॥ श्रीहरि:॥

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मानव कल्याण के साधन

श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • ‘शिव’ का निवेदन
  • मानव-कल्याणका स्वरूप तथा उसके साधन
  • भोग—दु:खयोनि
  • आसक्ति और कामना ही बन्धन
  • भगवान् परम सुहृद्
  • विषयोंमें आसक्ति
  • जगत‍्में तीन रस
  • सब वस्तुएँ प्राणियोंकी सेवाके लिये
  • अकर्मण्यताके दोष
  • किसीसे कोई आशा नहीं करनी चाहिये
  • निराशाकी रात्रिसे आशाका प्रभात
  • धनका आदर-अनादर
  • पापका परिणाम दु:ख और पुण्यका सुख
  • हृदयके शुभ विचार
  • साधनके तीन रूप
  • पापोंकी उत्पत्तिका कारण—विषयकामना
  • संकीर्ण स्वार्थके दोष
  • सच्ची प्रतिष्ठा
  • भगवत्कृपासे कठिनाइयोंका अन्त
  • प्रमाद
  • नित्य शान्ति देनेवाला भजन
  • भगवत्प्रीत्यर्थ सेवाके लिये ही सब कुछ
  • सद्विचार और सद्भाव
  • परमात्मा सर्वातीत और सर्वमय
  • सृष्टि और सृष्टिका व्यापार—सब भगवान् हैं
  • संसारमें सभी कुछ अनित्य और विनाशी
  • आवेशजनित सहसा कार्यसे हानि
  • भगवान् ही मेरे
  • ममताके विस्तारसे विपत्तिका विस्तार
  • आसक्ति और कामनासे ही बन्धन
  • वस्तु, व्यक्ति और परिस्थितिमें शान्ति नहीं
  • आशा-प्रतीक्षाके त्यागमें सुख
  • जो दिया जाता है, वही अनन्तगुना होकर मिलता है
  • शरीर और नाम आत्मा नहीं
  • भोग-सुखकी प्राप्तिमें परतन्त्रता
  • सबका सम्मान, हित और सेवा—कर्तव्य
  • भगवान‍्का मूर्तरूप
  • निष्कामभाव क्यों नहीं होता?
  • पारमार्थिक लाभ ही यथार्थ लाभ
  • भगवान्-ही-भगवान्
  • भोग इच्छासे नहीं मिलते—भगवान् मिलते हैं
  • परदोष-दर्शनसे हानि
  • सच्ची मानवता
  • भगवान‍्के अनन्य स्मरणसे लाभ
  • अहंता-ममतासे हानि
  • मन-इन्द्रियोंसे भगवान‍्का सेवन
  • कामना प्रेममें कलंक है
  • मान-बड़ाई मीठा विष है
  • यथार्थ सुख
  • निरन्तर भगवान‍्के चिन्तनमें परम लाभ
  • भगवान‍्का नित्य युगलस्वरूप
  • बाहरी स्वाँगसे हानि
  • सच्चे संत-महात्मा
  • भगवान‍्के बिना किसीका भी अस्तित्व नहीं
  • सम्पूर्ण विश्व भगवान‍्की अभिव्यक्ति
  • जैसा बीज वैसा ही फल
  • भोगप्राप्तिसे कामना नहीं मिटती
  • संसारमें त्रिगुणका खेल
  • भजनके लिये स्थितिकी प्रतीक्षा मनका धोखा
  • अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति मनकी कल्पना
  • सत्य तत्त्व एक ही है
  • ‘भगवान् हैं’
  • ‘हम’ शरीर नहीं है
  • विशुद्ध प्रेम
  • भगवान् अन्तर्यामी
  • भोगदृष्टिसे विषयसेवनका बुरा परिणाम
  • परमात्मासे जगत् परिपूर्ण है
  • प्रभुका विधान
  • संसारके चिन्तनसे पाप और अशान्ति
  • ब्रह्माण्ड ईश्वरका विराट् शरीर
  • मीठी और खारी वाणी
  • आत्मस्वरूपस्थित ही सच्चा ज्ञानी
  • संगका फल
  • नीचेकी ओर जाना इन्द्रियोंका स्वभाव
  • पूर्ण समर्पण ही भक्ति है
  • आत्मा सदा सम और एकरस
  • ईश्वरविश्वास या आत्मविश्वास
  • आदर्शजीवन
  • कोई भी वैरी नहीं
  • भोगवासनाके त्यागसे शान्ति
  • विषय-तृष्णा जीर्ण नहीं होती
  • भगवान‍्की नित्य समीपता
  • संसारके मिथ्या सम्बन्धका त्याग कैसे हो?
  • अपने पूर्वकृत कर्मसे ही अच्छा-बुरा फल
  • नैराश्यं परमं सुखम्
  • मानव-जीवनका उद्देश्य
  • संसार दु:खरूप
  • भोगपरायण जीवनका परिणाम
  • सच्चा साधन
  • अपनी आवश्यकताओंको कम-से-कम रखो
  • पुण्यकर्ममय साधुजीवन
  • अन्तिम पृष्ठ

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