॥ श्रीहरि:॥

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महाभारत (भीष्मपर्व)

हिन्दी/संस्कृत

महाभारत आर्य-संस्कृति तथा भारतीय सनातनधर्मका एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नोंका अपार भण्डार है। महाभारत महाकाव्य है, गूढ़ार्थमय ज्ञान-विज्ञान-शास्त्र है, धर्मग्रन्थ है, राजनीतिक दर्शन है, कर्मयोग-दर्शन है, भक्ति-शास्त्र है, अध्यात्म-शास्त्र है, आर्यजातिका इतिहास है और सर्वार्थसाधक तथा सर्वशास्त्रसंग्रह है। इसकी महिमा अपार है।
इसके भीष्मपर्व को पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। आशा है, पाठकगण इससे लाभ उठाकर अपने जीवनको सफल बनानेमें सक्षम होंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • भीष्मपर्व
  • जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • कुरुक्षेत्रमें उभय पक्षके सैनिकोंकी स्थिति तथा युद्धके नियमोंका निर्माण
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • वेदव्यासजीके द्वारा संजयको दिव्य दृष्टिका दान तथा भयसूचक उत्पातोंका वर्णन
  • तृतीयोऽध्याय:
  • व्यासजीके द्वारा अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजयके द्वारा भूमिके महत्त्वका वर्णन
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • पंचमहाभूतों तथा सुदर्शनद्वीपका संक्षिप्त वर्णन
  • षष्ठोऽध्याय:
  • सुदर्शनके वर्ष, पर्वत, मेरुगिरि, गंगानदी तथा शशाकृतिका वर्णन
  • सप्तमोऽध्याय:
  • उत्तर कुरु, भद्राश्ववर्ष तथा माल्यवान‍्का वर्णन
  • अष्टमोऽध्याय:
  • रमणक, हिरण्यक, शृंगवान् पर्वत तथा ऐरावतवर्षका वर्णन
  • नवमोऽध्याय:
  • भारतवर्षकी नदियों, देशों तथा जनपदोंके नाम और भूमिका महत्त्व
  • दशमोऽध्याय:
  • भारतवर्षमें युगोंके अनुसार मनुष्योंकी आयु तथा गुणोंका निरूपण
  • भूमिपर्व
  • एकादशोऽध्याय:
  • शाकद्वीपका वर्णन
  • द्वादशोऽध्याय:
  • कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन
  • श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्व
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • संजयका युद्धभूमिसे लौटकर धृतराष्ट्रको भीष्मकी मृत्युका समाचार सुनाना
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रका विलाप करते हुए भीष्मजीके मारे जानेकी घटनाको विस्तारपूर्वक जाननेके लिये संजयसे प्रश्न करना
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • संजयका युद्धके वृत्तान्तका वर्णन आरम्भ करना—दुर्योधनका दु:शासनको भीष्मकी रक्षाके लिये समुचित व्यवस्था करनेका आदेश
  • षोडशोऽध्याय:
  • दुर्योधनकी सेनाका वर्णन
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • कौरवमहारथियोंका युद्धके लिये आगे बढ़ना तथा उनके व्यूह, वाहन और ध्वज आदिका वर्णन
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • कौरवसेनाका कोलाहल तथा भीष्मके रक्षकोंका वर्णन
  • एकोनविंशतितमोऽध्याय:
  • व्यूहनिर्माणके विषयमें युधिष्ठिर और अर्जुनकी बातचीत, अर्जुनद्वारा वज्रव्यूहकी रचना, भीमसेनकी अध्यक्षतामें सेनाका आगे बढ़ना
  • विंशोऽध्याय:
  • दोनों सेनाओंकी स्थिति तथा कौरवसेनाका अभियान
  • एकविंशोऽध्याय:
  • कौरवसेनाको देखकर युधिष्ठिरका विषाद करना और ‘श्रीकृष्णकी कृपासे ही विजय होती है’ यह कहकर अर्जुनका उन्हें आश्वासन देना
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरकी रणयात्रा, अर्जुन और भीमसेनकी प्रशंसा तथा श्रीकृष्णका अर्जुनसे कौरवसेनाको मारनेके लिये कहना
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा दुर्गादेवीकी स्तुति, वरप्राप्ति और अर्जुनकृत दुर्गास्तवनके पाठकी महिमा
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • सैनिकोंके हर्ष और उत्साहके विषयमें धृतराष्ट्र और संजयका संवाद
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • दोनों सेनाओंके प्रधान-प्रधान वीरों एवं शंखध्वनिका वर्णन तथा स्वजनवधके पापसे भयभीत हुए अर्जुनका विषाद
  • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
