॥ श्रीहरि:॥

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महाभारत (आदिपर्व से स्वर्गारोहणपर्व)

हिन्दी/संस्कृत

महाभारत आर्य-संस्कृति तथा भारतीय सनातनधर्मका एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नोंका अपार भण्डार है। महाभारत महाकाव्य है, गूढ़ार्थमय ज्ञान-विज्ञान-शास्त्र है, धर्मग्रन्थ है, राजनीतिक दर्शन है, कर्मयोग-दर्शन है, भक्ति-शास्त्र है, अध्यात्म-शास्त्र है, आर्यजातिका इतिहास है और सर्वार्थसाधक तथा सर्वशास्त्रसंग्रह है। इसकी महिमा अपार है। आशा है, पाठकगण इससे लाभ उठाकर अपने जीवनको सफल बनानेमें सक्षम होंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • नम्र निवेदन
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    आदिपर्व
    • अनुक्रमणिकापर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • ग्रन्थका उपक्रम, ग्रन्थमें कहे हुए अधिकांश विषयोंकी संक्षिप्तसूची तथा इसके पाठकी महिमा
    • पर्वसंग्रहपर्व
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल
    • पौष्यपर्व
    • तृतीयोऽध्याय:
    • जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना
    • पौलोमपर्व
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • कथा-प्रवेश
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • भृगुके आश्रमपर पुलोमा दानवका आगमन और उसकी अग्निदेवके साथ बातचीत
    • षष्ठोऽध्याय:
    • महर्षि च्यवनका जन्म, उनके तेजसे पुलोमा राक्षसका भस्म होना तथा भृगुका अग्निदेवको शाप देना
    • सप्तमोऽध्याय:
    • शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • प्रमद्वराका जन्म, रुरुके साथ उसका वाग्दान तथा विवाहके पहले ही साँपके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु
    • नवमोऽध्याय:
    • रुरुकी आधी आयुसे प्रमद्वराका जीवित होना, रुरुके साथ उसका विवाह, रुरुका सर्पोंको मारनेका निश्चय तथा रुरु-डुण्डुभ-संवाद
    • दशमोऽध्याय:
    • रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद
    • एकादशोऽध्याय:
    • डुण्डुभकी आत्मकथा तथा उसके द्वारा रुरुको अहिंसाका उपदेश
    • द्वादशोऽध्याय:
    • जनमेजयके सर्पसत्रके विषयमें रुरुकी जिज्ञासा और पिताद्वारा उसकी पूर्ति
    • आस्तीकपर्व
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • जरत्कारुका अपने पितरोंके अनुरोधसे विवाहके लिये उद्यत होना
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • जरत्कारुद्वारा वासुकिकी बहिनका पाणिग्रहण
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • आस्तीकका जन्म तथा मातृशापसे सर्पसत्रमें नष्ट होनेवाले नागवंशकी उनके द्वारा रक्षा
    • षोडशोऽध्याय:
    • कद्रू और विनताको कश्यपजीके वरदानसे अभीष्ट पुत्रोंकी प्राप्ति
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • मेरुपर्वतपर अमृतके लिये विचार करनेवाले देवताओंको भगवान् नारायणका समुद्रमन्थनके लिये आदेश
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • देवताओंका अमृतपान, देवासुरसंग्राम तथा देवताओंकी विजय
    • विंशोऽध्याय:
    • कद्रू और विनताकी होड़, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप एवं ब्रह्माजीद्वारा उसका अनुमोदन
    • एकविंशोऽध्याय:
    • समुद्रका विस्तारसे वर्णन
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • नागोंद्वारा उच्चै:श्रवाकी पूँछको काली बनाना; कद्रू और विनताका समुद्रको देखते हुए आगे बढ़ना
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • पराजित विनताका कद्रूकी दासी होना, गरुडकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी स्तुति
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • गरुडके द्वारा अपने तेज और शरीरका संकोच तथा सूर्यके क्रोधजनित तीव्र तेजकी शान्तिके लिये अरुणका उनके रथपर स्थित होना
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • सूर्यके तापसे मूर्च्छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • इन्द्रद्वारा की हुई वर्षासे सर्पोंकी प्रसन्नता
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • गरुडका देवताओंके साथ युद्ध और देवताओंकी पराजय
    • त्रयत्रिंशोऽध्याय:
    • गरुडका अमृत लेकर लौटना, मार्गमें भगवान् विष्णुसे वर पाना एवं उनपर इन्द्रके द्वारा वज्र-प्रहार
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • मुख्य-मुख्य नागोंके नाम
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर-प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श
    • अष्टत्रिंशोऽध्याय:
    • वासुकिकी बहिन जरत्कारुका जरत्कारु मुनिके साथ विवाह करनेका निश्चय
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • ब्रह्माजीकी आज्ञासे वासुकिका जरत्कारु मुनिके साथ अपनी बहिनको ब्याहनेके लिये प्रयत्नशील होना
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित् को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित् के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • जनमेजयका राज्याभिषेक और विवाह
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना और नागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • राजा परीक्षित् के धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन, राजाका शिकारके लिये जाना और उनके द्वारा शमीक मुनिका तिरस्कार
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • शृंगी ऋषिका परीक्षित् को शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित् को डँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोंका विनाश
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना
    • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • सर्पयज्ञमें दग्ध हुए प्रधान-प्रधान सर्पोंके नाम
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना
    • अंशावतरणपर्व
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • महाभारतका उपक्रम
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथा राजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत-कथा सुनानेके लिये कहना
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका सूत्ररूपमें निर्देश
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • महाभारतकी महत्ता
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश
    • सम्भवपर्व
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • मरीचि आदि महर्षियों तथा अदिति आदि दक्षकन्याओंके वंशका विवरण
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका वर्णन
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • देवता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा दुष्यन्तकी अद्‍भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • दुष्यन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण बतलाना तथा उसी प्रसंगमें विश्वामित्रकी तपस्यासे इन्द्रका चिन्तित होकर मेनकाको मुनिका तपोभंग करनेके लिये भेजना
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • मेनका-विश्वामित्र-मिलन, कन्याकी उत्पत्ति, शकुन्त पक्षियोंके द्वारा उसकी रक्षा और कण्वका उसे अपने आश्रमपर लाकर शकुन्तला नाम रखकर पालन करना
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्‍भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यजीके साथ वार्तालाप
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह
    • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
    • ययातिसे देवयानीको पुत्र-प्राप्ति; ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म
    • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
    • देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना
    • चतुरशीतितमोऽध्याय:
    • ययातिका अपने पुत्र यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनुसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर अपने पुत्र पूरुको जरावस्था देकर उनकी युवावस्था लेना तथा उन्हें वर प्रदान करना
    • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
    • राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना
    • षडशीतितमोऽध्याय:
    • वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति
    • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
    • इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना
    • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
    • ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना
    • एकोननवतितमोऽध्याय:
    • ययाति और अष्टकका संवाद
    • नवतितमोऽध्याय:
    • अष्टक और ययातिका संवाद
    • एकनवतितमोऽध्याय:
    • ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद
    • द्विनवतितमोऽध्याय:
    • अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना
    • त्रिनवतितमोऽध्याय:
    • राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना
    • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
    • पूरुवंशका वर्णन
    • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
    • दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन
    • षण्णवतितमोऽध्याय:
    • महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसुओंके साथ गंगाकी बातचीत
    • सप्तनवतितमोऽध्याय:
    • राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना
    • अष्टनवतितमोऽध्याय:
    • शान्तनु और गंगाका कुछ शर्तोंके साथ सम्बन्ध, वसुओंका जन्म और शापसे उद्धार तथा भीष्मकी उत्पत्ति
    • नवनवतितमोऽध्याय:
    • महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा
    • शततमोऽध्याय:
    • शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा
    • एकाधिकशततमोऽध्याय:
    • सत्यवतीके गर्भसे चित्रांगद और विचित्रवीर्यकी उत्पत्ति, शान्तनु और चित्रांगदका निधन तथा विचित्रवीर्यका राज्याभिषेक
    • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मके द्वारा स्वयंवरसे काशिराजकी कन्याओंका हरण, युद्धमें सब राजाओं तथा शाल्वकी पराजय, अम्बिका और अम्बालिकाके साथ विचित्रवीर्यका विवाह तथा निधन
    • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सत्यवतीका भीष्मसे राज्यग्रहण और संतानोत्पादनके लिये आग्रह तथा भीष्मके द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति
    • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मकी सम्मतिसे सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे कुरुवंशकी वृद्धिके लिये विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना
    • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीके द्वारा विचित्रवीर्यके क्षेत्रसे धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति
    • षडधिकशततमोऽध्याय:
    • महर्षि माण्डव्यका शूलीपर चढ़ाया जाना
    • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
    • माण्डव्यका धर्मराजको शाप देना
    • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र आदिके जन्म तथा भीष्मजीके धर्मपूर्ण शासनसे कुरुदेशकी सर्वांगीण उन्नतिका दिग्दर्शन
    • नवाधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा धृतराष्ट्रका विवाह
    • दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान
    • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीद्वारा स्वयंवरमें पाण्डुका वरण और उनके साथ विवाह
    • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • माद्रीके साथ पाण्डुका विवाह तथा राजा पाण्डुकी दिग्विजय
    • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा पाण्डुका पत्नियोंसहित वनमें निवास तथा विदुरका विवाह
    • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति
    • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • दु:शलाके जन्मकी कथा
    • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंकी नामावली
    • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति
    • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश
    • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डुका कुन्तीको पुत्र-प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका आदेश
    • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीका पाण्डुको व्युषिताश्वके मृत शरीरसे उसकी पतिव्रता पत्नी भद्राके द्वारा पुत्र-प्राप्तिका कथन
    • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डुका कुन्तीको समझाना और कुन्तीका पतिकी आज्ञासे पुत्रोत्पत्तिके लिये धर्मदेवताका आवाहन करनेके लिये उद्यत होना
    • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनकी उत्पत्ति
    • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार
    • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण
    • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना
    • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डु और माद्रीकी अस्थियोंका दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओंद्वारा उनके लिये जलांजलिदान
    • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंकी बालक्रीड़ा, दुर्योधनका भीमसेनको विष खिलाना तथा गंगामें ढकेलना और भीमका नागलोकमें पहुँचकर आठ कुण्डोंके दिव्य रसका पान करना
    • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनके न आनेसे कुन्ती आदिकी चिन्ता, नागलोकसे भीमसेनका आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधनकी कुचेष्टा
    • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा
    • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना
    • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा
    • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति
    • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • राजकुमारोंका रंगभूमिमें अस्त्र-कौशल दिखाना
    • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन, दुर्योधन तथा अर्जुनके द्वारा अस्त्र-कौशलका प्रदर्शन
    • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कर्णका रंगभूमिमें प्रवेश तथा राज्याभिषेक
    • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनके द्वारा कर्णका तिरस्कार और दुर्योधनद्वारा उसका सम्मान
    • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणका शिष्योंद्वारा द्रुपदपर आक्रमण करवाना, अर्जुनका द्रुपदको बंदी बनाकर लाना और द्रोणद्वारा द्रुपदको आधा राज्य देकर मुक्त कर देना
    • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका युवराजपदपर अभिषेक, पाण्डवोंके शौर्य, कीर्ति और बलके विस्तारसे धृतराष्ट्रको चिन्ता
    • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कणिकका धृतराष्ट्रको कूटनीतिका उपदेश
    • जतुगृहपर्व
    • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंके प्रति पुरवासियोंका अनुराग देखकर दुर्योधनकी चिन्ता
    • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंको वारणावत भेज देनेका प्रस्ताव
    • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके आदेशसे पाण्डवोंकी वारणावत-यात्रा
    • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके आदेशसे पुरोचनका वारणावत नगरमें लाक्षागृह बनाना
    • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंकी वारणावत-यात्रा तथा उनको विदुरका गुप्त उपदेश
    • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत
    • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • विदुरके भेजे हुए खनकद्वारा लाक्षागृहमें सुरंगका निर्माण
    • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना
    • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • विदुरजीके भेजे हुए नाविकका पाण्डवोंको गंगाजीके पार उतारना
    • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र आदिके द्वारा पाण्डवोंके लिये शोकप्रकाश एवं जलांजलिदान तथा पाण्डवोंका वनमें प्रवेश
    • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध
    • हिडिम्बवधपर्व
    • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • हिडिम्बके भेजनेसे हिडिम्बा राक्षसीका पाण्डवोंके पास आना और भीमसेनसे उसका वार्तालाप
    • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • हिडिम्बका आना, हिडिम्बाका उससे भयभीत होना और भीम तथा हिडिम्बासुरका युद्ध
    • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • हिडिम्बाका कुन्ती आदिसे अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासुरका वध
    • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति
    • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश
    • बकवधपर्व
    • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार
    • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना
    • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना
    • एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीके पूछनेपर ब्राह्मणका उनसे अपने दु:खका कारण बताना
    • षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्ती और ब्राह्मणकी बातचीत
    • एकषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनको राक्षसके पास भेजनेके विषयमें युधिष्ठिर और कुन्तीकी बातचीत
    • द्विषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनका भोजन-सामग्री लेकर बकासुरके पास जाना और स्वयं भोजन करना तथा युद्ध करके उसे मार गिराना
    • त्रिषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • बकासुरके वधसे राक्षसोंका भयभीत होकर पलायन और नगरनिवासियोंकी प्रसन्नता
    • चैत्ररथपर्व
    • चतु:षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका एक ब्राह्मणसे विचित्र कथाएँ सुनना
    • पञ्चषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणके द्वारा द्रुपदके अपमानित होनेका वृत्तान्त
    • षट्षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति
    • सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीकी अपने पुत्रोंसे पूछकर पंचालदेशमें जानेकी तैयारी
    • अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीका पाण्डवोंको द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाना
    • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता
    • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना
    • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • तपती और संवरणकी बातचीत
    • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • वसिष्ठजीकी सहायतासे राजा संवरणको तपतीकी प्राप्ति
    • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • गन्धर्वका वसिष्ठजीकी महत्ता बताते हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको पुरोहित बनानेके लिये आग्रह करना
    • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • वसिष्ठजीके अद्‍भुत क्षमा-बलके आगे विश्वामित्रजीका पराभव
    • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक
    • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति
    • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शक्तिपुत्र पराशरका जन्म और पिताकी मृत्युका हाल सुनकर कुपित हुए पराशरको शान्त करनेके लिये वसिष्ठजीका उन्हें और्वोपाख्यान सुनाना
    • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पितरोंद्वारा और्वके क्रोधका निवारण
    • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • और्व और पितरोंकी बातचीत तथा और्वका अपनी क्रोधाग्निको बडवानलरूपसे समुद्रमें त्यागना
    • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति
    • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप
    • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका धौम्यको अपना पुरोहित बनाना
    • स्वयंवरपर्व
    • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंकी पंचालयात्रा और मार्गमें ब्राह्मणोंसे बातचीत
    • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा
    • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्नका द्रौपदीको स्वयंवरमें आये हुए राजाओंका परिचय देना
    • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजाओंका लक्ष्यवेधके लिये उद्योग और असफल होना
    • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त करना
    • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रुपदको मारनेके लिये उद्यत हुए राजाओंका सामना करनेके लिये भीम और अर्जुनका उद्यत होना और उनके विषयमें भगवान् श्रीकृष्णका बलरामजीसे वार्तालाप
    • एकोननवत्यधिकशततमोध्याय:
    • अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कर्ण तथा शल्यकी पराजय और द्रौपदीसहित भीम-अर्जुनका अपने डेरेपर जाना
    • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट
    • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्नका गुप्तरूपसे वहाँका सब हाल देखकर राजा द्रुपदके पास आना तथा द्रौपदीके विषयमें द्रुपदका प्रश्न
