॥ श्रीहरि:॥

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महाभारत (द्रोणपर्व)

हिन्दी/संस्कृत

महाभारत आर्य-संस्कृति तथा भारतीय सनातनधर्मका एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नोंका अपार भण्डार है। महाभारत महाकाव्य है, गूढ़ार्थमय ज्ञान-विज्ञान-शास्त्र है, धर्मग्रन्थ है, राजनीतिक दर्शन है, कर्मयोग-दर्शन है, भक्ति-शास्त्र है, अध्यात्म-शास्त्र है, आर्यजातिका इतिहास है और सर्वार्थसाधक तथा सर्वशास्त्रसंग्रह है। इसकी महिमा अपार है।
इसके द्रोणपर्व को पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। आशा है, पाठकगण इससे लाभ उठाकर अपने जीवनको सफल बनानेमें सक्षम होंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • द्रोणाभिषेकपर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • भीष्मजीके धराशायी होनेसे कौरवोंका शोक तथा उनके द्वारा कर्णका स्मरण
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • कर्णकी रणयात्रा
  • तृतीयोऽध्याय:
  • भीष्मजीके प्रति कर्णका कथन
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • भीष्मजीका कर्णको प्रोत्साहन देकर युद्धके लिये भेजना तथा कर्णके आगमनसे कौरवोंका हर्षोल्लास
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • कर्णका दुर्योधनके समक्ष सेनापति-पदके लिये द्रोणाचार्यका नाम प्रस्तावित करना
  • षष्ठोऽध्याय:
  • दुर्योधनका द्रोणाचार्यसे सेनापति होनेके लिये प्रार्थना करना
  • सप्तमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यका सेनापतिके पदपर अभिषेक, कौरव-पाण्डव-सेनाओंका युद्ध और द्रोणका पराक्रम
  • अष्टमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यके पराक्रम और वधका संक्षिप्त समाचार
  • नवमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना
  • दशमोऽध्याय:
  • राजा धृतराष्ट्रका शोकसे व्याकुल होना और संजयसे युद्धविषयक प्रश्न
  • एकादशोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका भगवान् श्रीकृष्णकी संक्षिप्त लीलाओंका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना
  • द्वादशोऽध्याय:
  • दुर्योधनका वर माँगना और द्रोणाचार्यका युधिष्ठिरको अर्जुनकी अनुपस्थितिमें जीवित पकड़ लानेकी प्रतिज्ञा करना
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • अर्जुनका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा युद्धमें द्रोणाचार्यका पराक्रम
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • द्रोणका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका द्वन्द्वयुद्ध, रणनदीका वर्णन तथा अभिमन्युकी वीरता
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • शल्यके साथ भीमसेनका युद्ध तथा शल्यकी पराजय
  • षोडशोऽध्याय:
  • वृषसेनका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका तुमुल युद्ध, द्रोणाचार्यके द्वारा पाण्डवपक्षके अनेक वीरोंका वध तथा अर्जुनकी विजय
  • संशप्तकवधपर्व
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • सुशर्मा आदि संशप्तक वीरोंकी प्रतिज्ञा तथा अर्जुनका युद्धके लिये उनके निकट जाना
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • संशप्तक-सेनाओंके साथ अर्जुनका युद्ध और सुधन्वाका वध
  • एकोनविंशोऽध्याय:
  • संशप्तकगणोंके साथ अर्जुनका घोर युद्ध
  • विंशोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार
  • एकविंशोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यके द्वारा सत्यजित् , शतानीक,दृढसेन,क्षेम, वसुदान तथा पांचालराजकुमार आदिका वध और पाण्डव-सेनाकी पराजय
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • द्रोणके युद्धके विषयमें दुर्योधन और कर्णका संवाद
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • पाण्डव-सेनाके महारथियोंके रथ, घोड़े, ध्वज तथा धनुषोंका विवरण
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका अपना खेद प्रकाशित करते हुए युद्धके समाचार पूछना
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डव-सैनिकोंके द्वन्द-युद्ध
  • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
  • भीमसेनका भगदत्तके हाथीके साथ युद्ध, हाथी और भगदत्तका भयानक पराक्रम
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • अर्जुनका संशप्तक-सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • संशप्तकोंका संहार करके अर्जुनका कौरव-सेनापर आक्रमण तथा भगदत्त और उनके हाथीका पराक्रम
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • अर्जुन और भगदत्तका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा तथा अर्जुनद्वारा हाथीसहित भगदत्तका वध
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा वृषक और अचलका वध, शकुनिकी माया और उसकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध तथा अश्वत्थामाके द्वारा राजा नीलका वध
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध,भीमसेनका कौरव महारथियोंके साथ संग्राम, भयंकर संहार, पाण्डवोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, अर्जुन और कर्णका युद्ध, कर्णके भाइयोंका वध तथा कर्ण और सात्यकिका संग्राम
