॥ श्रीहरि:॥

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मनुष्य का परम कर्तव्य

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

इन लेखोंमें मानवमात्रके कल्याणके लिये गीतोक्त निष्काम कर्म, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, संयम, वर्णाश्रमधर्म, सत्य, श्रद्धा, समता, भगवत्प्रेम, भगवान् की दया, प्रारब्ध और पुरुषार्थ एवं यथार्थ सुख आदि अनेक आध्यात्मिक तत्त्वोंका विशद विवेचन किया गया है। साथ ही चतु:श्लोकी भागवत भी व्याख्यासहित दी गयी है। इससे यह संग्रह कर्मयोगी, भक्तियोगी और ज्ञानयोगी— सभी प्रकारके साधकोंके लिये परम उपयोगी है।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • गीताके अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करनेमें स्वतन्त्र है
  • +
    मानवता और वर्णाश्रमधर्म
    • ब्रह्मचर्याश्रम
    • गृहस्थाश्रम
    • वानप्रस्थाश्रम
    • संन्यासाश्रम
    • ब्राह्मणके धर्म
    • क्षत्रियके धर्म
    • वैश्यके धर्म
    • शूद्रके धर्म
  • इन्द्रियों और मनका विषयोंसे सम्बन्ध-विच्छेद, संयम और वैराग्य
  • भक्तों और ज्ञानियोंके लिये भी शास्त्रविहित कर्मोंकी परम आवश्यकता
  • लोकसंग्रहका रहस्य
  • संयमसे आत्मोद्धार
  • सत्यकी महिमा
  • प्रारब्ध और पुरुषार्थका रहस्य
  • अपने उत्थानके प्रयत्नकी परम आवश्यकता
  • साधन तेज न होनेमें अश्रद्धा ही प्रधान कारण है
  • साधनको साध्यसे भी अधिक आदर देना चाहिये
  • आद्याशक्ति भगवती देवी और ब्रह्मकी एकता
  • भगवदर्थ कर्म और भगवान् की दयाका रहस्य
  • +
    चतु:श्लोकी भागवत
    • चतु:श्लोकी भागवत
  • भगवत्प्रेमकी प्राप्ति और वृद्धिके विविध साधन
  • मानवताके पूर्ण आदर्श मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम
  • गीतामें भजन
  • गीता पढ़नेके लाभ
  • +
    सुखोंके भेद और यथार्थ सुखकी महत्ता
    • १—तामस सुख
    • २—राजस सुख
    • ३—सात्त्विक सुख
    • ४—यथार्थ सुख
  • +
    परमानन्दस्वरूप निरतिशय असली सुखकी प्राप्तिके साधन
    • परिणामदु:ख
    • तापदु:ख
    • संस्कारदु:ख
    • गुणवृत्तिविरोधजन्य दु:ख
  • ज्ञानकी सात भूमिकाएँ
  • ज्ञान और भक्तिके साधनसे अहंता-ममताका अभाव
  • समताका स्वरूप और महिमा
  • स्वेच्छा, परेच्छा और अनिच्छा*
  • अन्तिम पृष्ठ

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