
उत्तमा तारकोपेता मध्यमा लुप्ततारका।
कनिष्ठा सूर्यसहिता प्रात:संध्या त्रिधा स्मृता॥ १॥
तारोंके रहते की हुई संध्या उत्तम, तारे लुप्त होनेपर की गयी संध्या मध्यम तथा सूर्योदय को बाद की गयी संध्या कनिष्ठ – इस प्रकार प्रातः संध्या तीन प्रकारकी कही गयी है।
मध्या मध्याह्ने॥ २॥
दोपहरकी संध्या मध्याह्नमें की जाती है।
उत्तमा सूर्यसहिता मध्यमा लुप्तभास्करा।
कनिष्ठा तारकोपेता सायंसंध्या त्रिधा स्मृता॥ ३॥
सूर्यके रहते की हुई संध्या उत्तम, सूर्यास्त होने के बाद की गयी संध्या मध्यम तथा तारे उदय होने के बाद कनिष्ठ – इस प्रकार सांय संध्या तीन प्रकारकी कही गयी है।
सन्ध्या येन न विज्ञाता सन्ध्या येनानुपासिता।
जीवन्नेव भवेच्छूद्रो मृत: श्वा चाभिजायते॥
(देवीभागवत ११। १६। ६)
‘जो द्विज संध्या नहीं जानता और संध्योपासन नहीं करता वह जीता हुआ ही शूद्र हो जाता है और मरनेपर कुत्तेकी योनिको प्राप्त होता है।’
सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्ह: सर्वकर्मसु।
यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्॥
(दक्षस्मृति २। २०)
‘संध्याहीन द्विज नित्य ही अपवित्र है और सम्पूर्ण धर्मकार्य करनेमें अयोग्य है। वह जो कुछ अन्य कर्म करता है उसका फल उसे नहीं मिलता।’
न तिष्ठति तु य: पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम्।
स शूद्रवद्बहिष्कार्य: सर्वस्माद् द्विजकर्मण:॥
(मनु० २। १०३)
‘जो द्विज प्रात:काल और सायंकालकी संध्या नहीं करता, उसे शूद्रकी भाँति द्विजातियोंके करने योग्य सभी कर्मोंसे अलग कर देना चाहिये।’
सन्ध्यामुपासते ये तु सततं शंसितव्रता:।
विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकं सनातनम्॥
(अत्रि)
‘जो प्रशंसितव्रती सदा संध्योपासन करते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं और वे सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं।’
यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां हि विकर्मस्थास्तु वै द्विजा:।
तेषां वै पावनार्थाय सन्ध्या सृष्टा स्वयम्भुवा॥
(याज्ञवल्क्य)
‘इस पृथ्वीपर निषिद्ध कर्म करनेवाले जितने भी द्विज हैं, उन सबको पवित्र करनेके लिये स्वयं ब्रह्माजीने संध्याका निर्माण किया।’
निशायां वा दिवा वापि यदज्ञानकृतं भवेत्।
त्रिकालसन्ध्याकरणात् तत्सर्वं हि प्रणश्यति॥
(याज्ञवल्क्य)
‘रातमें या दिनमें जिस किसी समय अज्ञानके कारण जो भी अनुचित कर्म घटित हो जाते हैं, वे सब त्रिकाल-संध्या करनेसे नष्ट हो जाते हैं।’
सन्ध्यालोपस्य चाकर्ता स्नानशीलश्च य: सदा।
तं दोषा नोपसर्पन्ति गरुत्मन्तमिवोरगा:॥
(कात्यायन)
‘जो कभी संध्याका लोप नहीं करता अर्थात् नित्य संध्या करता है और जो सदा स्नानशील है, उसके पास दोष उसी तरह नहीं रहते जैसे गरुडके सांनिध्यमें साँप।’



































































































































































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