॥ श्रीहरि:॥

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महाभारत (उद्योगपर्व)

हिन्दी/संस्कृत

महाभारत आर्य-संस्कृति तथा भारतीय सनातनधर्मका एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नोंका अपार भण्डार है। महाभारत महाकाव्य है, गूढ़ार्थमय ज्ञान-विज्ञान-शास्त्र है, धर्मग्रन्थ है, राजनीतिक दर्शन है, कर्मयोग-दर्शन है, भक्ति-शास्त्र है, अध्यात्म-शास्त्र है, आर्यजातिका इतिहास है और सर्वार्थसाधक तथा सर्वशास्त्रसंग्रह है। इसकी महिमा अपार है।
इसके उद्योगपर्व को पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। आशा है, पाठकगण इससे लाभ उठाकर अपने जीवनको सफल बनानेमें सक्षम होंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • उद्योगपर्व
  • सेनोद्योगपर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • राजा विराटकी सभामें भगवान‍् श्रीकृष्णका भाषण
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • बलरामजीका भाषण
  • तृतीयोऽध्याय:
  • सात्यकिके वीरोचित उद्‍गार
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • राजा द्रुपदकी सम्मति
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • भगवान‍् श्रीकृष्णका द्वारकागमन, विराट और द्रुपदके संदेशसे राजाओंका पाण्डवपक्षकी ओरसे युद्धके लिये आगमन
  • षष्ठोऽध्याय:
  • द्रुपदका पुरोहितको दौत्यकर्मके लिये अनुमति देना तथा पुरोहितका हस्तिनापुरको प्रस्थान
  • सप्तमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका दुर्योधन तथा अर्जुन दोनोंको सहायता देना
  • अष्टमोऽध्याय:
  • शल्यका दुर्योधनके सत्कारसे प्रसन्न हो उसे वर देना और युधिष्ठिरसे मिलकर उन्हें आश्वासन देना
  • नवमोऽध्याय:
  • इन्द्रके द्वारा त्रिशिराका वध, वृत्रासुरकी उत्पत्ति, उसके साथ इन्द्रका युद्ध तथा देवताओंकी पराजय
  • दशमोऽध्याय:
  • इन्द्रसहित देवताओंका भगवान‍् विष्णुकी शरणमें जाना और इन्द्रका उनके आज्ञानुसार वृत्रासुरसे संधि करके अवसर पाकर उसे मारना एवं ब्रह्महत्याके भयसे जलमें छिपना
  • एकादशोऽध्याय:
  • देवताओं तथा ऋषियोंके अनुरोधसे राजा नहुषका इन्द्रके पदपर अभिषिक्त होना एवं काम-भोगमें आसक्त होना और चिन्तामें पड़ी हुई इन्द्राणीको बृहस्पतिका आश्वासन
  • द्वादशोऽध्याय:
  • देवता-नहुष-संवाद, बृहस्पतिके द्वारा इन्द्राणीकी रक्षा तथा इन्द्राणीका नहुषके पास कुछ समयकी अवधि माँगनेके लिये जाना
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • नहुषका इन्द्राणीको कुछ कालकी अवधि देना, इन्द्रका ब्रह्महत्यासे उद्धार तथा शचीद्वारा रात्रिदेवीकी उपासना
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • उपश्रुति देवीकी सहायतासे इन्द्राणीकी इन्द्रसे भेंट
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • इन्द्रकी आज्ञासे इन्द्राणीके अनुरोधपर नहुषका ऋषियोंको अपना वाहन बनाना तथा बृहस्पति और अग्निका संवाद
  • षोडशोऽध्याय:
  • बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • अगस्त्यजीका इन्द्रसे नहुषके पतनका वृत्तान्त बताना
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • इन्द्रका स्वर्गमें जाकर अपने राज्यका पालन करना, शल्यका युधिष्ठिरको आश्वासन देना और उनसे विदा लेकर दुर्योधनके यहाँ जाना
  • एकोनविंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिर और दुर्योधनके यहाँ सहायताके लिये आयी हुई सेनाओंका संक्षिप्त विवरण
  • संजययानपर्व
  • विंशोऽध्याय:
  • द्रुपदके पुरोहितका कौरवसभामें भाषण
  • एकविंशोऽध्याय:
  • भीष्मके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातका समर्थन करते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना, इसके विरुद्ध कर्णके आक्षेपपूर्ण वचन तथा धृतराष्ट्रद्वारा भीष्मकी बातका समर्थन करते हुए दूतको सम्मानित करके विदा करना
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका संजयसे पाण्डवोंके प्रभाव और प्रतिभाका वर्णन करते हुए उसे संदेश देकर पाण्डवोंके पास भेजना
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • संजयका युधिष्ठिरसे मिलकर उनकी कुशल पूछना एवं युधिष्ठिरका संजयसे कौरवपक्षका कुशल-समाचार पूछते हुए उससे सारगर्भित प्रश्न करना
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • संजयका युधिष्ठिरको उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए उन्हें राजा धृतराष्ट्रका संदेश सुनानेकी प्रतिज्ञा करना