    • वैवाहिकपर्व
    • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्नके द्वारा द्रौपदी तथा पाण्डवोंका हाल सुनकर राजा द्रुपदका उनके पास पुरोहितको भेजना तथा पुरोहित और युधिष्ठिरकी बातचीत
    • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवों और कुन्तीका द्रुपदके घरमें जाकर सम्मानित होना और राजा द्रुपदद्वारा पाण्डवोंके शील-स्वभावकी परीक्षा
    • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रुपद और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा व्यासजीका आगमन
    • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीके सामने द्रौपदीका पाँच पुरुषोंसे विवाह होनेके विषयमें द्रुपद, धृष्टद्युम्न और युधिष्ठिरका अपने-अपने विचार व्यक्त करना
    • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर दिव्य दृष्टि देना और द्रुपदका उनके दिव्य रूपोंकी झाँकी करना
    • सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रौपदीका पाँचों पाण्डवोंके साथ विवाह
    • अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीका द्रौपदीको उपदेश और आशीर्वाद तथा भगवान् श्रीकृष्णका पाण्डवोंके लिये उपहार भेजना
    • विदुरागमनराज्यलम्भपर्व
    • नवनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा
    • द्विशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, शत्रुओंको वशमें करनेके उपाय
    • एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंको पराक्रमसे दबानेके लिये कर्णकी सम्मति
    • द्वॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • भीष्मकी दुर्योधनसे पाण्डवोंको आधा राज्य देनेकी सलाह
    • त्र्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार
    • चतुरधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • विदुरजीकी सम्मति—द्रोण और भीष्मके वचनोंका ही समर्थन
    • पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरका द्रुपदके यहाँ जाना और पाण्डवोंको हस्तिनापुर भेजनेका प्रस्ताव करना
    • षडधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान
    • सप्ताधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना
    • अष्टाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव
    • नवाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सुन्द और उपसुन्दद्वारा क्रूरतापूर्ण कर्मोंसे त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करना
    • दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • तिलोत्तमाकी उत्पत्ति, उसके रूपका आकर्षण तथा सुन्दोपसुन्दको मोहित करनेके लिये उसका प्रस्थान
    • एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • तिलोत्तमापर मोहित होकर सुन्द-उपसुन्दका आपसमें लड़ना और मारा जाना एवं तिलोत्तमाको ब्रह्माजीद्वारा वरप्राप्त तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण
    • अर्जुनवनवासपर्व
    • द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान
    • त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन
    • चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका पूर्वदिशाके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए मणिपूरमें जाकर चित्रांगदाका पाणिग्रहण करके उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न करना
    • पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ
    • षोडशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपूर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना
    • सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्णसे मिलना और उन्हींके साथ उनका रैवतक पर्वत एवं द्वारकापुरीमें आना
    • सुभद्राहरणपर्व
    • अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • रैवतक पर्वतके उत्सवमें अर्जुनका सुभद्रापर आसक्त होना और श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिरकी अनुमतिसे उसे हर ले जानेका निश्चय करना
    • एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • यादवोंकी युद्धके लिये तैयारी और अर्जुनके प्रति बलरामजीके क्रोधपूर्ण उद्‍गार
    • हरणाहरणपर्व
    • विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा
    • खाण्डवदाहपर्व
    • एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके राज्यकी विशेषता, कृष्ण और अर्जुनका खाण्डववनमें जाना तथा उन दोनोंके पास ब्राह्मणवेशधारी अग्निदेवका आगमन
    • द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा
    • त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका अग्निकी प्रार्थना स्वीकार करके उनसे दिव्य धनुष एवं रथ आदि माँगना
    • चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना
    • पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा
    • षड्‍‍विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • देवताओं आदिके साथ श्रीकृष्ण और अर्जुनका युद्ध
    • मयदर्शनपर्व
    • सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा
    • अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शार्ङ्गकोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना
    • एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जरिताका अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्तित होकर विलाप करना
    • त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जरिता और उसके बच्चोंका संवाद
    • एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना
    • द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • मन्दपालका अपने बाल-बच्चोंसे मिलना
    • त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • इन्द्रदेवका श्रीकृष्ण और अर्जुनको वरदान तथा श्रीकृष्ण, अर्जुन और मयासुरका अग्निसे विदा लेकर एक साथ यमुनातटपर बैठना
  • +
    सभापर्व
    • सभाक्रियापर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार मयासुरद्वारा सभाभवन बनानेकी तैयारी
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णकी द्वारकायात्रा
    • तृतीयोऽध्याय:
    • मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्‍भुत सभाका निर्माण
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • मयद्वारा निर्मित सभाभवनमें धर्मराज युधिष्ठिरका प्रवेश तथा सभामें स्थित महर्षियों और राजाओं आदिका वर्णन
    • लोकपालसभाख्यानपर्व
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना
    • षष्ठोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा
    • सप्तमोऽध्याय:
    • इन्द्रसभाका वर्णन
    • अष्टमोऽध्याय:
    • यमराजकी सभाका वर्णन
    • नवमोऽध्याय:
    • वरुणकी सभाका वर्णन
    • दशमोऽध्याय:
    • कुबेरकी सभाका वर्णन
    • एकादशोऽध्याय:
    • ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन
    • द्वादशोऽध्याय:
    • राजा हरिश्चन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश
    • राजसूयारम्भपर्व
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • जरासंधके विषयमें राजा युधिष्ठिर, भीम और श्रीकृष्णकी बातचीत
    • षोडशोऽध्याय:
    • जरासंधको जीतनेके विषयमें युधिष्ठिरके उत्साहहीन होनेपर अर्जुनका उत्साहपूर्ण उद्‍गार
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • जरा राक्षसीका अपना परिचय देना और उसीके नामपर बालकका नामकरण होना
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • चण्डकौशिक मुनिके द्वारा जरासंधका भविष्यकथन तथा पिताके द्वारा उसका राज्याभिषेक करके वनमें जाना
    • जरासंधवधपर्व
    • विंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके अनुमोदन करनेपर श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेनकी मगध-यात्रा
    • एकविंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • जरासंधका भीमसेनके साथ युद्ध करनेका निश्चय, भीम और जरासंधका भयानक युद्ध तथा जरासंधकी थकावट
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • भीमके द्वारा जरासंधका वध, बंदी राजाओंकी मुक्ति, श्रीकृष्ण आदिका भेंट लेकर इन्द्रप्रस्थमें आना और वहाँसे श्रीकृष्णका द्वारका जाना
    • दिग्विजयपर्व
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • अर्जुन आदि चारों भाइयोंकी दिग्विजयके लिये यात्रा
    • षड्‍‍‍विंशोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • किम्पुरुष, हाटक तथा उत्तरकुरुपर विजय प्राप्त करके अर्जुनका इन्द्रप्रस्थ लौटना
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • भीमसेनका पूर्व दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान और विभिन्न देशोंपर विजय पाना
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • भीमका पूर्व दिशाके अनेक देशों तथा राजाओंको जीतकर भारी धन-सम्पत्तिके साथ इन्द्रप्रस्थमें लौटना
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय
    • राजसूयपर्व
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके यज्ञमें सब देशके राजाओं, कौरवों तथा यादवोंका आगमन और उन सबके भोजन-विश्राम आदिकी सुव्यवस्था
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • राजसूययज्ञका वर्णन
    • अर्घाभिहरणपर्व
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • राजसूययज्ञमें ब्राह्मणों तथा राजाओंका समागम, श्रीनारदजीके द्वारा श्रीकृष्ण-महिमाका वर्णन और भीष्मजीकी अनुमतिसे श्रीकृष्णकी अग्रपूजा
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका शिशुपालको समझाना और भीष्मजीका उसके आक्षेपोंका उत्तर देना
    • भगवान् नारायणकी महिमा और उनके द्वारा मधु-कैटभका वध
    • वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि अवतारोंकी संक्षिप्त कथा
    • कल्क्यवतार:
    • श्रीकृष्णका प्राकटॺ तथा श्रीकृष्ण-बलरामकी बाललीलाओंका वर्णन
    • कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना
    • नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना
    • द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश
    • भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और भीष्मके द्वारा श्रीकृष्ण-माहात्म्यका उपसंहार
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • सहदेवकी राजाओंको चुनौती तथा क्षुब्ध हुए शिशुपाल आदि नरेशोंका युद्धके लिये उद्यत होना
    • शिशुपालवधपर्व
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी चिन्ता और भीष्मजीका उन्हें सान्त्वना देना
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • शिशुपालद्वारा भीष्मकी निन्दा
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • शिशुपालकी बातोंपर भीमसेनका क्रोध और भीष्मजीका उन्हें शान्त करना
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • भीष्मजीके द्वारा शिशुपालके जन्मके वृत्तान्तका वर्णन
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • भीष्मकी बातोंसे चिढ़े हुए शिशुपालका उन्हें फटकारना तथा भीष्मका श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये समस्त राजाओंको चुनौती देना
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन
    • द्यूतपर्व
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये शकुनि और दुर्योधनकी बातचीत
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दु:ख और चिन्ताका कारण बताना
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन
    • चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • विदुर और धृतराष्ट्रकी बातचीत
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • विदुर और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें जाकर सबसे मिलना
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • जूएके अनौचित्यके सम्बन्धमें युधिष्ठिर और शकुनिका संवाद
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • द्यूतक्रीड़ाका आरम्भ
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • जूएमें शकुनिके छलसे प्रत्येक दाँवपर युधिष्ठिरकी हार
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रको विदुरकी चेतावनी
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • विदुरजीके द्वारा जूएका घोर विरोध
    • चतुष्षष्टितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका विदुरको फटकारना और विदुरका उसे चेतावनी देना
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका धन, राज्य, भाइयों तथा द्रौपदीसहित अपनेको भी हारना
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • विदुरका दुर्योधनको फटकारना
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दु:शासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • द्रौपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके छल-कपटयुक्त वचन और भीमसेनका रोषपूर्ण उद्‍गार
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • कर्ण और दुर्योधनके वचन, भीमसेनकी प्रतिज्ञा, विदुरकी चेतावनी और द्रौपदीको धृतराष्ट्रसे वरप्राप्ति
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • शत्रुओंको मारनेके लिये उद्यत हुए भीमको युधिष्ठिरका शान्त करना
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको सारा धन लौटाकर एवं समझा-बुझाकर इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश देना
    • अनुद्यूतपर्व
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुन: द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • गान्धारीकी धृतराष्ट्रको चेतावनी और धृतराष्ट्रका अस्वीकार करना
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिसे विदा लेना, विदुरका कुन्तीको अपने यहाँ रखनेका प्रस्ताव और पाण्डवोंको धर्मपूर्वक रहनेका उपदेश देना
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रकी चिन्ता और उनका संजयके साथ वार्तालाप
    • निवेदन
    • महाभारत-सार
  • +
    वनपर्व
    • अरण्यपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत
    • तृतीयोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके द्वारा अन्नके लिये भगवान् सूर्यकी उपासना और उनसे अक्षयपात्रकी प्राप्ति
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • विदुरजीका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना और धृतराष्ट्रका रुष्ट होकर महलमें चला जाना
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना
    • षष्ठोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका संजयको भेजकर विदुरको वनसे बुलवाना और उनसे क्षमा-प्रार्थना
    • सप्तमोऽध्याय:
    • दुर्योधन, दु:शासन, शकुनि और कर्णकी सलाह, पाण्डवोंका वध करनेके लिये उनका वनमें जानेकी तैयारी तथा व्यासजीका आकर उनको रोकना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • व्यासजीका धृतराष्ट्रसे दुर्योधनके अन्यायको रोकनेके लिये अनुरोध
    • नवमोऽध्याय:
    • व्यासजीके द्वारा सुरभि और इन्द्रके उपाख्यानका वर्णन तथा उनका पाण्डवोंके प्रति दया दिखलाना
    • दशमोऽध्याय:
    • व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना
    • किर्मीरवधपर्व
    • एकादशोऽध्याय:
    • भीमसेनके द्वारा किर्मीरके वधकी कथा
    • अर्जुनाभिगमनपर्व
    • द्वादशोऽध्याय:
    • अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका जूएके दोष बताते हुए पाण्डवोंपर आयी हुई विपत्तिमें अपनी अनुपस्थितिको कारण मानना
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • द्यूतके समय न पहुँचनेमें श्रीकृष्णके द्वारा शाल्वके साथ युद्ध करने और सौभविमानसहित उसे नष्ट करनेका संक्षिप्त वर्णन
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • सौभनाशकी विस्तृत कथाके प्रसंगमें द्वारकामें युद्धसम्बन्धी रक्षात्मक तैयारियोंका वर्णन
    • षोडशोऽध्याय:
    • शाल्वकी विशाल सेनाके आक्रमणका यादवसेनाद्वारा प्रतिरोध, साम्बद्वारा क्षेमवृद्धिकी पराजय, वेगवान‍्का वध तथा चारुदेष्णद्वारा विविन्ध्य दैत्यका वध एवं प्रद्युम्नद्वारा सेनाको आश्वासन
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • प्रद्युम्न और शाल्वका घोर युद्ध
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • प्रद्युम्नके द्वारा शाल्वकी पराजय
    • विंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण और शाल्वका भीषण युद्ध
    • एकविंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका द्वैतवनमें जाना
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • दल्भपुत्र बकका युधिष्ठिरको ब्राह्मणोंका महत्त्व बतलाना
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • द्रौपदीद्वारा प्रह्लाद-बलि-संवादका वर्णन—तेज और क्षमाके अवसर
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • दु:खित भीमसेनका युधिष्ठिरको युद्धके लिये उत्साहित करना
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना
    • कैरातपर्व
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना
    • इन्द्रलोकाभिगमनपर्व
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनका हिमालयसे विदा होकर मातलिके साथ स्वर्गलोकको प्रस्थान
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा देवराज इन्द्रका दर्शन तथा इन्द्रसभामें उनका स्वागत
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनको अस्त्र और संगीतकी शिक्षा
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • चित्रसेन और उर्वशीका वार्तालाप
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • दु:खित धृतराष्ट्रका संजयके सम्मुख अपने पुत्रोंके लिये चिन्ता करना
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • संजयके द्वारा धृतराष्ट्रकी बातोंका अनुमोदन और धृतराष्ट्रका संताप
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • वनमें पाण्डवोंका आहार
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • संजयका धृतराष्ट्रके प्रति श्रीकृष्णादिके द्वारा की हुई दुर्योधनादिके वधकी प्रतिज्ञाका वृत्तान्त सुनाना
    • नलोपाख्यानपर्व
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • नल-दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग और हंसका दमयन्ती और नलको एक-दूसरेके संदेश सुनाना
    • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • स्वर्गमें नारद और इन्द्रकी बातचीत, दमयन्तीके स्वयंवरके लिये राजाओं तथा लोकपालोंका प्रस्थान
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • देवताओंके द्वारा नलके गुणोंका गान और उनके निषेध करनेपर भी नलके विरुद्ध कलियुगका कोप
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • नलमें कलियुगका प्रवेश एवं नल और पुष्करकी द्यूतक्रीडा, प्रजा और दमयन्तीके निवारण करनेपर भी राजाका द्यूतसे निवृत्त नहीं होना
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • दु:खित दमयन्तीका वार्ष्णेयके द्वारा कुमार-कुमारीको कुण्डिनपुर भेजना
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपद्‍ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा नलकी चिन्ता और दमयन्तीको अकेली सोती छोड़कर उनका अन्यत्र प्रस्थान
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • राजा नलके द्वारा दावानलसे कर्कोटक नागकी रक्षा तथा नागद्वारा नलको आश्वासन
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा नलका ऋतुपर्णके यहाँ अश्वाध्यक्षके पदपर नियुक्त होना और वहाँ दमयन्तीके लिये निरन्तर चिन्तित रहना तथा उनकी जीवलसे बातचीत
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • दमयन्तीका अपने पिताके यहाँ जाना और वहाँसे नलको ढूँढ़नेके लिये अपना संदेश देकर ब्राह्मणोंको भेजना
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • पर्णादका दमयन्तीसे बाहुकरूपधारी नलका समाचार बताना और दमयन्तीका ऋतुपर्णके यहाँ सुदेव नामक ब्राह्मणको स्वयंवरका संदेश देकर भेजना
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • ऋतुपर्णका कुण्डिनपुरमें प्रवेश, दमयन्तीका विचार तथा भीमके द्वारा ऋतुपर्णका स्वागत
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • बाहुक-केशिनी-संवाद
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • दमयन्तीके आदेशसे केशिनीद्वारा बाहुककी परीक्षा तथा बाहुकका अपने लड़के-लड़कियोंको देखकर उनसे प्रेम करना
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • दमयन्ती और बाहुककी बातचीत, नलका प्राकटॺ और नल-दमयन्ती-मिलन
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका नलसे अश्वविद्या सीखकर अयोध्या जाना
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें भेजकर अपने नगरमें प्रवेश करना
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • राजा नलके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व, बृहदश्व मुनिका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा द्यूतविद्या और अश्वविद्याका रहस्य बताकर जाना
    • तीर्थयात्रापर्व
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनके लिये द्रौपदीसहित पाण्डवोंकी चिन्ता
