॥ श्रीहरि:॥

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नेत्रों में भगवान् को बसा लें

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • नेत्रोंमें भगवान‍्को बसा लें
  • सच्चिदानन्दकी एकता
  • संसार परमात्मस्वरूप ही है
  • ध्यानकी विशेषता
  • व्यापारसे भगवत्प्राप्ति
  • निराकारका ध्यान
  • घर-घरमें मूर्तिपूजा
  • अनित्यका त्याग आवश्यक
  • नीति और साधुता
  • श्रद्धाकी महिमा
  • स्मृतिकी महिमा
  • गीताकी महिमा
  • भगवान‍्की आवश्यकता
  • भगवान‍्की दयालुता
  • पतिकी सेवा सर्वोच्च सेवा है
  • अन्याय कभी न करें
  • सिद्धके स्वप्नमें भी दोष नहीं घट सकता
  • सत्संगका दुरुपयोग न करें
  • चेतावनी
  • नियमपालन और विश्वासकी महिमा
  • साधनाको गुप्त रखें
  • साधनमें श्रद्धाकी आवश्यकता
  • कर्मयोग तथा भक्तियोग
  • मनुष्यका कर्तव्य
  • उदारता ही सार है
  • सर्वस्व देकर भी भगवत्प्रेम प्राप्त करें
  • अन्तिम पृष्ठ

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