९६४- जो तुम रणसे मुख मोड़ोगे..
•
९६५- विषमस्थलमें उपजा कैसे..
•
९६६- भारत! अब ज्ञानखड्ग लो..
•
९६७- कर्मेन्द्रियाँ रोक जो तजता..
•
९६८- मुझमें चित्त जोड़..
•
९६९- सुर-ऋषि-पितर..
•
९७०- पार्थ! यह काम पापकी..
•
९७१- जाते वहीं कर्मयोगी हैं..
•
९७२- ध्यानमें मन इस भाँति..
•
९७३- सब भूतोंमें स्थित आत्मा..
•
९७४- योगभ्रष्ट पुण्यलोकोंमें जाकर..
•
९७५- जो संलग्न श्रेष्ठ साधनमें..
•
९७६- मायाने है जिन लोगोंका..
•
९७७- बहु-जन्मोंके अन्त जन्ममें..
•
९७८- करता जो भूतोंकी पूजा..
•
९७९- मानव जिसका सदा स्मरण..
•
९८०- जीवनभर जिन भाव..
•
९८१- इससे स्मरण करो तुम..
•
९८२- मन निरुद्धकर हृदय..
•
९८३- नरकोंमें जा पापी सहते..
•
९८४- शुभ्र ज्योतिर्मय सुपथसे..
•
९८५- पुण्यवान सकाम योगी..
•
९८६- मैं ही गति, भर्ता, प्रभु..
•
९८७- वैदिक यज्ञकर्म करते..
•
९८८- कुन्तिपुत्र! जो अन्य..
•
९८९- कर दैवी प्रकृतिका आश्रय..
•
९९०- जिनसे सब प्रकारसे..
•
९९१- हूँ महर्षियोंमें भृगु मैं..
•
९९२- हरिकी दिव्य विभूति..
•
९९३- नागोंमें मैं शेषनाग हूँ..
•
९९४- ऐसी कोई वस्तु नहीं है..
•
९९५- विश्व चराचर निकला..
•
९९६- जिससे जीव सकल..
•
९९७- जय भगवद्गीते, जय भगवद्गीते..
•
श्रीमद्भगवद्गीताकी आरती
+
श्रीभगवन्नाम-महिमा (९९८ से १०२१)
•
९९८- वन्दन नित्य हृदयसे..
•
९९९- जय आनन्द, अमृत..
•
१०००- मधुरन महँ सब तें..
•
१००१- राम राम राम राम..
•
१००२- राम राम राम राम..
•
१००३- नारायण शुभ नाम दिव्य..
•
१००४- करतलसों ताली देत..
•
१००५- मुखसों कहत राम-नाम..
•
१००६- साधन नाम-सम नहिं..
•
१००७- भली है राम-नाम की..
•
१००८- भूल जग के विषयन..
•
१००९- कर मन हरि को ध्यान..
•
१०१०- बन्धुगणो! मिल कहो..
•
१०११- बन्धुगणो! मिल कहो..
•
१०१२- राम राम गाओ संतो..
•
१०१३- राम राम राम भजो..
•
१०१४- प्रेम-मुदित मन से..
•
१०१५- भजौ नित राधा नाम..
•
१०१६- और सब भूल भले ही..
•
१०१७- चाहता जो परम सुख..
•
१०१८- बिनती सुण म्हाँरी..
•
१०१९- नाचत गौर प्रेम अधीर..
•
१०२०- मेरे एक राम-नाम..
•
१०२१- जीभलड़ीने चोखी बाण..
+
प्रबोध-चेतावनी (१०२२ से १०५०)
•
१०२२- अरे मन-मधुप! छोड़..
•
१०२३- अरे मन! भज..
•
१०२४- अरे मन! भज नित..
•
१०२५- अरे मन! भज नव..
•
१०२६- दुरलभ नरदेह पाइ..
•
१०२७- जिस शरीरका, मूर्ख!..
•
१०२८- कहाँ, कहाँ? किस तरफ..
•
१०२९- जो सुख-रूपी जल..
•
१०३०- रक्त-मांस-मल-मूत्र..
•
१०३१- प्रभुसे रहित, विषय-विष..
•
१०३२- भोग विषभरे मधुर..
•
१०३३- क्षणभंगुर प्रत्यक्ष जगत् के..
•
१०३४- नित्य नयी आसक्ति..
•
१०३५- जगमें तेरा कुछ नहीं..
•
१०३६- बृथा क्यौं मानव-जनम..
•
१०३७- अरे, तू क्यों अमूल्य..
•
१०३८- चेत कर नर, चेत कर..
•
१०३९- पल-भर पहले जो कहता..
•
१०४०- तजो रे मन झूठे सुखकी..
•
१०४१- जगतमें स्वारथके..
•
१०४२- मन, कछु वा दिनकी..
•
१०४३- अरे मन, तू कछु..
•
१०४४- अरे मन, कर प्रभुपर..
•
१०४५- मूढ! केहि बलपर..
•
१०४६- छोड मन तू मेरा-मेरा..
•
१०४७- जगतमें कोइ नहिं तेरा..
•
१०४८- इधर उधर क्यों भटक..
•
१०४९- भोग अति दु:ख नरकके..