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके पास देवर्षि नारदका आगमन और तीर्थयात्राके फलके सम्बन्धमें पूछनेपर नारदजीद्वारा भीष्म-पुलस्त्य-संवादकी प्रस्तावना
    • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
    • भीष्मजीके पूछनेपर पुलस्त्यजीका उन्हें विभिन्न तीर्थोंकी यात्राका माहात्म्य बताना
    • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
    • कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन
    • चतुरशीतितमोऽध्याय:
    • नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा
    • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
    • गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य
    • षडशीतितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना
    • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
    • धौम्यद्वारा पूर्वदिशाके तीर्थोंका वर्णन
    • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
    • धौम्यमुनिके द्वारा दक्षिण दिशावर्ती तीर्थोंका वर्णन
    • एकोननवतितमोऽध्याय:
    • धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन
    • नवतितमोऽध्याय:
    • धौम्यद्वारा उत्तर दिशाके तीर्थोंका वर्णन
    • एकनवतितमोऽध्याय:
    • महर्षि लोमशका आगमन और युधिष्ठिरसे अर्जुनके पाशुपत आदि दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर्णन तथा इन्द्रका संदेश सुनाना
    • द्विनवतितमोऽध्याय:
    • महर्षि लोमशके मुखसे इन्द्र और अर्जुनका संदेश सुनकर युधिष्ठिरका प्रसन्न होना और तीर्थयात्राके लिये उद्यत हो अपने अधिक साथियोंको विदा करना
    • त्रिनवतितमोऽध्याय:
    • ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना
    • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
    • देवताओं और धर्मात्मा राजाओंका उदाहरण देकर महर्षि लोमशका युधिष्ठिरको अधर्मसे हानि बताना और तीर्थयात्राजनित पुण्यकी महिमाका वर्णन करते हुए आश्वासन देना
    • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना
    • षण्णवतितमोऽध्याय:
    • इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना
    • सप्तनवतितमोऽध्याय:
    • महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान
    • अष्टनवतितमोऽध्याय:
    • धन प्राप्त करनेके लिये अगस्त्यका श्रुतर्वा, ब्रध्नश्व और त्रसदस्यु आदिके पास जाना
    • एकोनशततमोऽध्याय:
    • अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति
    • शततमोऽध्याय:
    • वृत्रासुरसे त्रस्त देवताओंको महर्षि दधीचका अस्थिदान एवं वज्रका निर्माण
    • एकाधिकशततमोऽध्याय:
    • वृत्रासुरका वध और असुरोंकी भयंकर मन्त्रणा
    • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
    • कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिका संहार तथा देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति
    • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान् विष्णुके आदेशसे देवताओंका महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर जाकर उनकी स्तुति करना
    • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
    • अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना
    • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
    • अगस्त्यजीके द्वारा समुद्रपान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुन: भरनेका उपाय पूछना
    • षडधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा सगरका संतानके लिये तपस्या करना और शिवजीके द्वारा वरदान पाना
    • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
    • सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति
    • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
    • भगीरथका हिमालयपर तपस्याद्वारा गंगा और महादेवजीको प्रसन्न करके उनसे वर प्राप्त करना
    • नवाधिकशततमोऽध्याय:
    • पृथ्वीपर गंगाजीके उतरने और समुद्रको जलसे भरनेका विवरण तथा सगरपुत्रोंका उद्धार
    • दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न
    • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • वेश्याका ऋष्यशृंगको लुभाना और विभाण्डक मुनिका आश्रमपर आकर अपने पुत्रकी चिन्ताका कारण पूछना
    • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन
    • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना
    • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन
    • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन
    • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
    • पिताकी आज्ञासे परशुरामजीका अपनी माताका मस्तक काटना और उन्हींके वरदानसे पुन: जिलाना, परशुरामजीद्वारा कार्तवीर्य-अर्जुनका वध और उसके पुत्रोंद्वारा जमदग्नि मुनिकी हत्या
    • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन
    • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना
    • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार
    • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्‍गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास
    • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ
    • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति
    • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अश्विनीकुमारोंकी कृपासे महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्ति
    • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना
    • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन
    • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र
    • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सोमक और जन्तुका उपाख्यान
    • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सोमकको सौ पुत्रोंकी प्राप्ति तथा सोमक और पुरोहितका समानरूपसे नरक और पुण्यलोकोंका उपभोग करना
    • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा
    • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • विभिन्न तीर्थोंकी महिमा और राजा उशीनरकी कथाका आरम्भ
    • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा उशीनरद्वारा बाजको अपने शरीरका मांस देकर शरणमें आये हुए कबूतरके प्राणोंकी रक्षा करना
    • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनका राजा जनकके दरबारमें जाना
    • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप
    • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना
    • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु
    • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्यु
    • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भरद्वाजका पुत्रशोकसे विलाप करना, रैभ्यमुनिको शाप देना एवं स्वयं अग्निमें प्रवेश करना
    • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य,भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना
    • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंकी उत्तराखण्ड-यात्रा और लोमशजीद्वारा उसकी दुर्गमताका कथन
    • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान
    • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना
    • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना
    • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना
    • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन
    • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन
    • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमान‍्जीसे भेंट
    • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद
    • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • हनुमान‍्जीका भीमसेनको संक्षेपसे श्रीरामका चरित्र सुनाना
    • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • हनुमान‍्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन
    • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीहनुमान‍्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन
    • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीहनुमान‍्जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना
    • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनका सौगन्धिक वनमें पहुँचना
    • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • क्रोधवश नामक राक्षसोंका भीमसेनसे सरोवरके निकट आनेका कारण पूछना
    • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना
    • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना
    • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका आकाशवाणीके आदेशसे पुन: नर-नारायणाश्रममें लौटना
    • जटासुरवधपर्व
    • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध
    • यक्षयुद्धपर्व
    • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना
    • एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • प्रश्नके रूपमें आर्ष्टिषेणका युधिष्ठिरके प्रति उपदेश
    • षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका आर्ष्टिषेणके आश्रमपर निवास, द्रौपदीके अनुरोधसे भीमसेनका पर्वतके शिखरपर जाना और यक्षों तथा राक्षसोंसे युद्ध करके मणिमान‍्का वध करना
    • एकषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट
    • द्विषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान
    • त्रिषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन
    • चतु:षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका आगमन
    • निवातकवचयुद्धपर्व
    • पञ्चषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना
    • षट्षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना
    • सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा
    • अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन
    • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ
    • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध
    • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन
    • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • निवातकवचोंका संहार
    • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन
    • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना
    • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • नारद आदिका अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोकना
    • आजगरपर्व
    • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनकी युधिष्ठिरसे बातचीत और पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान
    • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका गन्धमादनसे बदरिकाश्रम, सुबाहुनगर और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश
    • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • महाबली भीमसेनका हिंसक पशुओंको मारना और अजगरद्वारा पकड़ा जाना
    • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज
    • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना
    • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका
    • भीमसेनको छोड़ देना तथा युधिष्ठिरके साथ वार्तालाप करनेके प्रभावसे सर्पयोनिसे मुक्त होकर स्वर्ग जाना
    • मार्कण्डेयसमास्यापर्व
    • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • वर्षा और शरद्-ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुन: द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश
    • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन
    • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य
    • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणकी महिमाके विषयमें अत्रिमुनि तथा राजा पृथुकी प्रशंसा
    • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद
    • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा
    • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना
    • एकोननवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना
    • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन
    • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान् कल्कीके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश
    • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता
    • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • इन्द्र और बक मुनिका संवाद
    • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • क्षत्रिय राजाओंका महत्त्व—सुहोत्र और शिबिकी प्रशंसा
    • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा ययातिद्वारा ब्राह्मणको सहस्र गौओंका दान
    • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सेदुक और वृषदर्भका चरित्र
    • सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • इन्द्र और अग्निद्वारा राजा शिबिकी परीक्षा
    • अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन
    • नवनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा
    • द्विशततमोऽध्याय:
    • निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन
    • एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान‍्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना
    • द्वॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • उत्तङ्कका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह
    • त्र्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधु-कैटभका वध
    • चतुरधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना
    • पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य
    • षडधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन
    • सप्ताधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन
    • अष्टाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन
    • नवाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन
    • दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन
    • एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन
    • द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन
    • त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय
    • चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन
    • पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना
    • षोडशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान
    • सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति
    • अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अंगिराकी संततिका वर्णन
    • एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • बृहस्पतिकी संततिका वर्णन
    • विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन
    • एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अग्निस्वरूप तप और भानु (मनु)-की संततिका वर्णन
    • द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुन: उनका प्राकटॺ
    • त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • इन्द्रके द्वारा केशीके हाथसे देवसेनाका उद्धार
    • चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन
    • पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण
    • षड्‍‍विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • विश्वामित्रका स्कन्दके जातकर्मादि तेरह संस्कार करना और विश्वामित्रके समझानेपर भी ऋषियोंका अपनी पत्नियोंको स्वीकार न करना तथा अग्निदेव आदिके द्वारा बालक स्कन्दकी रक्षा करना
    • सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराजित होकर शरणमें आये हुए इन्द्रसहित देवताओंको स्कन्दका अभयदान
    • अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • स्कन्दके पार्षदोंका वर्णन
    • एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह
    • त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन
    • एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा
    • द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन
    • द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्व
    • त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना
    • चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पतिदेवको अनुकूल करनेका उपाय—पतिकी अनन्यभावसे सेवा
    • पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सत्यभामाका द्रौपदीको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको प्रस्थान
    • घोषयात्रापर्व
    • षट्‍‍त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका खेद और चिन्तापूर्ण उद्‍गार
    • सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना
    • अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना
    • एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान
    • चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वोंमें परस्पर कटु संवाद
    • एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कौरवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध और कर्णकी पराजय
    • द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • गन्धर्वोंद्वारा दुर्योधन आदिकी पराजय और उनका अपहरण
    • त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा
    • चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध
    • पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंके द्वारा गन्धर्वोंकी पराजय
    • षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा
    • सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सेनासहित दुर्योधनका मार्गमें ठहरना और कर्णके द्वारा उसका अभिनन्दन
    • अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका कर्णको अपनी पराजयका समाचार बताना
    • एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दु:शासनको राजा बननेका आदेश, दु:शासनका दु:ख और कर्णका दुर्योधनको समझाना
    • पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कर्णके समझानेपर भी दुर्योधनका आमरण अनशन करनेका ही निश्चय
    • एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना
    • द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दानवोंका दुर्योधनको समझाना और कर्णके अनुरोध करनेपर दुर्योधनका अनशन त्याग करके हस्तिनापुरको प्रस्थान
    • त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान
    • चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार
    • पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी
    • षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके यज्ञका आरम्भ एवं समाप्ति
    • सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति
    • मृगस्वप्नोद्भवपर्व
    • अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका काम्यकवनमें गमन
    • व्रीहिद्रौणिकपर्व
    • एकोनषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन
    • षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना
    • एकषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना
    • द्रौपदीहरणपर्व
    • द्विषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना
    • त्रिषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • चतु:षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जयद्रथका द्रौपदीको देखकर मोहित होना और उसके पास कोटिकास्यको भेजना
    • पञ्चषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कोटिकास्यका द्रौपदीसे जयद्रथ और उसके साथियोंका परिचय देते हुए उसका भी परिचय पूछना
    • षट्षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • द्रौपदीका कोटिकास्यको उत्तर
    • सप्तषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद
    • अष्टषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण
    • एकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका आश्रमपर लौटना और धात्रेयिकासे द्रौपदीहरणका वृत्तान्त जानकर जयद्रथका पीछा करना
    • सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • द्रौपदीद्वारा जयद्रथके सामने पाण्डवोंके पराक्रमका वर्णन
    • एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना
    • जयद्रथविमोक्षणपर्व
    • द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन
    • रामोपाख्यानपर्व
    • त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अपनी दुरवस्थासे दु:खी हुए युधिष्ठिरका मार्कण्डेय मुनिसे प्रश्न करना
    • चतु:सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • श्रीराम आदिका जन्म तथा कुबेरकी उत्पत्ति और उन्हें ऐश्वर्यकी प्राप्ति
    • पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना
    • षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाकर रावणके अत्याचारसे बचानेके लिये प्रार्थना करना तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका रीछ और वानरयोनिमें संतान उत्पन्न करना एवं दुन्दुभी गन्धर्वीका मन्थरा बनकर आना
    • सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी, रामवनगमन, भरतकी चित्रकूटयात्रा, रामके द्वारा खर-दूषण आदि राक्षसोंका नाश तथा रावणका मारीचके पास जाना
    • अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण
    • एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि-संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्य स्वरूपसे वार्तालाप
    • अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षसियोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन
    • एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • रावण और सीताका संवाद
    • द्वॺशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना
    • त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना
    • चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम
    • पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • श्रीराम और रावणकी सेनाओंका द्वन्द्वयुद्ध
    • षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • प्रहस्त और धूम्राक्षके वधसे दु:खी हुए रावणका कुम्भकर्णको जगाना और उसे युद्धमें भेजना
    • सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कुम्भकर्ण, वज्रवेग और प्रमाथीका वध
    • अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • इन्द्रजित् का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा
    • एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • श्रीराम-लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित् का वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना
    • नवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • राम और रावणका युद्ध तथा रावणका वध
    • एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना
    • द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • मार्कण्डेयजीके द्वारा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन
    • पतिव्रतामाहात्म्यपर्व
    • त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण
    • चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सावित्रीका सत्यवान‍्के साथ विवाह करनेका दृढ़ निश्चय
    • पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सत्यवान‍् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना
    • षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान‍्के साथ उसका वनमें जाना
    • सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान
    • अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनकी सत्यवान‍्के लिये चिन्ता, ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान‍्का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वरप्राप्तिका विवरण बताना
    • नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति
    • कुण्डलाहरणपर्व
    • त्रिशततमोऽध्याय:
    • सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना
    • एकाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • सूर्यका कर्णको समझाते हुए उसे इन्द्रको कुण्डल न देनेका आदेश देना
    • द्वॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय
    • त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना
    • चतुरधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीका पितासे वार्तालाप और ब्राह्मणकी परिचर्या
    • पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना
    • षडधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद
    • सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन
    • अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना
    • नवाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • अधिरथ सूत तथा उसकी पत्नी राधाको बालक कर्णकी प्राप्ति, राधाके द्वारा उसका पालन, हस्तिनापुरमें उसकी शिक्षा-दीक्षा तथा कर्णके पास इन्द्रका आगमन
    • दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना
    • आरणेयपर्व
    • एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणकी अरणि एवं मन्थन-काष्ठका पता लगानेके लिये पाण्डवोंका मृगके पीछे दौड़ना और दु:खी होना
    • द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना
    • त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना
    • चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • यक्षका चारों भाइयोंको जिलाकर धर्मके रूपमें प्रकट हो युधिष्ठिरको वरदान देना
    • पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना
    • वनपर्वकी श्लोक-संख्या
    • वनपर्व-श्रवण-महिमा
  • +
    विराटपर्व
    • पाण्डवप्रवेशपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • भीमसेन और अर्जुनद्वारा विराटनगरमें किये जानेवाले अपने अनुकूल कार्योंका निर्देश
    • तृतीयोऽध्याय:
    • नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीद्वारा अपने-अपने भावी कर्तव्योंका दिग्दर्शन
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • धौम्यका पाण्डवोंको राजाके यहाँ रहनेका ढंग बताना और सबका अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको जाना
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका विराटनगरके समीप पहुँचकर श्मशानमें एक शमीवृक्षपर अपने अस्त्र-शस्त्र रखना
    • षष्ठोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरद्वारा दुर्गादेवीकी स्तुति और देवीका प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन्हें वर देना
    • सप्तमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • भीमसेनका राजा विराटकी सभामें प्रवेश और राजाके द्वारा आश्वासन पाना
    • नवमोऽध्याय:
    • द्रौपदीका सैरन्ध्रीके वेशमें विराटके रनिवासमें जाकर रानी सुदेष्णासे वार्तालाप करना और वहाँ निवास पाना
    • दशमोऽध्याय:
    • सहदेवका राजा विराटके साथ वार्तालाप और गौओंकी देखभालके लिये उनकी नियुक्ति
    • एकादशोऽध्याय:
    • अर्जुनका राजा विराटसे मिलना और राजाके द्वारा कन्याओंको नृत्य आदिकी शिक्षा देनेके लिये उनको नियुक्त करना
    • द्वादशोऽध्याय:
    • नकुलका विराटके अश्वोंकी देखरेखमें नियुक्त होना
    • समयपालनपर्व
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • भीमसेनके द्वारा जीमूत नामक विश्वविख्यात मल्लका वध
    • कीचकवधपर्व
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • रानी सुदेष्णाका द्रौपदीको कीचकके घर भेजना
    • षोडशोऽध्याय:
    • कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • द्रौपदीका भीमसेनके समीप जाना
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंके दु:खसे दु:खित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप
    • विंशोऽध्याय:
    • द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दु:ख निवेदन करना
    • एकविंशोऽध्याय:
    • भीमसेन और द्रौपदीका संवाद
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • कीचक और भीमसेनका युद्ध तथा कीचकवध
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • उपकीचकोंका सैरन्ध्रीको बाँधकर श्मशानभूमिमें ले जाना और भीमसेनका उन सबको मारकर सैरन्ध्रीको छुड़ाना
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • द्रौपदीका राजमहलमें लौटकर आना और बृहन्नला एवं सुदेष्णासे उसकी बातचीत
    • गोहरणपर्व
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • दुर्योधनके पास उसके गुप्तचरोंका आना और उनका पाण्डवोंके विषयमें कुछ पता न लगा, यह बताकर कीचकवधका वृत्तान्त सुनाना
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • दुर्योधनका सभासदोंसे पाण्डवोंका पता लगानेके लिये परामर्श तथा इस विषयमें कर्ण और दु:शासनकी सम्मति
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • आचार्य द्रोणकी सम्मति
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी महिमा कहते हुए भीष्मकी पाण्डवोंके अन्वेषणके विषयमें सम्मति
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • कृपाचार्यकी सम्मति और दुर्योधनका निश्चय
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • सुशर्माके प्रस्तावके अनुसार त्रिगर्तों और कौरवोंका मत्स्यदेशपर धावा
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • चारों पाण्डवोंसहित राजा विराटकी सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • मत्स्य तथा त्रिगर्तदेशीय सेनाओंका परस्पर युद्ध
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • सुशर्माका विराटको पकड़कर ले जाना, पाण्डवोंके प्रयत्नसे उनका छुटकारा, भीमद्वारा सुशर्माका निग्रह और युधिष्ठिरका अनुग्रह करके उसे छोड़ देना
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • राजा विराटद्वारा पाण्डवोंका सम्मान, युधिष्ठिरद्वारा राजाका अभिनन्दन तथा विराटनगरमें राजाकी विजयघोषणा
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • कौरवोंद्वारा उत्तर दिशाकी ओरसे आकर विराटकी गौओंका अपहरण और गोपाध्यक्षका उत्तरकुमारको युद्धके लिये उत्साह दिलाना
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • उत्तरका अपने लिये सारथि ढूँढ़नेका प्रस्ताव, अर्जुनकी सम्मतिसे द्रौपदीका बृहन्नलाको सारथि बनानेके लिये सुझाव देना
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • बृहन्नलाको सारथि बनाकर राजकुमार उत्तरका रणभूमिकी ओर प्रस्थान
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • उत्तरकुमारका भय और अर्जुनका उसे आश्वासन देकर रथपर चढ़ाना
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यद्वारा अर्जुनके अलौकिक पराक्रमकी प्रशंसा
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनका उत्तरको शमीवृक्षसे अस्त्र उतारनेके लिये आदेश
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • उत्तरका अर्जुनके आदेशके अनुसार शमीवृक्षसे पाण्डवोंके दिव्य धनुष आदि उतारना
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • उत्तरका बृहन्नलासे पाण्डवोंके अस्त्र-शस्त्रोंके विषयमें प्रश्न करना
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • बृहन्नलाद्वारा उत्तरको पाण्डवोंके आयुधोंका परिचय कराना
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनका उत्तरकुमारसे अपना और अपने भाइयोंका यथार्थ परिचय देना
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा युद्धकी तैयारी, अस्त्र-शस्त्रोंका स्मरण, उनसे वार्तालाप तथा उत्तरके भयका निवारण
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पात-सूचक अपशकुनोंका वर्णन
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • दुर्योधनके द्वारा युद्धका निश्चय तथा कर्णकी उक्ति
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • कर्णकी आत्मप्रशंसापूर्ण अहंकारोक्ति
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • कृपाचार्यका कर्णको फटकारते हुए युद्धके विषयमें अपना विचार बताना
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाके उद्‍गार
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • पितामह भीष्मकी सम्मति
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अर्जुनका दुर्योधनकी सेनापर आक्रमण करके गौओंको लौटा लेना
    • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अर्जुनका कर्णपर आक्रमण, विकर्णकी पराजय, शत्रुंतप और संग्रामजित् का वध, कर्ण और अर्जुनका युद्ध तथा कर्णका पलायन
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा कौरवसेनाका संहार और उत्तरका उनके रथको कृपाचार्यके पास ले जाना
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अर्जुन और कृपाचार्यका युद्ध देखनेके लिये देवताओंका आकाशमें विमानोंपर आगमन
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • कृपाचार्य और अर्जुनका युद्ध तथा कौरवपक्षके सैनिकोंद्वारा कृपाचार्यको हटा ले जाना
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाके साथ अर्जुनका युद्ध
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुन और कर्णका संवाद तथा कर्णका अर्जुनसे हारकर भागना
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका उत्तरकुमारको आश्वासन तथा अर्जुनसे दु:शासन आदिकी पराजय
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका सब योद्धाओं और महारथियोंके साथ युद्ध
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुनपर समस्त कौरवपक्षीय महारथियोंका आक्रमण और सबका युद्धभूमिसे पीठ दिखाकर भागना
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुन और भीष्मका अद्‍भुत युद्ध तथा मूर्च्छित भीष्मका सारथिद्वारा रणभूमिसे हटाया जाना
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुन और दुर्योधनका युद्ध, विकर्ण आदि योद्धाओंसहित दुर्योधनका युद्धके मैदानसे भागना
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा समस्त कौरवदलकी पराजय तथा कौरवोंका स्वदेशको प्रस्थान
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • विजयी अर्जुन और उत्तरका राजधानीकी ओर प्रस्थान
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • राजा विराट और उत्तरकी विजयके विषयमें बातचीत
    • वैवाहिकपर्व
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका राजा विराटको महाराज युधिष्ठिरका परिचय देना
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • विराटको अन्य पाण्डवोंका भी परिचय प्राप्त होना तथा विराटके द्वारा युधिष्ठिरको राज्य समर्पण करके अर्जुनके साथ उत्तराके विवाहका प्रस्ताव करना
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका अपनी पुत्रवधूके रूपमें उत्तराको ग्रहण करना एवं अभिमन्यु और उत्तराका विवाह
    • विराटपर्वकी श्लोक-संख्या
    • विराटपर्व-श्रवण-महिमा
    • महाभारत-सार
  • +
    उद्योगपर्व
    • सेनोद्योगपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • राजा विराटकी सभामें भगवान‍् श्रीकृष्णका भाषण
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • बलरामजीका भाषण
    • तृतीयोऽध्याय:
    • सात्यकिके वीरोचित उद्‍गार
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • राजा द्रुपदकी सम्मति
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णका द्वारकागमन, विराट और द्रुपदके संदेशसे राजाओंका पाण्डवपक्षकी ओरसे युद्धके लिये आगमन
    • षष्ठोऽध्याय:
    • द्रुपदका पुरोहितको दौत्यकर्मके लिये अनुमति देना तथा पुरोहितका हस्तिनापुरको प्रस्थान
    • सप्तमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका दुर्योधन तथा अर्जुन दोनोंको सहायता देना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • शल्यका दुर्योधनके सत्कारसे प्रसन्न हो उसे वर देना और युधिष्ठिरसे मिलकर उन्हें आश्वासन देना
    • नवमोऽध्याय:
    • इन्द्रके द्वारा त्रिशिराका वध, वृत्रासुरकी उत्पत्ति, उसके साथ इन्द्रका युद्ध तथा देवताओंकी पराजय
    • दशमोऽध्याय:
    • इन्द्रसहित देवताओंका भगवान‍् विष्णुकी शरणमें जाना और इन्द्रका उनके आज्ञानुसार वृत्रासुरसे संधि करके अवसर पाकर उसे मारना एवं ब्रह्महत्याके भयसे जलमें छिपना
    • एकादशोऽध्याय:
    • देवताओं तथा ऋषियोंके अनुरोधसे राजा नहुषका इन्द्रके पदपर अभिषिक्त होना एवं काम-भोगमें आसक्त होना और चिन्तामें पड़ी हुई इन्द्राणीको बृहस्पतिका आश्वासन
    • द्वादशोऽध्याय:
    • देवता-नहुष-संवाद, बृहस्पतिके द्वारा इन्द्राणीकी रक्षा तथा इन्द्राणीका नहुषके पास कुछ समयकी अवधि माँगनेके लिये जाना
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • नहुषका इन्द्राणीको कुछ कालकी अवधि देना, इन्द्रका ब्रह्महत्यासे उद्धार तथा शचीद्वारा रात्रिदेवीकी उपासना
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • उपश्रुति देवीकी सहायतासे इन्द्राणीकी इन्द्रसे भेंट
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • इन्द्रकी आज्ञासे इन्द्राणीके अनुरोधपर नहुषका ऋषियोंको अपना वाहन बनाना तथा बृहस्पति और अग्निका संवाद
    • षोडशोऽध्याय:
    • बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • अगस्त्यजीका इन्द्रसे नहुषके पतनका वृत्तान्त बताना
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • इन्द्रका स्वर्गमें जाकर अपने राज्यका पालन करना, शल्यका युधिष्ठिरको आश्वासन देना और उनसे विदा लेकर दुर्योधनके यहाँ जाना
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिर और दुर्योधनके यहाँ सहायताके लिये आयी हुई सेनाओंका संक्षिप्त विवरण
    • संजययानपर्व
    • विंशोऽध्याय:
    • द्रुपदके पुरोहितका कौरवसभामें भाषण
    • एकविंशोऽध्याय:
    • भीष्मके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातका समर्थन करते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना, इसके विरुद्ध कर्णके आक्षेपपूर्ण वचन तथा धृतराष्ट्रद्वारा भीष्मकी बातका समर्थन करते हुए दूतको सम्मानित करके विदा करना
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका संजयसे पाण्डवोंके प्रभाव और प्रतिभाका वर्णन करते हुए उसे संदेश देकर पाण्डवोंके पास भेजना
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • संजयका युधिष्ठिरसे मिलकर उनकी कुशल पूछना एवं युधिष्ठिरका संजयसे कौरवपक्षका कुशल-समाचार पूछते हुए उससे सारगर्भित प्रश्न करना
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • संजयका युधिष्ठिरको उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए उन्हें राजा धृतराष्ट्रका संदेश सुनानेकी प्रतिज्ञा करना
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • संजयका युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रका संदेश सुनाना एवं अपनी ओरसे भी शान्तिके लिये प्रार्थना करना
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका संजयको इन्द्रप्रस्थ लौटानेसे ही शान्ति होना सम्भव बतलाना
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • संजयका युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी सम्भावना बतलाकर उन्हें युद्धसे उपरत करनेका प्रयत्न करना
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • संजयको युधिष्ठिरका उत्तर
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • संजयकी विदाई तथा युधिष्ठिरका संदेश
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका मुख्य-मुख्य कुरुवंशियोंके प्रति संदेश
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना
    • प्रजागरपर्व
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:*
    • धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन
    • सनत्सुजातपर्व
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • विदुरजीके द्वारा स्मरण करनेपर आये हुए सनत्सुजात ऋषिसे धृतराष्ट्रको उपदेश देनेके लिये उनकी प्रार्थना
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन
    • यानसंधिपर्व
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंके यहाँसे लौटे हुए संजयका कौरवसभामें आगमन
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुन: उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • संजयद्वारा युधिष्ठिरके प्रधान सहायकोंका वर्णन
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीमसेनके पराक्रमसे डरे हुए धृतराष्ट्रका विलाप
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रद्वारा अर्जुनसे प्राप्त होनेवाले भयका वर्णन
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • कौरवसभामें धृतराष्ट्रका युद्धसे भय दिखाकर शान्तिके लिये प्रस्ताव करना
    • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • संजयका धृतराष्ट्रको उनके दोष बताते हुए दुर्योधनपर शासन करनेकी सलाह देना
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रको धैर्य देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • संजयद्वारा अर्जुनके ध्वज एवं अश्वोंका तथा युधिष्ठिर आदिके घोड़ोंका वर्णन
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • संजयद्वारा पाण्डवोंकी युद्धविषयक तैयारीका वर्णन, धृतराष्ट्रका विलाप, दुर्योधनद्वारा अपनी प्रबलताका प्रतिपादन, धृतराष्ट्रका उसपर अविश्वास तथा संजयद्वारा धृष्टद्युम्नकी शक्ति एवं संदेशका कथन
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • संजयका धृतराष्ट्रके पूछनेपर उन्हें श्रीकृष्ण और अर्जुनके अन्त:पुरमें कहे हुए संदेश सुनाना
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके द्वारा कौरव-पाण्डवोंकी शक्तिका तुलनात्मक वर्णन
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनद्वारा अपने पक्षकी प्रबलताका वर्णन करना और विदुरका दमकी महिमा बताना
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • विदुरका कौटुम्बिक कलहसे हानि बताते हुए धृतराष्ट्रको संधिकी सलाह देना
