॥ श्रीहरि:॥

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पद रत्नाकर

श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

हिन्दी/संस्कृत

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    ‘पद-रत्नाकर’ की वर्णानुक्रमणिका
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    वन्दना एवं प्रार्थना (१ से १५२)
    • १- दोउ चकोर, दोउ चंद्रमा..
    • २- मन्मथ-मन्मथ मन..
    • ३- जिनका शुचि सौन्दर्य..
    • ४- दुर्लभ परम त्यागमय..
    • ५- श्रीराधारानी-चरन..
    • ६-बंदौं श्रीराधा..
    • ७- श्रीराधारानी-चरन..
    • ८- बंदौं राधा-पद..
    • ९- रसिक स्याम की..
    • १०- बंदौं राधा-पद-रज..
    • ११- जिन लक्ष्मीकी रूप..
    • १२- जिन श्रीराधा के..
    • १३- स्वामिनी हे बृषभानु..
    • १४- श्रीराधा! अब देहु..
    • १५- करौ कृपा श्रीराधिका..
    • १६- दयामयि स्वामिनि परम..
    • १७- राधाजू! मोपै आजु..
    • १८- निन्द्य-नीच, पामर परम..
    • १९- हे राधे! हे श्याम..
    • २०- स्याम-स्वामिनी राधिके!..
    • २१-श्रीराधा! कृष्णप्रिया!..
    • २२- श्रीराधामाधव-युगल..
    • २३-कृपा जो राधा..
    • २४- राधा-नयन..
    • २५- जय वसुदेव-देवकीनन्दन..
    • २६- जयति राधिकाजीवन..
    • २७- हे परिपूर्ण ब्रह्म!..
    • २८- सत्-चित्-घन..
    • २९- माधव! नित मोहि..
    • ३०- माधव! मुझको भी..
    • ३१- रसस्वरूप श्रीकृष्ण परात्पर..
    • ३२- सोभित सिर सिखिपिच्छ..
    • ३३- राधा-माधव-पद..
    • ३४- महाभाव-रसराज स्वयं..
    • ३५- राधा-माधव-जुगल..
    • ३६- हमारे जीवन लाड़िलि..
    • ३७- बंदौं मधुर लाड़िलि..
    • ३८- श्रीराधामाधव कर हमपर..
    • ३९- मोहन-मन-धन-हारिणी..
    • ४०- श्यामा-श्याम युगल..
    • ४१- श्रीराधामाधव जुगल दिब्य..
    • ४२- हे राधा-माधव! तुम..
    • ४३- श्रीराधा-माधव! यह..
    • ४४- बसा रहे मन-मधुप..
    • ४५- श्रीराधा-माधव-जुगल!..
    • ४६- शुद्ध सच्चिदानन्द सनातन
    • ४७- बंदौं गोपी-जन-हृदय..
    • ४८- श्री ‘ललिता’ लावण्य..
    • ४९- ब्रह्म, ब्रह्मकी शक्ति..
    • ५०- बंदौं हरि-पद-पंकज..
    • ५१. शोभित चारों भुजा सुदर्शन..
    • ५२- नारायणं हृषीकेशं गोविन्दं..
    • ५३- श्रीगनपति गुरु सारदा..
    • ५४- वन्दौं विष्णु विश्वाधार..
    • ५५- परम गुरु राम..
    • ५६- जयति देव, जयति..
    • ५७- अर्पण मेरे हैं..
    • ५८- मोपै गिरिधर! कृपा..
    • ५९- प्रियतम! बनकर आओ
    • ६०- दिन-रजनी, तरु-लता..
    • ६१- करो प्रभु! ऐसी..
    • ६२- आते हो तुम बार-बार..
    • ६३- बिना याचनाके ही..
    • ६४- बन जाओ तुम मेरे..
    • ६५- प्रभो! मिटा दो मेरा..
    • ६६- करुणामय! उदार चूड़ामणि!..
    • ६७- सबमें सब देखें निज..
    • ६८- केवल तुम्हें पुकारूँ..
    • ६९- कहाँ तुच्छ सब..
    • ७०- मेरी शक्ति थक गयी..
    • ७१- जो चाहो तुम, जैसे..
    • ७२- ‘भोगोंमें सुख है’..
    • ७३. हमें ऐसा बल दो..
    • ७४- कैसैं बिनय सुनावौं..
    • ७५- अब मोहि एक भरोसौ..
    • ७६- करौ, प्रभु! ऐसी कृपा..
    • ७७- मुझे प्रभु! दो वह..
    • ७८- दयामय! मोहि दासता..
    • ७९- हे मेरे! तुम, प्राण..
    • ८०- हौं हरिदास-दास कौ..
    • ८१- जला दो उर मेरे..
    • ८२- हमें प्रभु! दो ऐसा..
    • ८३- प्रभु! तुम अपनौ बिरद..
    • ८४- प्रभु! मोहि देउ साँचौ..
    • ८५- छुड़ा दो विषयोंका..
    • ८६- माधव! मो सम कौन..
    • ८७- प्रभो! कृपा कर मुझे..
    • ८८- प्रभो! यह कैसा..
    • ८९- मैं शरण आ पड़ा..
    • ९०- हे यन्त्री! तुम मुझे..
    • ९१- हरो अभिमान, मिटा दो..
    • ९२- हो परमबन्धु तुम पतितोंके..
    • ९३- हर लो हरि! सुख..
    • ९४- विपदा है करुणाभा..
    • ९५- तोड़-फोड़कर मुझे..
    • ९६- किया नहीं मैंने सहर्ष..
    • ९७- दु:ख दूर मत करो..
    • ९८- आर्त-त्राण-परायण..
    • ९९- क्षुद्र स्वार्थका नाश..
    • १००- जबतक जगमें रहते..
    • १०१- किसी कामका नहीं..
    • १०२- ‘भक्त’ नाम लगता..
    • १०३- भेड़िया ओढ़ भेड़..
    • १०४- नहीं नापाक, नालायक..
    • १०५- दीनबन्धु! करुणा-वरुणालय!..
    • १०६- नाथ! हौं केहि बिधि..
    • १०७- नाथ! हौं निपट निरंकुस..
    • १०८- मेरे मनके धन तुम ही..
    • १०९- को अपराधी मो सम..
    • ११०- नीच मैं मूढ़ दोष..
    • १११- मलिन यह मन-मन्दिर..
    • ११२- जनम सब बीत्यौ अघ..
    • ११३- नहीं गर्भगृह ऐसा, जिसमें..
    • ११४- मैंने कभी न चाहा..
    • ११५- तुमने दिया सदा ही..
    • ११६- सर्वरहित, एकाकी वनमें..
    • ११७- कोई कहते ‘संत’ मुझे
    • ११८- किया न मैंने भूलकर..
    • ११९- क्रोध-मोह-मद..
    • १२०- मानव-जन्म सुदुर्लभ..
    • १२१- मेरे अघका पार नहीं..
    • १२२- कैसे लूँ मैं नाम तुम्हारा..
    • १२३- गुनाहोंसे भरी है यह..
    • १२४- भरा अमित दोषोंसे..
    • १२५- परम सत्य जो नित्य..
    • १२६- जीवनको संगीत बना..
    • १२७- कर प्रणाम तेरे चरणोंमें..
    • १२८- अब हरि! एक भरोसो..
    • १२९- प्रभु! तुम अपनो बिरद..
    • १३०- नाथ मैं थारो जी..
    • १३१- नाथ! थाँरै सरणै आयो..
    • १३२- नाथ! थाँरै सरण..
    • १३३- नाथ! मनें अबकी बार..
    • १३४- अब कित जाऊँ जी!..
    • १३५- हे दयामय! दीनबन्धो!..
    • १३६- दीनबन्धो! कृपासिन्धो!..
    • १३७- प्रभु! मेरो मन ऐसो..
    • १३८- हुआ अब मैं कृतार्थ..
    • १३९- नाथ! अब कैसे हो..
    • १४०- खड़ा अपराधी प्रभु..
    • १४१- होगा कब वह सुदिन
    • १४२- बना दो विमल-बुद्धि..
    • १४३- बना दो बुद्धिहीन..
    • १४४- नाथ अब लीजै मोहि..
    • १४५- हे निर्गुण! हे सर्वगुणाश्रय!..
    • १४६- हे नाथ! तुम्हीं सबके..
    • १४७- हे स्वामी! अनन्य..
    • १४८- पतित नहीं जो होते..
    • १४९- प्रभु तव चरन..
    • १५०- आयौ चरन तकि..
    • १५१- बहु जुग बहुत जोनि..
    • १५२- मोहन! राखु पद..
  • +
    श्रीराधा-माधव-स्वरूप-माधुरी (१५३ से २०३)
    • १५३- सुमन-समूह, मनोहर..
    • १५४- कर नवनीत लियें..
    • १५५- कृष्ण-अंग-लावण्य..
    • १५६- सजल-जलद-नीलाभ..
    • १५७- मधुर मनोहर सुंदर..
    • १५८- नव-नीरद-नीलाभ तन..
    • १५९- सजल-जलद-नीलाभ..
    • १६०- जयति जय गोप्रेमी..
    • १६१- कर मुरली, कटि काछनी..
    • १६२- कृष्ण-नील-द्युति तन..
    • १६३- कालिंदी-तट ठाढ़े..
    • १६४- जय जय ब्रजराज..
    • १६५- सजल-जलद-नीलाभ..
    • १६६- नव किशोर नटवर मुरलीधर..
    • १६७- छैल-छबीले लाड़िले..
    • १६८- कोटि-कोटि शत..
    • १६९- शारदीय-पूर्णिमा-सुनिर्मल..
    • १७०- मोरपिच्छ सिर, कर्णिकार..
    • १७१- नित नूतन गुन-रूप..
    • १७२- नित्य, अनन्त, अचिन्त्य..
    • १७३- उड़ा जा रहा प्रकृति..
    • १७४- रूप-सील-सौंदर्य..
    • १७५- मधुर-सुमधुर, मधुर..
    • १७६- जय जय हरि-हृदया..
    • १७७- हरत मन-माधव..
    • १७८- अंग-अंग अप्रतिम..
    • १७९- जुगलबर एक तत्त्व..
    • १८०- दोऊ सदा एक रस..
    • १८१- दुहुनि की प्रीति..
    • १८२- कृष्ण शक्तिमय, शक्ति..
    • १८३- वह सखि! शशधर..
    • १८४- वह सखि! नूतन..
    • १८५- रास-बिहारिनि राधिका..
    • १८६- भावमयी श्रीराधिका, रसमय..
    • १८७- जुगल बर परम..
    • १८८- जयति जय जयति..
    • १८९- परम प्रेम-आनंदमय..
    • १९०- जुगल छबि हरति..
    • १९१- सोहत जुगल राधे..
    • १९२- स्याम-स्यामा सुषमाके..
    • १९३- बिराजत रासेस्वरि..
    • १९४- सोहत सुठि स्याम..
    • १९५- बनहिं बन रस..
    • १९६- लता-निकुंज मध्य..
    • १९७- राधा-माधव माधव..
    • १९८- कलित कल्पतरु-कुंज..
    • १९९- रसमयी संग रसिक..
    • २००. स्थिर बिजली सँग चंचल..
    • २०१- बिराजित स्यामा-स्याम..
    • २०२- मिले श्याम-श्यामा..
    • २०३- गौर सुभग शशि अमित..
  • +
    श्रीकृष्ण-बाल-लीला-माधुरी (२०४ से २३२)
    • २०४- स्मरण-मात्रसे जिनके..
    • २०५- कर-कमलोंसे चरण..
    • २०६. ब्रजेस्वरि-गोद में..
    • २०७- खेलत झुनझुनियाँ ते..
    • २०८- रतनभूमि पर चलत..
    • २०९- नेहभरे नयनन्हि सों..
    • २१०- मचलि रहे ता दिन..
    • २११- लालन! देखु आयौ..
    • २१२- नंदसुत चुपकै माखन..
    • २१३- भूषन-बसन सजाय..
    • २१४- नारद बाबा कही..
    • २१५- बछरा की लै पूँछ कर..
    • २१६- करत विचित्र चरित्र..
    • २१७- सखनि सँग खेलत..
    • २१८- सो छबि छिनहुँ..
    • २१९- मैया! तू भोली है..
    • २२०- पनघट पर हरि..
    • २२१- बरजै क्यूँ नी..
    • २२२- कन्हैया गाय चरावन..
    • २२३- बनहिं बन स्याम..