•
१०५०- देख निज नित्य निकेतन..
+
अभिलाषा (१०५१ से १११९)
•
१०५१- नंद-नँदन श्रीकृष्ण एक..
•
१०५२- एक लालसा मन महँ..
•
१०५३- मौन ग्रहणकर रटूँ निरन्तर..
•
१०५४- मेरे एक राधा नाम अधार..
•
१०५५- काननि सुनौं स्याम की..
•
१०५६- देखा करूँ तुम्हारी लीला..
•
१०५७- लाखों बार तपाये उज्ज्वल..
•
१०५८- नहीं चाहता राज्य चक्रवर्ती..
•
१०५९- प्रियतम! तुमने सहज..
•
१०६०- भरे रहो तुम मधुर मनोहर..
•
१०६१- तन-मन-धन अर्पन कियौ..
•
१०६२- जाहि देखि, चाहत नहीं कछु..
•
१०६३- भरे रहो तुम सदा हृदयमें..
•
१०६४- प्रियतम! भरते रहो नित्य..
•
१०६५- जगमें मरकर, तुममें..
•
१०६६- करें कभी कोई मेरा अति..
•
१०६७- हर्षित होता देख परम..
•
१०६८- मेरे अखिल विश्व-जीवनके..
•
१०६९- बनूँ तुम्हारे शयन-कक्षका..
•
१०७०- मेरी ममता सारी केवल..
•
१०७१- चाह तुम्हारी ही हो प्यारे!..
•
१०७२- अणु-महान् तुम!..
•
१०७३- प्रभो! तुम्हारी सहज..
•
१०७४- स्वामीके शुचि चरण..
•
१०७५- सुख-सम्पतिमें तव..
•
१०७६- हर लो प्रभु! मेरी..
•
१०७७- जड-चेतन—सबमें..
•
१०७८- पूरी हो सर्वत्र सर्वथा..
•
१०७९- डरें नहीं कोई भी मुझसे..
•
१०८०- नहीं मान-धन, कीर्ति..
•
१०८१- नहीं चाहता क्षणभर भी..
•
१०८२- मुझसे कभी किसी..
•
१०८३- दु:ख-मृत्युमें देखूँ मैं..
•
१०८४- शान्ति, दया, स्वाभाविक..
•
१०८५- सबको मिले सुबुद्धि..
•
१०८६- अव्यवस्थित व्यस्त घोर..
•
१०८७- प्रभुकी याद दिलानेवाले..
•
१०८८- सद्विचार हों उदित सर्वदा..
•
१०८९- रहै न रंचक राग-रति..
•
१०९०- बनूँ सदा रोगीकी औषध..
•
१०९१- प्रभुका लीला-मंच..
•
१०९२- चित्त करे प्रभुका चिन्तन..
•
१०९३- करूँ कुछ भी, कहूँ..
•
१०९४- सब अच्छा खायें..
•
१०९५- तुमहि तजि जाऊँ कहाँ..
•
१०९६- बिछुरन-मिलन सरीर..
•
१०९७- स्वागत! स्वागत! आओ..
•
१०९८-सुन्यो तेरो पतित..
•
१०९९- मो कों कछु न चहिये..
•
११००- चहौं बस एक यही..
•
११०१- सनातन-सत-चित..
•
११०२- सकुच भरे अधखिले..
•
११०३- शुद्ध, सच्चिदानंद, सनातन
•
११०४- प्रभु अनन्त आनन्द..
•
११०५- मन बन मधुप हरिपद..
•
११०६- रे मन हरि-सुमिरन..
•
११०७- मनमें चाह जगी थी..
•
११०८- उनके होकर हम दु:खी..
•
११०९- कर लो आत्मसात् तुम..
•
१११०- बिना प्रीति नहिं मिलते..
•
११११- जान गया जो भरी..
•
१११२- दर-दर भटक, नीच मैं..
•
१११३- तव अनन्त आशाका..
•
१११४- ईश-विरोधी धर्म-विरोधी..
•
१११५- नहीं करूँगा कभी किसीका..
•
१११६- माधव! मन नहिं मानत..
•
१११७- दीन बन्धु हे करुणाकर..
•
१११८- सुनावौ कबि! (तुम)..
•
१११९- धन-जन-कविता सुंदरी..
+
अनुभूति (११२० से १२५६)
•
११२०- मेरे परम सुखके..
•
११२१- क्षणभर नहीं छोड़ते मोहन..
•
११२२- जब ते हिये बिराजे..
•
११२३- राधा-माधव बसि रहे..
•
११२४- मेरे द्वारा बोल रहे हैं..
•
११२५- हटते नहीं एक पल..
•
११२६- कर दिया प्रभुने..
•
११२७- सच्ची सुहागिन, मैं दुहागिन..
•
११२८- अन्तरमें हो रहा खेल..
•
११२९- हर वस्तुका आधार जो..
•
११३०- रात-दिवस मन में रहै..
•
११३१- मेरी ‘मति-गति’ के..
•
११३२- बस गया उनके हृदयमें..
•
११३३- नहीं भूलती है कभी..
•
११३४- प्रियके अमिलन-जनित..
•
११३५- मेरे तुम प्रियतम परम..
