॥ श्रीहरि:॥

gstlogo
हिन्दीarrowdown
महाभारत (सभापर्व)

हिन्दी/संस्कृत

महाभारत आर्य-संस्कृति तथा भारतीय सनातनधर्मका एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नोंका अपार भण्डार है। महाभारत महाकाव्य है, गूढ़ार्थमय ज्ञान-विज्ञान-शास्त्र है, धर्मग्रन्थ है, राजनीतिक दर्शन है, कर्मयोग-दर्शन है, भक्ति-शास्त्र है, अध्यात्म-शास्त्र है, आर्यजातिका इतिहास है और सर्वार्थसाधक तथा सर्वशास्त्रसंग्रह है। इसकी महिमा अपार है।
इसके सभापर्व को पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। आशा है, पाठकगण इससे लाभ उठाकर अपने जीवनको सफल बनानेमें सक्षम होंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • सभापर्व
  • सभाक्रियापर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार मयासुरद्वारा सभाभवन बनानेकी तैयारी
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णकी द्वारकायात्रा
  • तृतीयोऽध्याय:
  • मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्‍भुत सभाका निर्माण
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • मयद्वारा निर्मित सभाभवनमें धर्मराज युधिष्ठिरका प्रवेश तथा सभामें स्थित महर्षियों और राजाओं आदिका वर्णन
  • लोकपालसभाख्यानपर्व
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना
  • षष्ठोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा
  • सप्तमोऽध्याय:
  • इन्द्रसभाका वर्णन
  • अष्टमोऽध्याय:
  • यमराजकी सभाका वर्णन
  • नवमोऽध्याय:
  • वरुणकी सभाका वर्णन
  • दशमोऽध्याय:
  • कुबेरकी सभाका वर्णन
  • एकादशोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन
  • द्वादशोऽध्याय:
  • राजा हरिश्चन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश
  • राजसूयारम्भपर्व
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • जरासंधके विषयमें राजा युधिष्ठिर, भीम और श्रीकृष्णकी बातचीत
  • षोडशोऽध्याय:
  • जरासंधको जीतनेके विषयमें युधिष्ठिरके उत्साहहीन होनेपर अर्जुनका उत्साहपूर्ण उद्‍गार
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • जरा राक्षसीका अपना परिचय देना और उसीके नामपर बालकका नामकरण होना
  • एकोनविंशोऽध्याय:
  • चण्डकौशिक मुनिके द्वारा जरासंधका भविष्यकथन तथा पिताके द्वारा उसका राज्याभिषेक करके वनमें जाना
  • जरासंधवधपर्व
  • विंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके अनुमोदन करनेपर श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेनकी मगध-यात्रा
  • एकविंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • जरासंधका भीमसेनके साथ युद्ध करनेका निश्चय, भीम और जरासंधका भयानक युद्ध तथा जरासंधकी थकावट
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • भीमके द्वारा जरासंधका वध, बंदी राजाओंकी मुक्ति, श्रीकृष्ण आदिका भेंट लेकर इन्द्रप्रस्थमें आना और वहाँसे श्रीकृष्णका द्वारका जाना
  • दिग्विजयपर्व
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • अर्जुन आदि चारों भाइयोंकी दिग्विजयके लिये यात्रा
  • षड्‍‍‍विंशोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • किम्पुरुष, हाटक तथा उत्तरकुरुपर विजय प्राप्त करके अर्जुनका इन्द्रप्रस्थ लौटना
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • भीमसेनका पूर्व दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान और विभिन्न देशोंपर विजय पाना
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • भीमका पूर्व दिशाके अनेक देशों तथा राजाओंको जीतकर भारी धन-सम्पत्तिके साथ इन्द्रप्रस्थमें लौटना
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय
  • राजसूयपर्व
  • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके यज्ञमें सब देशके राजाओं, कौरवों तथा यादवोंका आगमन और उन सबके भोजन-विश्राम आदिकी सुव्यवस्था
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • राजसूययज्ञका वर्णन
  • अर्घाभिहरणपर्व
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • राजसूययज्ञमें ब्राह्मणों तथा राजाओंका समागम, श्रीनारदजीके द्वारा श्रीकृष्ण-महिमाका वर्णन और भीष्मजीकी अनुमतिसे श्रीकृष्णकी अग्रपूजा
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन
  • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका शिशुपालको समझाना और भीष्मजीका उसके आक्षेपोंका उत्तर देना
  • भगवान् नारायणकी महिमा और उनके द्वारा मधु-कैटभका वध
  • वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि अवतारोंकी संक्षिप्त कथा
  • कल्क्यवतार:
  • श्रीकृष्णका प्राकटॺ तथा श्रीकृष्ण-बलरामकी बाललीलाओंका वर्णन
  • कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना
  • नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना
  • द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश
  • भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और भीष्मके द्वारा श्रीकृष्ण-माहात्म्यका उपसंहार