    • २२४- खेलत ग्वालन सँग..
    • २२५- वृन्दा-विपिन तपन..
    • २२६- नव-पल्लव सुगन्ध..
    • २२७- बजावत मुरली मीठी..
    • २२८- गमन करत रबि..
    • २२९- नयननि कौ इतनौई..
    • २३०- कालीदह-जल ऊपर..
    • २३१- क्रीडत कल कुँमर..
    • २३२- दुर्मति दैत्य महाबलने..
  • +
    श्रीराधा-माधव-लीला-माधुरी (२३३ से ४१६)
    • २३३- नवल बृन्दाबन सोभा
    • २३४- नव कानन, नित नूतन..
    • २३५- निभृत-निकुंज-मध्य..
    • २३६- प्रिया-प्रीतम नित..
    • २३७- देख रहा मैं, करते..
    • २३८- मोहन के हिय..
    • २३९- बटाऊ! वा मग तैं..
    • २४०- स्याम मोरे ढिग तें..
    • २४१- मोहन-मुख-पंकज..
    • २४२- करते कभी छेड़..
    • २४३- गोपी घर तें निकसी..
    • २४४- ग्वालिनी भूली तन..
    • २४५- चली स्याम-गत-चित्ता..
    • २४६- मधुर ब्रजराजकुमर..
    • २४७- नीलमनि धेनु लिये..
    • २४८- नीलमनि मनहर बन..
    • २४९- नंदसुत रसमय बन..
    • २५०- बन तें घर हरि..
    • २५१- देखी आजु अनोखी..
    • २५२- यमुना-तट-संनिकट..
    • २५३- माधुरी मुरली अधर..
    • २५४- बजावत मुरली स्याम..
    • २५५- बजाऔ मति मुरली..
    • २५६- मुरलिया! मत बाजै..
    • २५७- ग्वालिन मुरली-धुनि..
    • २५८- सुनि मधु मुनि..
    • २५९- स्याम ने मुरली..
    • २६०- मुरलिया बाजी रे..
    • २६१- मधुर मुरलि कर..
    • २६२- स्याम-दरस-परसन
    • २६३- थीं वे विकसित..
    • २६४- तुम लोगोंसे हुआ..
    • २६५- परम प्रेममयी श्रीराधा
    • २६६- उदय हुए जब श्रीवृन्दावन..
    • २६७- कुसुमित कुंज कल्पतरु..
    • २६८- रुचिर तपन-तनया..
    • २६९- मंद-मंद मुसकावत..
    • २७०- निरखि मुखचंद तुम्हारौ..
    • २७१- राधा! हम-तुम..
    • २७२- करत निज कर..
    • २७३- थके पर छके..
    • २७४- तत्सुख-सुखी त्यागमय..
    • २७५- प्रिया-प्रीतम दोउ..
    • २७६- कानन नव निकुंज..
    • २७७- हँसि-हँसि झूलत..
    • २७८- झूलत फूल हंडोरे..
    • २७९- हंडोरें झूलत स्यामा..
    • २८०- झुलावत निज कर..
    • २८१- झुलावति स्यामा स्याम..
    • २८२- झूलत अभिराम स्याम..
    • २८३- झूलत कुंजनि प्रेम..
    • २८४- झूलत हरित कुंज..
    • २८५- झूलत सघन कुंज..
    • २८६- भीजत रीझत दोऊ..
    • २८७- आश्विन मास, शरद..
    • २८८- नित्य मधुर ब्रज-धाम..
    • २८९- खेलत सुन्दर स्याम..
    • २९०- खेलत स्यामा-स्याम..
    • २९१- होरी में गए हार..
    • २९२- याद पड़ रहा है..
    • २९३- लता-वल्लरी रही..
    • २९४- कहाँ गये तुम, कहाँ..
    • २९५- बिरहातुर, अति कातर..
    • २९६- अति एकान्त, बिकल..
    • २९७- देखा स्वप्न राधिकाने..
    • २९८- विषम बिछुड़नेकी बेलामें..
    • २९९- माधव! हौं तुम्हरे..
    • ३००- सखी री! मो सम..
    • ३०१- स्याम बिनु छिनहूँ..
    • ३०२- स्याम-घन कब..
    • ३०३- बज्र सम मेरौ..
    • ३०४- तिहारौ बिरह दु:ख..
    • ३०५- अहो हरि! मो..
    • ३०६- स्याम मोहिं तुम..
    • ३०७- स्याम! अब मत..
    • ३०८- माधव! करौ बचन..
    • ३०९- प्रानधन सुंदर स्याम..
    • ३१०- सखी! मोय कारौ..
    • ३११- परत मन छिन..
    • ३१२- बिरह-दुख सजनी!..
    • ३१३- झूर रहे दृग रूप..
    • ३१४- एक-एक पल बना..
    • ३१५- दिन नहिं चैन..
    • ३१६- गये श्यामसुन्दर जब..
    • ३१७- मधुपुरी गवन करत..
    • ३१८- जब ते हरि मधुपुरी..
    • ३१९- ब्रज की सुरत मोहिं..
    • ३२०- ऊधौ! बिसरत नहिं
    • ३२१- ब्रज-बनितनि की..
    • ३२२- ब्रज-बनिता नहिं..
    • ३२३- राधा की सुधि..
    • ३२४- ऊधौ! निठुर मो सम
    • ३२५- प्राणेश्वरि! जबसे मैं..
    • ३२६- मत समझना तुम..
    • ३२७- हे राधे! उस दिन..
    • ३२८- राधे! तुम जो अनुभव..
    • ३२९- ऊधौ! तुम ते कहौं..
    • ३३०- मुझसे करके प्रेम..
    • ३३१- माधव-सखा मनीषी..
    • ३३२- ऊधौ! स्याम बड़े ही..
    • ३३३- ऊधौ! कहा सिखावौ..
    • ३३४- ऊधौ! मोहन स्याम..
    • ३३५- ऊधौ! हम क्यौं स्याम..
    • ३३६- ऊधौ! प्रिय तें कहियो..
    • ३३७- ऊधौ! तुम तो बड़े..
    • ३३८- स्याम तव मूरति..
    • ३३९- ऊधौ! सो मनमोहन..
    • ३४०- ऊधो मधुपुरका बासी..
    • ३४१- ऊधौ! तुम्हरे नैन अधूरे..
    • ३४२- ऊधौ! मो मैं नैकु न..
    • ३४३- उद्धव! तुम मुझको किसका..
    • ३४४- ऊधौ! सोई प्रीति अनन्य..
    • ३४५- उद्धव! राधा-सी अभागिनी..
    • ३४६- उद्धव! मुझमें तनिक नहीं..
    • ३४७- राधे! क्या संदेश सुनाऊँ..
    • ३४८- उद्धव! सत्य सुनाया..
    • ३४९- कहने लगे राधिकासे..
    • ३५०- माधव दशा सुनाऊँ..
    • ३५१- प्यारे कान्ह सखाकी..
    • ३५२- स्याम! तुम परम..
    • ३५३- तुम सम निठुर दूजौ..
    • ३५४- मैं छोड़, प्रिये! तुमको..
    • ३५५- जबसे सुना सुधामय..
    • ३५६- चित्रपट देखत भूली..
    • ३५७- श्रीमती मूरति अंकित..
    • ३५८- कृष्ण-सुखैक-वासना..
    • ३५९- स्वर्णपिंजरस्थित मगन मन..
    • ३६०- राधिका आई कुंज..
    • ३६१- स्याम पाकर निकुंज..
    • ३६२- सखी ने आकर बात..
    • ३६३- स्याम आ पहुँचे तुरत..
    • ३६४- स्याम-सरोज-बदन सुचि..
    • ३६५- कृष्ण-प्रिया राधा-चरन..
    • ३६६- प्यारी-पग काँटौ चुभ्यौ..
    • ३६७- कदँब-बृच्छ-छाया सुखद..
    • ३६८- लै मुरली प्रिय छिप गए..
    • ३६९- विरह-व्यथा-पीड़ित..
    • ३७०- मलयज पवन, उल्लसित..
    • ३७१- विरहाकुल अति व्यथित..
    • ३७२- सखी! वह कैसौ मीठौ..
    • ३७३- नियत समयपर पहुँच न..
    • ३७४- जग रही थी रात भर..
    • ३७५- सखी! न कोई और..
    • ३७६- नाथ! अब मो पै कृपा..
    • ३७७- मधुर मनोहर नील-श्याम..
    • ३७८- बैठी राधा थीं यमुना-तट..
    • ३७९- नित्य उन्होंने चाहा मुझको..
    • ३८०- प्रियतम-भामिनि, मधुमय..
    • ३८१- एक दिना मिलि प्यारी..
    • ३८२- खड़े हुए थे लिये सहारा
    • ३८३- उस कैतवके लिये कर..
    • ३८४- सखि! सुख-दान करो..
    • ३८५- मग जोहति मन व्यथित..
    • ३८६- आय दूती ने बात..
    • ३८७- आय दूती ने बात..
    • ३८८- आय दूती ने बात..
    • ३८९- अनुपम मोरें मन अभिलास..
    • ३९०- सखी! यह कैसी भूल..
    • ३९१- कान्ह बर धरॺो..
    • ३९२- मेरे हे जीवन-जीवन!..
    • ३९३- प्राण-प्राण! हे प्राणनाथ!..
    • ३९४- तुम बिनु बीतत छिन..
    • ३९५- कोटि-कोटि कंदर्प-दर्पहर..
    • ३९६- श्रीमती! छमा करौ..
    • ३९७- तुम कुछ भी कहो भले..
    • ३९८- स्याम-मन उमग्यौ आनँद..
    • ३९९- मो ते भईं चूक अन..
    • ४००- नहीं तुम्हारा अन्तर देखा..
    • ४०१- स्याम बतावत प्रेम-मूर्ति..
    • ४०२- स्याम-स्यामा दोउ करत..
    • ४०३- नव-निकुंज सुख-पुंज..
    • ४०४- मुरली ली, प्रिय छिप गये..
    • ४०५- बच रहे थे दो, नहीं..
    • ४०६- महामहिम मुनि-मनहर..
    • ४०७- खड़ा यह कौन कुंजके..
    • ४०८- प्रिय-बियोगमें अबिरत स्मृति..
    • ४०९- सूखकर काँटा हुआ तन..
    • ४१०- समझ रही मैं लाभ चित्त..
    • ४११- मेरे इस प्रणको सुन लो..
    • ४१२- सखी! मैं भई अति..
    • ४१३- मधुर-मधुर, सुन्दर-सुन्दर..
    • ४१४- प्रानप्रिय मथुरा जाय बसे..
    • ४१५- औचक चौंकि उठे हरि..
    • ४१६- नव-निकुंजमें कृष्ण प्रेष्ठतम..
  • +
    प्रेम-समुद्रकी मधुर तरंगें (४१७ से ५३३)
    • ४१७- प्रियतमसे मिलनेको जिसके..
    • ४१८- अब तो कुछ भी नहीं..
    • ४१९- छलकि रहि गोपी..
    • ४२०- प्रियतमको अति मधुर मनोहर..
    • ४२१- भई गति कैसी सुनु..
    • ४२२- लग्यौ तब हिय मीठौ..
    • ४२३- बंदीजन आए गुन..
    • ४२४- सखी सौं सुनि वा..
    • ४२५- स्याम विमल गुन सुनत..
    • ४२६- सुनि सहसा सुर मधुर..
    • ४२७- गयौ मन मेरौ..
    • ४२८- जा दिन तैं मुरली-धुनि..
    • ४२९- सोवत रही सखी!..
    • ४३०- सखी! मैं कहा कहूँ..
    • ४३१- आजु देखि आई हौं..
    • ४३२- देखे जब मन-मोहन..
    • ४३३- मन की मन ही
    • ४३४- हौं जल भरन गई री..
    • ४३५- जब तैं मैं देखे मन-मोहन..
    • ४३६- सखी! मैं स्याम लुभानी..
    • ४३७- जब तैं मैं देखे नँद..
    • ४३८- आजु इन नयनन्हि निरखे..
    • ४३९- कहौं का मन-नयननि..
    • ४४०- गई हुती वा दिनाँ किसोरी..
    • ४४१- देखा मैंने उस दिन..
    • ४४२- मेरौ मन रूप-समुद्र..
    • ४४३- मेरौ मन मोहन छबि..
    • ४४४- बरजी मैं काहू की..
    • ४४५- श्याम ने कहा ठगोरी..