•
११३६- तन-मन-धन-जीवन..
•
११३७- मिलनेपर भी नहीं मिटेगी..
•
११३८- सभी वस्तुओंमें तुम देते..
•
११३९- रहते सदा पास वे..
•
११४०- मैं देखूँ नित श्यामको..
•
११४१- जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिका..
•
११४२- अति आश्चर्य, बदल दी..
•
११४३- मनकी बात जानता मन है..
•
११४४- तुम छाये आ उरमें..
•
११४५- तेरा मधुर प्रेम..
•
११४६- तुमने जो कहलाया मुझसे..
•
११४७- नाथ! तू सर्वस्व मेरा..
•
११४८- कौन तुम जो साथ..
•
११४९- दिया अचल सुख मुझे..
•
११५०- नहीं कामका रहा, छोड़..
•
११५१- हुआ जबसे मैं तुम्हारा..
•
११५२- जीवनमें मेरे शक्ति..
•
११५३- मनमें, तनमें, बुद्धि..
•
११५४- ‘मेरा’ कुछ भी है..
•
११५५- मेरी जीवन-सरिता-धारा..
•
११५६- मधुर हुआ जीवन सारा..
•
११५७- तुम ही सब दुख..
•
११५८- इस चर-अचर जगतके..
•
११५९- अवनि, अनिल, जल..
•
११६०- तुच्छ नगण्य सलिल..
•
११६१- देख एक तू ही..
•
११६२- इस अखिल विश्वमें..
•
११६३- प्रकृति-पुरुष-परमात्मा..
•
११६४- बाहर-भीतर तुम ही..
•
११६५- सूर्य-सोममें, वायु..
•
११६६- किससे कैसे कब हो..
•
११६७- सबमें मैं ही रम रहा..
•
११६८- मेरा जो कुछ था, सब..
•
११६९-मेरी परम शान्ति..
•
११७०- मैं हूँ दृढ़, मैं सदा साहसी
•
११७१-प्रभु मेरे रहते नित पास..
•
११७२- प्रभुसे प्यारा है न्यारा है..
•
११७३- प्रभु मुझसे जरा भी..
•
११७४- हुआ सच्चिदानन्द एकमें..
•
११७५- ईश्वरकी शुभ दृष्टिका..
•
११७६- देते हैं भगवान सदा..
•
११७७- देख रहा प्रत्यक्ष पूर्ण मैं..
•
११७८- हर स्थितिमें, हर जगह..
•
११७९- मेरे चारों ओर विराजित..
•
११८०- मेरे द्वारा होता जो कुछ..
•
११८१- मेरे मनमें नित प्रविष्ट..
•
११८२- मैं अपने प्यारे ईश्वरका..
•
११८३- मैं कैसा भी हूँ, पर..
•
११८४- मैं प्रभुका, प्रभु मेरे..
•
११८५- हम उनके हैं सदा सर्वथा..
•
११८६- मैं प्रभुका, वे प्रभु हैं मेरे..
•
११८७- मैं रहता हूँ प्रभुमें ही नित..
•
११८८- आज मिल गया मुझे..
•
११८९- रहूँ कहीं कैसे भी..
•
११९०- भगवत्कृपा अलौकिकने कैसे..
•
११९१- नित्य प्रकाशरूप प्रभु रहते..
•
११९२- करुणामयने कर लिया मुझे..
•
११९३- जड शरीर मैं नहीं, दिव्य..
•
११९४- आया, छाया मेरे अंदर..
•
११९५- घेरे हुए मुझे है..
•
११९६- प्रभु मेरे, मैं केवल प्रभुका..
•
११९७- प्रभुकी परम कृपासे मैं..
•
११९८- बसे निरन्तर मेरे अन्तर..
•
११९९- दिनकर उगता, रजनी आती..
•
१२००- प्रेमरूप हरि बस गये..
•
१२०१- सारी ममता सदाको..
•
१२०२- हम उनके, वे सदा हमारे..
•
१२०३- सफल जीवन हो गया, वैराग्यका..
•
१२०४- काहू कौ नहिं दास मैं..
•
१२०५- जीवन-मरण निरोग-रोगकी..
•
१२०६- मेरे अंदर भरी नित्य है..
•
१२०७- जान गया मैं, परम सुहृद..
•
१२०८- राम मेरा बल..
•
१२०९- किसमें पाप-दोष देखूँ मैं..
•
१२१०- प्रभु-प्रसादसे प्रकट हो..
•
१२११- किया कृपा कर प्रभुने..
•
१२१२- ममता एकमात्र प्रभु..
•
१२१३- हम उनके ही, केवल..
•
१२१४- छाये मधुर-मधुर वे..
•
१२१५- प्रभुकी अनुकम्पा परम..
•
१२१६- कभी विलग होते न..
•
१२१७- मिले मधुर मुझको..
•
१२१८- करना, न करना, न कराना..
•
१२१९- इस जगकी कोई वस्तु..
•
१२२०- मेरे मंगलमय रसमय प्रभु..
•
१२२१- जायें कहीं, मिलें, न मिलें वे..
•
१२२२- मिटे सभी संकल्प..
•
१२२३- बँधा, बँधा, मैं सदा..