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • संजयका धृतराष्ट्रको अर्जुनका संदेश सुनाना
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके पास व्यास और गान्धारीका आगमन तथा व्यासजीका संजयको श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्बन्धमें कुछ कहनेका आदेश
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • संजयका धृतराष्ट्रको भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमा बतलाना
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • संजयका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्ण-प्राप्ति एवं तत्त्वज्ञानका साधन बताना
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णके विभिन्न नामोंकी व्युत्पत्तियोंका कथन
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके द्वारा भगवद्‍गुणगान
    • भगवद्यानपर्व
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • भीमसेनका शान्तिविषयक प्रस्ताव
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका भीमसेनको उत्तेजित करना
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • भीमसेनका उत्तर
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका भीमसेनको आश्वासन देना
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका कथन
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका अर्जुनको उत्तर देना
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • नकुलका निवेदन
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • युद्धके लिये सहदेव तथा सात्यकिकी सम्मति और समस्त योद्धाओंका समर्थन
    • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
    • द्रौपदीका श्रीकृष्णसे अपना दु:ख सुनाना और श्रीकृष्णका उसे आश्वासन देना
    • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका हस्तिनापुरको प्रस्थान, युधिष्ठिरका माता कुन्ती एवं कौरवोंके लिये संदेश तथा श्रीकृष्णको मार्गमें दिव्य महर्षियोंका दर्शन
    • चतुरशीतितमोऽध्याय:
    • मार्गके शुभाशुभ शकुनोंका वर्णन तथा मार्गमें लोगोंद्वारा सत्कार पाते हुए श्रीकृष्णका वृकस्थल पहुँचकर वहाँ विश्राम करना
    • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका धृतराष्ट्र आदिकी अनुमतिसे श्रीकृष्णके स्वागत-सत्कारके लिये मार्गमें विश्रामस्थान बनवाना
    • षडशीतितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका भगवान‍् श्रीकृष्णकी अगवानी करके उन्हें भेंट देने एवं दु:शासनके महलमें ठहरानेका विचार प्रकट करना
    • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
    • विदुरका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेके लिये समझाना
    • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका श्रीकृष्णके विषयमें अपने विचार कहना एवं उसकी कुमन्त्रणासे कुपित हो भीष्मजीका सभासे उठ जाना
    • एकोननवतितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका स्वागत, धृतराष्ट्र तथा विदुरके घरोंपर उनका आतिथ्य
    • नवतितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना
    • एकनवतितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका दुर्योधनके घर जाना एवं उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करके विदुरजीके घरपर भोजन करना
    • द्विनवतितमोऽध्याय:
    • विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना
    • त्रिनवतितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका कौरव-पाण्डवोंमें संधिस्थापनके प्रयत्नका औचित्य बताना
    • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
    • दुर्योधन एवं शकुनिके द्वारा बुलाये जानेपर भगवान‍् श्रीकृष्णका रथपर बैठकर प्रस्थान एवं कौरवसभामें प्रवेश और स्वागतके पश्चात् आसनग्रहण
    • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
    • कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण
    • षण्णवतितमोऽध्याय:
    • परशुरामजीका दम्भोद्भवकी कथाद्वारा नर-नारायणस्वरूप अर्जुन और श्रीकृष्णका महत्त्व वर्णन करना
    • सप्तनवतितमोऽध्याय:
    • कण्व मुनिका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए मातलिका उपाख्यान आरम्भ करना
    • अष्टनवतितमोऽध्याय:
    • मातलिका अपनी पुत्रीके लिये वर खोजनेके निमित्त नारदजीके साथ वरुणलोकमें भ्रमण करते हुए अनेक आश्चर्यजनक वस्तुएँ देखना
    • एकोनशततमोऽध्याय:
    • नारदजीके द्वारा पाताललोकका प्रदर्शन
    • शततमोऽध्याय:
    • हिरण्यपुरका दिग्दर्शन और वर्णन
    • एकाधिकशततमोऽध्याय:
    • गरुड़लोक तथा गरुड़की संतानोंका वर्णन
    • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
    • सुरभि और उसकी संतानोंके साथ रसातलके सुखका वर्णन
    • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
    • नागलोकके नागोंका वर्णन और मातलिका नागकुमार सुमुखके साथ अपनी कन्याको ब्याहनेका निश्चय
    • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
    • नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी, सुमुख एवं आर्यकके साथ इन्द्रके पास आकर उनके द्वारा सुमुखको दीर्घायु प्रदान कराना तथा सुमुख-गुणकेशी-विवाह
    • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना
    • षडधिकशततमोऽध्याय:
    • नारदजीका दुर्योधनको समझाते हुए धर्मराजके द्वारा विश्वामित्रजीकी परीक्षा तथा गालवके विश्वामित्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये हठका वर्णन
    • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
    • गालवकी चिन्ता और गरुड़का आकर उन्हें आश्वासन देना
    • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
    • गरुड़का गालवसे पूर्व दिशाका वर्णन करना
    • नवाधिकशततमोऽध्याय:
    • दक्षिणदिशाका वर्णन
    • दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • पश्चिमदिशाका वर्णन
    • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • उत्तर दिशाका वर्णन
    • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • गरुड़की पीठपर बैठकर पूर्व दिशाकी ओर जाते हुए गालवका उनके वेगसे व्याकुल होना
    • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार
    • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • गरुड़ और गालवका राजा ययातिके यहाँ जाकर गुरुको देनेके लिये श्यामकर्ण घोड़ोंकी याचना करना
    • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा ययातिका गालवको अपनी कन्या देना और गालवका उसे लेकर अयोध्यानरेशके यहाँ जाना
    • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
    • हर्यश्वका दो सौ श्यामकर्ण घोड़े देकर ययातिकन्याके गर्भसे वसुमना नामक पुत्र उत्पन्न करना और गालवका इस कन्याके साथ वहाँसे प्रस्थान
    • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • दिवोदासका ययातिकन्या माधवीके गर्भसे प्रतर्दन नामक पुत्र उत्पन्न करना
    • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • उशीनरका ययातिकन्या माधवीके गर्भसे शिबि नामक पुत्र उत्पन्न करना, गालवका उस कन्याको साथ लेकर जाना और मार्गमें गरुड़का दर्शन करना
    • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • गालवका छ: सौ घोड़ोंके साथ माधवीको विश्वामित्रजीकी सेवामें देना और उनके द्वारा उसके गर्भसे अष्टक नामक पुत्रकी उत्पत्ति होनेके बाद उस कन्याको ययातिके यहाँ लौटा देना
    • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • माधवीका वनमें जाकर तप करना तथा ययातिका स्वर्गमें जाकर सुखभोगके पश्चात् मोहवश तेजोहीन होना
    • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौहित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना
    • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सत्संग एवं दौहित्रोंके पुण्यदानसे ययातिका पुन: स्वर्गारोहण
    • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • स्वर्गलोकमें ययातिका स्वागत, ययातिके पूछनेपर ब्रह्माजीका अभिमानको ही पतनका कारण बताना तथा नारदजीका दुर्योधनको समझाना
    • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान‍् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना
    • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना
    • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्म और द्रोणका दुर्योधनको पुन: समझाना
    • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णको दुर्योधनका उत्तर, उसका पाण्डवोंको राज्य न देनेका निश्चय
    • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका दुर्योधनको फटकारना और उसे कुपित होकर सभासे जाते देख उसे कैद करनेकी सलाह देना
    • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका गान्धारीको बुलाना और उसका दुर्योधनको समझाना
    • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके षड्यन्त्रका सात्यकिद्वारा भंडाफोड़, श्रीकृष्णकी सिंहगर्जना तथा धृतराष्ट्र और विदुरका दुर्योधनको पुन: समझाना
    • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णका विश्वरूप दर्शन कराकर कौरवसभासे प्रस्थान
    • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णके पूछनेपर कुन्तीका उन्हें पाण्डवोंसे कहनेके लिये संदेश देना
    • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना
    • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • विदुलाका अपने पुत्रको युद्धके लिये उत्साहित करना
    • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • विदुला और उसके पुत्रका संवाद—विदुलाके द्वारा कार्यमें सफलता प्राप्त करने तथा शत्रुवशीकरणके उपायोंका निर्देश
    • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • विदुलाके उपदेशसे उसके पुत्रका युद्धके लिये उद्यत होना
    • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीका पाण्डवोंके लिये संदेश देना और श्रीकृष्णका उनसे विदा लेकर उपप्लव्य नगरमें जाना
    • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्म और द्रोणका दुर्योधनको समझाना
    • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मसे वार्तालाप आरम्भ करके द्रोणाचार्यका दुर्योधनको पुन: संधिके लिये समझाना
    • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णका कर्णको पाण्डवपक्षमें आ जानेके लिये समझाना
    • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कर्णका दुर्योधनके पक्षमें रहनेके निश्चित विचारका प्रतिपादन करते हुए समरयज्ञके रूपकका वर्णन करना
    • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णका कर्णसे पाण्डवपक्षकी निश्चित विजयका प्रतिपादन
    • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्नका वर्णन
    • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • विदुरकी बात सुनकर युद्धके भावी दुष्परिणामसे व्यथित हुई कुन्तीका बहुत सोच-विचारके बाद कर्णके पास जाना
    • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कुन्तीका कर्णको अपना प्रथम पुत्र बताकर उससे पाण्डवपक्षमें मिल जानेका अनुरोध
    • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा
    • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके पूछनेपर श्रीकृष्णका कौरवसभामें व्यक्त किये हुए भीष्मजीके वचन सुनाना
    • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्य, विदुर तथा गान्धारीके युक्तियुक्त एवं महत्त्वपूर्ण वचनोंका भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा कथन
    • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके प्रति धृतराष्ट्रके युक्तिसंगत वचन—पाण्डवोंको आधा राज्य देनेके लिये आदेश
    • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका कौरवोंके प्रति साम, दान और भेदनीतिके प्रयोगकी असफलता बताकर दण्डके प्रयोगपर जोर देना
    • सैन्यनिर्याणपर्व
    • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवपक्षके सेनापतिका चुनाव तथा पाण्डव-सेनाका कुरुक्षेत्रमें प्रवेश
    • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कुरुक्षेत्रमें पाण्डव-सेनाका पड़ाव तथा शिविर-निर्माण
    • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका सेनाको सुसज्जित होने और शिविर-निर्माण करनेके लिये आज्ञा देना तथा सैनिकोंकी रणयात्राके लिये तैयारी
    • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका भगवान‍् श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके विषयमें पूछना, भगवान‍्का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा इस विषयमें युधिष्ठिरका संताप और अर्जुनद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका समर्थन
    • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके द्वारा सेनाओंका विभाजन और पृथक्-पृथक् अक्षौहिणियोंके सेनापतियोंका अभिषेक
    • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके द्वारा भीष्मजीका प्रधान सेनापतिके पदपर अभिषेक और कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर शिविर-निर्माण
    • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके द्वारा अपने सेनापतियोंका अभिषेक, यदुवंशियोंसहित बलरामजीका आगमन तथा पाण्डवोंसे विदा लेकर उनका तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान
    • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • रुक्मीका सहायता देनेके लिये आना; परंतु पाण्डव और कौरव दोनों पक्षोंके द्वारा कोरा उत्तर पाकर लौट जाना
    • एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र और संजयका संवाद
    • उलूकदूतागमनपर्व
    • षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजना और उनसे कहनेके लिये संदेश देना
    • एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंके शिविरमें पहुँचकर उलूकका भरी सभामें दुर्योधनका संदेश सुनाना
    • द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवपक्षकी ओरसे दुर्योधनको उसके संदेशका उत्तर
    • त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाँचों पाण्डवों, विराट, द्रुपद, शिखण्डी और धृष्टद्युम्नका संदेश लेकर उलूकका लौटना और उलूककी बात सुनकर दुर्योधनका सेनाको युद्धके लिये तैयार होनेका आदेश देना
    • चतु:षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डव-सेनाका युद्धके मैदानमें जाना और धृष्टद्युम्नके द्वारा योद्धाओंकी अपने-अपने योग्य विपक्षियोंके साथ युद्ध करनेके लिये नियुक्ति
    • रथातिरथसंख्यानपर्व
    • पञ्चषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके पूछनेपर भीष्मका कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका परिचय देना
    • षट्षष्ट्ॺधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरवपक्षके रथियोंका परिचय
    • सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरवपक्षके रथी, महारथी और अतिरथियोंका वर्णन
    • अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक संवाद तथा दुर्योधनद्वारा उसका निवारण
    • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवपक्षके रथी आदिका एवं उनकी महिमाका वर्णन
    • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवपक्षके रथियों और महारथियोंका वर्णन तथा विराट और द्रुपदकी प्रशंसा
    • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवपक्षके रथी, महारथी एवं अतिरथी आदिका वर्णन
    • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मका पाण्डवपक्षके अतिरथी वीरोंका वर्णन करते हुए शिखण्डी और पाण्डवोंका वध न करनेका कथन
    • अम्बोपाख्यानपर्व
    • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अम्बोपाख्यानका आरम्भ—भीष्मजीके द्वारा काशिराजकी कन्याओंका अपहरण
    • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अम्बाका शाल्वराजके प्रति अपना अनुराग प्रकट करके उनके पास जानेके लिये भीष्मसे आज्ञा माँगना
    • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद
    • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत
    • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अकृतव्रण और परशुरामजीकी अम्बासे बातचीत
    • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना
    • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • संकल्पनिर्मित रथपर आरूढ़ परशुरामजीके साथ भीष्मका युद्ध प्रारम्भ करना
    • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्म और परशुरामका घोर युद्ध
    • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्म और परशुरामका युद्ध
    • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्म और परशुरामका युद्ध
    • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मको अष्टवसुओंसे प्रस्वापनास्त्रकी प्राप्ति
    • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्म तथा परशुरामजीका एक-दूसरेपर शक्ति और ब्रह्मास्त्रका प्रयोग
    • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति
    • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अम्बाकी कठोर तपस्या
    • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अम्बाका द्वितीय जन्ममें पुन: तप करना और महादेवजीसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उसका चिताकी आगमें प्रवेश
    • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अम्बाका राजा द्रुपदके यहाँ कन्याके रूपमें जन्म, राजा तथा रानीका उसे पुत्ररूपमें प्रसिद्ध करके उसका नाम शिखण्डी रखना
    • एकोननवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शिखण्डीका विवाह तथा उसके स्त्री होनेका समाचार पाकर उसके श्वशुर दशार्णराजका महान् कोप
    • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • हिरण्यवर्माके आक्रमणके भयसे घबराये हुए द्रुपदका अपनी महारानीसे संकटनिवारणका उपाय पूछना
    • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रुपदपत्नीका उत्तर, द्रुपदके द्वारा नगररक्षाकी व्यवस्था और देवाराधन तथा शिखण्डिनीका वनमें जाकर स्थूणाकर्ण नामक यक्षसे अपने दु:खनिवारणके लिये प्रार्थना करना
    • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शिखण्डीको पुरुषत्वकी प्राप्ति, द्रुपद और हिरण्यवर्माकी प्रसन्नता, स्थूणाकर्णको कुबेरका शाप तथा भीष्मका शिखण्डीको न मारनेका निश्चय
    • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके पूछनेपर भीष्म आदिके द्वारा अपनी-अपनी शक्तिका वर्णन
    • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा अपनी, अपने सहायकोंकी तथा युधिष्ठिरकी भी शक्तिका परिचय देना
    • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरव-सेनाका रणके लिये प्रस्थान
    • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डवसेनाका युद्धके लिये प्रस्थान
  • +
    भीष्मपर्व
    • जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • कुरुक्षेत्रमें उभय पक्षके सैनिकोंकी स्थिति तथा युद्धके नियमोंका निर्माण
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • वेदव्यासजीके द्वारा संजयको दिव्य दृष्टिका दान तथा भयसूचक उत्पातोंका वर्णन
    • तृतीयोऽध्याय:
    • व्यासजीके द्वारा अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजयके द्वारा भूमिके महत्त्वका वर्णन
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • पंचमहाभूतों तथा सुदर्शनद्वीपका संक्षिप्त वर्णन
    • षष्ठोऽध्याय:
    • सुदर्शनके वर्ष, पर्वत, मेरुगिरि, गंगानदी तथा शशाकृतिका वर्णन
    • सप्तमोऽध्याय:
    • उत्तर कुरु, भद्राश्ववर्ष तथा माल्यवान‍्का वर्णन
    • अष्टमोऽध्याय:
    • रमणक, हिरण्यक, शृंगवान् पर्वत तथा ऐरावतवर्षका वर्णन
    • नवमोऽध्याय:
    • भारतवर्षकी नदियों, देशों तथा जनपदोंके नाम और भूमिका महत्त्व
    • दशमोऽध्याय:
    • भारतवर्षमें युगोंके अनुसार मनुष्योंकी आयु तथा गुणोंका निरूपण
    • भूमिपर्व
    • एकादशोऽध्याय:
    • शाकद्वीपका वर्णन
    • द्वादशोऽध्याय:
    • कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन
    • श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्व
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • संजयका युद्धभूमिसे लौटकर धृतराष्ट्रको भीष्मकी मृत्युका समाचार सुनाना
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका विलाप करते हुए भीष्मजीके मारे जानेकी घटनाको विस्तारपूर्वक जाननेके लिये संजयसे प्रश्न करना
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • संजयका युद्धके वृत्तान्तका वर्णन आरम्भ करना—दुर्योधनका दु:शासनको भीष्मकी रक्षाके लिये समुचित व्यवस्था करनेका आदेश
    • षोडशोऽध्याय:
    • दुर्योधनकी सेनाका वर्णन
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • कौरवमहारथियोंका युद्धके लिये आगे बढ़ना तथा उनके व्यूह, वाहन और ध्वज आदिका वर्णन
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • कौरवसेनाका कोलाहल तथा भीष्मके रक्षकोंका वर्णन
    • एकोनविंशतितमोऽध्याय:
    • व्यूहनिर्माणके विषयमें युधिष्ठिर और अर्जुनकी बातचीत, अर्जुनद्वारा वज्रव्यूहकी रचना, भीमसेनकी अध्यक्षतामें सेनाका आगे बढ़ना