  • अर्जुनको युद्धके लिये उत्साहित करते हुए भगवान‍् के द्वारा नित्यानित्य वस्तुके विवेचनपूर्वक सांख्ययोग, कर्मयोग एवं स्थितप्रज्ञकी स्थिति और महिमाका प्रतिपादन
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • ज्ञानयोग और कर्मयोग आदि समस्त साधनोंके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन एवं स्वधर्मपालनकी महिमा तथा कामनिरोधके उपायका वर्णन
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • सगुण भगवान‍् के प्रभाव, निष्काम कर्मयोग तथा योगी महात्मा पुरुषोंके आचरण और उनकी महिमाका वर्णन करते हुए विविध यज्ञों एवं ज्ञानकी महिमाका वर्णन
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • सांख्ययोग, निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तिसहित ध्यानयोगका वर्णन
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • निष्काम कर्मयोगका प्रतिपादन करते हुए आत्मोद्धारके लिये प्रेरणा तथा मनोनिग्रहपूर्वक ध्यानयोग एवं योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • ज्ञान-विज्ञान, भगवान‍् की व्यापकता, अन्य देवताओंकी उपासना एवं भगवान‍् को प्रभावसहित न जाननेवालोंकी निन्दा और जाननेवालोंकी महिमाका कथन
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिके विषयमें अर्जुनके सात प्रश्न और उनका उत्तर एवं भक्तियोग तथा शुक्ल और कृष्ण मार्गोंका प्रतिपादन
  • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
  • ज्ञान-विज्ञान और जगत् की उत्पत्तिका, आसुरी और दैवी सम्पदावालोंका, प्रभावसहित भगवान‍् के स्वरूपका, सकाम-निष्काम उपासनाका एवं भगवद्भक्तिकी महिमाका वर्णन
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • भगवान‍् की विभूति और योगशक्तिका तथा प्रभावसहित भक्तियोगका कथन, अर्जुनके पूछनेपर भगवान‍्द्वारा अपनी विभूतियोंका और योगशक्तिका पुन: वर्णन
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • विश्वरूपका दर्शन करानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना, भगवान‍् और संजयद्वारा विश्वरूपका वर्णन, अर्जुनद्वारा भगवान‍् के विश्वरूपका देखा जाना, भयभीत हुए अर्जुनद्वारा भगवान‍् की स्तुति-प्रार्थना, भगवान‍्द्वारा विश्वरूप और चतुर्भुजरूपके दर्शनकी महिमा और केवल अनन्यभक्तिसे ही भगवान‍् की प्राप्तिका कथन
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • साकार और निराकारके उपासकोंकी उत्तमताका निर्णय तथा भगवत्प्राप्तिके उपायका एवं भगवत्प्राप्तिवाले पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुषका वर्णन
  • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
  • ज्ञानकी महिमा और प्रकृति-पुरुषसे जगत् की उत्पत्तिका, सत्त्व, रज, तम—तीनों गुणोंका, भगवत्प्राप्तिके उपायका एवं गुणातीत पुरुषके लक्षणोंका वर्णन
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • संसारवृक्षका, भगवत्प्राप्तिके उपायका, जीवात्माका, प्रभावसहित परमेश्वरके स्वरूपका एवं क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमके तत्त्वका वर्णन
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • फलसहित दैवी और आसुरी सम्पदाका वर्णन तथा शास्त्रविपरीत आचरणोंको त्यागने और शास्त्रके अनुकूल आचरण करनेके लिये प्रेरणा
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • श्रद्धाका और शास्त्रविपरीत घोर तप करनेवालोंका वर्णन, आहार, यज्ञ, तप और दानके पृथक्-पृथक् भेद तथा ॐ, तत्, सत् के प्रयोगकी व्याख्या
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • त्यागका, सांख्यसिद्धान्तका, फलसहित वर्ण-धर्मका, उपासनासहित ज्ञाननिष्ठाका, भक्तिसहित निष्काम कर्मयोगका एवं गीताके माहात्म्यका वर्णन
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डवोंके प्रथम दिनके युद्धका आरम्भ
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • उभय पक्षके सैनिकोंका द्वन्द्व-युद्ध
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डव-सेनाका घमासान युद्ध
