॥ श्रीहरि:॥

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महाभारत (आदिपर्व)

हिन्दी/संस्कृत

महाभारत आर्य-संस्कृति तथा भारतीय सनातनधर्मका एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नोंका अपार भण्डार है। महाभारत महाकाव्य है, गूढ़ार्थमय ज्ञान-विज्ञान-शास्त्र है, धर्मग्रन्थ है, राजनीतिक दर्शन है, कर्मयोग-दर्शन है, भक्ति-शास्त्र है, अध्यात्म-शास्त्र है, आर्यजातिका इतिहास है और सर्वार्थसाधक तथा सर्वशास्त्रसंग्रह है। इसकी महिमा अपार है।
इसके आदिपर्व को पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। आशा है, पाठकगण इससे लाभ उठाकर अपने जीवनको सफल बनानेमें सक्षम होंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • नम्र निवेदन
  • आदिपर्व
  • अनुक्रमणिकापर्व
  • प्रथमोऽध्याय:
  • ग्रन्थका उपक्रम, ग्रन्थमें कहे हुए अधिकांश विषयोंकी संक्षिप्तसूची तथा इसके पाठकी महिमा
  • पर्वसंग्रहपर्व
  • द्वितीयोऽध्याय:
  • समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल
  • पौष्यपर्व
  • तृतीयोऽध्याय:
  • जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना
  • पौलोमपर्व
  • चतुर्थोऽध्याय:
  • कथा-प्रवेश
  • पञ्चमोऽध्याय:
  • भृगुके आश्रमपर पुलोमा दानवका आगमन और उसकी अग्निदेवके साथ बातचीत
  • षष्ठोऽध्याय:
  • महर्षि च्यवनका जन्म, उनके तेजसे पुलोमा राक्षसका भस्म होना तथा भृगुका अग्निदेवको शाप देना
  • सप्तमोऽध्याय:
  • शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना
  • अष्टमोऽध्याय:
  • प्रमद्वराका जन्म, रुरुके साथ उसका वाग्दान तथा विवाहके पहले ही साँपके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु
  • नवमोऽध्याय:
  • रुरुकी आधी आयुसे प्रमद्वराका जीवित होना, रुरुके साथ उसका विवाह, रुरुका सर्पोंको मारनेका निश्चय तथा रुरु-डुण्डुभ-संवाद
  • दशमोऽध्याय:
  • रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद
  • एकादशोऽध्याय:
  • डुण्डुभकी आत्मकथा तथा उसके द्वारा रुरुको अहिंसाका उपदेश
  • द्वादशोऽध्याय:
  • जनमेजयके सर्पसत्रके विषयमें रुरुकी जिज्ञासा और पिताद्वारा उसकी पूर्ति
  • आस्तीकपर्व
  • त्रयोदशोऽध्याय:
  • जरत्कारुका अपने पितरोंके अनुरोधसे विवाहके लिये उद्यत होना
  • चतुर्दशोऽध्याय:
  • जरत्कारुद्वारा वासुकिकी बहिनका पाणिग्रहण
  • पञ्चदशोऽध्याय:
  • आस्तीकका जन्म तथा मातृशापसे सर्पसत्रमें नष्ट होनेवाले नागवंशकी उनके द्वारा रक्षा
  • षोडशोऽध्याय:
  • कद्रू और विनताको कश्यपजीके वरदानसे अभीष्ट पुत्रोंकी प्राप्ति
  • सप्तदशोऽध्याय:
  • मेरुपर्वतपर अमृतके लिये विचार करनेवाले देवताओंको भगवान् नारायणका समुद्रमन्थनके लिये आदेश
  • अष्टादशोऽध्याय:
  • देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना
  • एकोनविंशोऽध्याय:
  • देवताओंका अमृतपान, देवासुरसंग्राम तथा देवताओंकी विजय
  • विंशोऽध्याय:
  • कद्रू और विनताकी होड़, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप एवं ब्रह्माजीद्वारा उसका अनुमोदन
  • एकविंशोऽध्याय:
  • समुद्रका विस्तारसे वर्णन
  • द्वाविंशोऽध्याय:
  • नागोंद्वारा उच्चै:श्रवाकी पूँछको काली बनाना; कद्रू और विनताका समुद्रको देखते हुए आगे बढ़ना
  • त्रयोविंशोऽध्याय:
  • पराजित विनताका कद्रूकी दासी होना, गरुडकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी स्तुति
  • चतुर्विंशोऽध्याय:
  • गरुडके द्वारा अपने तेज और शरीरका संकोच तथा सूर्यके क्रोधजनित तीव्र तेजकी शान्तिके लिये अरुणका उनके रथपर स्थित होना
  • पञ्चविंशोऽध्याय:
  • सूर्यके तापसे मूर्च्छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति
  • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
  • इन्द्रद्वारा की हुई वर्षासे सर्पोंकी प्रसन्नता
  • सप्तविंशोऽध्याय:
  • रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना
  • अष्टाविंशोऽध्याय:
  • गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना
  • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
  • कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना
  • त्रिंशोऽध्याय:
  • गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना
  • एकत्रिंशोऽध्याय:
  • इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति
  • द्वात्रिंशोऽध्याय:
  • गरुडका देवताओंके साथ युद्ध और देवताओंकी पराजय
  • त्रयत्रिंशोऽध्याय:
  • गरुडका अमृत लेकर लौटना, मार्गमें भगवान् विष्णुसे वर पाना एवं उनपर इन्द्रके द्वारा वज्र-प्रहार
  • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
  • इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण
  • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
  • मुख्य-मुख्य नागोंके नाम
  • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
  • शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर-प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना
  • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
  • माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श
  • अष्टत्रिंशोऽध्याय:
  • वासुकिकी बहिन जरत्कारुका जरत्कारु मुनिके साथ विवाह करनेका निश्चय
  • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
  • ब्रह्माजीकी आज्ञासे वासुकिका जरत्कारु मुनिके साथ अपनी बहिनको ब्याहनेके लिये प्रयत्नशील होना
  • चत्वारिंशोऽध्याय:
  • जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना
  • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
  • शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित् को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना
  • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
  • शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत
  • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
  • तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित् के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना
  • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • जनमेजयका राज्याभिषेक और विवाह
  • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
  • जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप
  • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
  • जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना और नागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना
  • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
  • जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन
  • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
  • वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन
  • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • राजा परीक्षित् के धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन, राजाका शिकारके लिये जाना और उनके द्वारा शमीक मुनिका तिरस्कार
  • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • शृंगी ऋषिका परीक्षित् को शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित् को डँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा
  • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम
  • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोंका विनाश
  • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना
  • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना
  • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा
  • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना
  • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • सर्पयज्ञमें दग्ध हुए प्रधान-प्रधान सर्पोंके नाम
  • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
  • यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना
  • अंशावतरणपर्व
  • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
  • महाभारतका उपक्रम
  • षष्टितमोऽध्याय:
  • जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथा राजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत-कथा सुनानेके लिये कहना
  • एकषष्टितमोऽध्याय:
  • कौरव-पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका सूत्ररूपमें निर्देश
  • द्विषष्टितमोऽध्याय:
  • महाभारतकी महत्ता
  • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा
  • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश
  • सम्भवपर्व
  • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
  • मरीचि आदि महर्षियों तथा अदिति आदि दक्षकन्याओंके वंशका विवरण
  • षट्षष्टितमोऽध्याय:
  • महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका वर्णन
  • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
  • देवता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन
  • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
  • राजा दुष्यन्तकी अद्‍भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन
  • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
  • दुष्यन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना
  • सप्ततितमोऽध्याय:
  • तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश
  • एकसप्ततितमोऽध्याय:
  • राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना
  • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
  • मेनका-विश्वामित्र-मिलन, कन्याकी उत्पत्ति, शकुन्त पक्षियोंके द्वारा उसकी रक्षा और कण्वका उसे अपने आश्रमपर लाकर शकुन्तला नाम रखकर पालन करना
  • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
  • शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन
  • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
  • शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक
  • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
  • दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन
  • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
  • कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना
  • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
  • देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना
  • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
  • देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यजीके साथ वार्तालाप
  • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
  • शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष
  • अशीतितमोऽध्याय:
  • शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना
  • एकाशीतितमोऽध्याय:
  • सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह
  • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
  • ययातिसे देवयानीको पुत्र-प्राप्ति; ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म
  • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
  • देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना
  • चतुरशीतितमोऽध्याय:
  • ययातिका अपने पुत्र यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनुसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर अपने पुत्र पूरुको जरावस्था देकर उनकी युवावस्था लेना तथा उन्हें वर प्रदान करना
  • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
  • राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना
  • षडशीतितमोऽध्याय:
  • वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति
  • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
  • इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना
  • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
  • ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना
  • एकोननवतितमोऽध्याय:
  • ययाति और अष्टकका संवाद
  • नवतितमोऽध्याय:
  • अष्टक और ययातिका संवाद
  • एकनवतितमोऽध्याय:
  • ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद
  • द्विनवतितमोऽध्याय:
  • अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना
  • त्रिनवतितमोऽध्याय:
  • राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना
  • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
  • पूरुवंशका वर्णन
  • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
  • दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन
  • षण्णवतितमोऽध्याय:
  • महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसुओंके साथ गंगाकी बातचीत
  • सप्तनवतितमोऽध्याय:
  • राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना
  • अष्टनवतितमोऽध्याय:
  • शान्तनु और गंगाका कुछ शर्तोंके साथ सम्बन्ध, वसुओंका जन्म और शापसे उद्धार तथा भीष्मकी उत्पत्ति
  • नवनवतितमोऽध्याय:
  • महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा
  • शततमोऽध्याय:
  • शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा
  • एकाधिकशततमोऽध्याय:
  • सत्यवतीके गर्भसे चित्रांगद और विचित्रवीर्यकी उत्पत्ति, शान्तनु और चित्रांगदका निधन तथा विचित्रवीर्यका राज्याभिषेक
  • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्मके द्वारा स्वयंवरसे काशिराजकी कन्याओंका हरण, युद्धमें सब राजाओं तथा शाल्वकी पराजय, अम्बिका और अम्बालिकाके साथ विचित्रवीर्यका विवाह तथा निधन
  • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सत्यवतीका भीष्मसे राज्यग्रहण और संतानोत्पादनके लिये आग्रह तथा भीष्मके द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति
  • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
  • भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना
  • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीके द्वारा विचित्रवीर्यके क्षेत्रसे धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति
  • षडधिकशततमोऽध्याय:
  • महर्षि माण्डव्यका शूलीपर चढ़ाया जाना
  • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
  • माण्डव्यका धर्मराजको शाप देना
  • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्र आदिके जन्म तथा भीष्मजीके धर्मपूर्ण शासनसे कुरुदेशकी सर्वांगीण उन्नतिका दिग्दर्शन
  • नवाधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा धृतराष्ट्रका विवाह
  • दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान
  • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीद्वारा स्वयंवरमें पाण्डुका वरण और उनके साथ विवाह
  • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • माद्रीके साथ पाण्डुका विवाह तथा राजा पाण्डुकी दिग्विजय
  • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा पाण्डुका पत्नियोंसहित वनमें निवास तथा विदुरका विवाह
  • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति
  • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • दु:शलाके जन्मकी कथा
  • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंकी नामावली
  • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति
  • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश
  • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डुका कुन्तीको पुत्र-प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका आदेश
  • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीका पाण्डुको व्युषिताश्वके मृत शरीरसे उसकी पतिव्रता पत्नी भद्राके द्वारा पुत्र-प्राप्तिका कथन
  • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डुका कुन्तीको समझाना और कुन्तीका पतिकी आज्ञासे पुत्रोत्पत्तिके लिये धर्मदेवताका आवाहन करनेके लिये उद्यत होना
  • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनकी उत्पत्ति
  • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार
  • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण
  • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना
  • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डु और माद्रीकी अस्थियोंका दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओंद्वारा उनके लिये जलांजलिदान
  • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंकी बालक्रीड़ा, दुर्योधनका भीमसेनको विष खिलाना तथा गंगामें ढकेलना और भीमका नागलोकमें पहुँचकर आठ कुण्डोंके दिव्य रसका पान करना
  • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनके न आनेसे कुन्ती आदिकी चिन्ता, नागलोकसे भीमसेनका आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधनकी कुचेष्टा
  • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा
  • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना
  • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा
  • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति
  • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • राजकुमारोंका रंगभूमिमें अस्त्र-कौशल दिखाना
  • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेन, दुर्योधन तथा अर्जुनके द्वारा अस्त्र-कौशलका प्रदर्शन
  • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कर्णका रंगभूमिमें प्रवेश तथा राज्याभिषेक
  • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनके द्वारा कर्णका तिरस्कार और दुर्योधनद्वारा उसका सम्मान
  • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणका शिष्योंद्वारा द्रुपदपर आक्रमण करवाना, अर्जुनका द्रुपदको बंदी बनाकर लाना और द्रोणद्वारा द्रुपदको आधा राज्य देकर मुक्त कर देना
  • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका युवराजपदपर अभिषेक, पाण्डवोंके शौर्य, कीर्ति और बलके विस्तारसे धृतराष्ट्रको चिन्ता
  • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • कणिकका धृतराष्ट्रको कूटनीतिका उपदेश
  • जतुगृहपर्व
  • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंके प्रति पुरवासियोंका अनुराग देखकर दुर्योधनकी चिन्ता
  • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंको वारणावत भेज देनेका प्रस्ताव
  • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रके आदेशसे पाण्डवोंकी वारणावत-यात्रा
  • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • दुर्योधनके आदेशसे पुरोचनका वारणावत नगरमें लाक्षागृह बनाना
  • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंकी वारणावत-यात्रा तथा उनको विदुरका गुप्त उपदेश
  • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत
  • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • विदुरके भेजे हुए खनकद्वारा लाक्षागृहमें सुरंगका निर्माण
  • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना
  • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
  • विदुरजीके भेजे हुए नाविकका पाण्डवोंको गंगाजीके पार उतारना
  • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्र आदिके द्वारा पाण्डवोंके लिये शोकप्रकाश एवं जलांजलिदान तथा पाण्डवोंका वनमें प्रवेश
  • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध
  • हिडिम्बवधपर्व
  • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • हिडिम्बके भेजनेसे हिडिम्बा राक्षसीका पाण्डवोंके पास आना और भीमसेनसे उसका वार्तालाप
  • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • हिडिम्बका आना, हिडिम्बाका उससे भयभीत होना और भीम तथा हिडिम्बासुरका युद्ध
  • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • हिडिम्बाका कुन्ती आदिसे अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासुरका वध
  • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति
  • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश
  • बकवधपर्व
  • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार
  • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना
  • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
  • ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना
  • एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीके पूछनेपर ब्राह्मणका उनसे अपने दु:खका कारण बताना
  • षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्ती और ब्राह्मणकी बातचीत
  • एकषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनको राक्षसके पास भेजनेके विषयमें युधिष्ठिर और कुन्तीकी बातचीत
  • द्विषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • भीमसेनका भोजन-सामग्री लेकर बकासुरके पास जाना और स्वयं भोजन करना तथा युद्ध करके उसे मार गिराना
  • त्रिषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • बकासुरके वधसे राक्षसोंका भयभीत होकर पलायन और नगरनिवासियोंकी प्रसन्नता
  • चैत्ररथपर्व
  • चतु:षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका एक ब्राह्मणसे विचित्र कथाएँ सुनना
  • पञ्चषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रोणके द्वारा द्रुपदके अपमानित होनेका वृत्तान्त
  • षट्षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति
  • सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीकी अपने पुत्रोंसे पूछकर पंचालदेशमें जानेकी तैयारी
  • अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीका पाण्डवोंको द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाना
  • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता
  • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना
  • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • तपती और संवरणकी बातचीत
  • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • वसिष्ठजीकी सहायतासे राजा संवरणको तपतीकी प्राप्ति
  • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • गन्धर्वका वसिष्ठजीकी महत्ता बताते हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको पुरोहित बनानेके लिये आग्रह करना
  • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • वसिष्ठजीके अद्‍भुत क्षमा-बलके आगे विश्वामित्रजीका पराभव
  • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक
  • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति
  • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • शक्तिपुत्र पराशरका जन्म और पिताकी मृत्युका हाल सुनकर कुपित हुए पराशरको शान्त करनेके लिये वसिष्ठजीका उन्हें और्वोपाख्यान सुनाना
  • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पितरोंद्वारा और्वके क्रोधका निवारण
  • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • और्व और पितरोंकी बातचीत तथा और्वका अपनी क्रोधाग्निको बडवानलरूपसे समुद्रमें त्यागना
  • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति
  • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप
  • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका धौम्यको अपना पुरोहित बनाना
  • स्वयंवरपर्व
  • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंकी पंचालयात्रा और मार्गमें ब्राह्मणोंसे बातचीत
  • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा
  • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • धृष्टद्युम्नका द्रौपदीको स्वयंवरमें आये हुए राजाओंका परिचय देना
  • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • राजाओंका लक्ष्यवेधके लिये उद्योग और असफल होना
  • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त करना
  • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रुपदको मारनेके लिये उद्यत हुए राजाओंका सामना करनेके लिये भीम और अर्जुनका उद्यत होना और उनके विषयमें भगवान् श्रीकृष्णका बलरामजीसे वार्तालाप
  • एकोननवत्यधिकशततमोध्याय:
  • अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कर्ण तथा शल्यकी पराजय और द्रौपदीसहित भीम-अर्जुनका अपने डेरेपर जाना
  • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट
  • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • धृष्टद्युम्नका गुप्तरूपसे वहाँका सब हाल देखकर राजा द्रुपदके पास आना तथा द्रौपदीके विषयमें द्रुपदका प्रश्न