    • ४४६- निरखु सखि! कैसौ..
    • ४४७- जल भरिबे कूँ आज..
    • ४४८- मेरे जीवन-धन प्यारे!..
    • ४४९- प्यारे मोहन मनभावन!..
    • ४५०- मैं तुमको श्याम बुलाऊँ..
    • ४५१- चतुर चंचल चपल चित..
    • ४५२- सखी! मैं जाऊँ जमुना..
    • ४५३- प्यारे आकर हँसकर..
    • ४५४- सौंप दिये मन प्राण..
    • ४५५- होय पद-कंज..
    • ४५६- सजनी! चलु वा पिय
    • ४५७- बनी रहे नित बिरह..
    • ४५८- तरस रहीं अँखियाँ देखन..
    • ४५९- हों चाहे वे परम अनिर्वचनीय..
    • ४६०- बने रहें प्रभु एकमात्र..
    • ४६१- नहीं चाहती मनोनाश मैं..
    • ४६२- स्वर्ग जायँ या पड़ी रहें..
    • ४६३- मन की बात मन हि..
    • ४६४- मेरे जीवनके जीवन..
    • ४६५- राजी रहो सदा प्यारे!..
    • ४६६- तुम ही मेरे प्राण..
    • ४६७- मेरा मन, मनके सारे..
    • ४६८- हो चाहे तुम खुद ब्रह्म..
    • ४६९- हो चाहे शंकर शुचि..
    • ४७०- दृढ़ रति, मन विश्वास..
    • ४७१- ‘मैं, बस, उनकी ही’,..
    • ४७२- हुआ समर्पण प्रभु-चरणोंमें..
    • ४७३- वे प्रियतम मेरे श्याम..
    • ४७४- कृष्ण उठत, कृष्ण चलत
    • ४७५- देश कृष्ण, काल कृष्ण..
    • ४७६- श्याम हमारे तन-मन-धन..
    • ४७७- श्याम नित्य सुन्दर..
    • ४७८- श्याम हमारे वस्त्राभूषण..
    • ४७९- श्यामकी चर्चा हमारा..
    • ४८०- राधा घर, काननमें राधा..
    • ४८१- प्रियतम नित्य प्राण हैं..
    • ४८२- हटे वह सामनेसे..
    • ४८३- प्यारे प्रियतम प्रभु अवश्य..
    • ४८४- रहते नित हृदयमें मेरे..
    • ४८५- नहीं छोड़ते हैं पलभर..
    • ४८६- नित्य सुदारुण विरह भयानक..
    • ४८७- स्याम मो मन में आय..
    • ४८८- कहाँ असीम अनन्त परम..
    • ४८९- सखी! हो गयी क्या मैं पगली..
    • ४९०- हरि मेरे प्रियतम सदा..
    • ४९१- नहीं चाहती याद रखूँ मैं..
    • ४९२- दीर्घकालके बाद हुआ..
    • ४९३- लालची लोचन मधुप..
    • ४९४- हुआ मधुर सम्बन्ध प्रेमका..
    • ४९५- रहते हैं प्यारे नित सारे..
    • ४९६- कैसे देखूँ दूर मैं..
    • ४९७- हो गया उनका सब..
    • ४९८- मिल्यौ स्याम कौ मधु..
    • ४९९- सजनी! जो कटा अँग..
    • ५००- मिटे सब शोक..
    • ५०१- पलभर नहीं छोड़ते प्यारे..
    • [५०२]
    • ५०३- बिछुरे होयँ जु मिलैं..
    • ५०४- सरबस छीन लै गयौ..
    • ५०५- पता नहीं कुछ रात..
    • ५०६- सखि! क्या हुआ?
    • ५०७- सुनौ सखि! यह..
    • ५०८- नैन-मन जब तैं..
    • ५०९- सखी री! यह अनुभव..
    • ५१०- निरखि सखि! मोहनकी..
    • ५११- सखी! हौं स्याम..
    • ५१२- सखी! हौं प्रीतम..
    • ५१३- प्रियतम मेरे, मैं प्रियतमकी..
    • ५१४- रूप अनूप सुधा-रस..
    • ५१५- स्याम-सो साँचौ स्नेही..
    • ५१६- शुद्ध सच्चिदानन्द, परम निज..
    • ५१७- मैं तो सदा बस्तु हूँ..
    • ५१८- मेरे इक जीवन-धन..
    • ५१९- मैं हूँ एकमात्र उनकी ही..
    • ५२०- सखि! संयोग-वियोग..
    • ५२१- तुम उनकी, वे नित्य तुम्हारे..
    • ५२२- सखी! यह अतुल अनोखी..
    • ५२३- स्रवननि भरि निज गिरा..
    • ५२४- मिले रहते मुझसे..
    • ५२५- हृदय-भवनमें बसे निरन्तर..
    • ५२६- सखी री! तू क्यौं भई..
    • ५२७- सखी! जो रूठे स्याम..
    • ५२८- अरी सखि! मेरे तन..
    • ५२९- सखी! जनि करौ अयानी..
    • ५३०- सुनु प्यारी मम बैन..
    • ५३१- याद आ रही थी मुझको..
    • ५३२- सखी री! हौं अवगुन की..
    • ५३३- सखी! तुम इतनौ करियो
  • +
    श्रीकृष्णके प्रेमोद्गार (५३४ से ६०७)
    • ५३४- बरबस करषौं मुनि-मनहि..
    • ५३५- राधा बिना अशोभन नित..
    • ५३६- मैं हूँ पूर्णानन्द परम शुचि..
    • ५३७- मुझ ‘रस’ को, मेरे..
    • ५३८- नहीं चुका सकता मैं बदला..
    • ५३९- कहत स्याम निज मुख..
    • ५४०- अन्त-विहीन, अनादि, नित्य..
    • ५४१- दूर रहें या पास, नित्य..
    • ५४२- कैसे किसे बताऊँ अब..
    • ५४३- मो मन राधा-छबि पै..
    • ५४४- राधासे भी लगता मुझको..
    • ५४५- जिह्वाके मम अग्रभागपर..
    • ५४६- मानो या मत मानो..
    • ५४७- ‘मैं प्रियतम, तू प्रेयसि मेरी’..
    • ५४८- प्रिये! लखौ तुम सर्व..
    • ५४९- सुन्दर-मधुर सदा मैं..
    • ५५०- राधिके! तुम मम जीवन..
    • ५५१- हे आराध्या राधा!..
    • ५५२- हे वृषभानुराजनन्दिनि!..
    • ५५३- हे प्रियतमे राधिके!..
    • ५५४- राधे, हे प्रियतमे..
    • ५५५- मेरा तन-मन सब तेरा..
    • ५५६- राधे! तू ही चित्तरंजनी..
    • ५५७- राधा! तुम-सी तुम्हीं..
    • ५५८- राधे! तुम-सी तुम्हीं..
    • ५५९- हे राधे वृषभानुनन्दिनी..
    • ५६०- प्रिये! तुम्हारा-मेरा यह..
    • ५६१- प्राणेश्वरि! निश्चय ही तू..
    • ५६२- प्रिये! तुम्हारी महान महिमा..
    • ५६३- मिली सदा रहतीं तुम..
    • ५६४- सुमधुर स्मरण तुम्हारा..
    • ५६५- तेरी चिन्ता, तेरी पीड़ा..
    • ५६६- आतुर मैं अत्यन्त सदा..
    • ५६७- विषय-कामना, भोग-रति..
    • ५६८- प्रिये! तुम्हारी मूर्ति नित..
    • ५६९- राधे! क्यों मैं रीझा तुमपर..
    • ५७०- है कर्तव्य नहीं कुछ मुझको..
    • ५७१- एक तुम्हारे सिवा न राधे!..
    • ५७२- नहीं जानता मैं भगवत्ता..
    • ५७३- कभी न होता, कभी न होगा..
    • ५७४- जिससे मुझ ‘आनन्द-रूप’..
    • ५७५ प्रिये! तुम्हारी मधुर मनोहर..
    • ५७६- अन्तरकी रस-धाराकी..
    • ५७७- एक तुम्हींमें मन अटका है..
    • ५७८- प्रिये! प्राण-प्रतिमे!..
    • ५७९- प्रिये! तुम्हारी वाणी..
    • ५८०- पल भर नहीं छोड़ते...
    • ५८१- तेरे उरकी शुचि सुन्दरता..
    • ५८२- देख छबीली छटा..
    • ५८३- कैसे तुम्हें दिखाऊँ..
    • ५८४- जब तुम कहती हो..
    • ५८५- तुम्हें क्या कहूँ..
    • ५८६- मैं न तुमसे एक क्षण..
    • ५८७- तुमने मुझे दिया सुख..
    • ५८८- रोजकी आदत मेरी..
    • ५८९- प्रियतमे! मैं नित रिनी..
    • ५९०- तुम कभी मनमें..
    • ५९१- प्राणाधिके! प्रियतमे! मुझको..
    • ५९२- तोसे मिलहौं, हे राधिके!..
    • ५९३- जबसे छूटा था राधे!..
    • ५९४- भूल गया मैं अन्य सभी..
    • ५९५- राधा! तेरे दर्शनको..
    • ५९६- प्रिये! तुम्हारी विरह..
    • ५९७- विधु-बदनी श्रीराधिके!..
    • ५९८- राधिके! तुम सलिल..
    • ५९९- तुम्हारी स्मृति नित बन..
    • ६००- रहता पुरी द्वारिकामें मैं..
    • ६०१- तुम यह शायद समझ..
    • ६०२- हे ब्रजरमणि-मुकुटमणि राधे!..
    • ६०३- सर्वनियन्ता सर्वेश्वर मैं..
    • ६०४- राधा मेरी प्राण-प्रतिमा..
    • ६०५- राधिके! तुम सौं होड़..
    • ६०६- गोपिका! (प्रिया सब) हौं..
    • ६०७- निर्मल प्रेम नित्य यौं..
  • +
    श्रीराधाके प्रेमोद्गार—श्रीकृष्णके प्रति (६०८ से ६६०)
    • ६०८- हौं तो दासी नित्य तिहारी..
    • ६०९- मेरी इस विनीत विनतीको..
    • ६१०- सुन्दर श्याम कमल..
    • ६११- सदा सोचती रहती हूँ मैं..
    • ६१२- मेरे धन-जन-जीवन..
    • ६१३- तुमसे सदा लिया ही मैंने..
    • ६१४- तुम अनन्त सौन्दर्य..
    • ६१५- तुम हो यन्त्री, मैं यन्त्र..
    • ६१६- हे प्रियतम! माधुर्य..
    • ६१७-प्रियतम! तव रूप-सुधा..
    • ६१८- तुम अपनी असमोर्ध्व..
    • ६१९- यहाँ-वहाँ कुछ कहीं..
    • ६२०- एकमात्र उनकी ही हूँ..
    • ६२१- तुम करते रहो रसिकवर!..
    • ६२२- स्याम! तोय नैननि..
    • ६२३- रहते घुले-मिले ही..
    • ६२४- नहीं चाहती तुमसे कुछ..
    • ६२५- देख रही सुन रही सभी..
    • ६२६- मिलती अगर सान्त्वना..
    • ६२७- हो चाहे तुम सर्वदोषमय..
    • ६२८- दुतकारो-डाँटो सदा..
    • ६२९- मिलो कभी मत, नहीं..
    • ६३०- हो चाहे तुम सबके स्वामी..
    • ६३१- बहुत दूर तुम, बहुत..
    • ६३२- देह-प्राण, मन-बुद्धि..
    • ६३३- नहीं चाहती दु:ख मिटाना..
    • ६३४- तन कौ कन-कन..
    • ६३५- देउँ कहा तुम कहँ..
    • ६३६- मेरे तुम, मैं नित्य तुम्हारी..
    • ६३७- करना तुम मत नाश कभी..
    • ६३८- खूब जानती हूँ मैं..
    • ६३९- अतुल रूप-सौन्दर्य..
    • ६४०- मैं अति दीन, मलिन मति..
    • ६४१- नहीं शक्ति, सामर्थ्य न..
    • ६४२-नहीं एक भी सद्गुण..
    • ६४३- मैं अपराधिनि, अघी..
    • ६४४- ‘काया’ मैं न, ‘जीव’..
    • ६४५- कैसी दिव्य तुम्हारी ममता..
    • ६४६-अनोखौ प्रेम तुम्हारौ स्याम!..
    • ६४७- पियारे! तुम ही तुम्हरे..