•
१२२४- बड़भागी है वही..
•
१२२५- क्रोध, कपट, भय..
•
१२२६- बीत रहा है मेरा पल..
•
१२२७- रहूँ भले यात्रामें..
•
१२२८- हटा मोहका पर्दा गहरा..
•
१२२९- टूट गये जगके..
•
१२३०- मिट गये भ्रम-भय..
•
१२३१- तुम्हीं सदा सुखरूप..
•
१२३२- जीवन-मरण, दु:ख-सुख..
•
१२३३- कभी तुम बन सुखमय..
•
१२३४- प्रियतम! न छिप सकोगे..
•
१२३५- ज्यों-ज्यों मैं पीछे हटता..
•
१२३६- भला किया प्रभु!..
•
१२३७- परम प्रिय मेरे प्राणाधार!..
•
१२३८- दारुण अशान्तिकी आग..
•
१२३९- सौंप दिये मन-प्राण..
•
१२४०- छीनकर सहज सभी संसार..
•
१२४१- दु:ख-सुख सारे..
•
१२४२- प्राणि-पदार्थ किसीपर भी..
•
१२४३- प्राणनाथ! तुम्हारे बिना..
•
१२४४- भर गया मेरे हृदयमें..
•
१२४५- नाथ! तुम्हारी कृपा अहैतुक..
•
१२४६- नाथ! तुम्हारी कितनी..
•
१२४७- होता नहीं कभी चंचल..
•
१२४८- जगमें सुख-दुख..
•
१२४९- आओ सब मिल..
•
१२५०- तुम्हारा नाथ! अनोखा प्यार..
•
१२५१- नीच नराधम होनेपर भी..
•
१२५२- पुत्र-शोक-संतप्त..
•
१२५३- भीषण तम-परिपूर्ण..
•
१२५४- देख दु:खका वेष धरे..
•
१२५५- मृत्यु! भयानक आयी..
•
१२५६- हैं भरे भगवान मुझमें..
+
व्यवहार-परमार्थ (१२५७ से १५०३)
•
भगवान् की सर्वव्यापकता
•
१२५७- अनोखा अभिनय यह संसार..
•
१२५८- सकल जग हरि कौ..
•
१२५९- विश्व-वाटिकाकी प्रति..
•
१२६०- वे हरि सब में बसि रहे..
•
१२६१- ब्राह्मण-श्वपच, देवता..
•
१२६२- मानव-दानव-गाय..
•
१२६३- ईश्वरमें हैं नहीं कभी..
•
१२६४-सकल विश्वमें रम रहे..
•
१२६५- जगतीमें यह जो कुछ..
•
१२६६- सर्वसमर्थ, सर्वके प्रेरक..
•
१२६७- हर पदार्थमें देखो हरिको..
•
१२६८- रहो सदा पर-हित..
•
१२६९- माता-पिता-सुसेवकके..
•
१२७०- जो नित सबमें देखता..
•
१२७१- नभ, अनिल, अनल..
•
१२७२- एक ‘उपास्य’ देव ही..
•
१२७३- निर्गुण-निराकार हैं वे..
•
१२७४- विश्वचराचरमें जो छाये..
•
१२७५- ब्रह्म सगुण-निर्गुण..
•
१२७६- दु:खालय अनित्य दारुण..
•
१२७७- तनकी रक्षा करने..
•
१२७८- जाग रहे तुम कौन..
•
१२७९- कितने तुम अनुपम..
•
१२८०- स्तुति निन्दा, पूजा-घृणा..
•
१२८१- है प्रत्येक अभाव-दशामें..
•
१२८२- लाभ-हानि, सुख-दु:ख..
•
१२८३- मत निराश हो..
•
१२८४- अमावास्या घोर तममयी..
•
१२८५- नित्य जो भगवानकी..
•
१२८६- मायाके प्रवाहमें पड़कर..
•
१२८७- मानव-जीवनमें कटुता..
•
१२८८- जानता हूँ पाप है..
•
१२८९- तुम ही मेरी हो धन-दौलत..
•
१२९०- सहज सुहृद, अतिशय..
•
१२९१- नित्य दयामय, मंगलमय..
•
१२९२- सदा प्रसन्न रहो..
•
१२९३- तुम सुखी रहो..
•
१२९४- सुखी रहो, नित शान्त..
•
१२९५- बसें तुम्हारे हृदय..
•
१२९६- हो रहो उसके..
•
१२९७- भजहिं भावजुत जे सदा..
•
१२९८- अर्पण कर दो रामको..
•
१२९९- मनसे नित चिन्तन....
•
१३००- बरस रही प्रभु-कृपा
•
१३०१- जो कुछ खाओ..
•
१३०२- जिसने देखा कभी हृदय..
•
१३०३- करत नहिं क्यों प्रभु..
•
१३०४- जन्म-मरणके दु:ख..
•
१३०५- अगर चाहते परम शान्ति..
•
१३०६- सेवा करो जगतकी..
•
१३०७- अपने भले-बुरेका..
•
१३०८- प्रकृति-जगतके भोग..
•
१३०९- प्राकृत जगत्, प्रकृति..
•
१३१०- जग की छोड़े आस..