  • अभिमन्युवधपर्व
  • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
  • दुर्योधनका उपालम्भ, द्रोणाचार्यकी प्रतिज्ञा और अभिमन्युवधके वृत्तान्तका संक्षेपसे वर्णन
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • संजयके द्वारा अभिमन्युकी प्रशंसा, द्रोणाचार्यद्वारा चक्रव्यूहका निर्माण
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिर और अभिमन्युका संवाद तथा व्यूहभेदनके लिये अभिमन्युकी प्रतिज्ञा
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युका उत्साह तथा उसके द्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका संहार
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युका पराक्रम, उसके द्वारा अश्मकपुत्रका वध, शल्यका मूर्च्छित होना और कौरव-सेनाका पलायन
  • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युके द्वारा शल्यके भाईका वध तथा द्रोणाचार्यकी रथसेनाका पलायन
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यके द्वारा अभिमन्युके पराक्रमकी प्रशंसा तथा दुर्योधनके आदेशसे दु:शासनका अभिमन्युके साथ युद्ध आरम्भ करना
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युके द्वारा दु:शासन और कर्णकी पराजय
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युके द्वारा कर्णके भाईका वध तथा कौरव-सेनाका संहार और पलायन
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युके पीछे जानेवाले पाण्डवोंको जयद्रथका वरके प्रभावसे रोक देना
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • पाण्डवोंके साथ जयद्रथका युद्ध और व्यूहद्वारको रोक रखना
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युका पराक्रम और उसके द्वारा वसातीय आदि अनेक योद्धाओंका वध
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युके द्वारा सत्यश्रवा, क्षत्रियसमूह, रुक्मरथ तथा उसके मित्रगणों और सैकड़ों राजकुमारोंका वध और दुर्योधनकी पराजय
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युके द्वारा लक्ष्मण तथा क्राथपुत्रका वध और सेनासहित छ: महारथियोंका पलायन
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युका पराक्रम, छ: महारथियोंके साथ घोर युद्ध और उसके द्वारा वृन्दारक तथा दस हजार अन्य राजाओंके सहित कोसलनरेश बृहद्‍बलका वध
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • अभिमन्युद्वारा अश्वकेतु, भोज और कर्णके मन्त्री आदिका वध एवं छ: महारथियोंके साथ घोर युद्ध और उन महारथियोंद्वारा अभिमन्युके धनुष, रथ, ढाल और तलवारका नाश
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • अभिमन्युका कालिकेय, वसाति और कैकय रथियोंको मार डालना एवं छ: महारथियोंके सहयोगसे अभिमन्युका वध और भागती हुई अपनी सेनाको युधिष्ठिरका आश्वासन देना
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका विलाप
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • विलाप करते हुए युधिष्ठिरके पास व्यासजीका आगमन और अकम्पन-नारद-संवादकी प्रस्तावना करते हुए मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग आरम्भ करना
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना
  • चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • मृत्युकी घोर तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उसे वरकी प्राप्ति तथा नारद-अकम्पन-संवादका उपसंहार
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना
  • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • राजा सुहोत्रकी दानशीलता
  • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • राजा पौरवके अद्भुत दानका वृत्तान्त
  • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • राजा शिबिके यज्ञ और दानकी महत्ता
  • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीरामका चरित्र
  • षष्टितमोऽध्याय:
  • राजा भगीरथका चरित्र
  • एकषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा दिलीपका उत्कर्ष
  • द्विषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा मान्धाताकी महत्ता
  • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा ययातिका उपाख्यान
  • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
  • राजा अम्बरीषका चरित्र
  • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा शशबिन्दुका चरित्र
  • षट्षष्टितमोऽध्याय:
  • राजा गयका चरित्र
  • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा रन्तिदेवकी महत्ता
  • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा भरतका चरित्र
  • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
  • राजा पृथुका चरित्र
  • सप्ततितमोऽध्याय:
  • परशुरामजीका चरित्र
  • एकसप्ततितमोऽध्याय:
  • नारदजीका सृंजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना
  • प्रतिज्ञापर्व
  • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
  • अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध
  • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा
  • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
  • जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना
  • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका अर्जुनको कौरवोंके जयद्रथकी रक्षाविषयक उद्योगका समाचार बताना
  • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
  • अर्जुनके वीरोचित वचन
  • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
  • नाना प्रकारके अशुभसूचक उत्पात, कौरव-सेनामें भय और श्रीकृष्णका अपनी बहिन सुभद्राको आश्वासन देना
  • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
  • सुभद्राका विलाप और श्रीकृष्णका सबको आश्वासन
  • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन
  • अशीतितमोऽध्याय:
  • अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना
  • एकाशीतितमोऽध्याय:
  • अर्जुनको स्वप्नमें ही पुन: पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति
  • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना
  • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
  • अर्जुनकी प्रतिज्ञाको सफल बनानेके लिये युधिष्ठिरकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना और श्रीकृष्णका उन्हें आश्वासन देना
  • चतुरशीतितमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका अर्जुनको आशीर्वाद, अर्जुनका स्वप्न सुनकर समस्त सुहृदोंकी प्रसन्नता, सात्यकि और श्रीकृष्णके साथ रथपर बैठकर अर्जुनकी रणयात्रा तथा अर्जुनके कहनेसे सात्यकिका युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये जाना
  • जयद्रथवधपर्व
  • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका विलाप
  • षडशीतितमोऽध्याय:
  • संजयका धृतराष्ट्रको उपालम्भ
  • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
  • कौरव-सैनिकोंका उत्साह तथा आचार्य द्रोणके द्वारा चक्रशकटव्यूहका निर्माण
  • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
  • कौरव-सेनाके लिये अपशकुन, दुर्मर्षणका अर्जुनसे लड़नेका उत्साह तथा अर्जुनका रणभूमिमें प्रवेश एवं शंखनाद
  • एकोननवतितमोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा दुर्मर्षणकी गजसेनाका संहार और समस्त सैनिकोंका पलायन
  • नवतितमोऽध्याय:
  • अर्जुनके बाणोंसे हताहत होकर सेनासहित दु:शासनका पलायन
  • एकनवतितमोऽध्याय:
  • अर्जुन और द्रोणाचार्यका वार्तालाप तथा युद्ध एवं द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे बढ़े हुए अर्जुनका कौरव-सैनिकोंद्वारा प्रतिरोध
  • द्विनवतितमोऽध्याय:
  • अर्जुनका द्रोणाचार्य और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए कौरव-सेनामें प्रवेश तथा श्रुतायुधका अपनी गदासे और सुदक्षिणका अर्जुनद्वारा वध
  • त्रिनवतितमोऽध्याय:
  • अर्जुनद्वारा श्रुतायु, अच्युतायु, नियतायु, दीर्घायु, म्लेच्छ-सैनिक और अम्बष्ठ आदिका वध
  • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका उपालम्भ सुनकर द्रोणाचार्यका उसके शरीरमें दिव्य कवच बाँधकर उसीको अर्जुनके साथ युद्धके लिये भेजना
  • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
  • द्रोण और धृष्टद्युम्नका भीषण संग्राम तथा उभय पक्षके प्रमुख वीरोंका परस्पर संकुल युद्ध
  • षण्णवतितमोऽध्याय:
  • दोनों पक्षोंके प्रधान वीरोंका द्वन्द्व-युद्ध
  • सप्तनवतितमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिद्वारा धृष्टद्युम्नकी रक्षा
  • अष्टनवतितमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्य और सात्यकिका अद्भुत युद्ध
  • एकोनशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा तीव्र गतिसे कौरव-सेनामें प्रवेश, विन्द और अनुविन्दका वध तथा अद्भुत जलाशयका निर्माण
  • शततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना
  • एकाधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण और अर्जुनको आगे बढ़ा देख कौरव-सैनिकोंकी निराशा तथा दुर्योधनका युद्धके लिये आना
  • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका अर्जुनकी प्रशंसापूर्वक उसे प्रोत्साहन देना, अर्जुन और दुर्योधनका एक-दूसरेके सम्मुख आना, कौरव-सैनिकोंका भय तथा दुर्योधनका अर्जुनको ललकारना
  • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधन और अर्जुनका युद्ध तथा दुर्योधनकी पराजय
  • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका कौरव महारथियोंके साथ घोर युद्ध
  • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुन तथा कौरव-महारथियोंके ध्वजोंका वर्णन और नौ महारथियोंके साथ अकेले अर्जुनका युद्ध
  • षडधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोण और उनकी सेनाके साथ पाण्डव-सेनाका द्वन्द्वयुद्ध तथा द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करते समय रथ-भंग हो जानेपर युधिष्ठिरका पलायन
  • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरव-सेनाके क्षेमधूर्ति, वीरधन्वा, निरमित्र तथा व्याघ्रदत्तका वध और दुर्मुख एवं विकर्णकी पराजय
  • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रौपदीपुत्रोंके द्वारा सोमदत्तकुमार शलका वध तथा भीमसेनके द्वारा अलम्बुषकी पराजय
  • नवाधिकशततमोऽध्याय:
  • घटोत्कचद्वारा अलम्बुषका वध और पाण्डव-सेनामें हर्ष-ध्वनि
  • दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश
  • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद
  • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिकी अर्जुनके पास जानेकी तैयारी और सम्मानपूर्वक विदा होकर उनका प्रस्थान तथा साथ आते हुए भीमको युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये लौटा देना
  • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिका द्रोण और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए काम्बोजोंकी सेनाके पास पहुँचना
  • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका विषादयुक्त वचन, संजयका धृतराष्ट्रको ही दोषी बताना, कृतवर्माका भीमसेन और शिखण्डीके साथ युद्ध तथा पाण्डव-सेनाकी पराजय
  • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय, त्रिगर्तोंकी गजसेनाका संहार और जलसंधका वध
  • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिका पराक्रम तथा दुर्योधन और कृतवर्माकी पुन: पराजय
  • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकि और द्रोणाचार्यका युद्ध, द्रोणकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन
  • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिद्वारा सुदर्शनका वध
  • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकि और उनके सारथिका संवाद तथा सात्यकिद्वारा काम्बोजों और यवन आदिकी सेनाकी पराजय
  • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिद्वारा दुर्योधनकी सेनाका संहार तथा भाइयोंसहित दुर्योधनका पलायन
  • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिके द्वारा पाषाणयोधी म्लेच्छोंकी सेनाका संहार और दु:शासनका सेनासहित पलायन
  • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय
  • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिका घोर युद्ध और दु:शासनकी पराजय
  • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डव-सेनाका घोर युद्ध तथा पाण्डवोंके साथ दुर्योधनका संग्राम
  • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यके द्वारा बृहत्क्षत्र, धृष्टकेतु, जरासन्धपुत्र सहदेव तथा धृष्टद्युम्नकुमार क्षत्रधर्माका वध और चेकितानकी पराजय
  • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका चिन्तित होकर भीमसेनको अर्जुन और सात्यकिका पता लगानेके लिये भेजना
  • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन
  • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनका द्रोणाचार्य और अन्य कौरव योद्धाओंको पराजित करते हुए द्रोणाचार्यके रथको आठ बार फेंक देना तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनके समीप पहुँचकर गर्जना करना तथा युधिष्ठिरका प्रसन्न होकर अनेक प्रकारकी बातें सोचना
  • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और कर्णका युद्ध तथा कर्णकी पराजय
  • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना, द्रोणाचार्यका उसे द्यूतका परिणाम दिखाकर युद्धके लिये वापस भेजना और उसके साथ युधामन्यु तथा उत्तमौजाका युद्ध
  • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनके द्वारा कर्णकी पराजय
  • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और कर्णका घोर युद्ध
  • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णके सारथिसहित रथका विनाश तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध
  • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और कर्णका युद्ध, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्मुखका वध तथा कर्णका पलायन
  • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका खेदपूर्वक भीमसेनके बलका वर्णन और अपने पुत्रोंकी निन्दा करना तथा भीमके द्वारा दुर्मर्षण आदि धृतराष्ट्रके पाँच पुत्रोंका वध
  • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णका पलायन, धृतराष्ट्रके सात पुत्रोंका वध तथा भीमका पराक्रम
  • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और कर्णका युद्ध तथा दुर्योधनके सात भाइयोंका वध
  • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और कर्णका भयंकर युद्ध
  • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और कर्णका भयंकर युद्ध, पहले भीमकी और पीछे कर्णकी विजय, उसके बाद अर्जुनके बाणोंसे व्यथित होकर कर्ण और अश्वत्थामाका पलायन
  • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिद्वारा राजा अलम्बुषका और दु:शासनके घोड़ोंका वध
  • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिका अद्भुत पराक्रम, श्रीकृष्णका अर्जुनको सात्यकिके आगमनकी सूचना देना और अर्जुनकी चिन्ता
  • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भूरिश्रवा और सात्यकिका रोषपूर्वक सम्भाषण और युद्ध तथा सात्यकिका सिर काटनेके लिये उद्यत हुए भूरिश्रवाकी भुजाका अर्जुनद्वारा उच्छेद
  • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भूरिश्रवाका अर्जुनको उपालम्भ देना, अर्जुनका उत्तर और आमरण अनशनके लिये बैठे हुए भूरिश्रवाका सात्यकिके द्वारा वध
  • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिके भूरिश्रवाद्वारा अपमानित होनेका कारण तथा वृष्णिवंशी वीरोंकी प्रशंसा
  • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका जयद्रथपर आक्रमण, कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत, कर्णके साथ अर्जुनका युद्ध और कर्णकी पराजय तथा सब योद्धाओंके साथ अर्जुनका घोर युद्ध
  • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका अद्भुत पराक्रम और सिन्धुराज जयद्रथका वध
  • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय
  • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका कर्णको फटकारना और वृषसेनके वधकी प्रतिज्ञा करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको बधाई देकर उन्हें रणभूमिका भयानक दृश्य दिखाते हुए युधिष्ठिरके पास ले जाना
  • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे विजयका समाचार सुनाना और युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा अर्जुन, भीम एवं सात्यकिका अभिनन्दन
  • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना
  • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यका दुर्योधनको उत्तर और युद्धके लिये प्रस्थान
  • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधन और कर्णकी बातचीत तथा पुन: युद्धका आरम्भ
  • घटोत्कचवधपर्व
  • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डव-सेनाका युद्ध, दुर्योधन और युधिष्ठिरका संग्राम तथा दुर्योधनकी पराजय
  • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • रात्रियुद्धमें पाण्डव-सैनिकोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण और द्रोणाचार्यद्वारा उनका संहार
  • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यद्वारा शिबिका वध तथा भीमसेनद्वारा घूँसे और थप्पड़से कलिंगराजकुमारका एवं ध्रुव, जयरात तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुष्कर्ण और दुर्मदका वध
  • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • सोमदत्त और सात्यकिका युद्ध, सोमदत्तकी पराजय, घटोत्कच और अश्वत्थामाका युद्ध और अश्वत्थामाद्वारा घटोत्कचके पुत्रका, एक अक्षौहिणी राक्षस-सेनाका तथा द्रुपदपुत्रोंका वध एवं पाण्डव-सेनाकी पराजय
  • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • सोमदत्तकी मूर्च्छा, भीमके द्वारा बाह्लीकका वध, धृतराष्ट्रके दस पुत्रों और शकुनिके सात रथियों एवं पाँच भाइयोंका संहार तथा द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरके युद्धमें युधिष्ठिरकी विजय
  • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधन और कर्णकी बातचीत, कृपाचार्यद्वारा कर्णको फटकारना तथा कर्णद्वारा कृपाचार्यका अपमान
  • एकोनष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अश्वत्थामाका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना, दुर्योधनका उसे मनाना, पाण्डवों और पाञ्चालोंका कर्णपर आक्रमण, कर्णका पराक्रम, अर्जुनके द्वारा कर्णकी पराजय तथा दुर्योधनका अश्वत्थामासे पांचालोंके वधके लिये अनुरोध
  • षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अश्वत्थामाका दुर्योधनको उपालम्भपूर्ण आश्वासन देकर पांचालोंके साथ युद्ध करते हुए धृष्टद्युम्नके रथसहित सारथिको नष्ट करके उसकी सेनाको भगाकर अद्भुत पराक्रम दिखाना
  • एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और अर्जुनका आक्रमण और कौरव-सेनाका पलायन
  • द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिद्वारा सोमदत्तका वध, द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरका युद्ध तथा भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यसे दूर रहनेका आदेश
  • त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंमें प्रदीपों (मशालों)-का प्रकाश
  • चतु:षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दोनों सेनाओंका घमासान युद्ध और दुर्योधनका द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये सैनिकोंको आदेश
  • पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दोनों सेनाओंका युद्ध और कृतवर्माद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय
  • षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिके द्वारा भूरिका वध, घटोत्कच और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा भीमके साथ दुर्योधनका युद्ध एवं दुर्योधनका पलायन
  • सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कर्णके द्वारा सहदेवकी पराजय, शल्यके द्वारा विराटके भाई शतानीकका वध और विराटकी पराजय तथा अर्जुनसे पराजित होकर अलम्बुषका पलायन
  • अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
  • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • नकुलके द्वारा शकुनिकी पराजय तथा शिखण्डी और कृपाचार्यका घोर युद्ध
  • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्यका युद्ध, धृष्टद्युम्नद्वारा द्रुमसेनका वध, सात्यकि और कर्णका युद्ध, कर्णकी दुर्योधनको सलाह तथा शकुनिका पाण्डव-सेनापर आक्रमण
  • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकिसे दुर्योधनकी, अर्जुनसे शकुनि और उलूककी तथा धृष्टद्युम्नसे कौरव-सेनाकी पराजय
  • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके उपालम्भसे द्रोणाचार्य और कर्णका घोर युद्ध, पाण्डव-सेनाका पलायन, भीमसेनका सेनाको लौटाकर लाना और अर्जुनसहित भीमसेनका कौरवोंपर आक्रमण करना
  • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कर्णद्वारा धृष्टद्युम्न एवं पांचालोंकी पराजय, युधिष्ठिरकी घबराहट तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनका घटोत्कचको प्रोत्साहन देकर कर्णके साथ युद्धके लिये भेजना
  • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • घटोत्कच और जटासुरके पुत्र अलम्बुषका घोर युद्ध तथा अलम्बुषका वध
  • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम
  • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अलायुधका युद्धस्थलमें प्रवेश तथा उसके स्वरूप और रथ आदिका वर्णन
  • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन और अलायुधका घोर युद्ध
  • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दोनों सेनाओंमें परस्पर घोर युद्ध और घटोत्कचके द्वारा अलायुधका वध एवं दुर्योधनका पश्चात्ताप
  • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • घटोत्कचका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा चलायी हुई इन्द्रप्रदत्त शक्तिसे उसका वध
  • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण
  • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको जरासंध आदि धर्मद्रोहियोंके वध करनेका कारण बताना
  • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कर्णने अर्जुनपर शक्ति क्यों नहीं छोड़ी, इसके उत्तरमें संजयका धृतराष्ट्रसे और श्रीकृष्णका सात्यकिसे रहस्ययुक्त कथन
  • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण
  • द्रोणवधपर्व
  • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • निद्रासे व्याकुल हुए उभयपक्षके सैनिकोंका अर्जुनके कहनेसे सो जाना और चन्द्रोदयके बाद पुन: उठकर युद्धमें लग जाना
  • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका उपालम्भ और द्रोणाचार्यका व्यंगपूर्ण उत्तर
  • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डववीरोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, द्रुपदके पौत्रों तथा द्रुपद एवं विराट आदिका वध, धृष्टद्युम्नकी प्रतिज्ञा और दोनों दलोंमें घमासान युद्ध
  • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • युद्धस्थलकी भीषण अवस्थाका वर्णन और नकुलके द्वारा दुर्योधनकी पराजय
  • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • दु:शासन और सहदेवका, कर्ण और भीमसेनका तथा द्रोणाचार्य और अर्जुनका घोर युद्ध
  • एकोननवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • धृष्टद्युम्नका दु:शासनको हराकर द्रोणाचार्यपर आक्रमण, नकुल-सहदेवद्वारा उनकी रक्षा, दुर्योधन तथा सात्यकिका संवाद तथा युद्ध, कर्ण और भीमसेनका संग्राम और अर्जुनका कौरवोंपर आक्रमण
  • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना
  • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिकी शूरवीरता और प्रशंसा
  • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद
  • नारायणास्त्रमोक्षपर्व
  • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरव-सैनिकों तथा सेनापतियोंका भागना, अश्वत्थामाके पूछनेपर कृपाचार्यका उसे द्रोणवधका वृत्तान्त सुनाना
  • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका प्रश्न
  • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य
  • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरव-सेनाका सिंहनाद सुनकर युधिष्ठिरका अर्जुनसे कारण पूछना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाके क्रोध एवं गुरुहत्याके भीषण परिणामका वर्णन
  • सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनके वीरोचित उद्‍गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन
  • अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण
  • नवनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अश्वत्थामाके द्वारा नारायणास्त्रका प्रयोग, राजा युधिष्ठिरका खेद, भगवान् श्रीकृष्णके बताये हुए उपायसे सैनिकोंकी रक्षा, भीमसेनका वीरोचित उद्‍गार और उनपर उस अस्त्रका प्रबल आक्रमण
  • द्विशततमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन
  • एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना
  • द्वॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल
  • अन्तिम पृष्ठ

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