    • ६४८- क्षणभर मुझे उदास देख..
    • ६४९- कभी मत मिलो..
    • ६५०- प्रियतम! मीठी नित..
    • ६५१- कभी मत मिलें..
    • ६५२- कितने तुम अनुपम..
    • ६५३- तुम्हारी स्मृति ही है..
    • ६५४- चाहता मन है नित..
    • ६५५- बिसारूँ कैसे स्याम..
    • ६५६- मैं भूली थी अपने..
    • ६५७- मैं थी पहले मलिना..
    • ६५८- प्रेमाधीन शिरोमणि हो..
    • ६५९- दूर करो, ठुकराओ चाहे..
    • ६६०- चाह-कुचाह मिट गयी..
  • +
    प्रेम-तत्त्व एवं गोपी-प्रेमका महत्त्व (६६१ से ७५२)
    • ६६१- प्रेम-राज्यके सभी..
    • ६६२- ‘कर्म-राज्य’ से उच्च..
    • ६६३- सबहि सौं पृथक..
    • ६६४- प्रेम हृदय की बस्तु है..
    • प्रेमका महत्त्व
    • प्रेमके साधन
    • प्रेमके विघ्न
    • प्रेमकी स्थिति
    • ज्ञान और प्रेम
    • प्रेमीका स्वरूप
    • ६६५- प्रेम सदा पावन..
    • ६६६- परम गोप्य, अतिसय..
    • ६६७- उत्कट काम, अमर्ष..
    • ६६८- अति निर्मल, अति ही मधुर
    • ६६९- प्रेम पवित्र, परम उज्ज्वल
    • ६७० काहू कौं जानौं..
    • ६७१- सुनै सदा चाहे न..
    • ६७२ जो परतन्त्र सदा..
    • ६७३- पावन पावक प्रेम..
    • ६७४- जितने सब हैं भाव..
    • ६७५- सुद्ध सत्त्वकी वृत्ति..
    • प्रेमके आठ स्तर
    • ६७६- प्रेम-अमिय के पियत..
    • ६७७- जन्म-मरण न दु:ख..
    • ६७८- भोग-मोक्ष-इच्छा..
    • ६७९- इत-उत जो धावत..
    • ६८०- लौकिक भोग-काम है..
    • ६८१- श्याम प्रेम तब जानिये..
    • ६८२- शुद्ध-प्रेम राधा-माधवका..
    • ६८३- उड़ता नहीं निरा भ्रम..
    • ६८४- भोगासक्ति-कामना करती..
    • ६८५- ‘काम’ रहेगा, तबतक होंगें..
    • कामके उच्च-नीच स्वरूप
    • ६८६- प्रेम कौ एक मधुर..
    • ६८७- प्रेम-राज्यमें निज..
    • ६८८- स्व-सुख-वासना..
    • ६८९- समय-स्थानकी दूरी..
    • ६९०- हमको दुखी देखकर प्यारे..
    • ६९१- प्यारे! हँसो, रहो ही हँसते..
    • ६९२- कैसे वह दुखिया माने..
    • ६९३- सुमधुर स्मृतिमें होता..
    • ६९४- मिला जिसको हरि..
    • ६९५- ज्यों-ज्यों प्रभु-समीपता..
    • ६९६- शुद्ध प्रेमरूप हैं केवल..
    • ६९७- शुद्ध प्रेम राधा-माधवका..
    • ६९८- इन्द्रिय-सुख-इच्छासे..
    • ६९९- नित्य सर्वकारण कारण..
    • ७००- मिलौ न चाहें तुम..
    • ७०१- जहाँ पवित्र भाव हैं..
    • ७०२- ‘सर्व-त्याग’ हो गया सहज..
    • ७०३- नहीं वासना, नहीं कामना..
    • ७०४- प्रथम सीस अरपन..
    • ७०५- विषय-रस नीरस सदा..
    • ७०६- प्रानसहित या देह..
    • ७०७- जिसने अपने तन-मन..
    • ७०८- जाकौं प्रभु अपनो..
    • ७०९- पूर्ण समर्पण हो सदा..
    • ७१०- देह-प्राण-मन, वस्तु..
    • ७११- निज सुख वांछा नैकु..
    • ७१२- मिले नेत्र नेत्रोंमें जाकर..
    • ७१३- जिससे परम सुखी हों..
    • ७१४- नहीं मिलनमें तृप्ति..
    • ७१५- लग जाती है होड़ परस्पर..
    • ७१६- प्रेम-रस-सागर नागरि..
    • ७१७- धन्य-धन्य ब्रजकी..
    • ७१८- जितना-जितना मनसे..
    • ७१९- ‘मेरे साथ बिहार करैं..
    • ७२०- सकल साधनोंकी फलरूपा..
    • ७२१- गोपिन की उपमा..
    • ७२२- गोपीजन की महिमा..
    • ७२३- गोपिन पटतर नहिं..
    • ७२४- जिसकी कहीं न कोई..
    • ७२५- कृष्ण-प्रियतमा राधा रानी..
    • ७२६- पूर्ण त्यागमय सर्वसमर्पणका..
    • ७२७- कामगन्धसे शून्य सर्वथा..
    • ७२८- निज-सुख-काम..
    • ७२९- श्रीराधा श्रीकृष्ण नित्य..
    • ७३०- प्रथम साधना है..
    • ७३१- स्यामकी लीला सुखकी..
    • ७३२- राधा नहीं चाहतीं निज..
    • ७३३- सेवा करती नित प्रियतमकी..
    • ७३४- शुद्ध प्रेम श्रीराधाका है..
    • ७३५- मेरी उन राधाके शुचितम..
    • ७३६- राधारानी देतीं प्रियको..
    • ७३७- कृष्णमना, श्रीकृष्ण-मति..
    • ७३८- प्रेम जो प्रगट्यौ ब्रज..
    • ७३९- अलौकिक राधा-माधव..
    • ७४०- अनोखी राधा-माधव..
    • ७४१- है अति सुखकर मिलन..
    • ७४२- धन-जन-अभिजन..
    • ७४३- लज्जा, शील, मोह..
    • ७४४- बरसत आनँद-रस..
    • ७४५- नित्य नयी क्षमता है..
    • ७४६- देह-प्राण-मन-बुद्धि..
    • ७४७- राधा-मानस-सिन्धु में..
    • ७४८- राधा-गोपी नहीं..
    • ७४९- राधाराधन के परम..
    • ७५०- सकल सदगुन नित..
    • ७५१- वे हैं एकमात्र सब मेरे..
    • ७५२- निज सुख-लेश वासनाका..
  • +
    श्रीराधा-कृष्ण-जन्म-महोत्सव एवं जय-गान (७५३ से ८१७)
    • ७५३- सर्वातीत, सर्वविरहित, जो..
    • ७५४- नव-नीरद-नीलाभ कृष्ण..
    • ७५५- जन्म अजन्मा, अविनाशीका..
    • ७५६- प्रकट हुए थे धराधाममें..
    • ७५७- कंस तमोमयका था..
    • ७५८- शुद्ध सच्चिदानन्द परात्पर..
    • ७५९- काल हो गया अतिशय..
    • ७६०- उदय हो गये जैसे..
    • ७६१- कृष्नचंद्र उदय भए..
    • ७६२- हरि अवतरे कारागार..
    • ७६३- सुन्यौ नँद-घर लाला..
    • ७६४- प्रगटे अभिराम स्याम रसिक..
    • ७६५- चकित-थकित अपलक..
    • ७६६- श्रीराधा माधव, श्रीमाधव..
    • ७६७- कीर्ति-कुक्षिकी कीर्ति..
    • ७६८- आजु वृषभान भवन..
    • ७६९- प्रगटीं अनूप भूप..
    • ७७०- प्रगटीं राधा रावलमें..
    • ७७१- प्रकट हुईं वृषभानु..
    • ७७२- आए मुनि भानु..
    • ७७३- सुन्दर सुभग कुँवरि..
    • ७७४- रानी कीरति कुँवरी..
    • ७७५- जन्मोच्छव राधिका कुँवरि..
    • ७७६- हरि-प्रिय-भामिनि..
    • ७७७- हृदय आनन्द भर..
    • ७७८- स्यामघन दामिनि प्रगट..
    • ७७९- सुभ निसान बाजत..
    • ७८०- द्वार वृषभानु के आजु..
    • ७८१- बज रही गाँव रावलमें..
    • ७८२- भानु घर उत्सव..
    • ७८३- वह धन्य घड़ी है..
    • ७८४- भानुपुर बाजत बिपुल..
    • ७८५- जग उठे भाग्य..
    • ७८६- अतुल आनन्द भर..
    • ७८७- (अब तो) जागे भाग हमारे..
    • ७८८- अब जो हरष भयौ..
    • ७८९- नन्द-यशोदाके घर..
    • ७९०- मंगल बधाइयाँ हो..
    • ७९१- सुदंर सुभग कुँवरि..
    • ७९२- धन्य-धन्य द्वापर जुग..
    • ७९३- धन्य घरी, धनि भादौं..
    • ७९४- राधा जाई, आनँद लाई..
    • ७९५- प्रेम की मूरति नागर..
    • ७९६- जसुमति लै संग नंद..
    • ७९७- त्यागमूर्ति श्रीराधा आयीं..
    • ७९८- बरसगाँठि बृषभानु-कुँवरि..
    • ७९९- बरसगाँठि बृषभानु-कुँवरि..
    • ८००- राधाने दे दर्शन सुर..
    • ८०१- जय राधे, जय जय..
    • ८०२- जय राधे जय श्रीराधे..
    • ८०३- बोलो जय राधे, राधे..
    • ८०४- रटे जा राधे-राधे..
    • ८०५- जय राधे! जय राधे..
    • ८०६- बृंदावन-रानी श्रीराधा..
    • ८०७- वृषभानु-दुलारी जय..
    • ८०८- कृष्णप्रेयसी कान्तागणमें..
    • ८०९- जय परमेश्वरि, जयति..
    • ८१०- जय जय राधा, रासेश्वरि..
    • ८११- जय जय जय राधा अभिराम..
    • ८१२- जयति जय श्रीबृषभानु..
    • ८१३- जय नँद-नन्दन..
    • ८१४- जय वसुदेव-देवकी-नन्दन..
    • ८१५- जय नँद-नंदन प्रेम..
    • ८१६- देवकी-नन्दनकी जय..
    • ८१७- एक लकड़िया चन्दन की..
  • +
    आरतियाँ (८१८ से ८२३)
    • ८१८- आरति कीजै श्रीनटवर की..
    • ८१९- आरति श्रीवसुदेव-तनय की..
    • ८२०- आरति श्रीवृषभानुलली की..
    • ८२१- आरति श्रीबृषभानुसुता की..
    • ८२२- आरति राधा-राधाबर की..
    • ८२३- समुद सुगन्धित सुमन लै..
  • +
    श्रीराम-गुण-गान (८२४ से ८५४)
    • ८२४- चित्र-विचित्र मण्डपोंसे..
    • ८२५- शौर्य-वीर्य-ऐश्वर्य..
    • ८२६- रामचंद्र मुख-मंजु मनोहर..
    • ८२७- अतुल अनन्त अचिन्त्य..
    • ८२८- मात-पिता-गुरु-भक्ति..
    • ८२९- जय श्रीराम, भरत, लक्ष्मण..
    • ८३०- सीता-राम, उर्मिला..
    • ८३१- मज्जन करि सुभ..
    • ८३२- राम-लखन नृप-सुअन..
    • ८३३- अति प्रसन्न-मन..
    • ८३४- प्रभु! मैं नहिं नाव..
    • ८३५- प्रभु बोले मुसुकाई..
    • ८३६- मधुर मृदु सुंदर..
    • ८३७- लक्ष्मण अनुज सती..
    • ८३८- चरन-पादुका नेह..
    • ८३९- सहित सहस्र चतुर्दश..
    • ८४०- विप्रवेशधारी वैश्वानर..
    • ८४१- मधुर सु-सेवासे प्रसन्न..
    • ८४२- ओजस्वी सौमित्रि करो..
    • ८४३- सीता अति कृस गात..
    • ८४४- सीताका कर हरण..
    • ८४५- पता लगाकर सीताका खुद..
    • ८४६- रिपु रन जीति राम..
    • ८४७- नील कमल, नव-नील..
    • ८४८- गो-द्विज-रक्षा-हेतु..
    • ८४९- पूर्णब्रह्म परात्पर राम..
    • ८५०- ध्यानमग्न हनुमान नाचते..