•
१३११- सकल चराचर विश्वमें..
•
१३१२- धर्म करता है चित्त..
•
१३१३- काम-क्रोध, लोभ..
•
१३१४- एकमात्र प्रभुकी सेवा..
•
१३१५- सबमें समझो एक..
•
१३१६- धन-ऐश्वर्य, सफलता..
•
१३१७- हरि-पद-पदुम..
•
१३१८- धर्म मूल पावन..
•
१३१९- नहिं ममता, नहिं कामना..
•
१३२०- पिता तीर्थ है, जननि..
•
१३२१- निज सुखकी परवाह..
•
१३२२- मुख, बाहू, जङ्घा..
•
१३२३- सत्य वचन हितकर..
•
१३२४- वैश्य जो न्याय..
•
१३२५- व्रत-उपवास-नियम..
•
१३२६- पुत्र सुपुत्र वही जो..
•
१३२७- पति-सेवाको मानती..
•
१३२८- समझकर पत्नीको अर्धांग..
•
१३२९- भारतीय नर-नारी..
•
१३३०- जिनसे जगती विषय-वासना..
•
१३३१- सर्व-शिरोमणि विश्व-सभाके..
•
१३३२- संत महा गुन-खानी..
•
१३३३- गुरु यथार्थमें वही..
•
१३३४- जिसका मन है अमल..
•
१३३५- रह न गया जिसमें..
•
१३३६- हरिने आदर दिया जिसे..
•
१३३७- ईश्वर नित्य प्रसन्न-वदन हैं..
•
१३३८- यद्यपि तूने किये अनेकों..
•
१३३९- स्तुति-निन्दा, सुख-दु:ख..
•
१३४०- ‘योग-विभूति-सिद्धि’
•
१३४१- जड-चेतन सबमें..
•
१३४२- प्रभु-सेवामें ‘अहं’ समर्पित..
•
१३४३- जगमें जो कुछ भी है..
•
१३४४- द्वेष-रहित, जो मित्र..
•
१३४५- काम-क्रोध-लोभ..
•
१३४६- दम्भ-मान-मद..
•
१३४७- पर-निंदा मिथ्या करि..
•
१३४८- जिनके परस-दरस..
•
१३४९- नहीं जरा भी जिनमें..
•
१३५०- नित्य ‘ज्ञानमय’, ‘नित्य ज्ञान’..
•
१३५१- मिलता नहीं बिना हरिकी..
•
१३५२- सुख-दु:खोंसे रहित..
•
१३५३- निर्गुण-निराकारके साधक..
•
१३५४- मानवका है चरम परम..
•
१३५५- मानव वह जो करता है..
•
१३५६- माता, पिता, देव..
•
१३५७- पाता है जो जीवनमें..
•
१३५८- मानव-जीवनका है पावन..
•
१३५९- मानव-जीवन मूल्यवान..
•
१३६०- श्रेय परम मानव-जीवनका..
•
१३६१- भोग अनित्य, अपूर्ण सदा हैं..
•
१३६२- इन्द्रियके सब भोग विविध..
•
१३६३- चाहे हों कितने ही..
•
१३६४- मन मति सात्त्विक रहे..
•
१३६५- जबतक यह आस्था है..
•
१३६६- दुर्लभ मानव-तन मिला..
•
१३६७- विश्व-चराचरमें है व्यापक..
•
१३६८- जन्म-मरणके चक्र घोरका..
•
१३६९- मानव! मानवता धारण कर..
•
१३७०- मानव आज बन गया दानव..
•
१३७१-भय, व्याकुलता, क्रोध..
•
१३७२- प्राणिमात्रमें बस रहे..
•
१३७३- घोर अविद्या, जो मानवको..
•
१३७४- राष्ट्रोंमें हो प्रेम परस्पर..
•
१३७५- सबके प्रभु! सर्वान्तर्यामी!..
•
१३७६- द्वेष-अमर्ष-वैर-हिंसा..
•
१३७७- देवाराधन करें-करायें..
•
१३७८- सत्य, अहिंसा, सेवा..
•
१३७९- सत्य-धर्म-रत..
•
१३८०- गाली सुनकर भी..
•
१३८१- दु:ख पराया जिसका..
•
१३८२- मन वशमें हो, इन्द्रिय..
•
१३८३- विजयी वही, स्वतन्त्र वही..
•
१३८४- जिसके मन बसते सदा..
•
१३८५- पर-दुख को निज..
•
१३८६- सब बिधि सौं सेवा..
•
१३८७- देश मैं है, देश मैं..
•
१३८८- जबतक भोगोंकी खोज..
•
१३८९- पर-सुखमें दुख, पर..
•
१३९०- जिनसे तृष्णा-कामना..
•
१३९१- जिनका हो परिणाम..
•
१३९२- धन, जन, पद..
•
१३९३- सावधान रह, रहो देखते..
•
१३९४- राह पड़े सूखे तृणसे..
•
१३९५- राग, काम, मद..
•
१३९६- वर्ण-जाति, धन-जन..
•
१३९७- संयम-नियम-पूर्ण..
•
१३९८- प्राणिमात्रसे द्वेषरहित रह..