  • वैवाहिकपर्व
  • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • धृष्टद्युम्नके द्वारा द्रौपदी तथा पाण्डवोंका हाल सुनकर राजा द्रुपदका उनके पास पुरोहितको भेजना तथा पुरोहित और युधिष्ठिरकी बातचीत
  • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवों और कुन्तीका द्रुपदके घरमें जाकर सम्मानित होना और राजा द्रुपदद्वारा पाण्डवोंके शील-स्वभावकी परीक्षा
  • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रुपद और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा व्यासजीका आगमन
  • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीके सामने द्रौपदीका पाँच पुरुषोंसे विवाह होनेके विषयमें द्रुपद, धृष्टद्युम्न और युधिष्ठिरका अपने-अपने विचार व्यक्त करना
  • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • व्यासजीका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर दिव्य दृष्टि देना और द्रुपदका उनके दिव्य रूपोंकी झाँकी करना
  • सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • द्रौपदीका पाँचों पाण्डवोंके साथ विवाह
  • अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • कुन्तीका द्रौपदीको उपदेश और आशीर्वाद तथा भगवान् श्रीकृष्णका पाण्डवोंके लिये उपहार भेजना
  • विदुरागमनराज्यलम्भपर्व
  • नवनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा
  • द्विशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, शत्रुओंको वशमें करनेके उपाय
  • एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंको पराक्रमसे दबानेके लिये कर्णकी सम्मति
  • द्वॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • भीष्मकी दुर्योधनसे पाण्डवोंको आधा राज्य देनेकी सलाह
  • त्र्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार
  • चतुरधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • विदुरजीकी सम्मति—द्रोण और भीष्मके वचनोंका ही समर्थन
  • पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरका द्रुपदके यहाँ जाना और पाण्डवोंको हस्तिनापुर भेजनेका प्रस्ताव करना
  • षडधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान
  • सप्ताधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना
  • अष्टाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव
  • नवाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • सुन्द और उपसुन्दद्वारा क्रूरतापूर्ण कर्मोंसे त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करना
  • दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • तिलोत्तमाकी उत्पत्ति, उसके रूपका आकर्षण तथा सुन्दोपसुन्दको मोहित करनेके लिये उसका प्रस्थान
  • एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • तिलोत्तमापर मोहित होकर सुन्द-उपसुन्दका आपसमें लड़ना और मारा जाना एवं तिलोत्तमाको ब्रह्माजीद्वारा वरप्राप्त तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण
  • अर्जुनवनवासपर्व
  • द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान
  • त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन
  • चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका पूर्वदिशाके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए मणिपूरमें जाकर चित्रांगदाका पाणिग्रहण करके उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न करना
  • पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ
  • षोडशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपूर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना
  • सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्णसे मिलना और उन्हींके साथ उनका रैवतक पर्वत एवं द्वारकापुरीमें आना
  • सुभद्राहरणपर्व
  • अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • रैवतक पर्वतके उत्सवमें अर्जुनका सुभद्रापर आसक्त होना और श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिरकी अनुमतिसे उसे हर ले जानेका निश्चय करना
  • एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • यादवोंकी युद्धके लिये तैयारी और अर्जुनके प्रति बलरामजीके क्रोधपूर्ण उद्‍गार
  • हरणाहरणपर्व
  • विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा
  • खाण्डवदाहपर्व
  • एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • युधिष्ठिरके राज्यकी विशेषता, कृष्ण और अर्जुनका खाण्डववनमें जाना तथा उन दोनोंके पास ब्राह्मणवेशधारी अग्निदेवका आगमन
  • द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा
  • त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अर्जुनका अग्निकी प्रार्थना स्वीकार करके उनसे दिव्य धनुष एवं रथ आदि माँगना
  • चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना
  • पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा
  • षड्‍‍विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • देवताओं आदिके साथ श्रीकृष्ण और अर्जुनका युद्ध
  • मयदर्शनपर्व
  • सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा
  • अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शार्ङ्गकोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना
  • एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जरिताका अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्तित होकर विलाप करना
  • त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • जरिता और उसके बच्चोंका संवाद
  • एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना
  • द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • मन्दपालका अपने बाल-बच्चोंसे मिलना
  • त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
  • इन्द्रदेवका श्रीकृष्ण और अर्जुनको वरदान तथा श्रीकृष्ण, अर्जुन और मयासुरका अग्निसे विदा लेकर एक साथ यमुनातटपर बैठना
  • अन्तिम पृष्ठ

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