    • विंशोऽध्याय:
    • दोनों सेनाओंकी स्थिति तथा कौरवसेनाका अभियान
    • एकविंशोऽध्याय:
    • कौरवसेनाको देखकर युधिष्ठिरका विषाद करना और ‘श्रीकृष्णकी कृपासे ही विजय होती है’ यह कहकर अर्जुनका उन्हें आश्वासन देना
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी रणयात्रा, अर्जुन और भीमसेनकी प्रशंसा तथा श्रीकृष्णका अर्जुनसे कौरवसेनाको मारनेके लिये कहना
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा दुर्गादेवीकी स्तुति, वरप्राप्ति और अर्जुनकृत दुर्गास्तवनके पाठकी महिमा
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • सैनिकोंके हर्ष और उत्साहके विषयमें धृतराष्ट्र और संजयका संवाद
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • दोनों सेनाओंके प्रधान-प्रधान वीरों एवं शंखध्वनिका वर्णन तथा स्वजनवधके पापसे भयभीत हुए अर्जुनका विषाद
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • अर्जुनको युद्धके लिये उत्साहित करते हुए भगवान‍् के द्वारा नित्यानित्य वस्तुके विवेचनपूर्वक सांख्ययोग, कर्मयोग एवं स्थितप्रज्ञकी स्थिति और महिमाका प्रतिपादन
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • ज्ञानयोग और कर्मयोग आदि समस्त साधनोंके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन एवं स्वधर्मपालनकी महिमा तथा कामनिरोधके उपायका वर्णन
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • सगुण भगवान‍् के प्रभाव, निष्काम कर्मयोग तथा योगी महात्मा पुरुषोंके आचरण और उनकी महिमाका वर्णन करते हुए विविध यज्ञों एवं ज्ञानकी महिमाका वर्णन
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • सांख्ययोग, निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तिसहित ध्यानयोगका वर्णन
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • निष्काम कर्मयोगका प्रतिपादन करते हुए आत्मोद्धारके लिये प्रेरणा तथा मनोनिग्रहपूर्वक ध्यानयोग एवं योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • ज्ञान-विज्ञान, भगवान‍् की व्यापकता, अन्य देवताओंकी उपासना एवं भगवान‍् को प्रभावसहित न जाननेवालोंकी निन्दा और जाननेवालोंकी महिमाका कथन
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिके विषयमें अर्जुनके सात प्रश्न और उनका उत्तर एवं भक्तियोग तथा शुक्ल और कृष्ण मार्गोंका प्रतिपादन
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • ज्ञान-विज्ञान और जगत् की उत्पत्तिका, आसुरी और दैवी सम्पदावालोंका, प्रभावसहित भगवान‍् के स्वरूपका, सकाम-निष्काम उपासनाका एवं भगवद्भक्तिकी महिमाका वर्णन
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • भगवान‍् की विभूति और योगशक्तिका तथा प्रभावसहित भक्तियोगका कथन, अर्जुनके पूछनेपर भगवान‍्द्वारा अपनी विभूतियोंका और योगशक्तिका पुन: वर्णन
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • विश्वरूपका दर्शन करानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना, भगवान‍् और संजयद्वारा विश्वरूपका वर्णन, अर्जुनद्वारा भगवान‍् के विश्वरूपका देखा जाना, भयभीत हुए अर्जुनद्वारा भगवान‍् की स्तुति-प्रार्थना, भगवान‍्द्वारा विश्वरूप और चतुर्भुजरूपके दर्शनकी महिमा और केवल अनन्यभक्तिसे ही भगवान‍् की प्राप्तिका कथन
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • साकार और निराकारके उपासकोंकी उत्तमताका निर्णय तथा भगवत्प्राप्तिके उपायका एवं भगवत्प्राप्तिवाले पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुषका वर्णन
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • ज्ञानकी महिमा और प्रकृति-पुरुषसे जगत् की उत्पत्तिका, सत्त्व, रज, तम—तीनों गुणोंका, भगवत्प्राप्तिके उपायका एवं गुणातीत पुरुषके लक्षणोंका वर्णन
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • संसारवृक्षका, भगवत्प्राप्तिके उपायका, जीवात्माका, प्रभावसहित परमेश्वरके स्वरूपका एवं क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमके तत्त्वका वर्णन
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • फलसहित दैवी और आसुरी सम्पदाका वर्णन तथा शास्त्रविपरीत आचरणोंको त्यागने और शास्त्रके अनुकूल आचरण करनेके लिये प्रेरणा
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • श्रद्धाका और शास्त्रविपरीत घोर तप करनेवालोंका वर्णन, आहार, यज्ञ, तप और दानके पृथक्-पृथक् भेद तथा ॐ, तत्, सत् के प्रयोगकी व्याख्या
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • त्यागका, सांख्यसिद्धान्तका, फलसहित वर्ण-धर्मका, उपासनासहित ज्ञाननिष्ठाका, भक्तिसहित निष्काम कर्मयोगका एवं गीताके माहात्म्यका वर्णन
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डवोंके प्रथम दिनके युद्धका आरम्भ
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • उभय पक्षके सैनिकोंका द्वन्द्व-युद्ध
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डव-सेनाका घमासान युद्ध
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • भीष्मके साथ अभिमन्युका भयंकर युद्ध, शल्यके द्वारा उत्तरकुमारका वध और श्वेतका पराक्रम
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • श्वेतका महाभयंकर पराक्रम और भीष्मके द्वारा उसका वध
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • शंखका युद्ध, भीष्मका प्रचण्ड पराक्रम तथा प्रथम दिनके युद्धकी समाप्ति
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • कौरव-सेनाकी व्यूह-रचना तथा दोनों दलोंमें शंखध्वनि और सिंहनाद
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीष्म और अर्जुनका युद्ध
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्यका युद्ध
    • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीमसेनका कलिंगों और निषादोंसे युद्ध, भीमसेनके द्वारा शक्रदेव, भानुमान् और केतुमान‍्का वध तथा उनके बहुत-से सैनिकोंका संहार
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अभिमन्यु और अर्जुनका पराक्रम तथा दूसरे दिनके युद्धकी समाप्ति
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • तीसरे दिन—कौरव-पाण्डवोंकी व्यूह-रचना तथा युद्धका आरम्भ
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • पाण्डव-वीरोंका पराक्रम, कौरव-सेनामें भगदड़ तथा दुर्योधन और भीष्मका संवाद
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • चौथे दिन—दोनों सेनाओंका व्यूह-निर्माण तथा भीष्म और अर्जुनका द्वैरथ-युद्ध
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • अभिमन्युका पराक्रम और धृष्टद्युम्नद्वारा शलके पुत्रका वध
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्न और शल्य आदि दोनों पक्षके वीरोंका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • युद्धस्थलमें प्रचण्ड पराक्रमकारी भीमसेनका भीष्मके साथ युद्ध तथा सात्यकि और भूरिश्रवाकी मुठभेड़
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • भीमसेन और घटोत्कचका पराक्रम, कौरवोंकी पराजय तथा चौथे दिनके युद्धकी समाप्ति
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • नारायणावतार श्रीकृष्ण एवं नरावतार अर्जुनकी महिमाका प्रतिपादन
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमा
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • ब्रह्मभूतस्तोत्र तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महत्ता
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • कौरवोंद्वारा मकरव्यूह तथा पाण्डवोंद्वारा श्येनव्यूहका निर्माण एवं पाँचवें दिनके युद्धका आरम्भ
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • भीष्म और भीमसेनका घमासान युद्ध
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • भीष्म, अर्जुन आदि योद्धाओंका घमासान युद्ध
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • दोनों सेनाओंका परस्पर घोर युद्ध
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • विराट-भीष्म, अश्वत्थामा-अर्जुन, दुर्योधन-भीमसेन तथा अभिमन्यु और लक्ष्मणके द्वन्द्व-युद्ध
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • सात्यकि और भूरिश्रवाका युद्ध, भूरिश्रवाद्वारा सात्यकिके दस पुत्रोंका वध, अर्जुनका पराक्रम तथा पाँचवें दिनके युद्धका उपसंहार
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • छठे दिनके युद्धका आरम्भ, पाण्डव तथा कौरव-सेनाका क्रमश: मकरव्यूह एवं क्रौंचव्यूह बनाकर युद्धमें प्रवृत्त होना
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रकी चिन्ता
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • भीमसेन, धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्यका पराक्रम
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • उभय पक्षकी सेनाओंका संकुल युद्ध
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • भीमसेनके द्वारा दुर्योधनकी पराजय, अभिमन्यु और द्रौपदीपुत्रोंका धृतराष्ट्रपुत्रोंके साथ युद्ध तथा छठे दिनके युद्धकी समाप्ति
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • भीष्मद्वारा दुर्योधनको आश्वासन तथा सातवें दिनके युद्धके लिये कौरव-सेनाका प्रस्थान
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • सातवें दिनके युद्धमें कौरव-पाण्डव-सेनाओंका मण्डल और वज्रव्यूह बनाकर भीषण संघर्ष
    • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण और अर्जुनसे डरकर कौरवसेनामें भगदड़, द्रोणाचार्य और विराटका युद्ध, विराटपुत्र शंखका वध, शिखण्डी और अश्वत्थामाका युद्ध, सात्यकिके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, धृष्टद्युम्नके द्वारा दुर्योधनकी हार तथा भीमसेन और कृतवर्माका युद्ध
    • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
    • इरावान‍्के द्वारा विन्द और अनुविन्दकी पराजय, भगदत्तसे घटोत्कचका हारना तथा मद्रराजपर नकुल और सहदेवकी विजय
    • चतुरशीतितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरसे राजा श्रुतायुका पराजित होना, युद्धमें चेकितान और कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, भूरिश्रवासे धृष्टकेतुका और अभिमन्युसे चित्रसेन आदिका पराजित होना एवं सुशर्मा आदिसे अर्जुनका युद्धारम्भ
    • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका पराक्रम, पाण्डवोंका भीष्मपर आक्रमण, युधिष्ठिरका शिखण्डीको उपालम्भ और भीमका पुरुषार्थ
    • षडशीतितमोऽध्याय:
    • भीष्म और युधिष्ठिरका युद्ध, धृष्टद्युम्न और सात्यकिके साथ विन्द और अनुविन्दका संग्राम, द्रोण आदिका पराक्रम और सातवें दिनके युद्धकी समाप्ति
    • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
    • आठवें दिन व्यूहबद्ध कौरव-पाण्डव-सेनाओंकी रणयात्रा और उनका परस्पर घमासान युद्ध
    • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
    • भीष्मका पराक्रम, भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके आठ पुत्रोंका वध तथा दुर्योधन और भीष्मकी युद्धविषयक बातचीत
    • एकोननवतितमोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डव-सेनाका घमासान युद्ध और भयानक जनसंहार
    • नवतितमोऽध्याय:
    • इरावान‍्के द्वारा शकुनिके भाइयोंका तथा राक्षस अलम्बुषके द्वारा इरावान‍्का वध
    • एकनवतितमोऽध्याय:
    • घटोत्कच और दुर्योधनका भयानक युद्ध
    • द्विनवतितमोऽध्याय:
    • घटोत्कचका दुर्योधन एवं द्रोण आदि प्रमुख वीरोंके साथ भयंकर युद्ध
    • त्रिनवतितमोऽध्याय:
    • घटोत्कचकी रक्षाके लिये आये हुए भीम आदि शूरवीरोंके साथ कौरवोंका युद्ध और उनका पलायन
    • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
    • दुर्योधन और भीमसेनका एवं अश्वत्थामा और राजा नीलका युद्ध तथा घटोत्कचकी मायासे मोहित होकर कौरव-सेनाका पलायन
    • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके अनुरोध और भीष्मजीकी आज्ञासे भगदत्तका घटोत्कच, भीमसेन और पाण्डव-सेनाके साथ घोर युद्ध
    • षण्णवतितमोऽध्याय:
    • इरावान‍्के वधसे अर्जुनका दु:खपूर्ण उद्‍गार, भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके नौ पुत्रोंका वध, अभिमन्यु और अम्बष्ठका युद्ध, युद्धकी भयानक स्थितिका वर्णन तथा आठवें दिनके युद्धका उपसंहार
    • सप्तनवतितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका अपने मन्त्रियोंसे सलाह करके भीष्मसे पाण्डवोंको मारने अथवा कर्णको युद्धके लिये आज्ञा देनेका अनुरोध करना
    • अष्टनवतितमोऽध्याय:
    • भीष्मका दुर्योधनको अर्जुनका पराक्रम बताना और भयंकर युद्धके लिये प्रतिज्ञा करना तथा प्रात:काल दुर्योधनके द्वारा भीष्मकी रक्षाकी व्यवस्था
    • एकोनशततमोऽध्याय:
    • नवें दिनके युद्धके लिये उभयपक्षकी सेनाओंकी व्यूह-रचना और उनके घमासान युद्धका आरम्भ तथा विनाशसूचक उत्पातोंका वर्णन
    • शततमोऽध्याय:
    • द्रौपदीके पाँचों पुत्रों और अभिमन्युका राक्षस अलम्बुषके साथ घोर युद्ध एवं अभिमन्युके द्वारा नष्ट होती हुई कौरव-सेनाका युद्धभूमिसे पलायन
    • एकाधिकशततमोऽध्याय:
    • अभिमन्युके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, अर्जुनके साथ भीष्मका तथा कृपाचार्य, अश्वत्थामा और द्रोणाचार्यके साथ सात्यकिका युद्ध
    • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्य और सुशर्माके साथ अर्जुनका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार
    • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
    • उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध और रक्तमयी रणनदीका वर्णन
    • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय, कौरव-पाण्डव-सैनिकोंका घोर युद्ध, अभिमन्युसे चित्रसेनकी, द्रोणसे द्रुपदकी और भीमसेनसे बाह्लीककी पराजय तथा सात्यकि और भीष्मका युद्ध
    • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका दु:शासनको भीष्मकी रक्षाके लिये आदेश, युधिष्ठिर और नकुल-सहदेवके द्वारा शकुनिकी घुड़सवार-सेनाकी पराजय तथा शल्यके साथ उन सबका युद्ध
    • षडधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मके द्वारा पराजित पाण्डवसेनाका पलायन और भीष्मको मारनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको अर्जुनका रोकना
    • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
    • नवें दिनके युद्धकी समाप्ति, रातमें पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंका भीष्मसे मिलकर उनके वधका उपाय जानना
    • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
    • दसवें दिन उभयपक्षकी सेनाका रणके लिये प्रस्थान तथा भीष्म और शिखण्डीका समागम एवं अर्जुनका शिखण्डीको भीष्मका वध करनेके लिये उत्साहित करना
    • नवाधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्म और दुर्योधनका संवाद तथा भीष्मके द्वारा लाखों सैनिकोंका संहार
    • दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके प्रोत्साहनसे शिखण्डीका भीष्मपर आक्रमण और दोनों सेनाओंके प्रमुख वीरोंका परस्पर युद्ध तथा दु:शासनका अर्जुनके साथ घोर युद्ध
    • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डवपक्षके प्रमुख महारथियोंके द्वन्द्व-युद्धका वर्णन
    • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यका अश्वत्थामाको अशुभ शकुनोंकी सूचना देते हुए उसे भीष्मकी रक्षाके लिये धृष्टद्युम्नसे युद्ध करनेका आदेश देना
    • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरवपक्षके दस प्रमुख महारथियोंके साथ अकेले घोर युद्ध करते हुए भीमसेनका अद्भुत पराक्रम
    • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंके साथ युद्धमें भीमसेन और अर्जुनका अद्भुत पुरुषार्थ
    • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मके आदेशसे युधिष्ठिरका उनपर आक्रमण तथा कौरव-पाण्डव-सैनिकोंका भीषण युद्ध
    • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डव महारथियोंके द्वन्द्वयुद्धका वर्णन तथा भीष्मका पराक्रम
    • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • उभय पक्षकी सेनाओंका युद्ध, दु:शासनका पराक्रम तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मका मूर्च्छित होना
    • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मका अद्भुत पराक्रम करते हुए पाण्डव-सेनाका भीषण संहार
    • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना
    • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मजीकी महत्ता तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मको तकिया देना एवं उभय पक्षकी सेनाओंका अपने शिबिरमें जाना और श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवाद
    • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना
    • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद
    • श्रवणमहिमा
    • महाभारत-सार
  • +
    द्रोणपर्व
    • द्रोणाभिषेकपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • भीष्मजीके धराशायी होनेसे कौरवोंका शोक तथा उनके द्वारा कर्णका स्मरण
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • कर्णकी रणयात्रा
    • तृतीयोऽध्याय:
    • भीष्मजीके प्रति कर्णका कथन
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • भीष्मजीका कर्णको प्रोत्साहन देकर युद्धके लिये भेजना तथा कर्णके आगमनसे कौरवोंका हर्षोल्लास
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • कर्णका दुर्योधनके समक्ष सेनापति-पदके लिये द्रोणाचार्यका नाम प्रस्तावित करना
    • षष्ठोऽध्याय:
    • दुर्योधनका द्रोणाचार्यसे सेनापति होनेके लिये प्रार्थना करना
    • सप्तमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यका सेनापतिके पदपर अभिषेक, कौरव-पाण्डव-सेनाओंका युद्ध और द्रोणका पराक्रम
    • अष्टमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यके पराक्रम और वधका संक्षिप्त समाचार
    • नवमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना
    • दशमोऽध्याय:
    • राजा धृतराष्ट्रका शोकसे व्याकुल होना और संजयसे युद्धविषयक प्रश्न
    • एकादशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका भगवान् श्रीकृष्णकी संक्षिप्त लीलाओंका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना
    • द्वादशोऽध्याय:
    • दुर्योधनका वर माँगना और द्रोणाचार्यका युधिष्ठिरको अर्जुनकी अनुपस्थितिमें जीवित पकड़ लानेकी प्रतिज्ञा करना
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • अर्जुनका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा युद्धमें द्रोणाचार्यका पराक्रम
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • द्रोणका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका द्वन्द्वयुद्ध, रणनदीका वर्णन तथा अभिमन्युकी वीरता
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • शल्यके साथ भीमसेनका युद्ध तथा शल्यकी पराजय
    • षोडशोऽध्याय:
    • वृषसेनका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका तुमुल युद्ध, द्रोणाचार्यके द्वारा पाण्डवपक्षके अनेक वीरोंका वध तथा अर्जुनकी विजय
    • संशप्तकवधपर्व
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • सुशर्मा आदि संशप्तक वीरोंकी प्रतिज्ञा तथा अर्जुनका युद्धके लिये उनके निकट जाना
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • संशप्तक-सेनाओंके साथ अर्जुनका युद्ध और सुधन्वाका वध
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • संशप्तकगणोंके साथ अर्जुनका घोर युद्ध
    • विंशोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार
    • एकविंशोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यके द्वारा सत्यजित् , शतानीक,दृढसेन,क्षेम, वसुदान तथा पांचालराजकुमार आदिका वध और पाण्डव-सेनाकी पराजय
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • द्रोणके युद्धके विषयमें दुर्योधन और कर्णका संवाद
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • पाण्डव-सेनाके महारथियोंके रथ, घोड़े, ध्वज तथा धनुषोंका विवरण
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका अपना खेद प्रकाशित करते हुए युद्धके समाचार पूछना
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डव-सैनिकोंके द्वन्द-युद्ध
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • भीमसेनका भगदत्तके हाथीके साथ युद्ध, हाथी और भगदत्तका भयानक पराक्रम
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • अर्जुनका संशप्तक-सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • संशप्तकोंका संहार करके अर्जुनका कौरव-सेनापर आक्रमण तथा भगदत्त और उनके हाथीका पराक्रम
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • अर्जुन और भगदत्तका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा तथा अर्जुनद्वारा हाथीसहित भगदत्तका वध
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा वृषक और अचलका वध, शकुनिकी माया और उसकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध तथा अश्वत्थामाके द्वारा राजा नीलका वध
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध,भीमसेनका कौरव महारथियोंके साथ संग्राम, भयंकर संहार, पाण्डवोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, अर्जुन और कर्णका युद्ध, कर्णके भाइयोंका वध तथा कर्ण और सात्यकिका संग्राम