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • सहदेवकी राजाओंको चुनौती तथा क्षुब्ध हुए शिशुपाल आदि नरेशोंका युद्धके लिये उद्यत होना
  • शिशुपालवधपर्व
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरकी चिन्ता और भीष्मजीका उन्हें सान्त्वना देना
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • शिशुपालद्वारा भीष्मकी निन्दा
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • शिशुपालकी बातोंपर भीमसेनका क्रोध और भीष्मजीका उन्हें शान्त करना
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • भीष्मजीके द्वारा शिशुपालके जन्मके वृत्तान्तका वर्णन
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • भीष्मकी बातोंसे चिढ़े हुए शिशुपालका उन्हें फटकारना तथा भीष्मका श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये समस्त राजाओंको चुनौती देना
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन
  • द्यूतपर्व
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये शकुनि और दुर्योधनकी बातचीत
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दु:ख और चिन्ताका कारण बताना
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन
  • चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना
  • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना
  • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • विदुर और धृतराष्ट्रकी बातचीत
  • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • विदुर और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें जाकर सबसे मिलना
  • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
  • जूएके अनौचित्यके सम्बन्धमें युधिष्ठिर और शकुनिका संवाद
  • षष्टितमोऽध्याय:
  • द्यूतक्रीड़ाका आरम्भ
  • एकषष्टितमोऽध्याय:
  • जूएमें शकुनिके छलसे प्रत्येक दाँवपर युधिष्ठिरकी हार
  • द्विषष्टितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रको विदुरकी चेतावनी
  • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
  • विदुरजीके द्वारा जूएका घोर विरोध
  • चतुष्षष्टितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका विदुरको फटकारना और विदुरका उसे चेतावनी देना
  • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका धन, राज्य, भाइयों तथा द्रौपदीसहित अपनेको भी हारना
  • षट्षष्टितमोऽध्याय:
  • विदुरका दुर्योधनको फटकारना
  • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
  • प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दु:शासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न
  • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
  • भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना
  • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
  • द्रौपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन
  • सप्ततितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके छल-कपटयुक्त वचन और भीमसेनका रोषपूर्ण उद्‍गार
  • एकसप्ततितमोऽध्याय:
  • कर्ण और दुर्योधनके वचन, भीमसेनकी प्रतिज्ञा, विदुरकी चेतावनी और द्रौपदीको धृतराष्ट्रसे वरप्राप्ति
  • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
  • शत्रुओंको मारनेके लिये उद्यत हुए भीमको युधिष्ठिरका शान्त करना
  • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको सारा धन लौटाकर एवं समझा-बुझाकर इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश देना
  • अनुद्यूतपर्व
  • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुन: द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति
  • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
  • गान्धारीकी धृतराष्ट्रको चेतावनी और धृतराष्ट्रका अस्वीकार करना
  • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
  • सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना
  • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
  • दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा
  • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिसे विदा लेना, विदुरका कुन्तीको अपने यहाँ रखनेका प्रस्ताव और पाण्डवोंको धर्मपूर्वक रहनेका उपदेश देना
  • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
  • द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना
  • अशीतितमोऽध्याय:
  • वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन
  • एकाशीतितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रकी चिन्ता और उनका संजयके साथ वार्तालाप
  • निवेदन
  • महाभारत-सार
  • अन्तिम पृष्ठ

सम्बंधित ई-पुस्तकें

महाभारत (शान्तिपर्व)

महाभारत (शान्तिपर्व)

महाभारत (भीष्मपर्व)

महाभारत (भीष्मपर्व)

महाभारत (अनुशासनपर्व)

महाभारत (अनुशासनपर्व)

महाभारत (उद्योगपर्व)

महाभारत (उद्योगपर्व)

महाभारत (स्त्रीपर्व)

महाभारत (स्त्रीपर्व)