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • संजयका युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रका संदेश सुनाना एवं अपनी ओरसे भी शान्तिके लिये प्रार्थना करना
  • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका संजयको इन्द्रप्रस्थ लौटानेसे ही शान्ति होना सम्भव बतलाना
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • संजयका युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी सम्भावना बतलाकर उन्हें युद्धसे उपरत करनेका प्रयत्न करना
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • संजयको युधिष्ठिरका उत्तर
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • संजयकी विदाई तथा युधिष्ठिरका संदेश
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका मुख्य-मुख्य कुरुवंशियोंके प्रति संदेश
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना
  • प्रजागरपर्व
  • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:*
  • धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश
  • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
  • विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन
  • सनत्सुजातपर्व
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • विदुरजीके द्वारा स्मरण करनेपर आये हुए सनत्सुजात ऋषिसे धृतराष्ट्रको उपदेश देनेके लिये उनकी प्रार्थना
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन
  • यानसंधिपर्व
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • पाण्डवोंके यहाँसे लौटे हुए संजयका कौरवसभामें आगमन
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुन: उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • संजयद्वारा युधिष्ठिरके प्रधान सहायकोंका वर्णन
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भीमसेनके पराक्रमसे डरे हुए धृतराष्ट्रका विलाप
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रद्वारा अर्जुनसे प्राप्त होनेवाले भयका वर्णन
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • कौरवसभामें धृतराष्ट्रका युद्धसे भय दिखाकर शान्तिके लिये प्रस्ताव करना
  • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • संजयका धृतराष्ट्रको उनके दोष बताते हुए दुर्योधनपर शासन करनेकी सलाह देना
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रको धैर्य देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन
  • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • संजयद्वारा अर्जुनके ध्वज एवं अश्वोंका तथा युधिष्ठिर आदिके घोड़ोंका वर्णन
  • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • संजयद्वारा पाण्डवोंकी युद्धविषयक तैयारीका वर्णन, धृतराष्ट्रका विलाप, दुर्योधनद्वारा अपनी प्रबलताका प्रतिपादन, धृतराष्ट्रका उसपर अविश्वास तथा संजयद्वारा धृष्टद्युम्नकी शक्ति एवं संदेशका कथन
  • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना
  • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
  • संजयका धृतराष्ट्रके पूछनेपर उन्हें श्रीकृष्ण और अर्जुनके अन्त:पुरमें कहे हुए संदेश सुनाना
  • षष्टितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके द्वारा कौरव-पाण्डवोंकी शक्तिका तुलनात्मक वर्णन
  • एकषष्टितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा
  • द्विषष्टितमोऽध्याय:
  • कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना
  • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनद्वारा अपने पक्षकी प्रबलताका वर्णन करना और विदुरका दमकी महिमा बताना
  • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
  • विदुरका कौटुम्बिक कलहसे हानि बताते हुए धृतराष्ट्रको संधिकी सलाह देना
  • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना
  • षट्षष्टितमोऽध्याय:
  • संजयका धृतराष्ट्रको अर्जुनका संदेश सुनाना
  • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके पास व्यास और गान्धारीका आगमन तथा व्यासजीका संजयको श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्बन्धमें कुछ कहनेका आदेश
  • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
  • संजयका धृतराष्ट्रको भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमा बतलाना
  • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
  • संजयका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्ण-प्राप्ति एवं तत्त्वज्ञानका साधन बताना
  • सप्ततितमोऽध्याय:
