॥ श्रीहरि:॥

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निष्काम श्रद्धा और प्रेम

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

गीताजीके तीसरे अध्यायके १८वें श्लोकमें कहा है—
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय:॥
जो महात्मा हैं वह कोई काम करें, उन्हें करनेसे भी कोई प्रयोजन नहीं है और न करनेसे भी कोई प्रयोजन नहीं है। उन्हें जड़-चेतन किसीसे भी कोई प्रयोजन नहीं। महात्माका सम्पूर्ण भूतोंसे कुछ भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता, फिर भी उनके द्वारा संसारके कल्याणके कार्य किये जाते हैं। परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका की एक बड़ी भूख स्वाभाविक थी कि जीवमात्रका कल्याण हो; अत: उन्हें प्रवचन देनेका बड़ा उत्साह था। घंटों-घंटों प्रवचन देकर भी थकावट महसूस नहीं करते थे। उन प्रवचनोंको उस समय प्राय: लिख लिया जाता था। उनका कहना था—‘जबतक ये बातें जीवनमें न आ जायँ यानी कल्याण न हो जाय तबतक ये बातें हमेशा ही नयी हैं, इन्हें बार-बार सुनना, पढ़ना, मनन करना और जीवनमें लानेकी चेष्टा करनी चाहिये।’ उनके द्वारा दिये गये कुछ प्रवचनोंको यहाँ पुस्तकरूपमें दिया किया जा रहा है। हमें इन लेखों-बातोंको जीवनमें लानेके भावसे बार-बार इनका पठन तथा मनन करना चाहिये।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • दयाका तत्त्व
  • श्रद्धानुसार लाभ
  • श्रद्धाका क्रम
  • प्रेमका स्वरूप
  • ईश्वर और महापुरुषके आज्ञापालनका महत्त्व
  • प्रभुसे पुकार करें
  • निष्कामभावका क्रम
  • ध्यानका विषय
  • नवधा भक्ति
  • प्रेमके साधनका क्रम
  • ज्ञान और योग
  • तीर्थोंमें पालनीय बातें
  • श्रद्धासे विशेष लाभ
  • भगवान‍्का तत्त्व-रहस्य
  • भगवान‍्की परीक्षा—विपत्ति
  • तत्त्वज्ञान
  • सिद्ध महापुरुषकी स्थिति
  • महात्मा बननेका उपाय
  • भगवान‍्का रसास्वाद
  • तीर्थोंमें करनेयोग्य बातें
  • साधनकी स्थायी स्थिति
  • अन्तिम पृष्ठ

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