    • ८५१- कांचनाद्रि-कमनीय कलेवर..
    • ८५२- आरति कीजै श्रीरघुबर की..
    • आरती भगवान् मर्यादापुरुषोत्तम
    • ८५३- आरति श्रीजनक-दुलारी की..
    • आरती श्रीजानकीजी
    • ८५४- आरति श्रीअंजनि कुमारकी..
    • आरती श्रीअंजनीकुमारकी
  • +
    भगवान् के विविध स्वरूपोंका गुण-गान (८५५ से ९२९)
    • ८५५- एक सत्य जो परम तत्त्व..
    • सब नामरूपोंमें एक ही सत्यकी उपासना
    • ८५६- एक परम प्रभु चिदानन्दघन..
    • एक ही परम प्रभु पाँच उपास्यरूपोंमें
    • ८५७- नीरद श्यामवर्ण अति शोभित..
    • श्रीमहाविष्णु
    • ८५८- वज्र-ध्वजा-अंकुश-सरसिजके..
    • भगवान् श्रीविष्णुका मनोहर ध्यान
    • ८५९-है जो त्रिगुणातीत..
    • ८६०- दिव्य ज्योति-मण्डल..
    • भगवान् विष्णु
    • ८६१- लक्ष्मी नारायण स्वयं..
    • संयुक्त लक्ष्मी-नारायण
    • ८६२- नील-स्याम अद्भुत..
    • अद्भुत बालक
    • ८६३- देते सूर्य-सोम-मण्डलको..
    • सर्वप्रकाशक ज्योतिर्मय भगवान्
    • ८६४- जय अनन्त वैभवमयि..
    • वरदायिनी श्रीलक्ष्मीमाता
    • ८६५- कमलासन-आसीन देवि..
    • भगवती श्री (महालक्ष्मी) की झाँकी
    • ८६६- शक्ति-शक्तिधर श्रीलक्ष्मी..
    • लक्ष्मीनारायण, लक्ष्मी, सरस्वती
    • ८६७- एकार्णवकी उस अगाध..
    • एकार्णवमें वटवृक्षपर बाल भगवान्
    • ८६८- कहाँ वयस सुकुमार..
    • भगवान् नृसिंहकी प्रह्लादसे क्षमा-प्रार्थना
    • ८६९- जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा..
    • पुरीधाममें श्रीजगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्रजीके मंगल-विग्रह
    • ८७०- असुरोंने आ किया आक्रमण..
    • धनुष-टंकारसे ज्वाला भड़की
    • ८७१- देव-दानवोंने मथा..
    • लक्ष्मीद्वारा श्रीहरिका वरण
    • ८७२- हरि सँग समर रत..
    • हरि-हर-युद्ध
    • ८७३- परम परात्पर देव..
    • गोलोकाधीश्वर
    • ८७४- मथुरामें सानन्द पधारे..
    • कंसकी धनुषशालामें श्रीकृष्णके द्वारा धनुषभंग
    • ८७५- ब्राह्मणके गो-धनकी..
    • प्रभास क्षेत्रमें श्रीकृष्णार्जुन मिलन
    • ८७६- अज अव्यय अखिलेश..
    • ८७७- संजय बोले—‘नृपति!..
    • श्रीकृष्णार्जुनका दिव्य प्रेम
    • ८७८- शुद्ध सच्चिदानन्द दिव्य..
    • संधि-दूत-श्रीकृष्ण
    • ८७९- बिदुर-घर स्याम..
    • विदुर-घर स्याम पाहुने आये
    • ८८०- बढ़ते चले, शूल-मद..
    • भक्तवत्सल भगवान् के द्वारा अश्वोंकी परिचर्या
    • ८८१- अज अविनाशी अखिल..
    • कुरुक्षेत्रकी समर-भूमिमें वरदहस्त श्रीकृष्ण
    • ८८२- चिन्तन किया श्यामने..
    • सत्यभामाजीके द्वारा नारदजीको श्रीकृष्णका दान
    • ८८३- व्याध बिनवत दोऊ..
    • व्याधकी विनय
    • ८८४- श्रीमहेशकी अंगकान्ति..
    • भगवान् श्रीशिवका मनोहर ध्यान
    • ८८५- नित्य सच्चिदानन्द सदाशिव..
    • ध्यानमय भगवान् शिव
    • ८८६- अचल सरल उन्नत..
    • ध्यानस्थ शिव सच्चिदानन्द
    • ८८७- वर्ण गौर कर्पूर..
    • पंचमुख परमेश्वर
    • ८८८- शुभ कर्पूरगौर तन..
    • जय मृत्युंजय
    • ८८९- शंख-गौर पट..
    • जय महेश
    • ८९०- ध्यानमग्न शुचि शान्त..
    • भगवान् चन्द्रमौलिसे प्रार्थना
    • ८९१- हिमगिरिमें हिमसे आच्छादित..
    • हिमालयमें छिपे भगवान् शंकर
    • ८९२- शिव शिव हर हर..
    • शिव-शिव हर-हर जप
    • ८९३- अचल अमल अज अनघ..
    • हर हर भज
    • ८९४- कालीसे गौरी हुई..
    • शिव-गौरी
    • ८९५- हिमगिरि छाइ रहे..
    • श्रीगौरी-शंकर
    • ८९६- खुलता नेत्र तीसरा..
    • रुद्रका तीसरा नेत्र खुला
    • ८९७- नाचत नटराज रुचिर..
    • नटराजका ताण्डव नृत्य
    • ८९८- जय जय शंकर शूल..
    • जय शंकर-गौरी-गणपति
    • ८९९- शीश जटा सुरसरि..
    • रुद्रमूर्तिकृत शिवस्तुति-चालीसा
    • ९००- अज अनादि अविगत..
    • श्रीशिवचालीसा
    • ९०१- आदि अनादि अनंत..
    • श्रीशिवाष्टक
    • ९०२- जय जय, अव्यय..
    • नागरीवर्णानुक्रम जययुक्त अष्टोत्तरशिवसहस्रनाम
    • ९०३- एकदन्त, गजवदन, चतुर्भुज..
    • भगवान् गणेश और शंकरकी जय-जय
    • ९०४- करता तुम्हें प्रणाम..
    • सिद्धिदायक गणनाथ
    • ९०५- रक्तवर्ण शुभ, एकदन्त..
    • श्रीसिद्धि-गणराज
    • ९०६- जय अष्टादशभुजाधारिणी..
    • जय अष्टादशभुजा दुर्गा
    • ९०७- लिएँ हाथ असि..
    • महिषमर्दिनी दशभुजा दुर्गा
    • ९०८- दुर्गा दुर्गा रटत ही..
    • दुर्गाकी कृपा
    • ९०९- खड्ग परशु, खट्वांग..
    • माता सारिका देवी
    • ९१०- भानु-सहस्र-सदृश..
    • संतान-सुंदरी माताकी जय
    • ९११- कान्ति धवल कर्पूरकुन्द..
    • श्रीहंसवाहिनी
    • ९१२- विद्यादायिनि ‘सरस्वती’..
    • प्रसिद्ध छ: देवी माताओंकी जय
    • ९१३- रक्त वर्ण, रक्ताम्बर..
    • जय श्रीललिताम्बा
    • ९१४- गौरारुण शुभ वर्ण..
    • भगवती गौरी देवी
    • ९१५- जय भव-भामिनि..
    • जगज्जननी अन्नपूर्णा
    • ९१६- जय दुर्गे दुर्गतिनाशिनि..
    • जययुक्त श्रीदेवी-अष्टोत्तर-सहस्रनाम [श्रीदेवीजीके १००८ नाम]
    • ९१७- कालमेघ-श्यामल..
    • बटुक भैरव
    • ९१८- आदिदेव, आदित्य, दिवाकर..
    • भगवान् सूर्य नारायणकी जय
    • ९१९- जय जगदीश हरे..
    • आरती—श्रीजगदीश्वर हरि
    • ९२०- आरति भक्तकल्पतरु हरि..
    • आरती—श्रीनृसिंहभगवान्
    • ९२१- आरति परम साम्ब-शंकर..
    • आरती—भगवान् शंकर
    • ९२२- हर हर हर महादेव!..
    • आरती—भगवान् महादेव
    • ९२३- आरति गजवदन विनायक..
    • आरती—भगवान् श्रीगणेशजी
    • ९२४- जगजननी जय! जय..
    • आरती श्रीदुर्गाजी
    • ९२५- आरति श्री गायत्रीजी की..
    • आरती श्रीगायत्रीजी
    • ९२६- गायत्री माता, जय गायत्री..
    • आरती श्रीगायत्रीजी—२
    • ९२७- आरति अतिपावन पुरान की..
    • श्रीमद्भागवतकी आरती
    • ९२८- आरति जग पावन पुरान की..
    • श्रीदेवीभागवतकी आरती
    • ९२९- आरति श्रीगैया-मैया की..
    • श्रीगोमाताकी आरती
  • +
    भगवान् का स्वभाव (९३० से ९६०)
    • ९३०- मेरे प्रभु हैं कितने सहज..
    • ९३१- हरि सम हरि ही..
    • ९३२- हरिकों हरि-जन अतिहि..
    • ९३३- जिसका कोई नहीं जगतमें..
    • ९३४- कैसे अति विचित्र करुणामय..
    • ९३५- जो अनन्त ब्रह्माण्डोंके हैं..
    • ९३६- साँवरे सदा प्रेमाधीन..
    • ९३७- मैं नित भगतन हाथ..
    • ९३८- जिसने उनको चाहा..
    • ९३९- प्रेम-रस-मधुर भावयुक्त..
    • ९४०- प्रियतमकी मधुर स्मृति..
    • ९४१- प्रेमी-जनके प्रेमास्पद..
    • ९४२- गोपोंके आँगन-कीचड़में..
    • ९४३- बरस रही है सबपर..
    • ९४४- कृपा कृपामयकी सदा..
    • ९४५- भय मत करो..
    • ९४६- नित्य-निरन्तर सहज..
    • ९४७- जिसने प्रभुसे कहा..
    • ९४८- एक बार शरणागत..
    • ९४९- जो अनन्त ऐश्वर्य..
    • ९५०- सब प्रकारसे मलिन..
    • ९५१- जिसको पतित समझकर..
    • ९५२- दैन्य-मूर्ति जो प्रभुकी..
    • ९५३- भरा हुआ दुस्तर दोषोंसे..
    • ९५४- सारे यज्ञ-तपोंके..
    • ९५५- घोर असाधु, मलिन-मन..
    • ९५६- मृत्युरूप बन तुम..
    • ९५७- शब्दोंके मिथ्याडम्बरसे..
    • ९५८- भोग रहे हैं सुख-दुख..
    • ९५९- प्रियतम प्रभु ऐसे स्नेही हैं..
    • ९६०- तू भाइ म्हारो रे..
  • +
    श्रीमद्भगवद्गीताके विविध प्रसंग (९६१ से ९९७)
    • ९६१- धर्मभूमि शुचि कुरुक्षेत्रमें..
    • [श्रीमद्भगवद्गीताके प्रथम अध्यायका पद्यानुवाद]
    • ९६२- उठो! कायरता छोड़ो वीर..
    • ९६३- अपना धर्म देखकर भी..
    • ९६४- जो तुम रणसे मुख मोड़ोगे..
    • ९६५- विषमस्थलमें उपजा कैसे..
    • ९६६- भारत! अब ज्ञानखड्ग लो..
    • ९६७- कर्मेन्द्रियाँ रोक जो तजता..
    • ९६८- मुझमें चित्त जोड़..
    • ९६९- सुर-ऋषि-पितर..
    • ९७०- पार्थ! यह काम पापकी..
    • ९७१- जाते वहीं कर्मयोगी हैं..
    • ९७२- ध्यानमें मन इस भाँति..
    • ९७३- सब भूतोंमें स्थित आत्मा..
    • ९७४- योगभ्रष्ट पुण्यलोकोंमें जाकर..
    • ९७५- जो संलग्न श्रेष्ठ साधनमें..
    • ९७६- मायाने है जिन लोगोंका..
    • ९७७- बहु-जन्मोंके अन्त जन्ममें..
    • ९७८- करता जो भूतोंकी पूजा..
    • ९७९- मानव जिसका सदा स्मरण..
    • ९८०- जीवनभर जिन भाव..
    • ९८१- इससे स्मरण करो तुम..
    • ९८२- मन निरुद्धकर हृदय..
    • ९८३- नरकोंमें जा पापी सहते..
