॥ श्रीहरि:॥

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नवधा भक्ति

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

इस पुस्तकके प्रणेता हैं गीताप्रेसके संस्थापक परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका। इनको भगवान् विष्णुने अपने चतुर्भुजरूपके दर्शन दिये थे तथा इन्हें जीवोंके कल्याणका अधिकारप्राप्त था। श्रद्धा, प्रेमपूर्वक इनके दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप तथा चिन्तनसे सभी परम पवित्र बन जाते थे। इनकी लिखी हुई पुस्तकोंको पढ़कर मनन करते हुए यदि वर्तमानमें पापकर्म त्याग दे तो मनुष्यका कल्याण निश्चित है।
भक्तशिरोमणि प्रह्लादके पिता हिरण्यकशिपुने उनसे पूछा कि इतने दिनोंमें तुमने गुरुजीसे जो शिक्षा प्राप्त की है, उसमेंसे सबसे अच्छी बात मुझे सुनाओ। प्रह्लादजीने कहा—
श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
यह नौ प्रकारकी भक्ति मेरी दृष्टिमें सबसे उत्तम वस्तु है।
इन नौ प्रकारकी भक्तिका विवेचन इस पुस्तकमें हुआ है। भगवान् को प्राप्त करनेके लिये कर्म, भक्ति, ज्ञान-सभी मार्ग उत्तम हैं, परन्तु भक्तिकी महिमा शास्त्रोंमें विशेष रूपसे बतायी गयी है। इस नवधा भक्तिमेंसे जिसमें एक प्रकारकी भी भक्ति होती है, वह संसारसागरसे अनायास तरकर भगवान् को प्राप्त कर लेता है। जिनमें प्रह्लादजीकी तरह नवों भक्तिका विकास हो, उनका तो कहना ही क्या है।
श्रद्धेय श्रीगोयन्दकाजीने लिखा कि एक प्रकारकी भक्ति भी हममें आ जाय तो हमारा कल्याण निश्चित है। प्रत्येक प्रकारकी भक्ति हम जीवनमें कैसे लायें, इस बातका स्पष्टीकरण भक्तोंके उदाहरणके द्वारा इस पुस्तकमें किया गया है। 
श्रीभरतजीमें नवों प्रकारकी भक्ति थी। उनके चरित्रद्वारा भी इन नवों प्रकारकी भक्तिका वर्णन इस पुस्तकमें हुआ है।
सभीसे निवेदन है कि इस पुस्तकको अवश्य पढ़ें तथा जिस प्रकारकी भक्ति अनुकूल हो, उसको जीवनमें लायें। इससे पुस्तकके लेखक आपसे अनुग्रहीत होंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • नवधा भक्ति
  • श्रवण
  • कीर्तन
  • स्मरण
  • पाद-सेवन
  • अर्चन
  • वन्दन
  • दास्य
  • सख्य
  • आत्मनिवेदन
  • उपसंहार
  • +
    श्रीभरतजीमें नवधा भक्ति
    • (१) श्रवण-भक्ति
    • (२) कीर्तन-भक्ति
    • (३) स्मरण-भक्ति
    • (४) पादसेवन-भक्ति
    • (५) अर्चन-भक्ति
    • (६) वन्दन-भक्ति
    • (७) दास्य-भक्ति
    • (८) सख्य-भक्ति
    • (९) आत्मनिवेदन-भक्ति
    • उपसंहार
  • अन्तिम पृष्ठ

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