  • भगवान‍् श्रीकृष्णके विभिन्न नामोंकी व्युत्पत्तियोंका कथन
  • एकसप्ततितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके द्वारा भगवद्‍गुणगान
  • भगवद्यानपर्व
  • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप
  • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना
  • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
  • भीमसेनका शान्तिविषयक प्रस्ताव
  • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका भीमसेनको उत्तेजित करना
  • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
  • भीमसेनका उत्तर
  • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका भीमसेनको आश्वासन देना
  • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
  • अर्जुनका कथन
  • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका अर्जुनको उत्तर देना
  • अशीतितमोऽध्याय:
  • नकुलका निवेदन
  • एकाशीतितमोऽध्याय:
  • युद्धके लिये सहदेव तथा सात्यकिकी सम्मति और समस्त योद्धाओंका समर्थन
  • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
  • द्रौपदीका श्रीकृष्णसे अपना दु:ख सुनाना और श्रीकृष्णका उसे आश्वासन देना
  • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका हस्तिनापुरको प्रस्थान, युधिष्ठिरका माता कुन्ती एवं कौरवोंके लिये संदेश तथा श्रीकृष्णको मार्गमें दिव्य महर्षियोंका दर्शन
  • चतुरशीतितमोऽध्याय:
  • मार्गके शुभाशुभ शकुनोंका वर्णन तथा मार्गमें लोगोंद्वारा सत्कार पाते हुए श्रीकृष्णका वृकस्थल पहुँचकर वहाँ विश्राम करना
  • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका धृतराष्ट्र आदिकी अनुमतिसे श्रीकृष्णके स्वागत-सत्कारके लिये मार्गमें विश्रामस्थान बनवाना
  • षडशीतितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका भगवान‍् श्रीकृष्णकी अगवानी करके उन्हें भेंट देने एवं दु:शासनके महलमें ठहरानेका विचार प्रकट करना
  • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
  • विदुरका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेके लिये समझाना
  • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका श्रीकृष्णके विषयमें अपने विचार कहना एवं उसकी कुमन्त्रणासे कुपित हो भीष्मजीका सभासे उठ जाना
  • एकोननवतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका स्वागत, धृतराष्ट्र तथा विदुरके घरोंपर उनका आतिथ्य
  • नवतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना
  • एकनवतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका दुर्योधनके घर जाना एवं उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करके विदुरजीके घरपर भोजन करना
  • द्विनवतितमोऽध्याय:
  • विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना
  • त्रिनवतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका कौरव-पाण्डवोंमें संधिस्थापनके प्रयत्नका औचित्य बताना
  • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
  • दुर्योधन एवं शकुनिके द्वारा बुलाये जानेपर भगवान‍् श्रीकृष्णका रथपर बैठकर प्रस्थान एवं कौरवसभामें प्रवेश और स्वागतके पश्चात् आसनग्रहण
  • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
  • कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण
  • षण्णवतितमोऽध्याय:
  • परशुरामजीका दम्भोद्भवकी कथाद्वारा नर-नारायणस्वरूप अर्जुन और श्रीकृष्णका महत्त्व वर्णन करना
  • सप्तनवतितमोऽध्याय:
  • कण्व मुनिका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए मातलिका उपाख्यान आरम्भ करना
  • अष्टनवतितमोऽध्याय:
  • मातलिका अपनी पुत्रीके लिये वर खोजनेके निमित्त नारदजीके साथ वरुणलोकमें भ्रमण करते हुए अनेक आश्चर्यजनक वस्तुएँ देखना
  • एकोनशततमोऽध्याय:
  • नारदजीके द्वारा पाताललोकका प्रदर्शन
  • शततमोऽध्याय:
  • हिरण्यपुरका दिग्दर्शन और वर्णन
  • एकाधिकशततमोऽध्याय:
  • गरुड़लोक तथा गरुड़की संतानोंका वर्णन
  • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
  • सुरभि और उसकी संतानोंके साथ रसातलके सुखका वर्णन
  • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
  • नागलोकके नागोंका वर्णन और मातलिका नागकुमार सुमुखके साथ अपनी कन्याको ब्याहनेका निश्चय
  • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
  • नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी, सुमुख एवं आर्यकके साथ इन्द्रके पास आकर उनके द्वारा सुमुखको दीर्घायु प्रदान कराना तथा सुमुख-गुणकेशी-विवाह
  • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना
  • षडधिकशततमोऽध्याय:
  • नारदजीका दुर्योधनको समझाते हुए धर्मराजके द्वारा विश्वामित्रजीकी परीक्षा तथा गालवके विश्वामित्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये हठका वर्णन
  • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
  • गालवकी चिन्ता और गरुड़का आकर उन्हें आश्वासन देना
  • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
  • गरुड़का गालवसे पूर्व दिशाका वर्णन करना
  • नवाधिकशततमोऽध्याय:
  • दक्षिणदिशाका वर्णन
  • दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • पश्चिमदिशाका वर्णन
  • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • उत्तर दिशाका वर्णन
  • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • गरुड़की पीठपर बैठकर पूर्व दिशाकी ओर जाते हुए गालवका उनके वेगसे व्याकुल होना
  • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार
  • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • गरुड़ और गालवका राजा ययातिके यहाँ जाकर गुरुको देनेके लिये श्यामकर्ण घोड़ोंकी याचना करना
  • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा ययातिका गालवको अपनी कन्या देना और गालवका उसे लेकर अयोध्यानरेशके यहाँ जाना
  • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
  • हर्यश्वका दो सौ श्यामकर्ण घोड़े देकर ययातिकन्याके गर्भसे वसुमना नामक पुत्र उत्पन्न करना और गालवका इस कन्याके साथ वहाँसे प्रस्थान
  • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • दिवोदासका ययातिकन्या माधवीके गर्भसे प्रतर्दन नामक पुत्र उत्पन्न करना
  • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • उशीनरका ययातिकन्या माधवीके गर्भसे शिबि नामक पुत्र उत्पन्न करना, गालवका उस कन्याको साथ लेकर जाना और मार्गमें गरुड़का दर्शन करना
  • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • गालवका छ: सौ घोड़ोंके साथ माधवीको विश्वामित्रजीकी सेवामें देना और उनके द्वारा उसके गर्भसे अष्टक नामक पुत्रकी उत्पत्ति होनेके बाद उस कन्याको ययातिके यहाँ लौटा देना
  • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • माधवीका वनमें जाकर तप करना तथा ययातिका स्वर्गमें जाकर सुखभोगके पश्चात् मोहवश तेजोहीन होना
  • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौहित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना
  • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सत्संग एवं दौहित्रोंके पुण्यदानसे ययातिका पुन: स्वर्गारोहण
  • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • स्वर्गलोकमें ययातिका स्वागत, ययातिके पूछनेपर ब्रह्माजीका अभिमानको ही पतनका कारण बताना तथा नारदजीका दुर्योधनको समझाना
  • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान‍् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना
  • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना
  • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्म और द्रोणका दुर्योधनको पुन: समझाना
  • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णको दुर्योधनका उत्तर, उसका पाण्डवोंको राज्य न देनेका निश्चय
  • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका दुर्योधनको फटकारना और उसे कुपित होकर सभासे जाते देख उसे कैद करनेकी सलाह देना
  • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका गान्धारीको बुलाना और उसका दुर्योधनको समझाना
  • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके षड्यन्त्रका सात्यकिद्वारा भंडाफोड़, श्रीकृष्णकी सिंहगर्जना तथा धृतराष्ट्र और विदुरका दुर्योधनको पुन: समझाना
  • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान‍् श्रीकृष्णका विश्वरूप दर्शन कराकर कौरवसभासे प्रस्थान
  • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके पूछनेपर कुन्तीका उन्हें पाण्डवोंसे कहनेके लिये संदेश देना
  • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना
  • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • विदुलाका अपने पुत्रको युद्धके लिये उत्साहित करना
  • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • विदुला और उसके पुत्रका संवाद—विदुलाके द्वारा कार्यमें सफलता प्राप्त करने तथा शत्रुवशीकरणके उपायोंका निर्देश
  • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • विदुलाके उपदेशसे उसके पुत्रका युद्धके लिये उद्यत होना
  • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीका पाण्डवोंके लिये संदेश देना और श्रीकृष्णका उनसे विदा लेकर उपप्लव्य नगरमें जाना
  • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्म और द्रोणका दुर्योधनको समझाना
  • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्मसे वार्तालाप आरम्भ करके द्रोणाचार्यका दुर्योधनको पुन: संधिके लिये समझाना
  • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान‍् श्रीकृष्णका कर्णको पाण्डवपक्षमें आ जानेके लिये समझाना
  • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कर्णका दुर्योधनके पक्षमें रहनेके निश्चित विचारका प्रतिपादन करते हुए समरयज्ञके रूपकका वर्णन करना
  • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान‍् श्रीकृष्णका कर्णसे पाण्डवपक्षकी निश्चित विजयका प्रतिपादन
  • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्नका वर्णन
  • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • विदुरकी बात सुनकर युद्धके भावी दुष्परिणामसे व्यथित हुई कुन्तीका बहुत सोच-विचारके बाद कर्णके पास जाना
  • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीका कर्णको अपना प्रथम पुत्र बताकर उससे पाण्डवपक्षमें मिल जानेका अनुरोध
  • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा
  • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर श्रीकृष्णका कौरवसभामें व्यक्त किये हुए भीष्मजीके वचन सुनाना
  • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्य, विदुर तथा गान्धारीके युक्तियुक्त एवं महत्त्वपूर्ण वचनोंका भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा कथन
  • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके प्रति धृतराष्ट्रके युक्तिसंगत वचन—पाण्डवोंको आधा राज्य देनेके लिये आदेश
  • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका कौरवोंके प्रति साम, दान और भेदनीतिके प्रयोगकी असफलता बताकर दण्डके प्रयोगपर जोर देना
  • सैन्यनिर्याणपर्व
  • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवपक्षके सेनापतिका चुनाव तथा पाण्डव-सेनाका कुरुक्षेत्रमें प्रवेश
  • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कुरुक्षेत्रमें पाण्डव-सेनाका पड़ाव तथा शिविर-निर्माण
  • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका सेनाको सुसज्जित होने और शिविर-निर्माण करनेके लिये आज्ञा देना तथा सैनिकोंकी रणयात्राके लिये तैयारी
  • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका भगवान‍् श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके विषयमें पूछना, भगवान‍्का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा इस विषयमें युधिष्ठिरका संताप और अर्जुनद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका समर्थन
  • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके द्वारा सेनाओंका विभाजन और पृथक्-पृथक् अक्षौहिणियोंके सेनापतियोंका अभिषेक
  • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके द्वारा भीष्मजीका प्रधान सेनापतिके पदपर अभिषेक और कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर शिविर-निर्माण
  • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके द्वारा अपने सेनापतियोंका अभिषेक, यदुवंशियोंसहित बलरामजीका आगमन तथा पाण्डवोंसे विदा लेकर उनका तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान
  • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • रुक्मीका सहायता देनेके लिये आना; परंतु पाण्डव और कौरव दोनों पक्षोंके द्वारा कोरा उत्तर पाकर लौट जाना
  • एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्र और संजयका संवाद
  • उलूकदूतागमनपर्व
  • षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजना और उनसे कहनेके लिये संदेश देना
  • एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंके शिविरमें पहुँचकर उलूकका भरी सभामें दुर्योधनका संदेश सुनाना
  • द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवपक्षकी ओरसे दुर्योधनको उसके संदेशका उत्तर
  • त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाँचों पाण्डवों, विराट, द्रुपद, शिखण्डी और धृष्टद्युम्नका संदेश लेकर उलूकका लौटना और उलूककी बात सुनकर दुर्योधनका सेनाको युद्धके लिये तैयार होनेका आदेश देना