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • भीष्मके साथ अभिमन्युका भयंकर युद्ध, शल्यके द्वारा उत्तरकुमारका वध और श्वेतका पराक्रम
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • श्वेतका महाभयंकर पराक्रम और भीष्मके द्वारा उसका वध
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • शंखका युद्ध, भीष्मका प्रचण्ड पराक्रम तथा प्रथम दिनके युद्धकी समाप्ति
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • कौरव-सेनाकी व्यूह-रचना तथा दोनों दलोंमें शंखध्वनि और सिंहनाद
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भीष्म और अर्जुनका युद्ध
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्यका युद्ध
  • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • भीमसेनका कलिंगों और निषादोंसे युद्ध, भीमसेनके द्वारा शक्रदेव, भानुमान् और केतुमान‍्का वध तथा उनके बहुत-से सैनिकोंका संहार
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • अभिमन्यु और अर्जुनका पराक्रम तथा दूसरे दिनके युद्धकी समाप्ति
  • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • तीसरे दिन—कौरव-पाण्डवोंकी व्यूह-रचना तथा युद्धका आरम्भ
  • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध
  • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • पाण्डव-वीरोंका पराक्रम, कौरव-सेनामें भगदड़ तथा दुर्योधन और भीष्मका संवाद
  • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
  • भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति
  • षष्टितमोऽध्याय:
  • चौथे दिन—दोनों सेनाओंका व्यूह-निर्माण तथा भीष्म और अर्जुनका द्वैरथ-युद्ध
  • एकषष्टितमोऽध्याय:
  • अभिमन्युका पराक्रम और धृष्टद्युम्नद्वारा शलके पुत्रका वध
  • द्विषष्टितमोऽध्याय:
  • धृष्टद्युम्न और शल्य आदि दोनों पक्षके वीरोंका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार
  • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
  • युद्धस्थलमें प्रचण्ड पराक्रमकारी भीमसेनका भीष्मके साथ युद्ध तथा सात्यकि और भूरिश्रवाकी मुठभेड़
  • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
  • भीमसेन और घटोत्कचका पराक्रम, कौरवोंकी पराजय तथा चौथे दिनके युद्धकी समाप्ति
  • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन
  • षट्षष्टितमोऽध्याय:
  • नारायणावतार श्रीकृष्ण एवं नरावतार अर्जुनकी महिमाका प्रतिपादन
  • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
  • भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमा
  • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
  • ब्रह्मभूतस्तोत्र तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महत्ता
  • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
  • कौरवोंद्वारा मकरव्यूह तथा पाण्डवोंद्वारा श्येनव्यूहका निर्माण एवं पाँचवें दिनके युद्धका आरम्भ
  • सप्ततितमोऽध्याय:
  • भीष्म और भीमसेनका घमासान युद्ध
  • एकसप्ततितमोऽध्याय:
  • भीष्म, अर्जुन आदि योद्धाओंका घमासान युद्ध
  • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
  • दोनों सेनाओंका परस्पर घोर युद्ध
  • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
  • विराट-भीष्म, अश्वत्थामा-अर्जुन, दुर्योधन-भीमसेन तथा अभिमन्यु और लक्ष्मणके द्वन्द्व-युद्ध
  • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
  • सात्यकि और भूरिश्रवाका युद्ध, भूरिश्रवाद्वारा सात्यकिके दस पुत्रोंका वध, अर्जुनका पराक्रम तथा पाँचवें दिनके युद्धका उपसंहार
  • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
  • छठे दिनके युद्धका आरम्भ, पाण्डव तथा कौरव-सेनाका क्रमश: मकरव्यूह एवं क्रौंचव्यूह बनाकर युद्धमें प्रवृत्त होना
  • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रकी चिन्ता
  • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
  • भीमसेन, धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्यका पराक्रम
  • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
  • उभय पक्षकी सेनाओंका संकुल युद्ध
  • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
  • भीमसेनके द्वारा दुर्योधनकी पराजय, अभिमन्यु और द्रौपदीपुत्रोंका धृतराष्ट्रपुत्रोंके साथ युद्ध तथा छठे दिनके युद्धकी समाप्ति
  • अशीतितमोऽध्याय:
  • भीष्मद्वारा दुर्योधनको आश्वासन तथा सातवें दिनके युद्धके लिये कौरव-सेनाका प्रस्थान
  • एकाशीतितमोऽध्याय:
  • सातवें दिनके युद्धमें कौरव-पाण्डव-सेनाओंका मण्डल और वज्रव्यूह बनाकर भीषण संघर्ष
  • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
  • श्रीकृष्ण और अर्जुनसे डरकर कौरवसेनामें भगदड़, द्रोणाचार्य और विराटका युद्ध, विराटपुत्र शंखका वध, शिखण्डी और अश्वत्थामाका युद्ध, सात्यकिके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, धृष्टद्युम्नके द्वारा दुर्योधनकी हार तथा भीमसेन और कृतवर्माका युद्ध
  • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
  • इरावान‍्के द्वारा विन्द और अनुविन्दकी पराजय, भगदत्तसे घटोत्कचका हारना तथा मद्रराजपर नकुल और सहदेवकी विजय
  • चतुरशीतितमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरसे राजा श्रुतायुका पराजित होना, युद्धमें चेकितान और कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, भूरिश्रवासे धृष्टकेतुका और अभिमन्युसे चित्रसेन आदिका पराजित होना एवं सुशर्मा आदिसे अर्जुनका युद्धारम्भ
  • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
  • अर्जुनका पराक्रम, पाण्डवोंका भीष्मपर आक्रमण, युधिष्ठिरका शिखण्डीको उपालम्भ और भीमका पुरुषार्थ
  • षडशीतितमोऽध्याय:
  • भीष्म और युधिष्ठिरका युद्ध, धृष्टद्युम्न और सात्यकिके साथ विन्द और अनुविन्दका संग्राम, द्रोण आदिका पराक्रम और सातवें दिनके युद्धकी समाप्ति
  • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
  • आठवें दिन व्यूहबद्ध कौरव-पाण्डव-सेनाओंकी रणयात्रा और उनका परस्पर घमासान युद्ध
  • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
  • भीष्मका पराक्रम, भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके आठ पुत्रोंका वध तथा दुर्योधन और भीष्मकी युद्धविषयक बातचीत
  • एकोननवतितमोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डव-सेनाका घमासान युद्ध और भयानक जनसंहार
  • नवतितमोऽध्याय:
  • इरावान‍्के द्वारा शकुनिके भाइयोंका तथा राक्षस अलम्बुषके द्वारा इरावान‍्का वध
  • एकनवतितमोऽध्याय:
  • घटोत्कच और दुर्योधनका भयानक युद्ध
  • द्विनवतितमोऽध्याय:
  • घटोत्कचका दुर्योधन एवं द्रोण आदि प्रमुख वीरोंके साथ भयंकर युद्ध
  • त्रिनवतितमोऽध्याय:
  • घटोत्कचकी रक्षाके लिये आये हुए भीम आदि शूरवीरोंके साथ कौरवोंका युद्ध और उनका पलायन
  • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
  • दुर्योधन और भीमसेनका एवं अश्वत्थामा और राजा नीलका युद्ध तथा घटोत्कचकी मायासे मोहित होकर कौरव-सेनाका पलायन
  • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके अनुरोध और भीष्मजीकी आज्ञासे भगदत्तका घटोत्कच, भीमसेन और पाण्डव-सेनाके साथ घोर युद्ध
  • षण्णवतितमोऽध्याय:
  • इरावान‍्के वधसे अर्जुनका दु:खपूर्ण उद्‍गार, भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके नौ पुत्रोंका वध, अभिमन्यु और अम्बष्ठका युद्ध, युद्धकी भयानक स्थितिका वर्णन तथा आठवें दिनके युद्धका उपसंहार
  • सप्तनवतितमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका अपने मन्त्रियोंसे सलाह करके भीष्मसे पाण्डवोंको मारने अथवा कर्णको युद्धके लिये आज्ञा देनेका अनुरोध करना
  • अष्टनवतितमोऽध्याय:
  • भीष्मका दुर्योधनको अर्जुनका पराक्रम बताना और भयंकर युद्धके लिये प्रतिज्ञा करना तथा प्रात:काल दुर्योधनके द्वारा भीष्मकी रक्षाकी व्यवस्था
  • एकोनशततमोऽध्याय:
  • नवें दिनके युद्धके लिये उभयपक्षकी सेनाओंकी व्यूह-रचना और उनके घमासान युद्धका आरम्भ तथा विनाशसूचक उत्पातोंका वर्णन
  • शततमोऽध्याय:
  • द्रौपदीके पाँचों पुत्रों और अभिमन्युका राक्षस अलम्बुषके साथ घोर युद्ध एवं अभिमन्युके द्वारा नष्ट होती हुई कौरव-सेनाका युद्धभूमिसे पलायन
  • एकाधिकशततमोऽध्याय:
  • अभिमन्युके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, अर्जुनके साथ भीष्मका तथा कृपाचार्य, अश्वत्थामा और द्रोणाचार्यके साथ सात्यकिका युद्ध
  • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्य और सुशर्माके साथ अर्जुनका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार
  • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
  • उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध और रक्तमयी रणनदीका वर्णन
  • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय, कौरव-पाण्डव-सैनिकोंका घोर युद्ध, अभिमन्युसे चित्रसेनकी, द्रोणसे द्रुपदकी और भीमसेनसे बाह्लीककी पराजय तथा सात्यकि और भीष्मका युद्ध
  • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका दु:शासनको भीष्मकी रक्षाके लिये आदेश, युधिष्ठिर और नकुल-सहदेवके द्वारा शकुनिकी घुड़सवार-सेनाकी पराजय तथा शल्यके साथ उन सबका युद्ध
  • षडधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्मके द्वारा पराजित पाण्डवसेनाका पलायन और भीष्मको मारनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको अर्जुनका रोकना
  • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
  • नवें दिनके युद्धकी समाप्ति, रातमें पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंका भीष्मसे मिलकर उनके वधका उपाय जानना
  • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
  • दसवें दिन उभयपक्षकी सेनाका रणके लिये प्रस्थान तथा भीष्म और शिखण्डीका समागम एवं अर्जुनका शिखण्डीको भीष्मका वध करनेके लिये उत्साहित करना
  • नवाधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्म और दुर्योधनका संवाद तथा भीष्मके द्वारा लाखों सैनिकोंका संहार
  • दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके प्रोत्साहनसे शिखण्डीका भीष्मपर आक्रमण और दोनों सेनाओंके प्रमुख वीरोंका परस्पर युद्ध तथा दु:शासनका अर्जुनके साथ घोर युद्ध
  • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डवपक्षके प्रमुख महारथियोंके द्वन्द्व-युद्धका वर्णन
  • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यका अश्वत्थामाको अशुभ शकुनोंकी सूचना देते हुए उसे भीष्मकी रक्षाके लिये धृष्टद्युम्नसे युद्ध करनेका आदेश देना
  • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरवपक्षके दस प्रमुख महारथियोंके साथ अकेले घोर युद्ध करते हुए भीमसेनका अद्भुत पराक्रम
  • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंके साथ युद्धमें भीमसेन और अर्जुनका अद्भुत पुरुषार्थ
  • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्मके आदेशसे युधिष्ठिरका उनपर आक्रमण तथा कौरव-पाण्डव-सैनिकोंका भीषण युद्ध
  • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डव महारथियोंके द्वन्द्वयुद्धका वर्णन तथा भीष्मका पराक्रम
  • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • उभय पक्षकी सेनाओंका युद्ध, दु:शासनका पराक्रम तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मका मूर्च्छित होना
  • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्मका अद्भुत पराक्रम करते हुए पाण्डव-सेनाका भीषण संहार
  • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना
  • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्मजीकी महत्ता तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मको तकिया देना एवं उभय पक्षकी सेनाओंका अपने शिबिरमें जाना और श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवाद
  • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना
  • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद
  • श्रवणमहिमा
  • महाभारत-सार
  • अन्तिम पृष्ठ

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