    • ९८४- शुभ्र ज्योतिर्मय सुपथसे..
    • ९८५- पुण्यवान सकाम योगी..
    • ९८६- मैं ही गति, भर्ता, प्रभु..
    • ९८७- वैदिक यज्ञकर्म करते..
    • ९८८- कुन्तिपुत्र! जो अन्य..
    • ९८९- कर दैवी प्रकृतिका आश्रय..
    • ९९०- जिनसे सब प्रकारसे..
    • ९९१- हूँ महर्षियोंमें भृगु मैं..
    • ९९२- हरिकी दिव्य विभूति..
    • ९९३- नागोंमें मैं शेषनाग हूँ..
    • ९९४- ऐसी कोई वस्तु नहीं है..
    • ९९५- विश्व चराचर निकला..
    • ९९६- जिससे जीव सकल..
    • ९९७- जय भगवद्गीते, जय भगवद्गीते..
    • श्रीमद्भगवद्गीताकी आरती
  • +
    श्रीभगवन्नाम-महिमा (९९८ से १०२१)
    • ९९८- वन्दन नित्य हृदयसे..
    • ९९९- जय आनन्द, अमृत..
    • १०००- मधुरन महँ सब तें..
    • १००१- राम राम राम राम..
    • १००२- राम राम राम राम..
    • १००३- नारायण शुभ नाम दिव्य..
    • १००४- करतलसों ताली देत..
    • १००५- मुखसों कहत राम-नाम..
    • १००६- साधन नाम-सम नहिं..
    • १००७- भली है राम-नाम की..
    • १००८- भूल जग के विषयन..
    • १००९- कर मन हरि को ध्यान..
    • १०१०- बन्धुगणो! मिल कहो..
    • १०११- बन्धुगणो! मिल कहो..
    • १०१२- राम राम गाओ संतो..
    • १०१३- राम राम राम भजो..
    • १०१४- प्रेम-मुदित मन से..
    • १०१५- भजौ नित राधा नाम..
    • १०१६- और सब भूल भले ही..
    • १०१७- चाहता जो परम सुख..
    • १०१८- बिनती सुण म्हाँरी..
    • १०१९- नाचत गौर प्रेम अधीर..
    • १०२०- मेरे एक राम-नाम..
    • १०२१- जीभलड़ीने चोखी बाण..
  • +
    प्रबोध-चेतावनी (१०२२ से १०५०)
    • १०२२- अरे मन-मधुप! छोड़..
    • १०२३- अरे मन! भज..
    • १०२४- अरे मन! भज नित..
    • १०२५- अरे मन! भज नव..
    • १०२६- दुरलभ नरदेह पाइ..
    • १०२७- जिस शरीरका, मूर्ख!..
    • १०२८- कहाँ, कहाँ? किस तरफ..
    • १०२९- जो सुख-रूपी जल..
    • १०३०- रक्त-मांस-मल-मूत्र..
    • १०३१- प्रभुसे रहित, विषय-विष..
    • १०३२- भोग विषभरे मधुर..
    • १०३३- क्षणभंगुर प्रत्यक्ष जगत् के..
    • १०३४- नित्य नयी आसक्ति..
    • १०३५- जगमें तेरा कुछ नहीं..
    • १०३६- बृथा क्यौं मानव-जनम..
    • १०३७- अरे, तू क्यों अमूल्य..
    • १०३८- चेत कर नर, चेत कर..
    • १०३९- पल-भर पहले जो कहता..
    • १०४०- तजो रे मन झूठे सुखकी..
    • १०४१- जगतमें स्वारथके..
    • १०४२- मन, कछु वा दिनकी..
    • १०४३- अरे मन, तू कछु..
    • १०४४- अरे मन, कर प्रभुपर..
    • १०४५- मूढ! केहि बलपर..
    • १०४६- छोड मन तू मेरा-मेरा..
    • १०४७- जगतमें कोइ नहिं तेरा..
    • १०४८- इधर उधर क्यों भटक..
    • १०४९- भोग अति दु:ख नरकके..
    • १०५०- देख निज नित्य निकेतन..
  • +
    अभिलाषा (१०५१ से १११९)
    • १०५१- नंद-नँदन श्रीकृष्ण एक..
    • १०५२- एक लालसा मन महँ..
    • १०५३- मौन ग्रहणकर रटूँ निरन्तर..
    • १०५४- मेरे एक राधा नाम अधार..
    • १०५५- काननि सुनौं स्याम की..
    • १०५६- देखा करूँ तुम्हारी लीला..
    • १०५७- लाखों बार तपाये उज्ज्वल..
    • १०५८- नहीं चाहता राज्य चक्रवर्ती..
    • १०५९- प्रियतम! तुमने सहज..
    • १०६०- भरे रहो तुम मधुर मनोहर..
    • १०६१- तन-मन-धन अर्पन कियौ..
    • १०६२- जाहि देखि, चाहत नहीं कछु..
    • १०६३- भरे रहो तुम सदा हृदयमें..
    • १०६४- प्रियतम! भरते रहो नित्य..
    • १०६५- जगमें मरकर, तुममें..
    • १०६६- करें कभी कोई मेरा अति..
    • १०६७- हर्षित होता देख परम..
    • १०६८- मेरे अखिल विश्व-जीवनके..
    • १०६९- बनूँ तुम्हारे शयन-कक्षका..
    • १०७०- मेरी ममता सारी केवल..
    • १०७१- चाह तुम्हारी ही हो प्यारे!..
    • १०७२- अणु-महान् तुम!..
    • १०७३- प्रभो! तुम्हारी सहज..
    • १०७४- स्वामीके शुचि चरण..
    • १०७५- सुख-सम्पतिमें तव..
    • १०७६- हर लो प्रभु! मेरी..
    • १०७७- जड-चेतन—सबमें..
    • १०७८- पूरी हो सर्वत्र सर्वथा..
    • १०७९- डरें नहीं कोई भी मुझसे..
    • १०८०- नहीं मान-धन, कीर्ति..
    • १०८१- नहीं चाहता क्षणभर भी..
    • १०८२- मुझसे कभी किसी..
    • १०८३- दु:ख-मृत्युमें देखूँ मैं..
    • १०८४- शान्ति, दया, स्वाभाविक..
    • १०८५- सबको मिले सुबुद्धि..
    • १०८६- अव्यवस्थित व्यस्त घोर..
    • १०८७- प्रभुकी याद दिलानेवाले..
    • १०८८- सद्विचार हों उदित सर्वदा..
    • १०८९- रहै न रंचक राग-रति..
    • १०९०- बनूँ सदा रोगीकी औषध..
    • १०९१- प्रभुका लीला-मंच..
    • १०९२- चित्त करे प्रभुका चिन्तन..
    • १०९३- करूँ कुछ भी, कहूँ..
    • १०९४- सब अच्छा खायें..
    • १०९५- तुमहि तजि जाऊँ कहाँ..
    • १०९६- बिछुरन-मिलन सरीर..
    • १०९७- स्वागत! स्वागत! आओ..
    • १०९८-सुन्यो तेरो पतित..
    • १०९९- मो कों कछु न चहिये..
    • ११००- चहौं बस एक यही..
    • ११०१- सनातन-सत-चित..
    • ११०२- सकुच भरे अधखिले..
    • ११०३- शुद्ध, सच्चिदानंद, सनातन
    • ११०४- प्रभु अनन्त आनन्द..
    • ११०५- मन बन मधुप हरिपद..
    • ११०६- रे मन हरि-सुमिरन..
    • ११०७- मनमें चाह जगी थी..
    • ११०८- उनके होकर हम दु:खी..
    • ११०९- कर लो आत्मसात् तुम..
    • १११०- बिना प्रीति नहिं मिलते..
    • ११११- जान गया जो भरी..
    • १११२- दर-दर भटक, नीच मैं..
    • १११३- तव अनन्त आशाका..
    • १११४- ईश-विरोधी धर्म-विरोधी..
    • १११५- नहीं करूँगा कभी किसीका..
    • १११६- माधव! मन नहिं मानत..
    • १११७- दीन बन्धु हे करुणाकर..
    • १११८- सुनावौ कबि! (तुम)..
    • १११९- धन-जन-कविता सुंदरी..
  • +
    अनुभूति (११२० से १२५६)
    • ११२०- मेरे परम सुखके..
    • ११२१- क्षणभर नहीं छोड़ते मोहन..
    • ११२२- जब ते हिये बिराजे..
    • ११२३- राधा-माधव बसि रहे..
    • ११२४- मेरे द्वारा बोल रहे हैं..
    • ११२५- हटते नहीं एक पल..
    • ११२६- कर दिया प्रभुने..
    • ११२७- सच्ची सुहागिन, मैं दुहागिन..
    • ११२८- अन्तरमें हो रहा खेल..
    • ११२९- हर वस्तुका आधार जो..
    • ११३०- रात-दिवस मन में रहै..
    • ११३१- मेरी ‘मति-गति’ के..
    • ११३२- बस गया उनके हृदयमें..
    • ११३३- नहीं भूलती है कभी..
    • ११३४- प्रियके अमिलन-जनित..
    • ११३५- मेरे तुम प्रियतम परम..
    • ११३६- तन-मन-धन-जीवन..
    • ११३७- मिलनेपर भी नहीं मिटेगी..
    • ११३८- सभी वस्तुओंमें तुम देते..
    • ११३९- रहते सदा पास वे..
    • ११४०- मैं देखूँ नित श्यामको..
    • ११४१- जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिका..
    • ११४२- अति आश्चर्य, बदल दी..
    • ११४३- मनकी बात जानता मन है..
    • ११४४- तुम छाये आ उरमें..
    • ११४५- तेरा मधुर प्रेम..
    • ११४६- तुमने जो कहलाया मुझसे..
    • ११४७- नाथ! तू सर्वस्व मेरा..
    • ११४८- कौन तुम जो साथ..
    • ११४९- दिया अचल सुख मुझे..
    • ११५०- नहीं कामका रहा, छोड़..
    • ११५१- हुआ जबसे मैं तुम्हारा..
    • ११५२- जीवनमें मेरे शक्ति..
    • ११५३- मनमें, तनमें, बुद्धि..
    • ११५४- ‘मेरा’ कुछ भी है..
    • ११५५- मेरी जीवन-सरिता-धारा..
    • ११५६- मधुर हुआ जीवन सारा..
    • ११५७- तुम ही सब दुख..
    • ११५८- इस चर-अचर जगतके..
    • ११५९- अवनि, अनिल, जल..
    • ११६०- तुच्छ नगण्य सलिल..
    • ११६१- देख एक तू ही..
    • ११६२- इस अखिल विश्वमें..
    • ११६३- प्रकृति-पुरुष-परमात्मा..
    • ११६४- बाहर-भीतर तुम ही..
    • ११६५- सूर्य-सोममें, वायु..
    • ११६६- किससे कैसे कब हो..
    • ११६७- सबमें मैं ही रम रहा..
    • ११६८- मेरा जो कुछ था, सब..
    • ११६९-मेरी परम शान्ति..
    • ११७०- मैं हूँ दृढ़, मैं सदा साहसी
    • ११७१-प्रभु मेरे रहते नित पास..
    • ११७२- प्रभुसे प्यारा है न्यारा है..
    • ११७३- प्रभु मुझसे जरा भी..
    • ११७४- हुआ सच्चिदानन्द एकमें..
    • ११७५- ईश्वरकी शुभ दृष्टिका..
    • ११७६- देते हैं भगवान सदा..
    • ११७७- देख रहा प्रत्यक्ष पूर्ण मैं..
    • ११७८- हर स्थितिमें, हर जगह..
    • ११७९- मेरे चारों ओर विराजित..
    • ११८०- मेरे द्वारा होता जो कुछ..
    • ११८१- मेरे मनमें नित प्रविष्ट..
    • ११८२- मैं अपने प्यारे ईश्वरका..
    • ११८३- मैं कैसा भी हूँ, पर..
    • ११८४- मैं प्रभुका, प्रभु मेरे..
    • ११८५- हम उनके हैं सदा सर्वथा..
    • ११८६- मैं प्रभुका, वे प्रभु हैं मेरे..
    • ११८७- मैं रहता हूँ प्रभुमें ही नित..
    • ११८८- आज मिल गया मुझे..
    • ११८९- रहूँ कहीं कैसे भी..
    • ११९०- भगवत्कृपा अलौकिकने कैसे..
    • ११९१- नित्य प्रकाशरूप प्रभु रहते..
