॥ श्रीहरि:॥

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महाभारत (वनपर्व)

हिन्दी/संस्कृत

महाभारत आर्य-संस्कृति तथा भारतीय सनातनधर्मका एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नोंका अपार भण्डार है। महाभारत महाकाव्य है, गूढ़ार्थमय ज्ञान-विज्ञान-शास्त्र है, धर्मग्रन्थ है, राजनीतिक दर्शन है, कर्मयोग-दर्शन है, भक्ति-शास्त्र है, अध्यात्म-शास्त्र है, आर्यजातिका इतिहास है और सर्वार्थसाधक तथा सर्वशास्त्रसंग्रह है। इसकी महिमा अपार है।
इसके वनपर्व को पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। आशा है, पाठकगण इससे लाभ उठाकर अपने जीवनको सफल बनानेमें सक्षम होंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • वनपर्व
  • अरण्यपर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत
  • तृतीयोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके द्वारा अन्नके लिये भगवान् सूर्यकी उपासना और उनसे अक्षयपात्रकी प्राप्ति
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • विदुरजीका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना और धृतराष्ट्रका रुष्ट होकर महलमें चला जाना
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना
  • षष्ठोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका संजयको भेजकर विदुरको वनसे बुलवाना और उनसे क्षमा-प्रार्थना
  • सप्तमोऽध्याय:
  • दुर्योधन, दु:शासन, शकुनि और कर्णकी सलाह, पाण्डवोंका वध करनेके लिये उनका वनमें जानेकी तैयारी तथा व्यासजीका आकर उनको रोकना
  • अष्टमोऽध्याय:
  • व्यासजीका धृतराष्ट्रसे दुर्योधनके अन्यायको रोकनेके लिये अनुरोध
  • नवमोऽध्याय:
  • व्यासजीके द्वारा सुरभि और इन्द्रके उपाख्यानका वर्णन तथा उनका पाण्डवोंके प्रति दया दिखलाना
  • दशमोऽध्याय:
  • व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना
  • किर्मीरवधपर्व
  • एकादशोऽध्याय:
  • भीमसेनके द्वारा किर्मीरके वधकी कथा
  • अर्जुनाभिगमनपर्व
  • द्वादशोऽध्याय:
  • अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका जूएके दोष बताते हुए पाण्डवोंपर आयी हुई विपत्तिमें अपनी अनुपस्थितिको कारण मानना
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • द्यूतके समय न पहुँचनेमें श्रीकृष्णके द्वारा शाल्वके साथ युद्ध करने और सौभविमानसहित उसे नष्ट करनेका संक्षिप्त वर्णन
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • सौभनाशकी विस्तृत कथाके प्रसंगमें द्वारकामें युद्धसम्बन्धी रक्षात्मक तैयारियोंका वर्णन
  • षोडशोऽध्याय:
  • शाल्वकी विशाल सेनाके आक्रमणका यादवसेनाद्वारा प्रतिरोध, साम्बद्वारा क्षेमवृद्धिकी पराजय, वेगवान‍्का वध तथा चारुदेष्णद्वारा विविन्ध्य दैत्यका वध एवं प्रद्युम्नद्वारा सेनाको आश्वासन
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • प्रद्युम्न और शाल्वका घोर युद्ध
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना
  • एकोनविंशोऽध्याय:
  • प्रद्युम्नके द्वारा शाल्वकी पराजय
  • विंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण और शाल्वका भीषण युद्ध
  • एकविंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका द्वैतवनमें जाना
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान
  • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
  • दल्भपुत्र बकका युधिष्ठिरको ब्राह्मणोंका महत्त्व बतलाना
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • द्रौपदीद्वारा प्रह्लाद-बलि-संवादका वर्णन—तेज और क्षमाके अवसर
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना
  • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
  • भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • दु:खित भीमसेनका युधिष्ठिरको युद्धके लिये उत्साहित करना
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना
  • कैरातपर्व
  • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
  • अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना
  • इन्द्रलोकाभिगमनपर्व
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • अर्जुनका हिमालयसे विदा होकर मातलिके साथ स्वर्गलोकको प्रस्थान
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • अर्जुनद्वारा देवराज इन्द्रका दर्शन तथा इन्द्रसभामें उनका स्वागत
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • अर्जुनको अस्त्र और संगीतकी शिक्षा
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • चित्रसेन और उर्वशीका वार्तालाप
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • दु:खित धृतराष्ट्रका संजयके सम्मुख अपने पुत्रोंके लिये चिन्ता करना
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • संजयके द्वारा धृतराष्ट्रकी बातोंका अनुमोदन और धृतराष्ट्रका संताप
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • वनमें पाण्डवोंका आहार
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • संजयका धृतराष्ट्रके प्रति श्रीकृष्णादिके द्वारा की हुई दुर्योधनादिके वधकी प्रतिज्ञाका वृत्तान्त सुनाना
  • नलोपाख्यानपर्व
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • नल-दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग और हंसका दमयन्ती और नलको एक-दूसरेके संदेश सुनाना
  • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • स्वर्गमें नारद और इन्द्रकी बातचीत, दमयन्तीके स्वयंवरके लिये राजाओं तथा लोकपालोंका प्रस्थान
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना
  • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना
  • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन
  • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • देवताओंके द्वारा नलके गुणोंका गान और उनके निषेध करनेपर भी नलके विरुद्ध कलियुगका कोप
  • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
  • नलमें कलियुगका प्रवेश एवं नल और पुष्करकी द्यूतक्रीडा, प्रजा और दमयन्तीके निवारण करनेपर भी राजाका द्यूतसे निवृत्त नहीं होना
  • षष्टितमोऽध्याय:
  • दु:खित दमयन्तीका वार्ष्णेयके द्वारा कुमार-कुमारीको कुण्डिनपुर भेजना
  • एकषष्टितमोऽध्याय:
  • नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपद्‍ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण
  • द्विषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा नलकी चिन्ता और दमयन्तीको अकेली सोती छोड़कर उनका अन्यत्र प्रस्थान
  • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
  • दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश
  • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
  • दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट
  • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
  • जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास
  • षट्षष्टितमोऽध्याय:
  • राजा नलके द्वारा दावानलसे कर्कोटक नागकी रक्षा तथा नागद्वारा नलको आश्वासन
  • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा नलका ऋतुपर्णके यहाँ अश्वाध्यक्षके पदपर नियुक्त होना और वहाँ दमयन्तीके लिये निरन्तर चिन्तित रहना तथा उनकी जीवलसे बातचीत
  • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
  • विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना
  • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
  • दमयन्तीका अपने पिताके यहाँ जाना और वहाँसे नलको ढूँढ़नेके लिये अपना संदेश देकर ब्राह्मणोंको भेजना
  • सप्ततितमोऽध्याय:
  • पर्णादका दमयन्तीसे बाहुकरूपधारी नलका समाचार बताना और दमयन्तीका ऋतुपर्णके यहाँ सुदेव नामक ब्राह्मणको स्वयंवरका संदेश देकर भेजना
  • एकसप्ततितमोऽध्याय:
  • राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना
  • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
  • ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना
  • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
  • ऋतुपर्णका कुण्डिनपुरमें प्रवेश, दमयन्तीका विचार तथा भीमके द्वारा ऋतुपर्णका स्वागत
  • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
  • बाहुक-केशिनी-संवाद
  • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
  • दमयन्तीके आदेशसे केशिनीद्वारा बाहुककी परीक्षा तथा बाहुकका अपने लड़के-लड़कियोंको देखकर उनसे प्रेम करना
  • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
  • दमयन्ती और बाहुककी बातचीत, नलका प्राकटॺ और नल-दमयन्ती-मिलन
  • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
  • नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका नलसे अश्वविद्या सीखकर अयोध्या जाना
  • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
  • राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें भेजकर अपने नगरमें प्रवेश करना
  • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
  • राजा नलके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व, बृहदश्व मुनिका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा द्यूतविद्या और अश्वविद्याका रहस्य बताकर जाना
  • तीर्थयात्रापर्व
  • अशीतितमोऽध्याय:
  • अर्जुनके लिये द्रौपदीसहित पाण्डवोंकी चिन्ता
  • एकाशीतितमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना
  • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
  • भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना
  • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
  • कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन
  • चतुरशीतितमोऽध्याय:
  • नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा
  • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
  • गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य
  • षडशीतितमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना
  • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
  • धौम्यद्वारा पूर्वदिशाके तीर्थोंका वर्णन
  • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
  • धौम्यमुनिके द्वारा दक्षिण दिशावर्ती तीर्थोंका वर्णन
  • एकोननवतितमोऽध्याय:
  • धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन
  • नवतितमोऽध्याय:
  • धौम्यद्वारा उत्तर दिशाके तीर्थोंका वर्णन
  • एकनवतितमोऽध्याय:
  • महर्षि लोमशका आगमन और युधिष्ठिरसे अर्जुनके पाशुपत आदि दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर्णन तथा इन्द्रका संदेश सुनाना
  • द्विनवतितमोऽध्याय:
  • महर्षि लोमशके मुखसे इन्द्र और अर्जुनका संदेश सुनकर युधिष्ठिरका प्रसन्न होना और तीर्थयात्राके लिये उद्यत हो अपने अधिक साथियोंको विदा करना
  • त्रिनवतितमोऽध्याय:
  • ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना
  • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
  • देवताओं और धर्मात्मा राजाओंका उदाहरण देकर महर्षि लोमशका युधिष्ठिरको अधर्मसे हानि बताना और तीर्थयात्राजनित पुण्यकी महिमाका वर्णन करते हुए आश्वासन देना
  • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना
  • षण्णवतितमोऽध्याय:
  • इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना
  • सप्तनवतितमोऽध्याय:
  • महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान
  • अष्टनवतितमोऽध्याय:
  • धन प्राप्त करनेके लिये अगस्त्यका श्रुतर्वा, ब्रध्नश्व और त्रसदस्यु आदिके पास जाना
  • एकोनशततमोऽध्याय:
  • अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति
  • शततमोऽध्याय:
  • वृत्रासुरसे त्रस्त देवताओंको महर्षि दधीचका अस्थिदान एवं वज्रका निर्माण
  • एकाधिकशततमोऽध्याय:
  • वृत्रासुरका वध और असुरोंकी भयंकर मन्त्रणा
  • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
  • कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिका संहार तथा देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति
  • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान् विष्णुके आदेशसे देवताओंका महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर जाकर उनकी स्तुति करना
  • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
  • अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना
  • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
  • अगस्त्यजीके द्वारा समुद्रपान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुन: भरनेका उपाय पूछना
  • षडधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा सगरका संतानके लिये तपस्या करना और शिवजीके द्वारा वरदान पाना
  • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
  • सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति
  • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
  • भगीरथका हिमालयपर तपस्याद्वारा गंगा और महादेवजीको प्रसन्न करके उनसे वर प्राप्त करना
  • नवाधिकशततमोऽध्याय:
  • पृथ्वीपर गंगाजीके उतरने और समुद्रको जलसे भरनेका विवरण तथा सगरपुत्रोंका उद्धार
  • दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न
  • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • वेश्याका ऋष्यशृंगको लुभाना और विभाण्डक मुनिका आश्रमपर आकर अपने पुत्रकी चिन्ताका कारण पूछना
  • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन
  • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना
  • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन
  • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन
  • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
  • पिताकी आज्ञासे परशुरामजीका अपनी माताका मस्तक काटना और उन्हींके वरदानसे पुन: जिलाना, परशुरामजीद्वारा कार्तवीर्य-अर्जुनका वध और उसके पुत्रोंद्वारा जमदग्नि मुनिकी हत्या
  • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन
  • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना
  • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार
  • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्‍गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास
  • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ
  • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति
  • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अश्विनीकुमारोंकी कृपासे महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्ति
  • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना
  • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन
  • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र
  • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सोमक और जन्तुका उपाख्यान
  • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सोमकको सौ पुत्रोंकी प्राप्ति तथा सोमक और पुरोहितका समानरूपसे नरक और पुण्यलोकोंका उपभोग करना
  • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा
  • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • विभिन्न तीर्थोंकी महिमा और राजा उशीनरकी कथाका आरम्भ
  • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा उशीनरद्वारा बाजको अपने शरीरका मांस देकर शरणमें आये हुए कबूतरके प्राणोंकी रक्षा करना
  • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनका राजा जनकके दरबारमें जाना
  • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप
  • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना
  • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु
  • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्यु
  • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भरद्वाजका पुत्रशोकसे विलाप करना, रैभ्यमुनिको शाप देना एवं स्वयं अग्निमें प्रवेश करना
  • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य,भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना
  • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंकी उत्तराखण्ड-यात्रा और लोमशजीद्वारा उसकी दुर्गमताका कथन
  • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान
  • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना
  • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना
  • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना
  • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन
  • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन
  • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमान‍्जीसे भेंट
  • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद
  • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • हनुमान‍्जीका भीमसेनको संक्षेपसे श्रीरामका चरित्र सुनाना
  • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • हनुमान‍्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन
  • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीहनुमान‍्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन
  • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीहनुमान‍्जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना
  • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनका सौगन्धिक वनमें पहुँचना
  • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • क्रोधवश नामक राक्षसोंका भीमसेनसे सरोवरके निकट आनेका कारण पूछना
  • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना
  • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना
  • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका आकाशवाणीके आदेशसे पुन: नर-नारायणाश्रममें लौटना
  • जटासुरवधपर्व
  • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध
  • यक्षयुद्धपर्व
  • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना
  • एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • प्रश्नके रूपमें आर्ष्टिषेणका युधिष्ठिरके प्रति उपदेश
  • षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका आर्ष्टिषेणके आश्रमपर निवास, द्रौपदीके अनुरोधसे भीमसेनका पर्वतके शिखरपर जाना और यक्षों तथा राक्षसोंसे युद्ध करके मणिमान‍्का वध करना
  • एकषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट
  • द्विषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान
  • त्रिषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन
  • चतु:षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका आगमन
  • निवातकवचयुद्धपर्व
  • पञ्चषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना
  • षट्षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना
  • सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा
  • अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन
  • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ
  • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध
  • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन
  • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • निवातकवचोंका संहार
  • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन
  • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना
  • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • नारद आदिका अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोकना
  • आजगरपर्व
  • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनकी युधिष्ठिरसे बातचीत और पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान
  • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका गन्धमादनसे बदरिकाश्रम, सुबाहुनगर और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश
  • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • महाबली भीमसेनका हिंसक पशुओंको मारना और अजगरद्वारा पकड़ा जाना
  • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज
  • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना
  • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका
  • भीमसेनको छोड़ देना तथा युधिष्ठिरके साथ वार्तालाप करनेके प्रभावसे सर्पयोनिसे मुक्त होकर स्वर्ग जाना
  • मार्कण्डेयसमास्यापर्व
  • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • वर्षा और शरद्-ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुन: द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश
  • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन
  • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य
  • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणकी महिमाके विषयमें अत्रिमुनि तथा राजा पृथुकी प्रशंसा
  • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद
  • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा
  • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना
  • एकोननवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना
  • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन
  • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान् कल्कीके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश
  • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता
  • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • इन्द्र और बक मुनिका संवाद
  • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • क्षत्रिय राजाओंका महत्त्व—सुहोत्र और शिबिकी प्रशंसा
  • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा ययातिद्वारा ब्राह्मणको सहस्र गौओंका दान
  • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सेदुक और वृषदर्भका चरित्र
  • सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • इन्द्र और अग्निद्वारा राजा शिबिकी परीक्षा
  • अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन
  • नवनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा
  • द्विशततमोऽध्याय:
  • निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन
  • एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान‍्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना
  • द्वॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • उत्तङ्कका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह
  • त्र्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधु-कैटभका वध
  • चतुरधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना
  • पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य
  • षडधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन
  • सप्ताधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन
  • अष्टाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन
  • नवाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन
  • दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन
  • एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन
  • द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन
  • त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय
  • चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन
  • पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना
  • षोडशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान
  • सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति
  • अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अंगिराकी संततिका वर्णन
  • एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • बृहस्पतिकी संततिका वर्णन
  • विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन
  • एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अग्निस्वरूप तप और भानु (मनु)-की संततिका वर्णन
  • द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुन: उनका प्राकटॺ
  • त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • इन्द्रके द्वारा केशीके हाथसे देवसेनाका उद्धार
  • चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन
  • पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण
  • षड्‍‍विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • विश्वामित्रका स्कन्दके जातकर्मादि तेरह संस्कार करना और विश्वामित्रके समझानेपर भी ऋषियोंका अपनी पत्नियोंको स्वीकार न करना तथा अग्निदेव आदिके द्वारा बालक स्कन्दकी रक्षा करना
  • सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराजित होकर शरणमें आये हुए इन्द्रसहित देवताओंको स्कन्दका अभयदान
  • अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • स्कन्दके पार्षदोंका वर्णन
  • एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह
  • त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन
  • एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा
  • द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन
  • द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्व
  • त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना
  • चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पतिदेवको अनुकूल करनेका उपाय—पतिकी अनन्यभावसे सेवा
  • पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सत्यभामाका द्रौपदीको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको प्रस्थान
  • घोषयात्रापर्व
  • षट्‍‍त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका खेद और चिन्तापूर्ण उद्‍गार
  • सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना
  • अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना
  • एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान
  • चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वोंमें परस्पर कटु संवाद
  • एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कौरवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध और कर्णकी पराजय
  • द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • गन्धर्वोंद्वारा दुर्योधन आदिकी पराजय और उनका अपहरण
  • त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा
  • चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध
  • पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंके द्वारा गन्धर्वोंकी पराजय
  • षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा
  • सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सेनासहित दुर्योधनका मार्गमें ठहरना और कर्णके द्वारा उसका अभिनन्दन
  • अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका कर्णको अपनी पराजयका समाचार बताना
  • एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दु:शासनको राजा बननेका आदेश, दु:शासनका दु:ख और कर्णका दुर्योधनको समझाना
  • पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कर्णके समझानेपर भी दुर्योधनका आमरण अनशन करनेका ही निश्चय
  • एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना
  • द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दानवोंका दुर्योधनको समझाना और कर्णके अनुरोध करनेपर दुर्योधनका अनशन त्याग करके हस्तिनापुरको प्रस्थान
  • त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान
  • चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार
  • पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी
  • षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके यज्ञका आरम्भ एवं समाप्ति
  • सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति
  • मृगस्वप्नोद्भवपर्व
  • अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका काम्यकवनमें गमन
  • व्रीहिद्रौणिकपर्व
  • एकोनषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन
  • षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना
  • एकषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना
  • द्रौपदीहरणपर्व
  • द्विषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना
  • त्रिषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • चतु:षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जयद्रथका द्रौपदीको देखकर मोहित होना और उसके पास कोटिकास्यको भेजना
  • पञ्चषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कोटिकास्यका द्रौपदीसे जयद्रथ और उसके साथियोंका परिचय देते हुए उसका भी परिचय पूछना
  • षट्षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • द्रौपदीका कोटिकास्यको उत्तर
  • सप्तषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद
  • अष्टषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण
  • एकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका आश्रमपर लौटना और धात्रेयिकासे द्रौपदीहरणका वृत्तान्त जानकर जयद्रथका पीछा करना
  • सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • द्रौपदीद्वारा जयद्रथके सामने पाण्डवोंके पराक्रमका वर्णन
  • एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना
  • जयद्रथविमोक्षणपर्व
  • द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन
  • रामोपाख्यानपर्व
  • त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अपनी दुरवस्थासे दु:खी हुए युधिष्ठिरका मार्कण्डेय मुनिसे प्रश्न करना
  • चतु:सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • श्रीराम आदिका जन्म तथा कुबेरकी उत्पत्ति और उन्हें ऐश्वर्यकी प्राप्ति
  • पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना
  • षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाकर रावणके अत्याचारसे बचानेके लिये प्रार्थना करना तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका रीछ और वानरयोनिमें संतान उत्पन्न करना एवं दुन्दुभी गन्धर्वीका मन्थरा बनकर आना
  • सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी, रामवनगमन, भरतकी चित्रकूटयात्रा, रामके द्वारा खर-दूषण आदि राक्षसोंका नाश तथा रावणका मारीचके पास जाना
  • अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण
  • एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि-संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्य स्वरूपसे वार्तालाप
  • अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षसियोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन
  • एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • रावण और सीताका संवाद
  • द्वॺशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना
  • त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना
  • चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम
  • पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • श्रीराम और रावणकी सेनाओंका द्वन्द्वयुद्ध
  • षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • प्रहस्त और धूम्राक्षके वधसे दु:खी हुए रावणका कुम्भकर्णको जगाना और उसे युद्धमें भेजना
  • सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कुम्भकर्ण, वज्रवेग और प्रमाथीका वध
  • अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • इन्द्रजित् का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा
  • एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • श्रीराम-लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित् का वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना
  • नवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • राम और रावणका युद्ध तथा रावणका वध
  • एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना
  • द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • मार्कण्डेयजीके द्वारा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन
  • पतिव्रतामाहात्म्यपर्व
  • त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण
  • चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सावित्रीका सत्यवान‍्के साथ विवाह करनेका दृढ़ निश्चय
  • पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सत्यवान‍् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना
  • षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान‍्के साथ उसका वनमें जाना
  • सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान
  • अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनकी सत्यवान‍्के लिये चिन्ता, ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान‍्का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वरप्राप्तिका विवरण बताना
  • नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति
  • कुण्डलाहरणपर्व
  • त्रिशततमोऽध्याय:
  • सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना
  • एकाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • सूर्यका कर्णको समझाते हुए उसे इन्द्रको कुण्डल न देनेका आदेश देना
  • द्वॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय
  • त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना
  • चतुरधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीका पितासे वार्तालाप और ब्राह्मणकी परिचर्या
  • पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना
  • षडधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद
  • सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन
  • अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना
  • नवाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • अधिरथ सूत तथा उसकी पत्नी राधाको बालक कर्णकी प्राप्ति, राधाके द्वारा उसका पालन, हस्तिनापुरमें उसकी शिक्षा-दीक्षा तथा कर्णके पास इन्द्रका आगमन
  • दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना
  • आरणेयपर्व
  • एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणकी अरणि एवं मन्थन-काष्ठका पता लगानेके लिये पाण्डवोंका मृगके पीछे दौड़ना और दु:खी होना
  • द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना
  • त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना
  • चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • यक्षका चारों भाइयोंको जिलाकर धर्मके रूपमें प्रकट हो युधिष्ठिरको वरदान देना
  • पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना
  • वनपर्वकी श्लोक-संख्या
  • वनपर्व-श्रवण-महिमा
  • अन्तिम पृष्ठ

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