•
१३९९- अहित, असत्य, व्यर्थ..
•
१४००- मन-इन्द्रिय-शरीर..
•
१४०१- तन-इन्द्रियको वशमें..
•
१४०२- मनको वश कर..
•
१४०३- मन-इन्द्रियको वशमें..
•
१४०४- पर हितको निज अहित..
•
१४०५- भजन-धनको छोड़कर..
•
१४०६- प्रेम-भजन ही असली..
•
१४०७- छिन-छिन हरि-सुमिरन..
•
१४०८- जो तू चाहे शान्ति-सुख..
•
१४०९- विषय-बासना तममयी..
•
१४१०- करते रहो निरन्तर प्रतिदिन..
•
१४११- भगवच्चिन्तन, सत्-चिन्तन..
•
१४१२- जगत में कीजै यों ब्यवहार..
•
१४१३- पुत्र पितामें देखे ईश्वर..
•
१४१४- जीव चराचरमें बसे..
•
१४१५- भगवानने दी जो परिस्थिति..
•
१४१६- सत्ता कभी न ‘असत्’..
•
१४१७- इह-पर दोनों लोकमें..
•
१४१८- रखो मत आसक्ति कर्ममें..
•
१४१९- सबका नित आदर करो..
•
१४२०- हित-मित-सत्य-मधुर..
•
१४२१- तन-मन-धन सौं कीजिये..
•
१४२२- दया देखती नहीं जाति..
•
१४२३- परम श्रेष्ठ जन समुद..
•
१४२४- देखो दु:खी-दीन..
•
१४२५- सत्य-धर्मसे अल्प भी..
•
१४२६- सबमें देखो निज आत्माको..
•
१४२७- जो निर्भर करता प्रभुपर..
•
१४२८- जीवनके सर्वोत्तम काम..
•
१४२९- मन सत-संगति नित..
•
१४३०- जिनसे बढ़े तमोगुण तमकर..
•
१४३१- दुर्जन-संग कबहुँ..
•
१४३२- कभी न चाहो, किसी..
•
१४३३- जो कुछ मिला, मिल..
•
१४३४- जो कुछ भी है मिला तुम्हें..
•
१४३५- जो कुछ है, मिलता है..
•
१४३६- वस्तुमात्र जो तुम्हें मिली..
•
१४३७- मिले तुम्हें जो तन-मन..
•
१४३८- भूखे जनको अन्न-दान..
•
१४३९- डरे हुएको अभय-दान..
•
१४४०- जहाँ ‘घृणा-संदेह’ भरे हैं..
•
१४४१- वैरीको दो क्षमा..
•
१४४२- भूलो—हुआ कभी जो..
•
१४४३- विपद-पड़े असहाय दीनका..
•
१४४४- कभी परायी वस्तुपर मत..
•
१४४५- सबको शुभ संकेत सदा..
•
१४४६- नित करो भला ही सब..
•
१४४७- दया करो तुम जीवमात्रपर..
•
१४४८- दु:ख-अहित-उद्वेगकर..
•
१४४९- रक्षा करो पराधिकारकी..
•
१४५०- करो सत्य व्यवहार..
•
१४५१- सुखियोंका सुख है..
•
१४५२- मत हँसो, किसीको गिरते..
•
१४५३- करो न पर-दोषोंका..
•
१४५४- मत देखो, किसके अंदर..
•
१४५५- देखो अपने दोष..
•
१४५६- देखो नहीं, करो मत..
•
१४५७- उत्तम वह जो पर-दोषोंको..
•
१४५८- है सौभाग्यवान पुण्यात्मा..
•
१४५९- जैसा बीज, बहुत-से होते..
•
१४६०- अपने लिये चाहते सबसे..
•
१४६१- शुद्ध कमाई अपने श्रमकी..
•
१४६२- धनका साधन, प्राप्ति..
•
१४६३- कर प्रमाद मत बनो आलसी..
•
१४६४- धनासक्त मानवमें होते..
•
१४६५- सुर-ऋषि-पितर-मनुज..
•
१४६६- जीवन, तन, मन, वचन..
•
१४६७- कबतक फँसे रहोगे..
•
१४६८- राखै अपुने कौं सदा..
•
१४६९- मिला हुआ जो न्यायोपार्जित..
•
१४७०- मांस, मद्य, अंडे, अशुचि..
•
१४७१- मानव, पशु, पक्षी, लता..
•
१४७२- कभी न करो किसी भी..
•
१४७३- जैसे कर्म किये जीवनभर..
•
१४७४- मृत्यु-समयकी अनुपम सेवा..
•
१४७५- भूत-प्रेतकी पूजा करता..
•
१४७६- काम-लोभ-बस कोप..
•
१४७७- पापका धन सदा रह..
•
१४७८- क्रोध है बहुत बड़ा..
•
१४७९- मित्रोंको नहिं दोष..
•
१४८०- नाम-रूपका बना हुआ है..
•
१४८१- जिसमें नहीं विनय..
•
१४८२- हो शरीर सेवा-संयममय..
•
१४८३- अस्थि-चर्म-मात्र..
•
१४८४- पहले ‘मैं’, फिर ‘मेरी पार्टी’..
•
१४८५- देश-धर्मको भूले..
