॥ श्रीहरि:॥

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महाभारत (शान्तिपर्व)

हिन्दी/संस्कृत

महाभारत आर्य-संस्कृति तथा भारतीय सनातनधर्मका एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नोंका अपार भण्डार है। महाभारत महाकाव्य है, गूढ़ार्थमय ज्ञान-विज्ञान-शास्त्र है, धर्मग्रन्थ है, राजनीतिक दर्शन है, कर्मयोग-दर्शन है, भक्ति-शास्त्र है, अध्यात्म-शास्त्र है, आर्यजातिका इतिहास है और सर्वार्थसाधक तथा सर्वशास्त्रसंग्रह है। इसकी महिमा अपार है।
इसके शान्तिपर्व को पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। आगे के पर्व भी समय-समय पर जोड़ दिए जाएंगे। आशा है, पाठकगण इससे लाभ उठाकर अपने जीवनको सफल बनानेमें सक्षम होंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • शान्तिपर्व
  • राजधर्मानुशासनपर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके पास नारद आदि महर्षियोंका आगमन और युधिष्ठिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका वृत्तान्त पूछना
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • नारदजीका कर्णको शाप प्राप्त होनेका प्रसंग सुनाना
  • तृतीयोऽध्याय:
  • कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • कर्णकी सहायतासे समागत राजाओंको पराजित करके दुर्योधनद्वारा स्वयंवरसे कलिंगराजकी कन्याका अपहरण
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • कर्णके बल और पराक्रमका वर्णन, उसके द्वारा जरासंधकी पराजय और जरासंधका कर्णको अंगदेशमें मालिनी नगरीका राज्य प्रदान करना
  • षष्ठाेऽध्याय:
  • युधिष्ठिरकी चिन्ता, कुन्तीका उन्हें समझाना और स्त्रियोंको युधिष्ठिरका शाप
  • सप्तमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना
  • अष्टमोऽध्याय:
  • अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना
  • नवमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय
  • दशमोऽध्याय:
  • भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना
  • एकादशोऽध्याय:
  • अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना
  • द्वादशोऽध्याय:
  • नकुलका गृहस्थ-धर्मकी प्रशंसा करते हुए राजा युधिष्ठिरको समझाना
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • सहदेवका युधिष्ठिरको ममता और आसक्तिसे रहित होकर राज्य करनेकी सलाह देना
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • द्रौपदीका युधिष्ठिरको राजदण्डधारणपूर्वक पृथ्वीका शासन करनेके लिये प्रेरित करना
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन
  • षोडशोऽध्याय:
  • भीमसेनका राजाको भुक्त दु:खोंकी स्मृति कराते हुए मोह छोड़कर मनको काबूमें करके राज्यशासन और यज्ञके लिये प्रेरित करना
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरद्वारा भीमकी बातका विरोध करते हुए मुनिवृत्तिकी और ज्ञानी महात्माओंकी प्रशंसा
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • अर्जुनका राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देते हुए युधिष्ठिरको संन्यास ग्रहण करनेसे रोकना
  • एकोनविंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरद्वारा अपने मतकी यथार्थताका प्रतिपादन
  • विंशोऽध्याय:
  • मुनिवर देवस्थानका राजा युधिष्ठिरको यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना
  • एकविंशोऽध्याय:
  • देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • क्षत्रियधर्मकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनका पुन: राजा युधिष्ठिरको समझाना
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • व्यासजीका युधिष्ठिरको राजा हयग्रीवका चरित्र सुनाकर उन्हें राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये जोर देना
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • सेनजित् के उपदेशयुक्त उद्‍गारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना
  • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना
  • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
  • व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • व्यासजी तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाराज युधिष्ठिरका नगरमें प्रवेश
  • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
  • नगर-प्रवेशके समय पुरवासियों तथा ब्राह्मणोंद्वारा राजा युधिष्ठिरका सत्कार और उनपर आक्षेप करनेवाले चार्वाकका ब्राह्मणोंद्वारा वध
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका श्रीकृष्णद्वारा वर्णन
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका राज्याभिषेक
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • राजा युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रके अधीन रहकर राज्यकी व्यवस्थाके लिये भाइयों तथा अन्य लोगोंको विभिन्न कार्योंपर नियुक्त करना
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • राजा युधिष्ठिर तथा धृतराष्ट्रका युद्धमें मारे गये सगे-सम्बन्धियों तथा अन्य राजाओंके लिये श्राद्धकर्म करना
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • महाराज युधिष्ठिरके दिये हुए विभिन्न भवनोंमें भीमसेन आदि सब भाइयोंका प्रवेश और विश्राम
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवाद, श्रीकृष्णद्वारा भीष्मकी प्रशंसा और युधिष्ठिरको उनके पास चलनेका आदेश
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • परशुरामजीद्वारा होनेवाले क्षत्रियसंहारके विषयमें राजा युधिष्ठिरका प्रश्न
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुन: उत्पन्न होनेकी कथा
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण-प्रभावका सविस्तर वर्णन
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भीष्मके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका भीष्मकी प्रशंसा करते हुए उन्हें युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश करनेका आदेश
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना
  • चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मजीकी बातचीत
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भीष्मका युधिष्ठिरके गुण कथनपूर्वक उनको प्रश्न करनेका आदेश देना, श्रीकृष्णका उनके लज्जित और भयभीत होनेका कारण बताना और भीष्मका आश्वासन पाकर युधिष्ठिरका उनके समीप जाना
  • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष
  • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन
  • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश
  • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन
  • षष्टितमोऽध्याय:
  • वर्ण-धर्मका वर्णन
  • एकषष्टितमोऽध्याय:
  • आश्रम-धर्मका वर्णन
  • द्विषष्टितमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व
  • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
  • वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता
  • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
  • राजधर्मकी श्रेष्ठताका वर्णन और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद
  • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
  • इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद
  • षट्षष्टितमोऽध्याय:
  • राजधर्मके पालनसे चारों आश्रमोंके धर्मका फल मिलनेका कथन
  • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
  • राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन
  • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
  • वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी हानि और होनेसे लाभका वर्णन
  • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
  • राजाके प्रधान कर्तव्योंका तथा दण्डनीतिके द्वारा युगोंके निर्माणका वर्णन
  • सप्ततितमोऽध्याय:
  • राजाको इहलोक और परलोकमें सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन
  • एकसप्ततितमोऽध्याय:
  • धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन
  • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
  • राजाके लिये सदाचारी विद्वान् पुरोहितकी आवश्यकता तथा प्रजापालनका महत्त्व
  • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
  • विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान
  • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
  • ब्राह्मण और क्षत्रियके मेलसे लाभका प्रतिपादन करनेवाला मुचुकुन्दका उपाख्यान
  • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
  • राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुन: राज्यकी महिमा सुनाना
  • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
  • उत्तम-अधम ब्राह्मणोंके साथ राजाका बर्ताव
  • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
  • केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन
  • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
  • आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये वैश्यवृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा लुटेरोंसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शस्त्र धारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना
  • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
  • ऋत्विजोंके लक्षण, यज्ञ और दक्षिणाका महत्त्व तथा तपकी श्रेष्ठता
  • अशीतितमोऽध्याय:
  • राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन
  • एकाशीतितमोऽध्याय:
  • कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद
  • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
  • मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान
  • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
  • सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश
  • चतुरशीतितमोऽध्याय:
  • इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व
  • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
  • राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संघटन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण
  • षडशीतितमोऽध्याय:
  • राजाके निवासयोग्य नगर एवं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश
  • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
  • राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय
  • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
  • प्रजासे कर लेने तथा कोश-संग्रह करनेका प्रकार
  • एकोननवतितमोऽध्याय:
  • राजाके कर्तव्यका वर्णन
  • नवतितमोऽध्याय:
  • उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता
  • एकनवतितमोऽध्याय:
  • उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन
  • द्विनवतितमोऽध्याय:
  • राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश
  • त्रिनवतितमोऽध्याय:
  • वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन
  • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
  • वामदेवके उपदेशमें राजा और राज्यके लिये हितकर बर्ताव
  • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
  • विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन
  • षण्णवतितमोऽध्याय:
  • राजाके छलरहित धर्मयुक्त बर्तावकी प्रशंसा
  • सप्तनवतितमोऽध्याय:
  • शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन
  • अष्टनवतितमोऽध्याय:
  • इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन
  • नवनवतितमोऽध्याय:
  • शूरवीरोंको स्वर्ग और कायरोंको नरककी प्राप्तिके विषयमें मिथिलेश्वर जनकका इतिहास
  • शततमोऽध्याय:
  • सैन्यसंचालनकी रीति-नीतिका वर्णन
  • एकाधिकशततमोऽध्याय:
  • भिन्न-भिन्न देशके योद्धाओंके स्वभाव, रूप, बल, आचरण और लक्षणोंका वर्णन
  • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
  • विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश
  • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद
  • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
  • राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश
  • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
  • कालकवृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्यकी प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन
  • षडधिकशततमोऽध्याय:
  • कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना
  • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
  • गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति
  • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
  • माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व
  • नवाधिकशततमोऽध्याय:
  • सत्य-असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन
  • दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सदाचार और ईश्वरभक्ति आदिको दु:खोंसे छूटनेका उपाय बताना
  • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा
  • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य
  • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • शक्तिशाली शत्रुके सामने बेंतकी भाँति नतमस्तक होनेका उपदेश—सरिताओं और समुद्रका संवाद
  • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ
  • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा तथा राजसेवकोंके आवश्यक गुण
  • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा
  • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुन: कुत्ता हो जाना
  • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ
  • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सेवकोंको उनके योग्य स्थानपर नियुक्त करने, कुलीन और सत्पुरुषोंका संग्रह करने, कोष बढ़ाने तथा सबकी देखभाल करनेके लिये राजाको प्रेरणा
  • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजधर्मका साररूपमें वर्णन
  • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन
  • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन
  • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद
  • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन
  • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना
  • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना
  • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • ऋषभका राजा सुमित्रको वीरद्युम्न और तनु मुनिका वृत्तान्त सुनाना
  • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना
  • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • यम और गौतमका संवाद
  • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • आपत्तिके समय राजाका धर्म
  • आपद्धर्मपर्व
  • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • आपत्तिग्रस्त राजाके कर्तव्यका वर्णन
  • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओंके धर्मका वर्णन तथा धर्मकी गतिको सूक्ष्म बताना
  • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • राजाके लिये कोशसंग्रहकी आवश्यकता, मर्यादाकी स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्तिकी निन्दा
  • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • बलकी महत्ता और पापसे छूटनेका प्रायश्चित्त
  • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्‍गतिका वर्णन
  • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा किसका धन ले और किसका न ले तथा किसके साथ कैसा बर्ताव करे—इसका विचार
  • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • आने वाले संकटसे सावधान रहनेके लिये दूरदर्शी, तत्कालज्ञ और दीर्घसूत्री—इन तीन मत्स्योंका दृष्टान्त
  • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान
  • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद
  • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश
  • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद
  • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश
  • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना
  • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कबूतरद्वारा अपनी भार्याका गुणगान तथा पतिव्रता स्त्रीकी प्रशंसा
  • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके लिये प्रार्थना
  • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग
  • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • बहेलियेका वैराग्य
  • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कबूतरीका विलाप और अग्निमें प्रवेश तथा उन दोनोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति
  • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • बहेलियेको स्वर्गलोककी प्राप्ति
  • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • इन्द्रोत मुनिका राजा जनमेजयको फटकारना
  • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना
  • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश
  • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • मृतककी पुनर्जीवनप्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता
  • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • नारदजीका सेमल-वृक्षसे प्रशंसापूर्वक प्रश्न
  • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना
  • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • नारदजीकी बात सुनकर वायुका सेमलको धमकाना और सेमलका वायुको तिरस्कृत करके विचारमग्न होना
  • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवान‍्के साथ वैर न करनेका उपदेश
  • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण
  • एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • अज्ञान और लोभको एक दूसरेका कारण बताकर दोनोंकी एकता करना और दोनोंको ही समस्त दोषोंका कारण सिद्ध करना
  • षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य
  • एकषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • तपकी महिमा
  • द्विषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन
  • त्रिषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय
  • चतु:षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • नृशंस अर्थात् अत्यन्त नीच पुरुषके लक्षण
  • पञ्चषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन
  • षट्षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन
  • सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय
  • अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ
  • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • गौतमका समुद्रकी ओर प्रस्थान और संध्याके समय एक दिव्य बकपक्षीके घरपर अतिथि होना
  • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश
  • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना
  • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना
  • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजधर्मा और गौतमका पुन: जीवित होना
  • मोक्षधर्मपर्व
  • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन
  • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश
  • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश
  • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति
  • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • जनककी उक्ति तथा राजा नहुषके प्रश्नोंके उत्तरमें बोध्यगीता
  • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा
  • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सद्‍बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद
  • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन
  • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन
  • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • आकाशसे अन्य चार स्थूल भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन
  • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन
  • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन
  • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • जीवकी सत्तापर नाना प्रकारकी युक्तियोंसे शंका उपस्थित करना
  • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • जीवकी सत्ता तथा नित्यताको युक्तियोंसे सिद्ध करना
  • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • वर्णविभागपूर्वक मनुष्योंकी और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन
  • एकोननवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • चारों वर्णोंके अलग-अलग कर्मोंका और सदाचारका वर्णन तथा वैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्ति
  • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सत्यकी महिमा, असत्यके दोष तथा लोक और परलोकके सुख-दु:खका विवेचन
  • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन
  • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार
  • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा
  • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अध्यात्मज्ञानका निरूपण
  • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • ध्यानयोगका वर्णन
  • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल
  • सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • जापकमें दोष आनेके कारण उसे नरककी प्राप्ति
  • अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • परमधामके अधिकारी जापकके लिये देवलोक भी नरक-तुल्य हैं—इसका प्रतिपादन
  • नवनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन
  • द्विशततमोऽध्याय:
  • जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता
  • एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण
  • द्वॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय
  • त्र्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन
  • चतुरधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय तथा महत्त्व
  • पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • परब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय
  • षडधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति
  • सप्ताधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा उनकी महिमाका कथन
  • अष्टाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंके वंशका तथा प्रत्येक दिशामें निवास करनेवाले महर्षियोंका वर्णन
  • नवाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति
  • दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन
  • एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • संसारचक्र और जीवात्माकी स्थितिका वर्णन
  • द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • निषिद्ध आचरणके त्याग, सत्त्व, रज और तमके कार्य एवं परिणामका तथा सत्त्वगुणके सेवनका उपदेश
  • त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जीवोत्पत्तिका वर्णन करते हुए दोषों और बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिये विषयासक्तिके त्यागका उपदेश
  • चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति
  • पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश
  • षोडशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें मनकी स्थिति तथा गुणातीत ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय
  • सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन
  • अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन
  • एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान
  • विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन
  • एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन
  • द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना
  • त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • इन्द्र और बलिका संवाद—इन्द्रके आक्षेपयुक्त वचनोंका बलिके द्वारा कठोर प्रत्युत्तर
  • चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना
  • पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • इन्द्र और लक्ष्मीका संवाद, बलिको त्यागकर आयी हुई लक्ष्मीकी इन्द्रके द्वारा प्रतिष्ठा
  • षड्‍‍विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • इन्द्र और नमुचिका संवाद
  • सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन
  • अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना
  • एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जैगीषव्यका असित-देवलको समत्वबुद्धिका उपदेश
  • त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवाद—नारदजीकी लोकप्रियताके हेतुभूत गुणोंका वर्णन
  • एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कालका स्वरूप बताना
  • द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश
  • त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मप्रलय एवं महाप्रलयका वर्णन
  • चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन
  • पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणके कर्तव्यका प्रतिपादन करते हुए कालरूप नदको पार करनेका उपाय बतलाना
  • षट्‍‍त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति
  • सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन
  • अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व
  • एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ज्ञानका साधन और उसकी महिमा
  • चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • योगसे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन
  • एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन
  • द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन
  • त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणोंके उपलक्षणसे गार्हस्थ्य-धर्मका वर्णन
  • चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन
  • पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा
  • षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय
  • सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन
  • अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक
  • एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ज्ञानके साधन तथा ज्ञानीके लक्षण और महिमा
  • पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार-नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति
  • एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणके लक्षण और परब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय
  • द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शरीरमें पञ्चभूतोंके कार्य और गुणोंकी पहचान
  • त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे भिन्न जीवात्माका और परमात्माका योगके द्वारा साक्षात्कार करनेका प्रकार
  • चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन
  • पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पञ्चभूतोंके तथा मन और बुद्धिके गुणोंका विस्तृत वर्णन
  • षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका मृत्युविषयक प्रश्न, नारदजीका राजा अकम्पनसे मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाते हुए ब्रह्माजीकी रोषाग्निसे प्रजाके दग्ध होनेका वर्णन
  • सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति
  • अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना
  • एकोनषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय
  • षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना
  • एकषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना
  • द्विषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद
  • त्रिषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश
  • चतु:षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जाजलिको पक्षियोंका उपदेश
  • पञ्चषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा
  • षट्षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा
  • सप्तषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • द्युमत्सेन और सत्यवान‍्का संवाद—अहिंसापूर्वक राज्यशासनकी श्रेष्ठताका कथन
  • अष्टषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण
  • एकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद
  • सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन
  • एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा
  • द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा
  • त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर
  • चतु:सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • मोक्षके साधनका वर्णन
  • पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असितदेवलका संवाद
  • षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद
  • सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद
  • अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • हारीत मुनिके द्वारा प्रतिपादित संन्यासीके स्वभाव, आचरण और धर्मोंका वर्णन
  • एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ
  • अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण
  • एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन
  • द्वॺशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • वृत्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन
  • त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप
  • चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा
  • पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन
  • षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन
  • सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश
  • अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अरिष्टनेमिका राजा सगरको वैराग्योत्पादक मोक्षविषयक उपदेश
  • एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • भृगुपुत्र उशनाका चरित्र और उन्हें शुक्र नामकी प्राप्ति
  • नवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराशरगीताका आरम्भ—पराशर मुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तिके साधनका उपदेश
  • एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ
  • द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ
  • त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराशरगीता—शूद्रके लिये सेवावृत्तिकी प्रधानता, सत्संगकी महिमा और चारों वर्णोंके धर्मपालनका महत्त्व
  • चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश
  • पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश
  • षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन
  • सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराशरगीता—नाना प्रकारके धर्म और कर्तव्योंका उपदेश
  • अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर
  • नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश
  • त्रिशततमोऽध्याय:
  • सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन
  • एकाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन
  • द्वॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • वसिष्ठ और करालजनकका संवाद—क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति
  • त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना
  • चतुरधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • प्रकृतिके संसर्गदोषसे जीवका पतन
  • पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर
  • षडधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति
  • सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन
  • अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार
  • नवाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • जनकवंशी वसुमान‍्को एक मुनिका धर्मविषयक उपदेश
  • दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • याज्ञवल्क्यका राजा जनकको उपदेश—सांख्यमतके अनुसार चौबीस तत्त्वों और नौ प्रकारके सर्गोंका निरूपण
  • एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार, मन और विषयोंकी कालसंख्याका एवं सृष्टिका वर्णन तथा इन्द्रियोंमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन
  • द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • संहारक्रमका वर्णन
  • त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा सात्त्विक, राजस और तामस भावोंके लक्षण
  • चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • सात्त्विक, राजस और तामस प्रकृतिके मनुष्योंकी गतिका वर्णन तथा राजा जनकके प्रश्न
  • पञ्चदशाधिकत्रिशततमोध्याय:
  • प्रकृति-पुरुषका विवेक और उसका फल
  • षोडशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति
  • सप्तदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • विभिन्न अंगोंसे प्राणोंके उत्क्रमणका फल तथा मृत्युसूचक लक्षणोंका वर्णन और मृत्युको जीतनेका उपाय
  • अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना
  • एकोनविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • जरा-मृत्युका उल्लंघन करनेके विषयमें पञ्चशिख और राजा जनकका संवाद
  • विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना
  • एकविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना
  • द्वाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन
  • त्रयोविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीकी पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या और भगवान् शंकरसे वरप्राप्ति
  • चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त
  • पञ्चविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना
  • षड्‍‍विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन
  • सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • शुकदेवजीका पिताके पास लौट आना तथा व्यासजीका अपने शिष्योंको स्वाध्यायकी विधि बताना
  • अष्टाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • शिष्योंके जानेके बाद व्यासजीके पास नारदजीका आगमन और व्यासजीको वेदपाठके लिये प्रेरित करना तथा व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण बताते हुए ‘प्रवह’ आदि सात वायुओंका परिचय देना
  • एकोनत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश
  • त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • शुकदेवको नारदजीका सदाचार और अध्यात्मविषयक उपदेश
  • एकत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय
  • द्वात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन
  • त्रयस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • शुकदेवजीकी परमपद-प्राप्ति तथा पुत्र-शोकसे व्याकुल व्यासजीको महादेवजीका आश्वासन देना
  • चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • बदरिकाश्रममें नारदजीके पूछनेपर भगवान् नारायणका परमदेव परमात्माको ही सर्वश्रेष्ठ पूजनीय बताना
  • पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग
  • षट्‍‍त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान् की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना
  • सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा
  • अष्टत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नारदजीका दो सौ नामोंद्वारा भगवान् की स्तुति करना
  • एकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य
  • चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना
  • एकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना
  • द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय
  • त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना
  • चतुश्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना
  • पञ्चचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना
  • षट्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नारायणकी महिमासम्बन्धी उपाख्यानका उपसंहार
  • सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन
  • अष्टचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा
  • एकोनपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा
  • पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • वैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मा और रुद्रका मिलन एवं ब्रह्माजीद्वारा परम पुरुष नारायणकी महिमाका वर्णन
  • एकपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • ब्रह्मा और रुद्रके संवादमें नारायणकी महिमाका विशेषरूपसे वर्णन
  • द्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नारदके द्वारा इन्द्रको उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणकी कथा सुनानेका उपक्रम
  • त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • महापद्मपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन
  • चतु:पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन
  • पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • अतिथिद्वारा नागराज पद्मनाभके सदाचार और सद्‍गुणोंका वर्णन तथा ब्राह्मणको उसके पास जानेके लिये प्रेरणा
  • षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • अतिथिके वचनोंसे संतुष्ट होकर ब्राह्मणका उसके कथनानुसार नागराजके घरकी ओर प्रस्थान
  • सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नागपत्नीके द्वारा ब्राह्मणका सत्कार और वार्तालापके बाद ब्राह्मणके द्वारा नागराजके आगमनकी प्रतीक्षा
  • अष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या तथा नागराजके परिवारवालोंका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना
  • एकोनषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध
  • षष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना
  • एकषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नागराज और ब्राह्मणका परस्पर मिलन तथा बातचीत
  • द्विषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नागराजका ब्राह्मणके पूछनेपर सूर्यमण्डलकी आश्चर्यजनक घटनाओंको सुनाना
  • त्रिषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • उञ्छ एवं शिलवृत्तिसे सिद्ध हुए पुरुषकी दिव्य गति
  • चतु:षष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणका नागराजसे बातचीत करके और उञ्छव्रतके पालनका निश्चय करके अपने घरको जानेके लिये नागराजसे विदा माँगना
  • पञ्चषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
  • नागराजसे विदा ले ब्राह्मणका च्यवनमुनिसे उञ्छवृत्तिकी दीक्षा लेकर साधनपरायण होना और इस कथाकी परम्पराका वर्णन
  • महाभारत-सार
  • अन्तिम पृष्ठ

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