श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका के लेखोंको संशोधन करके इस पुस्तकमें संगृहीत किया गया है। इनमें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक, व्यावहारिक, नैतिक, धार्मिक, पारमार्थिक आदि उन्नतिका विषय भी दिया गया है, जो मनुष्यमात्रके लिये लाभदायक है तथा स्त्रियोंको घरवालोंके साथ परस्पर किस प्रकार त्यागपूर्वक व्यवहार करना चाहिये, यह भी बताया गया है। ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, सदाचार और मन-इन्द्रियोंके संयमकी बातें तो कल्याणकामी पुरुषके लिये इसमें पर्याप्त हैं। उत्तम गुण, उत्तम भाव, सत्पुरुषोंके संग, महिमा, गुण, प्रभाव एवं गीता-रामायण आदि अध्यात्मविषयक शास्त्रोंके स्वाध्याय आदिकी बातें भी लिखी हैं। दु:खी और अनाथोंकी निष्काम सेवा करनेसे मनुष्यकी शीघ्र उन्नति हो सकती है तथा गृहस्थाश्रममें रहकर किस प्रकार अपना जीवन बिताना चाहिये, यह भी बताया है। ईश्वर, महात्मा, शास्त्र और परलोकमें श्रद्धा-विश्वास करनेसे शीघ्र कल्याण होनेकी बात बतायी गयी है। ईश्वरभक्ति-विषयमें गीताका तात्त्विक विवेचन भी किया गया है एवं भाइयोंको परस्पर किस प्रकार प्रेम-व्यवहार करना चाहिये, यह भी दिखाया गया है। भाई या माता-बहिनें इसे पढ़कर लाभ उठावें।