•
१४८६- धर्महीन जीवन पशु..
•
१४८७- काम-भोग-पर केवल..
•
१४८८- महापुरुष, योगी बने..
•
१४८९- दु:खोंसे है भरा हुआ..
•
१४९०- जिस मानव-शरीरमें होते..
•
१४९१- जबसे बना हमारे जीवनका..
•
१४९२- लक्ष्य भूल मानव जीवनका..
•
१४९३- सत्य ढक गया है अब तमसे..
•
१४९४- ‘जीवन ऊँचे स्तर’ का हो..
•
१४९५- है सब जीवोंमें एक आत्मचैतन्य..
•
१४९६- हुए विदेशी हम स्वदेशमें..
•
१४९७- (निज) देशमें ही आज..
•
१४९८- नभमें शब्द भर रहे सारे..
•
१४९९- मानवके हैं प्राण-आत्मा..
•
१५००- दम्भ-मान-मदयुक्त..
•
१५०१- धन-दौलत, अधिकार..
•
१५०२- धरकर वेश त्यागियोंका..
•
१५०३- हो गया उनका..
+
प्रकीर्ण (१५०४ से १५६५)
•
१५०४- नेहभरी श्रीनेहलता!..
•
एक प्रेमी सज्जनको सलाह
•
१५०५- जबहि तें मोहन दृष्टि परॺो..
•
प्रेमावस्था
•
१५०६- मिले पै मन की नहीं..
•
१५०७- प्रेम-सिरोमनि, प्रेम-मनि..
•
१५०८- महाभाव-रसराजके मधुर..
•
१५०९- निज तन-मन जिनके..
•
१५१०- ठाढ़ी जसुमति मातु निज..
•
१५११- विश्व-पावनी बाराणसिमें संत..
•
ब्राह्मण और बिच्छूकी कथा
•
१५१२- फैल गयी यह ख्याति..
•
मालिकका दान
•
१५१३- वृन्दावन यमुना-तट बैठे..
•
पारस
•
१५१४- धन्य कपोत-कपोती दंपति..
•
अतिथि-सेवा
•
१५१५- क्षुधा-क्षुब्ध अति व्याधको..
•
अतिथि-सेवक-कपोतका बलिदान
•
१५१६- गौतम अति कृतघ्न पापी..
•
राजधर्माका विलक्षण मित्र-धर्म
•
१५१७- सुनकर सिंह-गर्जना हरिणीने..
•
मोहकी महिमा
•
१५१८- गाते भगवन्नाम निरन्तर..
•
नाम-गान-परायण श्रीनारद
•
१५१९- नित्य निरन्तर करते रहते..
•
१५२०- भक्त-कीर्तनाचार्य-मुकुटमणि..
•
१५२१- दु:ख-नाश, सुख लाभ..
•
ध्रुवको माताका उपदेश
•
१५२२- राम-नाम जपनेवालोंको..
•
अग्निमें बैठे हुए प्रह्लादकी उक्ति
•
१५२३- त्याग-तपस्या-क्षमामय..
•
महर्षि वसिष्ठ
•
१५२४- भेदरहित सम, ब्रह्मद्रष्टा..
•
विरक्त भक्त श्रीशुकदेव
•
१५२५- शीत-उष्ण, सुख-दु:ख..
•
द्वन्द्वातीत जडभरत
•
१५२६- विधिवत् अग्नि-स्थापना..
•
शरभंग मुनिका ब्रह्मधाम-प्रयाण
•
१५२७- खेलत गुल्ली कुएँ गिरी..
•
गुरु द्रोण और कौरव-पाण्डव बालक
•
१५२८- बान-वेध-कौसल..
•
अनोखी गुरु-दक्षिणा
•
१५२९- विप्र याजके द्वारा सुरसरि..
•
द्रौपदीकी यज्ञसे उत्पत्ति
•
१५३०- सुर-अप्सरा उर्वशीने..
•
अर्जुनका विशुद्ध आचरण और उर्वशीका शापरूप वरदान
•
१५३१- राजा श्वेत हुए अति..
•
अन्न-दान न करनेसे दुर्गति
•
१५३२- भक्ति की महिमा अतुल अपार..
•
भक्तिकी महिमा
•
१५३३- जिनका चित्त लगा श्रीहरिमें..
•
यमराजका दूतोंके प्रति आदेश
•
१५३४- आत्मसमर्पण आत्मविसर्जन..
•
पतिप्राणा सतियोंकी जय
•
१५३५- करके त्याग अन्न-जल..
•
वैष्णवाग्रॺ श्रीरघुनाथदास गोस्वामी
•
१५३६- हरि-हर विधि, शशि-सूर्य..
•
गोमाताके अंग-अंगमें देवताओंका निवास
•
१५३७- गो-हत्या होगी नहीं..
•
गोवध सर्वथा बंद हो
•
१५३८- जिस गोमाताके रक्षण..
•
गोमाताके लिये प्रार्थना
•
१५३९- भगवन्! ऐसी सन्मति दो..
•
१५४०- गौ भारतका प्राण है..
•
गोरक्षाकी महिमा
•
१५४१- हे भगवान! हे भगवान..