  • चतु:षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डव-सेनाका युद्धके मैदानमें जाना और धृष्टद्युम्नके द्वारा योद्धाओंकी अपने-अपने योग्य विपक्षियोंके साथ युद्ध करनेके लिये नियुक्ति
  • रथातिरथसंख्यानपर्व
  • पञ्चषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके पूछनेपर भीष्मका कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका परिचय देना
  • षट्षष्ट्ॺधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरवपक्षके रथियोंका परिचय
  • सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरवपक्षके रथी, महारथी और अतिरथियोंका वर्णन
  • अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक संवाद तथा दुर्योधनद्वारा उसका निवारण
  • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवपक्षके रथी आदिका एवं उनकी महिमाका वर्णन
  • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवपक्षके रथियों और महारथियोंका वर्णन तथा विराट और द्रुपदकी प्रशंसा
  • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवपक्षके रथी, महारथी एवं अतिरथी आदिका वर्णन
  • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्मका पाण्डवपक्षके अतिरथी वीरोंका वर्णन करते हुए शिखण्डी और पाण्डवोंका वध न करनेका कथन
  • अम्बोपाख्यानपर्व
  • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अम्बोपाख्यानका आरम्भ—भीष्मजीके द्वारा काशिराजकी कन्याओंका अपहरण
  • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अम्बाका शाल्वराजके प्रति अपना अनुराग प्रकट करके उनके पास जानेके लिये भीष्मसे आज्ञा माँगना
  • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद
  • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत
  • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अकृतव्रण और परशुरामजीकी अम्बासे बातचीत
  • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना
  • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • संकल्पनिर्मित रथपर आरूढ़ परशुरामजीके साथ भीष्मका युद्ध प्रारम्भ करना
  • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्म और परशुरामका घोर युद्ध
  • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्म और परशुरामका युद्ध
  • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्म और परशुरामका युद्ध
  • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्मको अष्टवसुओंसे प्रस्वापनास्त्रकी प्राप्ति
  • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्म तथा परशुरामजीका एक-दूसरेपर शक्ति और ब्रह्मास्त्रका प्रयोग
  • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति
  • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अम्बाकी कठोर तपस्या
  • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अम्बाका द्वितीय जन्ममें पुन: तप करना और महादेवजीसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उसका चिताकी आगमें प्रवेश
  • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अम्बाका राजा द्रुपदके यहाँ कन्याके रूपमें जन्म, राजा तथा रानीका उसे पुत्ररूपमें प्रसिद्ध करके उसका नाम शिखण्डी रखना
  • एकोननवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शिखण्डीका विवाह तथा उसके स्त्री होनेका समाचार पाकर उसके श्वशुर दशार्णराजका महान् कोप
  • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • हिरण्यवर्माके आक्रमणके भयसे घबराये हुए द्रुपदका अपनी महारानीसे संकटनिवारणका उपाय पूछना
  • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रुपदपत्नीका उत्तर, द्रुपदके द्वारा नगररक्षाकी व्यवस्था और देवाराधन तथा शिखण्डिनीका वनमें जाकर स्थूणाकर्ण नामक यक्षसे अपने दु:खनिवारणके लिये प्रार्थना करना
  • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शिखण्डीको पुरुषत्वकी प्राप्ति, द्रुपद और हिरण्यवर्माकी प्रसन्नता, स्थूणाकर्णको कुबेरका शाप तथा भीष्मका शिखण्डीको न मारनेका निश्चय
  • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके पूछनेपर भीष्म आदिके द्वारा अपनी-अपनी शक्तिका वर्णन
  • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा अपनी, अपने सहायकोंकी तथा युधिष्ठिरकी भी शक्तिका परिचय देना
  • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरव-सेनाका रणके लिये प्रस्थान
  • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवसेनाका युद्धके लिये प्रस्थान
  • अन्तिम पृष्ठ

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