    • ११९२- करुणामयने कर लिया मुझे..
    • ११९३- जड शरीर मैं नहीं, दिव्य..
    • ११९४- आया, छाया मेरे अंदर..
    • ११९५- घेरे हुए मुझे है..
    • ११९६- प्रभु मेरे, मैं केवल प्रभुका..
    • ११९७- प्रभुकी परम कृपासे मैं..
    • ११९८- बसे निरन्तर मेरे अन्तर..
    • ११९९- दिनकर उगता, रजनी आती..
    • १२००- प्रेमरूप हरि बस गये..
    • १२०१- सारी ममता सदाको..
    • १२०२- हम उनके, वे सदा हमारे..
    • १२०३- सफल जीवन हो गया, वैराग्यका..
    • १२०४- काहू कौ नहिं दास मैं..
    • १२०५- जीवन-मरण निरोग-रोगकी..
    • १२०६- मेरे अंदर भरी नित्य है..
    • १२०७- जान गया मैं, परम सुहृद..
    • १२०८- राम मेरा बल..
    • १२०९- किसमें पाप-दोष देखूँ मैं..
    • १२१०- प्रभु-प्रसादसे प्रकट हो..
    • १२११- किया कृपा कर प्रभुने..
    • १२१२- ममता एकमात्र प्रभु..
    • १२१३- हम उनके ही, केवल..
    • १२१४- छाये मधुर-मधुर वे..
    • १२१५- प्रभुकी अनुकम्पा परम..
    • १२१६- कभी विलग होते न..
    • १२१७- मिले मधुर मुझको..
    • १२१८- करना, न करना, न कराना..
    • १२१९- इस जगकी कोई वस्तु..
    • १२२०- मेरे मंगलमय रसमय प्रभु..
    • १२२१- जायें कहीं, मिलें, न मिलें वे..
    • १२२२- मिटे सभी संकल्प..
    • १२२३- बँधा, बँधा, मैं सदा..
    • १२२४- बड़भागी है वही..
    • १२२५- क्रोध, कपट, भय..
    • १२२६- बीत रहा है मेरा पल..
    • १२२७- रहूँ भले यात्रामें..
    • १२२८- हटा मोहका पर्दा गहरा..
    • १२२९- टूट गये जगके..
    • १२३०- मिट गये भ्रम-भय..
    • १२३१- तुम्हीं सदा सुखरूप..
    • १२३२- जीवन-मरण, दु:ख-सुख..
    • १२३३- कभी तुम बन सुखमय..
    • १२३४- प्रियतम! न छिप सकोगे..
    • १२३५- ज्यों-ज्यों मैं पीछे हटता..
    • १२३६- भला किया प्रभु!..
    • १२३७- परम प्रिय मेरे प्राणाधार!..
    • १२३८- दारुण अशान्तिकी आग..
    • १२३९- सौंप दिये मन-प्राण..
    • १२४०- छीनकर सहज सभी संसार..
    • १२४१- दु:ख-सुख सारे..
    • १२४२- प्राणि-पदार्थ किसीपर भी..
    • १२४३- प्राणनाथ! तुम्हारे बिना..
    • १२४४- भर गया मेरे हृदयमें..
    • १२४५- नाथ! तुम्हारी कृपा अहैतुक..
    • १२४६- नाथ! तुम्हारी कितनी..
    • १२४७- होता नहीं कभी चंचल..
    • १२४८- जगमें सुख-दुख..
    • १२४९- आओ सब मिल..
    • १२५०- तुम्हारा नाथ! अनोखा प्यार..
    • १२५१- नीच नराधम होनेपर भी..
    • १२५२- पुत्र-शोक-संतप्त..
    • १२५३- भीषण तम-परिपूर्ण..
    • १२५४- देख दु:खका वेष धरे..
    • १२५५- मृत्यु! भयानक आयी..
    • १२५६- हैं भरे भगवान मुझमें..
  • +
    व्यवहार-परमार्थ (१२५७ से १५०३)
    • भगवान् की सर्वव्यापकता
    • १२५७- अनोखा अभिनय यह संसार..
    • १२५८- सकल जग हरि कौ..
    • १२५९- विश्व-वाटिकाकी प्रति..
    • १२६०- वे हरि सब में बसि रहे..
    • १२६१- ब्राह्मण-श्वपच, देवता..
    • १२६२- मानव-दानव-गाय..
    • १२६३- ईश्वरमें हैं नहीं कभी..
    • १२६४-सकल विश्वमें रम रहे..
    • १२६५- जगतीमें यह जो कुछ..
    • १२६६- सर्वसमर्थ, सर्वके प्रेरक..
    • १२६७- हर पदार्थमें देखो हरिको..
    • १२६८- रहो सदा पर-हित..
    • १२६९- माता-पिता-सुसेवकके..
    • १२७०- जो नित सबमें देखता..
    • १२७१- नभ, अनिल, अनल..
    • १२७२- एक ‘उपास्य’ देव ही..
    • १२७३- निर्गुण-निराकार हैं वे..
    • १२७४- विश्वचराचरमें जो छाये..
    • १२७५- ब्रह्म सगुण-निर्गुण..
    • १२७६- दु:खालय अनित्य दारुण..
    • १२७७- तनकी रक्षा करने..
    • १२७८- जाग रहे तुम कौन..
    • १२७९- कितने तुम अनुपम..
    • १२८०- स्तुति निन्दा, पूजा-घृणा..
    • १२८१- है प्रत्येक अभाव-दशामें..
    • १२८२- लाभ-हानि, सुख-दु:ख..
    • १२८३- मत निराश हो..
    • १२८४- अमावास्या घोर तममयी..
    • १२८५- नित्य जो भगवानकी..
    • १२८६- मायाके प्रवाहमें पड़कर..
    • १२८७- मानव-जीवनमें कटुता..
    • १२८८- जानता हूँ पाप है..
    • १२८९- तुम ही मेरी हो धन-दौलत..
    • १२९०- सहज सुहृद, अतिशय..
    • १२९१- नित्य दयामय, मंगलमय..
    • १२९२- सदा प्रसन्न रहो..
    • १२९३- तुम सुखी रहो..
    • १२९४- सुखी रहो, नित शान्त..
    • १२९५- बसें तुम्हारे हृदय..
    • १२९६- हो रहो उसके..
    • १२९७- भजहिं भावजुत जे सदा..
    • १२९८- अर्पण कर दो रामको..
    • १२९९- मनसे नित चिन्तन....
    • १३००- बरस रही प्रभु-कृपा
    • १३०१- जो कुछ खाओ..
    • १३०२- जिसने देखा कभी हृदय..
    • १३०३- करत नहिं क्यों प्रभु..
    • १३०४- जन्म-मरणके दु:ख..
    • १३०५- अगर चाहते परम शान्ति..
    • १३०६- सेवा करो जगतकी..
    • १३०७- अपने भले-बुरेका..
    • १३०८- प्रकृति-जगतके भोग..
    • १३०९- प्राकृत जगत्, प्रकृति..
    • १३१०- जग की छोड़े आस..
    • १३११- सकल चराचर विश्वमें..
    • १३१२- धर्म करता है चित्त..
    • १३१३- काम-क्रोध, लोभ..
    • १३१४- एकमात्र प्रभुकी सेवा..
    • १३१५- सबमें समझो एक..
    • १३१६- धन-ऐश्वर्य, सफलता..
    • १३१७- हरि-पद-पदुम..
    • १३१८- धर्म मूल पावन..
    • १३१९- नहिं ममता, नहिं कामना..
    • १३२०- पिता तीर्थ है, जननि..
    • १३२१- निज सुखकी परवाह..
    • १३२२- मुख, बाहू, जङ्घा..
    • १३२३- सत्य वचन हितकर..
    • १३२४- वैश्य जो न्याय..
    • १३२५- व्रत-उपवास-नियम..
    • १३२६- पुत्र सुपुत्र वही जो..
    • १३२७- पति-सेवाको मानती..
    • १३२८- समझकर पत्नीको अर्धांग..
    • १३२९- भारतीय नर-नारी..
    • १३३०- जिनसे जगती विषय-वासना..
    • १३३१- सर्व-शिरोमणि विश्व-सभाके..
    • १३३२- संत महा गुन-खानी..
    • १३३३- गुरु यथार्थमें वही..
    • १३३४- जिसका मन है अमल..
    • १३३५- रह न गया जिसमें..
    • १३३६- हरिने आदर दिया जिसे..
    • १३३७- ईश्वर नित्य प्रसन्न-वदन हैं..
    • १३३८- यद्यपि तूने किये अनेकों..
    • १३३९- स्तुति-निन्दा, सुख-दु:ख..
    • १३४०- ‘योग-विभूति-सिद्धि’
    • १३४१- जड-चेतन सबमें..
    • १३४२- प्रभु-सेवामें ‘अहं’ समर्पित..
    • १३४३- जगमें जो कुछ भी है..
    • १३४४- द्वेष-रहित, जो मित्र..
    • १३४५- काम-क्रोध-लोभ..
    • १३४६- दम्भ-मान-मद..
    • १३४७- पर-निंदा मिथ्या करि..
    • १३४८- जिनके परस-दरस..
    • १३४९- नहीं जरा भी जिनमें..
    • १३५०- नित्य ‘ज्ञानमय’, ‘नित्य ज्ञान’..
    • १३५१- मिलता नहीं बिना हरिकी..
    • १३५२- सुख-दु:खोंसे रहित..
    • १३५३- निर्गुण-निराकारके साधक..
    • १३५४- मानवका है चरम परम..
    • १३५५- मानव वह जो करता है..
    • १३५६- माता, पिता, देव..
    • १३५७- पाता है जो जीवनमें..
    • १३५८- मानव-जीवनका है पावन..
    • १३५९- मानव-जीवन मूल्यवान..
    • १३६०- श्रेय परम मानव-जीवनका..
    • १३६१- भोग अनित्य, अपूर्ण सदा हैं..
    • १३६२- इन्द्रियके सब भोग विविध..
    • १३६३- चाहे हों कितने ही..
    • १३६४- मन मति सात्त्विक रहे..
    • १३६५- जबतक यह आस्था है..
    • १३६६- दुर्लभ मानव-तन मिला..
    • १३६७- विश्व-चराचरमें है व्यापक..
    • १३६८- जन्म-मरणके चक्र घोरका..
    • १३६९- मानव! मानवता धारण कर..
    • १३७०- मानव आज बन गया दानव..
    • १३७१-भय, व्याकुलता, क्रोध..
    • १३७२- प्राणिमात्रमें बस रहे..
    • १३७३- घोर अविद्या, जो मानवको..
    • १३७४- राष्ट्रोंमें हो प्रेम परस्पर..
    • १३७५- सबके प्रभु! सर्वान्तर्यामी!..
    • १३७६- द्वेष-अमर्ष-वैर-हिंसा..
    • १३७७- देवाराधन करें-करायें..
    • १३७८- सत्य, अहिंसा, सेवा..
    • १३७९- सत्य-धर्म-रत..
    • १३८०- गाली सुनकर भी..
    • १३८१- दु:ख पराया जिसका..
    • १३८२- मन वशमें हो, इन्द्रिय..
    • १३८३- विजयी वही, स्वतन्त्र वही..
    • १३८४- जिसके मन बसते सदा..
    • १३८५- पर-दुख को निज..
    • १३८६- सब बिधि सौं सेवा..
    • १३८७- देश मैं है, देश मैं..
    • १३८८- जबतक भोगोंकी खोज..
    • १३८९- पर-सुखमें दुख, पर..
    • १३९०- जिनसे तृष्णा-कामना..
    • १३९१- जिनका हो परिणाम..
    • १३९२- धन, जन, पद..
    • १३९३- सावधान रह, रहो देखते..
    • १३९४- राह पड़े सूखे तृणसे..
    • १३९५- राग, काम, मद..
    • १३९६- वर्ण-जाति, धन-जन..
    • १३९७- संयम-नियम-पूर्ण..
    • १३९८- प्राणिमात्रसे द्वेषरहित रह..
    • १३९९- अहित, असत्य, व्यर्थ..
    • १४००- मन-इन्द्रिय-शरीर..
    • १४०१- तन-इन्द्रियको वशमें..
    • १४०२- मनको वश कर..
    • १४०३- मन-इन्द्रियको वशमें..
    • १४०४- पर हितको निज अहित..
    • १४०५- भजन-धनको छोड़कर..
    • १४०६- प्रेम-भजन ही असली..
