॥ श्रीहरि:॥

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महात्माओं की अहैतु की दया

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • साधनको मूल्यवान् बनायें
  • चेत करो
  • भगवान् और महात्माओंकी अहैतुकी दया
  • आत्मा नित्य है, शरीर अनित्य है
  • परमात्मामें प्रेम और महात्मामें श्रद्धा कल्याणकारी है
  • स्वाभाविक निरन्तर चिन्तन हमारा लक्ष्य हो
  • लाभ, हानि प्रारब्धके अधीन है
  • निराकारका ध्यान
  • निरन्तर नाम-जप कैसे हो?
  • भोगोंसे बहुत अधिक सुख वैराग्य, ध्यान और परमात्माकी प्राप्तिमें
  • ज्ञानमिश्रित भक्ति तथा केवल भक्तिका भेद
  • भेद भक्ति और अभेद मुक्ति
  • शान्ति कैसे प्राप्त हो?
  • भगवान् जल्दीसे जल्दी कैसे मिलें?
  • अंतिम पृष्ठ

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