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बालककी दैनिक प्रार्थना
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१५४२- मैया! मैं अब खूब पढ़ूँगा..
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बालकका मनोरथ
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१५४३- ‘मैया! कितने अपराध..
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माँका दुलार
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१५४४- साधन-हीन, मलीन-मन..
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समर्पण
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१५४५- जा प्रभु के पद-पदुम..
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१५४६- पाप-वासना भर मनमें..
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धर्म-मार्गसे डिगानेकी चेष्टाका कुपरिणाम
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१५४७- एक ब्रह्म है व्यापक..
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चीन-दमनकी साधना और सिद्धि
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१५४८- ज्ञान-योग-वैराग्य..
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कल्याण-भावना
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१५४९- श्रीराधा-माधव हम सबका
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दीपमालिकाका वन्दन
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१५५०- दीप-ज्योति जाग्रत् कर..
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१५५१- पुत्रि! समर्पित जीवन..
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शुभाशंसा
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१५५२- पावन सुख-सम्पन्नता..
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१५५३- दीर्घ आयु, आरोग्य..
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१५५४- सदाचार-सुविचार हों..
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१५५५- मंगलमय जीवन रहे..
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१५५६- सात्त्विक सुख-समृद्धि..
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१५५७- श्वेतद्वीपमें जा नारदने..
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१५५८- दीपावलिकी दीपज्योतिसे..
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१५५९- तुमने ही प्रभु! आत्मरूपसे..
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१५६०- डरपो मत प्रभुजीको..
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१५६१- आवो आवोजी सगाजी..
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१५६२- श्रीराम भजे सब म्हारे..
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१५६३- अभ्युदय हो सभीका..
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१५६४- शक्ति-प्रेरणा-स्फुरणा..
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स्वात्म-समर्पण
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१५६५- प्रेरक तुम, प्रेरणा तुम्हारी..
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‘पद-रत्नाकर’ पर सम्माननीय विद्वानोंके विचार
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परम आदरणीय श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, झूँसी (प्रयाग)
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पूज्य श्रीडोंगरेजी महाराज
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प्रभुपाद प्राणकिशोर गोस्वामी
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याज्ञिक सम्राट् पं० श्रीवेणीरामजी शर्मा गौड, वेदाचार्य, काव्यतीर्थ, वाराणसी
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डॉ० विजयेन्द्र स्नातक, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
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डॉ० रामकुमार वर्मा, भू० पू० हिंदी-प्रोफेसर, मास्को, (सोवियत-संघ) प्रयाग
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व्रज साहित्यके मर्मज्ञ डॉ० प्रभुदयाल मीतल, मथुरा
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अंतिम पृष्ठ
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सम्बंधित ई-पुस्तकें
सुख-शान्ति का मार्ग
परमार्थ की मन्दाकिनी
दिव्य सुख की सरिता
समाज सुधार
दीन-दु:खियों के प्रति कर्तव्य
श्रीरामचरितमानस (सटीक)
सुन्दरकाण्ड (सटीक)
गीता चिन्तन
सुखी बननेके उपाय
प्रार्थना
श्रीराधा माधव चिन्तन
साधन पथ
अमृत कण
श्री भगवन्नाम-चिन्तन
दाम्पत्य जीवन का आदर्श
ब्रह्मचर्य
श्रीराधा माधव रस सुधा (षोडश गीत)
सत्संग के बिखरे मोती
मानव जीवन का लक्ष्य
महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
तुलसी दल
संत वाणी
मन को वश करने के कुछ उपाय
श्रीभगवन्नाम
श्री राम चिन्तन
दैनिक कल्याण सूत्र
गोपी प्रेम
भगवच्चर्चा (सभी छहों भाग एक साथ)
गो सेवा के चमत्कार
नैवेद्य
उपनिषदों के चौदह रत्न
प्रेम दर्शन (नारद भक्ति सूत्र की व्...
ईश्वर की सत्ता और महत्ता
स्त्री धर्म प्रश्नोत्तरी
सत्संग सुधा
पूर्ण समर्पण
नारी शिक्षा
साधकों का सहारा
भवरोग की रामबाण दवा
दु:ख क्यों होते हैं?
भगवान् सदा तुम्हारे साथ हैं
दु:ख में भगवत्कृपा
भगवच्चर्चा
कल्याण कुंज
भगवत्प्राप्ति एवं हिंदू संस्कृति
महाभाव कल्लोलिनी
कल्याणकारी आचरण
मधुर
विवाह में दहेज
शान्ति कैसे मिले?
सिनेमा – मनोरञ्जन या विनाश का साधन
व्यवहार और परमार्थ
मानव धर्म
लोक परलोक का सुधार
दिव्य सन्देश
सुखी बनो
गोवध भारत का कलंक
आनन्द की लहरें
मानव कल्याण के साधन
सफलता के शिखर की सीढ़ियाँ
आनन्द का स्वरूप
भगवान् की पूजा के पुष्प
वर्तमान शिक्षा
भगवच्चर्चा (भाग-५)
सुख-शान्ति का मार्ग
परमार्थ की मन्दाकिनी
दिव्य सुख की सरिता
समाज सुधार
दीन-दु:खियों के प्रति कर्तव्य
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