    • १४०७- छिन-छिन हरि-सुमिरन..
    • १४०८- जो तू चाहे शान्ति-सुख..
    • १४०९- विषय-बासना तममयी..
    • १४१०- करते रहो निरन्तर प्रतिदिन..
    • १४११- भगवच्चिन्तन, सत्-चिन्तन..
    • १४१२- जगत में कीजै यों ब्यवहार..
    • १४१३- पुत्र पितामें देखे ईश्वर..
    • १४१४- जीव चराचरमें बसे..
    • १४१५- भगवानने दी जो परिस्थिति..
    • १४१६- सत्ता कभी न ‘असत्’..
    • १४१७- इह-पर दोनों लोकमें..
    • १४१८- रखो मत आसक्ति कर्ममें..
    • १४१९- सबका नित आदर करो..
    • १४२०- हित-मित-सत्य-मधुर..
    • १४२१- तन-मन-धन सौं कीजिये..
    • १४२२- दया देखती नहीं जाति..
    • १४२३- परम श्रेष्ठ जन समुद..
    • १४२४- देखो दु:खी-दीन..
    • १४२५- सत्य-धर्मसे अल्प भी..
    • १४२६- सबमें देखो निज आत्माको..
    • १४२७- जो निर्भर करता प्रभुपर..
    • १४२८- जीवनके सर्वोत्तम काम..
    • १४२९- मन सत-संगति नित..
    • १४३०- जिनसे बढ़े तमोगुण तमकर..
    • १४३१- दुर्जन-संग कबहुँ..
    • १४३२- कभी न चाहो, किसी..
    • १४३३- जो कुछ मिला, मिल..
    • १४३४- जो कुछ भी है मिला तुम्हें..
    • १४३५- जो कुछ है, मिलता है..
    • १४३६- वस्तुमात्र जो तुम्हें मिली..
    • १४३७- मिले तुम्हें जो तन-मन..
    • १४३८- भूखे जनको अन्न-दान..
    • १४३९- डरे हुएको अभय-दान..
    • १४४०- जहाँ ‘घृणा-संदेह’ भरे हैं..
    • १४४१- वैरीको दो क्षमा..
    • १४४२- भूलो—हुआ कभी जो..
    • १४४३- विपद-पड़े असहाय दीनका..
    • १४४४- कभी परायी वस्तुपर मत..
    • १४४५- सबको शुभ संकेत सदा..
    • १४४६- नित करो भला ही सब..
    • १४४७- दया करो तुम जीवमात्रपर..
    • १४४८- दु:ख-अहित-उद्वेगकर..
    • १४४९- रक्षा करो पराधिकारकी..
    • १४५०- करो सत्य व्यवहार..
    • १४५१- सुखियोंका सुख है..
    • १४५२- मत हँसो, किसीको गिरते..
    • १४५३- करो न पर-दोषोंका..
    • १४५४- मत देखो, किसके अंदर..
    • १४५५- देखो अपने दोष..
    • १४५६- देखो नहीं, करो मत..
    • १४५७- उत्तम वह जो पर-दोषोंको..
    • १४५८- है सौभाग्यवान पुण्यात्मा..
    • १४५९- जैसा बीज, बहुत-से होते..
    • १४६०- अपने लिये चाहते सबसे..
    • १४६१- शुद्ध कमाई अपने श्रमकी..
    • १४६२- धनका साधन, प्राप्ति..
    • १४६३- कर प्रमाद मत बनो आलसी..
    • १४६४- धनासक्त मानवमें होते..
    • १४६५- सुर-ऋषि-पितर-मनुज..
    • १४६६- जीवन, तन, मन, वचन..
    • १४६७- कबतक फँसे रहोगे..
    • १४६८- राखै अपुने कौं सदा..
    • १४६९- मिला हुआ जो न्यायोपार्जित..
    • १४७०- मांस, मद्य, अंडे, अशुचि..
    • १४७१- मानव, पशु, पक्षी, लता..
    • १४७२- कभी न करो किसी भी..
    • १४७३- जैसे कर्म किये जीवनभर..
    • १४७४- मृत्यु-समयकी अनुपम सेवा..
    • १४७५- भूत-प्रेतकी पूजा करता..
    • १४७६- काम-लोभ-बस कोप..
    • १४७७- पापका धन सदा रह..
    • १४७८- क्रोध है बहुत बड़ा..
    • १४७९- मित्रोंको नहिं दोष..
    • १४८०- नाम-रूपका बना हुआ है..
    • १४८१- जिसमें नहीं विनय..
    • १४८२- हो शरीर सेवा-संयममय..
    • १४८३- अस्थि-चर्म-मात्र..
    • १४८४- पहले ‘मैं’, फिर ‘मेरी पार्टी’..
    • १४८५- देश-धर्मको भूले..
    • १४८६- धर्महीन जीवन पशु..
    • १४८७- काम-भोग-पर केवल..
    • १४८८- महापुरुष, योगी बने..
    • १४८९- दु:खोंसे है भरा हुआ..
    • १४९०- जिस मानव-शरीरमें होते..
    • १४९१- जबसे बना हमारे जीवनका..
    • १४९२- लक्ष्य भूल मानव जीवनका..
    • १४९३- सत्य ढक गया है अब तमसे..
    • १४९४- ‘जीवन ऊँचे स्तर’ का हो..
    • १४९५- है सब जीवोंमें एक आत्मचैतन्य..
    • १४९६- हुए विदेशी हम स्वदेशमें..
    • १४९७- (निज) देशमें ही आज..
    • १४९८- नभमें शब्द भर रहे सारे..
    • १४९९- मानवके हैं प्राण-आत्मा..
    • १५००- दम्भ-मान-मदयुक्त..
    • १५०१- धन-दौलत, अधिकार..
    • १५०२- धरकर वेश त्यागियोंका..
    • १५०३- हो गया उनका..
  • +
    प्रकीर्ण (१५०४ से १५६५)
    • १५०४- नेहभरी श्रीनेहलता!..
    • एक प्रेमी सज्जनको सलाह
    • १५०५- जबहि तें मोहन दृष्टि परॺो..
    • प्रेमावस्था
    • १५०६- मिले पै मन की नहीं..
    • १५०७- प्रेम-सिरोमनि, प्रेम-मनि..
    • १५०८- महाभाव-रसराजके मधुर..
    • १५०९- निज तन-मन जिनके..
    • १५१०- ठाढ़ी जसुमति मातु निज..
    • १५११- विश्व-पावनी बाराणसिमें संत..
    • ब्राह्मण और बिच्छूकी कथा
    • १५१२- फैल गयी यह ख्याति..
    • मालिकका दान
    • १५१३- वृन्दावन यमुना-तट बैठे..
    • पारस
    • १५१४- धन्य कपोत-कपोती दंपति..
    • अतिथि-सेवा
    • १५१५- क्षुधा-क्षुब्ध अति व्याधको..
    • अतिथि-सेवक-कपोतका बलिदान
    • १५१६- गौतम अति कृतघ्न पापी..
    • राजधर्माका विलक्षण मित्र-धर्म
    • १५१७- सुनकर सिंह-गर्जना हरिणीने..
    • मोहकी महिमा
    • १५१८- गाते भगवन्नाम निरन्तर..
    • नाम-गान-परायण श्रीनारद
    • १५१९- नित्य निरन्तर करते रहते..
    • १५२०- भक्त-कीर्तनाचार्य-मुकुटमणि..
    • १५२१- दु:ख-नाश, सुख लाभ..
    • ध्रुवको माताका उपदेश
    • १५२२- राम-नाम जपनेवालोंको..
    • अग्निमें बैठे हुए प्रह्लादकी उक्ति
    • १५२३- त्याग-तपस्या-क्षमामय..
    • महर्षि वसिष्ठ
    • १५२४- भेदरहित सम, ब्रह्मद्रष्टा..
    • विरक्त भक्त श्रीशुकदेव
    • १५२५- शीत-उष्ण, सुख-दु:ख..
    • द्वन्द्वातीत जडभरत
    • १५२६- विधिवत् अग्नि-स्थापना..
    • शरभंग मुनिका ब्रह्मधाम-प्रयाण
    • १५२७- खेलत गुल्ली कुएँ गिरी..
    • गुरु द्रोण और कौरव-पाण्डव बालक
    • १५२८- बान-वेध-कौसल..
    • अनोखी गुरु-दक्षिणा
    • १५२९- विप्र याजके द्वारा सुरसरि..
    • द्रौपदीकी यज्ञसे उत्पत्ति
    • १५३०- सुर-अप्सरा उर्वशीने..
    • अर्जुनका विशुद्ध आचरण और उर्वशीका शापरूप वरदान
    • १५३१- राजा श्वेत हुए अति..
    • अन्न-दान न करनेसे दुर्गति
    • १५३२- भक्ति की महिमा अतुल अपार..
    • भक्तिकी महिमा
    • १५३३- जिनका चित्त लगा श्रीहरिमें..
    • यमराजका दूतोंके प्रति आदेश
    • १५३४- आत्मसमर्पण आत्मविसर्जन..
    • पतिप्राणा सतियोंकी जय
    • १५३५- करके त्याग अन्न-जल..
    • वैष्णवाग्रॺ श्रीरघुनाथदास गोस्वामी
    • १५३६- हरि-हर विधि, शशि-सूर्य..
    • गोमाताके अंग-अंगमें देवताओंका निवास
    • १५३७- गो-हत्या होगी नहीं..
    • गोवध सर्वथा बंद हो
    • १५३८- जिस गोमाताके रक्षण..
    • गोमाताके लिये प्रार्थना
    • १५३९- भगवन्! ऐसी सन्मति दो..
    • १५४०- गौ भारतका प्राण है..
    • गोरक्षाकी महिमा
    • १५४१- हे भगवान! हे भगवान..
    • बालककी दैनिक प्रार्थना
    • १५४२- मैया! मैं अब खूब पढ़ूँगा..
    • बालकका मनोरथ
    • १५४३- ‘मैया! कितने अपराध..
    • माँका दुलार
    • १५४४- साधन-हीन, मलीन-मन..
    • समर्पण
    • १५४५- जा प्रभु के पद-पदुम..
    • १५४६- पाप-वासना भर मनमें..
    • धर्म-मार्गसे डिगानेकी चेष्टाका कुपरिणाम
    • १५४७- एक ब्रह्म है व्यापक..
    • चीन-दमनकी साधना और सिद्धि
    • १५४८- ज्ञान-योग-वैराग्य..
    • कल्याण-भावना
    • १५४९- श्रीराधा-माधव हम सबका
    • दीपमालिकाका वन्दन
    • १५५०- दीप-ज्योति जाग्रत् कर..
    • १५५१- पुत्रि! समर्पित जीवन..
    • शुभाशंसा
    • १५५२- पावन सुख-सम्पन्नता..
    • १५५३- दीर्घ आयु, आरोग्य..
    • १५५४- सदाचार-सुविचार हों..
    • १५५५- मंगलमय जीवन रहे..
    • १५५६- सात्त्विक सुख-समृद्धि..
    • १५५७- श्वेतद्वीपमें जा नारदने..
    • १५५८- दीपावलिकी दीपज्योतिसे..
    • १५५९- तुमने ही प्रभु! आत्मरूपसे..
    • १५६०- डरपो मत प्रभुजीको..
    • १५६१- आवो आवोजी सगाजी..
    • १५६२- श्रीराम भजे सब म्हारे..
    • १५६३- अभ्युदय हो सभीका..
    • १५६४- शक्ति-प्रेरणा-स्फुरणा..
    • स्वात्म-समर्पण
    • १५६५- प्रेरक तुम, प्रेरणा तुम्हारी..
  • +
    ‘पद-रत्नाकर’ पर सम्माननीय विद्वानोंके विचार
    • परम आदरणीय श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, झूँसी (प्रयाग)
    • पूज्य श्रीडोंगरेजी महाराज
    • प्रभुपाद प्राणकिशोर गोस्वामी
    • याज्ञिक सम्राट् पं० श्रीवेणीरामजी शर्मा गौड, वेदाचार्य, काव्यतीर्थ, वाराणसी
    • डॉ० विजयेन्द्र स्नातक, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
    • डॉ० रामकुमार वर्मा, भू० पू० हिंदी-प्रोफेसर, मास्को, (सोवियत-संघ) प्रयाग
    • व्रज साहित्यके मर्मज्ञ डॉ० प्रभुदयाल मीतल, मथुरा
  • अंतिम पृष्ठ

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