॥ श्रीहरि:॥

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मनुष्य जीवन का उद्देश्य

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

संसारमें अनन्त जीव हैं। वे नाना योनियोंमें अनादिकालसे भटक रहे हैं, महान् दु:ख पा रहे हैं। कभी कृपा करके भगवान् इस जीवको मनुष्य-शरीर देते हैं—कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥ मनुष्य-शरीर पाकर मनुष्य यह सोच नहीं पाता कि मुझे ऐसा विवेकयुक्त मनुष्य-शरीर किस प्रयोजनके लिये मिला है। मुझे भगवान् ने कर्म करनेकी स्वतन्त्रता प्रदान की है। यह मनुष्ययोनि अन्य सभी योनियोंसे श्रेष्ठ है। इस योनिका उद्देश्य क्या है? इस रहस्यको महापुरुष ही यथार्थ जानते हैं।
गीताप्रेसके संस्थापक श्रीजयदयालजी गोयन्दका के हृदयमें एक भाव निरन्तर बना रहता कि मनुष्यका दु:खोंसे पिण्ड कैसे छूटे? सारे दु:ख पापोंके फल हैं। सबसे बड़ा दु:ख है पुन:-पुन: जन्मना-मरना, इससे प्रत्येक भाई-बहिन किस प्रकार मुक्त हों? उनके प्रवचनोंके विषय थे—नि:स्वार्थभावसे भगवान् समझकर प्राणियोंकी सेवा, भगवान् के निराकार-साकार-स्वरूपका ध्यान, सांसारिक विषयोंकी तुच्छता, भगवान् के प्रेमका स्वरूप, गीता, रामायण आदिकी महत्त्वपूर्ण बातें। इन प्रवचनोंको अपने जीवनमें लानेवाला इस संसार-बन्धनसे छूटकर परम आनन्दको प्राप्त हो सकता है। यह पुस्तक सन् १९४० में दिये गये कुछ प्रवचनोंका संग्रह है। हमें आशा है पाठकगण इन्हें पढ़ेंगे, मनन करेंगे तथा अपने जीवनमें लाकर अपने मनुष्य-जन्मको सार्थक करेंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • विज्ञानानन्दघन परमात्माका ध्यान
  • भगवान् की शरणागतिका रहस्य
  • संन्यास-आश्रमके धर्म
  • मनुष्य-जीवनका मुख्य उद्देश्य—भगवत्प्राप्ति
  • सगुण भगवान् की भक्तिका विषय
  • सेवा परम धन और वीरताकी बातें
  • साधनसम्बन्धी प्रश्नोत्तर
  • भगवान् के निराकार स्वरूपका ध्यान
  • क्रियामें भावकी प्रधानता
  • आत्मतत्त्वकी व्याख्या
  • सगुण भगवान् के प्रेमका विषय
  • दु:खी, आर्तकी सेवासे भगवत्प्राप्ति
  • आध्यात्मिक प्रश्नोत्तर
  • भगवान् के निराकार स्वरूपका वर्णन
  • मनुष्यशरीरकी दुर्लभता
  • मनके सुधारकी विशेष आवश्यकता
  • विषयभोगोंकी तुच्छता
  • अवश्य पालनीय बातें
  • अन्तिम पृष्ठ

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