    • अभिमन्युवधपर्व
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • दुर्योधनका उपालम्भ, द्रोणाचार्यकी प्रतिज्ञा और अभिमन्युवधके वृत्तान्तका संक्षेपसे वर्णन
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • संजयके द्वारा अभिमन्युकी प्रशंसा, द्रोणाचार्यद्वारा चक्रव्यूहका निर्माण
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिर और अभिमन्युका संवाद तथा व्यूहभेदनके लिये अभिमन्युकी प्रतिज्ञा
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युका उत्साह तथा उसके द्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका संहार
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युका पराक्रम, उसके द्वारा अश्मकपुत्रका वध, शल्यका मूर्च्छित होना और कौरव-सेनाका पलायन
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युके द्वारा शल्यके भाईका वध तथा द्रोणाचार्यकी रथसेनाका पलायन
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यके द्वारा अभिमन्युके पराक्रमकी प्रशंसा तथा दुर्योधनके आदेशसे दु:शासनका अभिमन्युके साथ युद्ध आरम्भ करना
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युके द्वारा दु:शासन और कर्णकी पराजय
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युके द्वारा कर्णके भाईका वध तथा कौरव-सेनाका संहार और पलायन
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युके पीछे जानेवाले पाण्डवोंको जयद्रथका वरके प्रभावसे रोक देना
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंके साथ जयद्रथका युद्ध और व्यूहद्वारको रोक रखना
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युका पराक्रम और उसके द्वारा वसातीय आदि अनेक योद्धाओंका वध
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युके द्वारा सत्यश्रवा, क्षत्रियसमूह, रुक्मरथ तथा उसके मित्रगणों और सैकड़ों राजकुमारोंका वध और दुर्योधनकी पराजय
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युके द्वारा लक्ष्मण तथा क्राथपुत्रका वध और सेनासहित छ: महारथियोंका पलायन
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युका पराक्रम, छ: महारथियोंके साथ घोर युद्ध और उसके द्वारा वृन्दारक तथा दस हजार अन्य राजाओंके सहित कोसलनरेश बृहद्‍बलका वध
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अभिमन्युद्वारा अश्वकेतु, भोज और कर्णके मन्त्री आदिका वध एवं छ: महारथियोंके साथ घोर युद्ध और उन महारथियोंद्वारा अभिमन्युके धनुष, रथ, ढाल और तलवारका नाश
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अभिमन्युका कालिकेय, वसाति और कैकय रथियोंको मार डालना एवं छ: महारथियोंके सहयोगसे अभिमन्युका वध और भागती हुई अपनी सेनाको युधिष्ठिरका आश्वासन देना
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका विलाप
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • विलाप करते हुए युधिष्ठिरके पास व्यासजीका आगमन और अकम्पन-नारद-संवादकी प्रस्तावना करते हुए मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग आरम्भ करना
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना
    • चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • मृत्युकी घोर तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उसे वरकी प्राप्ति तथा नारद-अकम्पन-संवादका उपसंहार
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • राजा सुहोत्रकी दानशीलता
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • राजा पौरवके अद्भुत दानका वृत्तान्त
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • राजा शिबिके यज्ञ और दानकी महत्ता
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • भगवान् श्रीरामका चरित्र
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • राजा भगीरथका चरित्र
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा दिलीपका उत्कर्ष
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा मान्धाताकी महत्ता
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा ययातिका उपाख्यान
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • राजा अम्बरीषका चरित्र
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा शशबिन्दुका चरित्र
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • राजा गयका चरित्र
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा रन्तिदेवकी महत्ता
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • राजा भरतका चरित्र
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • राजा पृथुका चरित्र
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • परशुरामजीका चरित्र
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • नारदजीका सृंजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना
    • प्रतिज्ञापर्व
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका अर्जुनको कौरवोंके जयद्रथकी रक्षाविषयक उद्योगका समाचार बताना
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनके वीरोचित वचन
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • नाना प्रकारके अशुभसूचक उत्पात, कौरव-सेनामें भय और श्रीकृष्णका अपनी बहिन सुभद्राको आश्वासन देना
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • सुभद्राका विलाप और श्रीकृष्णका सबको आश्वासन
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनको स्वप्नमें ही पुन: पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति
    • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना
    • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनकी प्रतिज्ञाको सफल बनानेके लिये युधिष्ठिरकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना और श्रीकृष्णका उन्हें आश्वासन देना
    • चतुरशीतितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका अर्जुनको आशीर्वाद, अर्जुनका स्वप्न सुनकर समस्त सुहृदोंकी प्रसन्नता, सात्यकि और श्रीकृष्णके साथ रथपर बैठकर अर्जुनकी रणयात्रा तथा अर्जुनके कहनेसे सात्यकिका युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये जाना
    • जयद्रथवधपर्व
    • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका विलाप
    • षडशीतितमोऽध्याय:
    • संजयका धृतराष्ट्रको उपालम्भ
    • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
    • कौरव-सैनिकोंका उत्साह तथा आचार्य द्रोणके द्वारा चक्रशकटव्यूहका निर्माण
    • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
    • कौरव-सेनाके लिये अपशकुन, दुर्मर्षणका अर्जुनसे लड़नेका उत्साह तथा अर्जुनका रणभूमिमें प्रवेश एवं शंखनाद
    • एकोननवतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा दुर्मर्षणकी गजसेनाका संहार और समस्त सैनिकोंका पलायन
    • नवतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनके बाणोंसे हताहत होकर सेनासहित दु:शासनका पलायन
    • एकनवतितमोऽध्याय:
    • अर्जुन और द्रोणाचार्यका वार्तालाप तथा युद्ध एवं द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे बढ़े हुए अर्जुनका कौरव-सैनिकोंद्वारा प्रतिरोध
    • द्विनवतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका द्रोणाचार्य और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए कौरव-सेनामें प्रवेश तथा श्रुतायुधका अपनी गदासे और सुदक्षिणका अर्जुनद्वारा वध
    • त्रिनवतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा श्रुतायु, अच्युतायु, नियतायु, दीर्घायु, म्लेच्छ-सैनिक और अम्बष्ठ आदिका वध
    • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका उपालम्भ सुनकर द्रोणाचार्यका उसके शरीरमें दिव्य कवच बाँधकर उसीको अर्जुनके साथ युद्धके लिये भेजना
    • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
    • द्रोण और धृष्टद्युम्नका भीषण संग्राम तथा उभय पक्षके प्रमुख वीरोंका परस्पर संकुल युद्ध
    • षण्णवतितमोऽध्याय:
    • दोनों पक्षोंके प्रधान वीरोंका द्वन्द्व-युद्ध
    • सप्तनवतितमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिद्वारा धृष्टद्युम्नकी रक्षा
    • अष्टनवतितमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्य और सात्यकिका अद्भुत युद्ध
    • एकोनशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा तीव्र गतिसे कौरव-सेनामें प्रवेश, विन्द और अनुविन्दका वध तथा अद्भुत जलाशयका निर्माण
    • शततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना
    • एकाधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण और अर्जुनको आगे बढ़ा देख कौरव-सैनिकोंकी निराशा तथा दुर्योधनका युद्धके लिये आना
    • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका अर्जुनकी प्रशंसापूर्वक उसे प्रोत्साहन देना, अर्जुन और दुर्योधनका एक-दूसरेके सम्मुख आना, कौरव-सैनिकोंका भय तथा दुर्योधनका अर्जुनको ललकारना
    • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधन और अर्जुनका युद्ध तथा दुर्योधनकी पराजय
    • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका कौरव महारथियोंके साथ घोर युद्ध
    • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुन तथा कौरव-महारथियोंके ध्वजोंका वर्णन और नौ महारथियोंके साथ अकेले अर्जुनका युद्ध
    • षडधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोण और उनकी सेनाके साथ पाण्डव-सेनाका द्वन्द्वयुद्ध तथा द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करते समय रथ-भंग हो जानेपर युधिष्ठिरका पलायन
    • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरव-सेनाके क्षेमधूर्ति, वीरधन्वा, निरमित्र तथा व्याघ्रदत्तका वध और दुर्मुख एवं विकर्णकी पराजय
    • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रौपदीपुत्रोंके द्वारा सोमदत्तकुमार शलका वध तथा भीमसेनके द्वारा अलम्बुषकी पराजय
    • नवाधिकशततमोऽध्याय:
    • घटोत्कचद्वारा अलम्बुषका वध और पाण्डव-सेनामें हर्ष-ध्वनि
    • दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश
    • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद
    • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिकी अर्जुनके पास जानेकी तैयारी और सम्मानपूर्वक विदा होकर उनका प्रस्थान तथा साथ आते हुए भीमको युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये लौटा देना
    • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिका द्रोण और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए काम्बोजोंकी सेनाके पास पहुँचना
    • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका विषादयुक्त वचन, संजयका धृतराष्ट्रको ही दोषी बताना, कृतवर्माका भीमसेन और शिखण्डीके साथ युद्ध तथा पाण्डव-सेनाकी पराजय
    • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय, त्रिगर्तोंकी गजसेनाका संहार और जलसंधका वध
    • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिका पराक्रम तथा दुर्योधन और कृतवर्माकी पुन: पराजय
    • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकि और द्रोणाचार्यका युद्ध, द्रोणकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन
    • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिद्वारा सुदर्शनका वध
    • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकि और उनके सारथिका संवाद तथा सात्यकिद्वारा काम्बोजों और यवन आदिकी सेनाकी पराजय
    • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिद्वारा दुर्योधनकी सेनाका संहार तथा भाइयोंसहित दुर्योधनका पलायन
    • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिके द्वारा पाषाणयोधी म्लेच्छोंकी सेनाका संहार और दु:शासनका सेनासहित पलायन
    • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय
    • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिका घोर युद्ध और दु:शासनकी पराजय
    • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डव-सेनाका घोर युद्ध तथा पाण्डवोंके साथ दुर्योधनका संग्राम
    • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यके द्वारा बृहत्क्षत्र, धृष्टकेतु, जरासन्धपुत्र सहदेव तथा धृष्टद्युम्नकुमार क्षत्रधर्माका वध और चेकितानकी पराजय
    • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका चिन्तित होकर भीमसेनको अर्जुन और सात्यकिका पता लगानेके लिये भेजना
    • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन
    • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनका द्रोणाचार्य और अन्य कौरव योद्धाओंको पराजित करते हुए द्रोणाचार्यके रथको आठ बार फेंक देना तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनके समीप पहुँचकर गर्जना करना तथा युधिष्ठिरका प्रसन्न होकर अनेक प्रकारकी बातें सोचना
    • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और कर्णका युद्ध तथा कर्णकी पराजय
    • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना, द्रोणाचार्यका उसे द्यूतका परिणाम दिखाकर युद्धके लिये वापस भेजना और उसके साथ युधामन्यु तथा उत्तमौजाका युद्ध
    • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनके द्वारा कर्णकी पराजय
    • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और कर्णका घोर युद्ध
    • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णके सारथिसहित रथका विनाश तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध
    • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और कर्णका युद्ध, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्मुखका वध तथा कर्णका पलायन
    • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका खेदपूर्वक भीमसेनके बलका वर्णन और अपने पुत्रोंकी निन्दा करना तथा भीमके द्वारा दुर्मर्षण आदि धृतराष्ट्रके पाँच पुत्रोंका वध
    • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णका पलायन, धृतराष्ट्रके सात पुत्रोंका वध तथा भीमका पराक्रम
    • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और कर्णका युद्ध तथा दुर्योधनके सात भाइयोंका वध
    • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और कर्णका भयंकर युद्ध
    • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और कर्णका भयंकर युद्ध, पहले भीमकी और पीछे कर्णकी विजय, उसके बाद अर्जुनके बाणोंसे व्यथित होकर कर्ण और अश्वत्थामाका पलायन
    • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिद्वारा राजा अलम्बुषका और दु:शासनके घोड़ोंका वध
    • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिका अद्भुत पराक्रम, श्रीकृष्णका अर्जुनको सात्यकिके आगमनकी सूचना देना और अर्जुनकी चिन्ता
    • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भूरिश्रवा और सात्यकिका रोषपूर्वक सम्भाषण और युद्ध तथा सात्यकिका सिर काटनेके लिये उद्यत हुए भूरिश्रवाकी भुजाका अर्जुनद्वारा उच्छेद
    • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भूरिश्रवाका अर्जुनको उपालम्भ देना, अर्जुनका उत्तर और आमरण अनशनके लिये बैठे हुए भूरिश्रवाका सात्यकिके द्वारा वध
    • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिके भूरिश्रवाद्वारा अपमानित होनेका कारण तथा वृष्णिवंशी वीरोंकी प्रशंसा
    • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका जयद्रथपर आक्रमण, कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत, कर्णके साथ अर्जुनका युद्ध और कर्णकी पराजय तथा सब योद्धाओंके साथ अर्जुनका घोर युद्ध
    • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका अद्भुत पराक्रम और सिन्धुराज जयद्रथका वध
    • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय
    • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अर्जुनका कर्णको फटकारना और वृषसेनके वधकी प्रतिज्ञा करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको बधाई देकर उन्हें रणभूमिका भयानक दृश्य दिखाते हुए युधिष्ठिरके पास ले जाना
    • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे विजयका समाचार सुनाना और युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा अर्जुन, भीम एवं सात्यकिका अभिनन्दन
    • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना
    • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यका दुर्योधनको उत्तर और युद्धके लिये प्रस्थान
    • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधन और कर्णकी बातचीत तथा पुन: युद्धका आरम्भ
    • घटोत्कचवधपर्व
    • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डव-सेनाका युद्ध, दुर्योधन और युधिष्ठिरका संग्राम तथा दुर्योधनकी पराजय
    • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • रात्रियुद्धमें पाण्डव-सैनिकोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण और द्रोणाचार्यद्वारा उनका संहार
    • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यद्वारा शिबिका वध तथा भीमसेनद्वारा घूँसे और थप्पड़से कलिंगराजकुमारका एवं ध्रुव, जयरात तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुष्कर्ण और दुर्मदका वध
    • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • सोमदत्त और सात्यकिका युद्ध, सोमदत्तकी पराजय, घटोत्कच और अश्वत्थामाका युद्ध और अश्वत्थामाद्वारा घटोत्कचके पुत्रका, एक अक्षौहिणी राक्षस-सेनाका तथा द्रुपदपुत्रोंका वध एवं पाण्डव-सेनाकी पराजय
    • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • सोमदत्तकी मूर्च्छा, भीमके द्वारा बाह्लीकका वध, धृतराष्ट्रके दस पुत्रों और शकुनिके सात रथियों एवं पाँच भाइयोंका संहार तथा द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरके युद्धमें युधिष्ठिरकी विजय
    • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधन और कर्णकी बातचीत, कृपाचार्यद्वारा कर्णको फटकारना तथा कर्णद्वारा कृपाचार्यका अपमान
    • एकोनष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना, दुर्योधनका उसे मनाना, पाण्डवों और पाञ्चालोंका कर्णपर आक्रमण, कर्णका पराक्रम, अर्जुनके द्वारा कर्णकी पराजय तथा दुर्योधनका अश्वत्थामासे पांचालोंके वधके लिये अनुरोध
    • षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाका दुर्योधनको उपालम्भपूर्ण आश्वासन देकर पांचालोंके साथ युद्ध करते हुए धृष्टद्युम्नके रथसहित सारथिको नष्ट करके उसकी सेनाको भगाकर अद्भुत पराक्रम दिखाना
    • एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और अर्जुनका आक्रमण और कौरव-सेनाका पलायन
    • द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिद्वारा सोमदत्तका वध, द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरका युद्ध तथा भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यसे दूर रहनेका आदेश
    • त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंमें प्रदीपों (मशालों)-का प्रकाश
    • चतु:षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दोनों सेनाओंका घमासान युद्ध और दुर्योधनका द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये सैनिकोंको आदेश
    • पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दोनों सेनाओंका युद्ध और कृतवर्माद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय
    • षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिके द्वारा भूरिका वध, घटोत्कच और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा भीमके साथ दुर्योधनका युद्ध एवं दुर्योधनका पलायन
    • सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कर्णके द्वारा सहदेवकी पराजय, शल्यके द्वारा विराटके भाई शतानीकका वध और विराटकी पराजय तथा अर्जुनसे पराजित होकर अलम्बुषका पलायन
    • अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:
    • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • नकुलके द्वारा शकुनिकी पराजय तथा शिखण्डी और कृपाचार्यका घोर युद्ध
    • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्यका युद्ध, धृष्टद्युम्नद्वारा द्रुमसेनका वध, सात्यकि और कर्णका युद्ध, कर्णकी दुर्योधनको सलाह तथा शकुनिका पाण्डव-सेनापर आक्रमण
    • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकिसे दुर्योधनकी, अर्जुनसे शकुनि और उलूककी तथा धृष्टद्युम्नसे कौरव-सेनाकी पराजय
    • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके उपालम्भसे द्रोणाचार्य और कर्णका घोर युद्ध, पाण्डव-सेनाका पलायन, भीमसेनका सेनाको लौटाकर लाना और अर्जुनसहित भीमसेनका कौरवोंपर आक्रमण करना
    • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कर्णद्वारा धृष्टद्युम्न एवं पांचालोंकी पराजय, युधिष्ठिरकी घबराहट तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनका घटोत्कचको प्रोत्साहन देकर कर्णके साथ युद्धके लिये भेजना
    • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • घटोत्कच और जटासुरके पुत्र अलम्बुषका घोर युद्ध तथा अलम्बुषका वध
    • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम
    • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अलायुधका युद्धस्थलमें प्रवेश तथा उसके स्वरूप और रथ आदिका वर्णन
    • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेन और अलायुधका घोर युद्ध
    • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दोनों सेनाओंमें परस्पर घोर युद्ध और घटोत्कचके द्वारा अलायुधका वध एवं दुर्योधनका पश्चात्ताप
    • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • घटोत्कचका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा चलायी हुई इन्द्रप्रदत्त शक्तिसे उसका वध
    • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण
    • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको जरासंध आदि धर्मद्रोहियोंके वध करनेका कारण बताना
    • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कर्णने अर्जुनपर शक्ति क्यों नहीं छोड़ी, इसके उत्तरमें संजयका धृतराष्ट्रसे और श्रीकृष्णका सात्यकिसे रहस्ययुक्त कथन
    • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण
    • द्रोणवधपर्व
    • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • निद्रासे व्याकुल हुए उभयपक्षके सैनिकोंका अर्जुनके कहनेसे सो जाना और चन्द्रोदयके बाद पुन: उठकर युद्धमें लग जाना
    • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका उपालम्भ और द्रोणाचार्यका व्यंगपूर्ण उत्तर
    • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पाण्डववीरोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, द्रुपदके पौत्रों तथा द्रुपद एवं विराट आदिका वध, धृष्टद्युम्नकी प्रतिज्ञा और दोनों दलोंमें घमासान युद्ध
    • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • युद्धस्थलकी भीषण अवस्थाका वर्णन और नकुलके द्वारा दुर्योधनकी पराजय
    • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दु:शासन और सहदेवका, कर्ण और भीमसेनका तथा द्रोणाचार्य और अर्जुनका घोर युद्ध
    • एकोननवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्नका दु:शासनको हराकर द्रोणाचार्यपर आक्रमण, नकुल-सहदेवद्वारा उनकी रक्षा, दुर्योधन तथा सात्यकिका संवाद तथा युद्ध, कर्ण और भीमसेनका संग्राम और अर्जुनका कौरवोंपर आक्रमण
    • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना
    • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिकी शूरवीरता और प्रशंसा
    • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद
    • नारायणास्त्रमोक्षपर्व
    • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरव-सैनिकों तथा सेनापतियोंका भागना, अश्वत्थामाके पूछनेपर कृपाचार्यका उसे द्रोणवधका वृत्तान्त सुनाना
    • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका प्रश्न
    • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य
    • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कौरव-सेनाका सिंहनाद सुनकर युधिष्ठिरका अर्जुनसे कारण पूछना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाके क्रोध एवं गुरुहत्याके भीषण परिणामका वर्णन
    • सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भीमसेनके वीरोचित उद्‍गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन
    • अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण
    • नवनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाके द्वारा नारायणास्त्रका प्रयोग, राजा युधिष्ठिरका खेद, भगवान् श्रीकृष्णके बताये हुए उपायसे सैनिकोंकी रक्षा, भीमसेनका वीरोचित उद्‍गार और उनपर उस अस्त्रका प्रबल आक्रमण
    • द्विशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन
    • एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना
    • द्वॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल
  • +
    कर्णपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • कर्णवधका संक्षिप्त वृत्तान्त सुनकर जनमेजयका वैशम्पायनजीसे उसे विस्तारपूर्वक कहनेका अनुरोध
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र और संजयका संवाद
    • तृतीयोऽध्याय:
    • दुर्योधनके द्वारा सेनाको आश्वासन देना तथा सेनापति कर्णके युद्ध और वधका संक्षिप्त वृत्तान्त
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका शोक और समस्त स्त्रियोंकी व्याकुलता
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • संजयका धृतराष्ट्रको कौरवपक्षके मारे गये प्रमुख वीरोंका परिचय देना
    • षष्ठोऽध्याय:
    • कौरवोंद्वारा मारे गये प्रधान-प्रधान पाण्डव-पक्षके वीरोंका परिचय
    • सप्तमोऽध्याय:
    • कौरवपक्षके जीवित योद्धाओंका वर्णन और धृतराष्ट्रकी मूर्च्छा
    • अष्टमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका विलाप
    • नवमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका संजयसे विलाप करते हुए कर्णवधका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त पूछना
    • दशमोऽध्याय:
    • कर्णको सेनापति बनानेके लिये अश्वत्थामाका प्रस्ताव और सेनापतिके पदपर उसका अभिषेक
    • एकादशोऽध्याय:
    • कर्णके सेनापतित्वमें कौरव-सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान और मकरव्यूहका निर्माण तथा पाण्डव-सेनाके अर्धचन्द्राकार व्यूहकी रचना और युद्धका आरम्भ
    • द्वादशोऽध्याय:
    • दोनों सेनाओंका घोर युद्ध और भीमसेनके द्वारा क्षेमधूर्तिका वध
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • दोनों सेनाओंका परस्पर घोर युद्ध तथा सात्यकिके द्वारा विन्द और अनुविन्दका वध
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • द्रौपदीपुत्र श्रुतकर्मा और प्रतिविन्ध्यद्वारा क्रमश: चित्रसेन एवं चित्रका वध, कौरव-सेनाका पलायन तथा अश्वत्थामाका भीमसेनपर आक्रमण
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • अश्वत्थामा और भीमसेनका अद्भुत युद्ध तथा दोनोंका मूर्च्छित हो जाना
    • षोडशोऽध्याय:
    • अर्जुनका संशप्तकों तथा अश्वत्थामाके साथ अद्भुत युद्ध
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाकी पराजय
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा हाथियोंसहित दण्डधार और दण्ड आदिका वध तथा उनकी सेनाका पलायन
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा संशप्तक-सेनाका संहार, श्रीकृष्णका अर्जुनको युद्धस्थलका दृश्य दिखाते हुए उनके पराक्रमकी प्रशंसा करना तथा पाण्ड्यनरेशका कौरव-सेनाके साथ युद्धारम्भ
    • विंशोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाके द्वारा पाण्ड्यनेरशका वध
    • एकविंशोऽध्याय:
    • कौरव-पाण्डव-दलोंका भयंकर घमासान युद्ध
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • पाण्डव-सेनापर भयानक गजसेनाका आक्रमण, पाण्डवोंद्वारा पुण्ड्रकी पराजय तथा बंगराज और अंगराजका वध, गजसेनाका विनाश और पलायन
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • सहदेवके द्वारा दु:शासनकी पराजय
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • नकुल और कर्णका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा नकुलकी पराजय और पांचाल-सेनाका संहार
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • युयुत्सु और उलूकका युद्ध, युयुत्सुका पलायन, शतानीक और धृतराष्ट्रपुत्र श्रुतकर्माका तथा सुतसोम और शकुनिका घोर युद्ध एवं शकुनिद्वारा पाण्डव-सेनाका विनाश
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • कृपाचार्यसे धृष्टद्युम्नका भय तथा कृतवर्माके द्वारा शिखण्डीकी पराजय
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा राजा श्रुतंजय, सौश्रुति, चन्द्रदेव और सत्यसेन आदि महारथियोंका वध एवं संशप्तक-सेनाका संहार
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिर और दुर्योधनका युद्ध, दुर्योधनकी पराजय तथा उभयपक्षकी सेनाओंका अमर्यादित भयंकर संग्राम
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके द्वारा दुर्योधनकी पराजय
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • सात्यकि और कर्णका युद्ध तथा अर्जुनके द्वारा कौरव-सेनाका संहार और पाण्डवोंकी विजय
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • रात्रिमें कौरवोंकी मन्त्रणा, धृतराष्ट्रके द्वारा दैवकी प्रबलताका प्रतिपादन, संजयद्वारा धृतराष्ट्रपर दोषारोप तथा कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना और शल्यका इस विषयमें घोर विरोध करना, पुन: श्रीकृष्णके समान अपनी प्रशंसा सुनकर उसे स्वीकार कर लेना
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर-वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात कहना
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • शल्य और दुर्योधनका वार्तालाप, कर्णका सारथि होनेके लिये शल्यकी स्वीकृति
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • कर्णका युद्धके लिये प्रस्थान और शल्यसे उसकी बातचीत
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • कर्णके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनका पता बतानेवालेको नाना प्रकारकी भोगसामग्री और इच्छानुसार धन देनेकी घोषणा
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • शल्यका कर्णके प्रति अत्यन्त आक्षेपपूर्ण वचन कहना
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • कर्णका आत्मप्रशंसापूर्वक शल्यको फटकारना
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • कर्णके द्वारा मद्र आदि बाहीक देशवासियोंकी निन्दा
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • कौरव-सेनाकी व्यूह-रचना, युधिष्ठिरके आदेशसे अर्जुनका आक्रमण, शल्यके द्वारा पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीरोंका वर्णन तथा अर्जुनकी प्रशंसा
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंका भयंकर युद्ध तथा अर्जुन और कर्णका पराक्रम
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • कर्णके द्वारा बहुत-से योद्धाओंसहित पाण्डव-सेनाका संहार, भीमसेनके द्वारा कर्णपुत्र भानुसेनका वध, नकुल और सात्यकिके साथ वृषसेनका युद्ध तथा कर्णका राजा युधिष्ठिरपर आक्रमण
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • कर्ण और युधिष्ठिरका संग्राम, कर्णकी मूर्च्छा, कर्णद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय और तिरस्कार तथा पाण्डवोंके हजारों योद्धाओंका वध और रक्त-नदीका वर्णन तथा पाण्डव महारथियोंद्वारा कौरव-सेनाका विध्वंस और उसका पलायन
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • कर्ण और भीमसेनका युद्ध तथा कर्णका पलायन
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके छ: पुत्रोंका वध, भीम और कर्णका युद्ध, भीमके द्वारा गजसेना, रथसेना और घुड़सवारोंका संहार तथा उभयपक्षकी सेनाओंका घोर युद्ध
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • दोनों सेनाओंका घोर युद्ध और कौरव-सेनाका व्यथित होना
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा दस हजार संशप्तक योद्धाओं और उनकी सेनाका संहार
    • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • कृपाचार्यके द्वारा शिखण्डीकी पराजय और सुकेतुका वध तथा धृष्टद्युम्नके द्वारा कृतवर्माका परास्त होना
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाका घोर युद्ध, सात्यकिके सारथिका वध एवं युधिष्ठिरका अश्वत्थामाको छोड़कर दूसरी ओर चले जाना
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • नकुल-सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल-सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका सैनिकोंको प्रोत्साहन देना और अश्वत्थामाकी प्रतिज्ञा
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • अर्जुनका श्रीकृष्णसे युधिष्ठिरके पास चलनेका आग्रह तथा श्रीकृष्णका उन्हें युद्धभूमि दिखाते और वहाँका समाचार बताते हुए रथको आगे बढ़ाना
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्न और कर्णका युद्ध, अश्वत्थामाका धृष्टद्युम्नपर आक्रमण तथा अर्जुनके द्वारा धृष्टद्युम्नकी रक्षा और अश्वत्थामाकी पराजय
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका अर्जुनसे दुर्योधन और कर्णके पराक्रमका वर्णन करके कर्णको मारनेके लिये अर्जुनको उत्साहित करना तथा भीमसेनके दुष्कर पराक्रमका वर्णन करना
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • कर्णद्वारा शिखण्डीकी पराजय, धृष्टद्युम्न और दु:शासनका तथा वृषसेन और नकुलका युद्ध, सहदेवद्वारा उलूककी तथा सात्यकिद्वारा शकुनिकी पराजय, कृपाचार्यद्वारा युधामन्युकी एवं कृतवर्माद्वारा उत्तमौजाकी पराजय तथा भीमसेनद्वारा दुर्योधनकी पराजय, गजसेनाका संहार और पलायन
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरपर कौरव-सैनिकोंका आक्रमण
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • कर्णद्वारा नकुल-सहदेवसहित युधिष्ठिरकी पराजय एवं पीड़ित होकर युधिष्ठिरका अपनी छावनीमें जाकर विश्राम करना
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा अश्वत्थामाकी पराजय, कौरव-सेनामें भगदड़ एवं दुर्योधनसे प्रेरित कर्णद्वारा भार्गवास्त्रसे पांचालोंका संहार
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • भीमसेनको युद्धका भार सौंपकर श्रीकृष्ण और अर्जुनका युधिष्ठिरके पास जाना
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका अर्जुनसे भ्रमवश कर्णके मारे जानेका वृत्तान्त पूछना
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका युधिष्ठिरसे अबतक कर्णको न मार सकनेका कारण बताते हुए उसे मारनेके लिये प्रतिज्ञा करना
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका अर्जुनके प्रति अपमानजनक क्रोधपूर्ण वचन
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनसे भगवान् श्रीकृष्णका उपदेश, अर्जुन और युधिष्ठिरका प्रसन्नतापूर्वक मिलन एवं अर्जुनद्वारा कर्णवधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरका आशीर्वाद
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रणयात्रा, मार्गमें शुभ शकुन तथा श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रोत्साहन देना
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • भीष्म और द्रोणके पराक्रमका वर्णन करते हुए अर्जुनके बलकी प्रशंसा करके श्रीकृष्णका कर्ण और दुर्योधनके अन्यायकी याद दिलाकर अर्जुनको कर्णवधके लिये उत्तेजित करना
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनके वीरोचित उद्‍गार
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • दोनों पक्षोंकी सेनाओंमें द्वन्द्वयुद्ध तथा सुषेणका वध
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • भीमसेनका अपने सारथि विशोकसे संवाद
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कौरव-सेनाका संहार तथा भीमसेनसे शकुनिकी पराजय एवं दुर्योधनादि धृतराष्ट्रपुत्रोंका सेनासहित भागकर कर्णका आश्रय लेना
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • कर्णके द्वारा पाण्डव-सेनाका संहार और पलायन
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका कौरव-सेनाका विनाश करके खूनकी नदी बहा देना और अपना रथ कर्णके पास ले चलनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णसे कहना तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनको आते देख शल्य और कर्णकी बातचीत तथा अर्जुनद्वारा कौरव-सेनाका विध्वंस
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका कौरव-सेनाको नष्ट करके आगे बढ़ना
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कौरव वीरोंका संहार तथा कर्णका पराक्रम
    • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
    • सात्यकिके द्वारा कर्णपुत्र प्रसेनका वध, कर्णका पराक्रम और दु:शासन एवं भीमसेनका युद्ध
    • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
    • भीमद्वारा दु:शासनका रक्तपान और उसका वध, युधामन्युद्वारा चित्रसेनका वध तथा भीमका हर्षोद्‍गार
    • चतुरशीतितमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके दस पुत्रोंका वध, कर्णका भय और शल्यका समझाना तथा नकुल और वृषसेनका युद्ध
    • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
    • कौरववीरोंद्वारा कुलिन्दराजके पुत्रों और हाथियोंका संहार तथा अर्जुनद्वारा वृषसेनका वध
    • षडशीतितमोऽध्याय:
    • कर्णके साथ युद्ध करनेके विषयमें श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत तथा अर्जुनका कर्णके सामने उपस्थित होना
    • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
    • कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता
    • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनद्वारा कौरव-सेनाका संहार, अश्वत्थामाका दुर्योधनसे संधिके लिये प्रस्ताव और दुर्योधनद्वारा उसकी अस्वीकृति
    • एकोननवतितमोऽध्याय:
    • कर्ण और अर्जुनका भयंकर युद्ध और कौरववीरोंका पलायन
    • नवतितमोऽध्याय:
    • अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना
    • एकनवतितमोऽध्याय:
    • भगवान् श्रीकृष्णका कर्णको चेतावनी देना और कर्णका वध
    • द्विनवतितमोऽध्याय:
    • कौरवोंका शोक, भीम आदि पाण्डवोंका हर्ष, कौरव-सेनाका पलायन और दु:खित शल्यका दुर्योधनको सान्त्वना देना
    • त्रिनवतितमोऽध्याय:
    • भीमसेनद्वारा पचीस हजार पैदल सैनिकोंका वध, अर्जुनद्वारा रथसेनाका विध्वंस, कौरव-सेनाका पलायन और दुर्योधनका उसे रोकनेके लिये विफल प्रयास
    • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
    • शल्यके द्वारा रणभूमिका दिग्दर्शन, कौरव-सेनाका पलायन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनका शिविरकी ओर गमन
    • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
    • कौरव-सेनाका शिबिरकी ओर पलायन और शिबिरोंमें प्रवेश
    • षण्णवतितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका रणभूमिमें कर्णको मारा गया देखकर प्रसन्न हो श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करना, धृतराष्ट्रका शोकमग्न होना तथा कर्णपर्वके श्रवणकी महिमा
  • +
    शल्यपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • संजयके मुखसे शल्य और दुर्योधनके वधका वृत्तान्त सुनकर राजा धृतराष्ट्रका मूर्च्छित होना और सचेत होनेपर उन्हें विदुरका आश्वासन देना
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • राजा धृतराष्ट्रका विलाप करना और संजयसे युद्धका वृत्तान्त पूछना
    • तृतीयोऽध्याय:
    • कर्णके मारे जानेपर पाण्डवोंके भयसे कौरव-सेनाका पलायन, सामना करनेवाले पचीस हजार पैदलोंका भीमसेनद्वारा वध तथा दुर्योधनका अपने सैनिकोंको समझा-बुझाकर पुन: पाण्डवोंके साथ युद्धमें लगाना
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • कृपाचार्यका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना
    • षष्ठोऽध्याय:
    • दुर्योधनके पूछनेपर अश्वत्थामाका शल्यको सेनापति बनानेके लिये प्रस्ताव, दुर्योधनका शल्यसे अनुरोध और शल्यद्वारा उसकी स्वीकृति
    • सप्तमोऽध्याय:
    • राजा शल्यके वीरोचित उद्‍गार तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको शल्यवधके लिये उत्साहित करना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • उभयपक्षकी सेनाओंका समरांगणमें उपस्थित होना एवं बची हुई दोनों सेनाओंकी संख्याका वर्णन
    • नवमोऽध्याय:
    • उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध और कौरव-सेनाका पलायन
    • दशमोऽध्याय:
    • नकुलद्वारा कर्णके तीन पुत्रोंका वध तथा उभयपक्षकी सेनाओंका भयानक युद्ध
    • एकादशोऽध्याय:
    • शल्यका पराक्रम, कौरव-पाण्डवयोद्धाओंके द्वन्द्वयुद्ध तथा भीमसेनके द्वारा शल्यकी पराजय
    • द्वादशोऽध्याय:
    • भीमसेन और शल्यका भयानक गदायुद्ध तथा युधिष्ठिरके साथ शल्यका युद्ध, दुर्योधनद्वारा चेकितानका और युधिष्ठिरद्वारा चन्द्रसेन एवं द्रुमसेनका वध, पुन: युधिष्ठिर और माद्रीपुत्रोंके साथ शल्यका युद्ध
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • मद्रराज शल्यका अद्भुत पराक्रम
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • अर्जुन और अश्वत्थामाका युद्ध तथा पांचाल वीर सुरथका वध
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • दुर्योधन और धृष्टद्युम्नका एवं अर्जुन और अश्वत्थामाका तथा शल्यके साथ नकुल और सात्यकि आदिका घोर संग्राम
    • षोडशोऽध्याय:
    • पाण्डव-सैनिकों और कौरव-सैनिकोंका द्वन्द्वयुद्ध, भीमसेनद्वारा दुर्योधनकी तथा युधिष्ठिरद्वारा शल्यकी पराजय
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • भीमसेनद्वारा राजा शल्यके घोड़े और सारथिका तथा युधिष्ठिरद्वारा राजा शल्य और उनके भाईका वध एवं कृतवर्माकी पराजय
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • मद्रराजके अनुचरोंका वध और कौरव-सेनाका पलायन
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • पाण्डवसैनिकोंका आपसमें बातचीत करते हुए पाण्डवोंकी प्रशंसा और धृतराष्ट्रकी निन्दा करना तथा कौरव-सेनाका पलायन, भीमद्वारा इक्कीस हजार पैदलोंका संहार और दुर्योधनका अपनी सेनाको उत्साहित करना
    • विंशोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्नद्वारा राजा शाल्वके हाथीका और सात्यकिद्वारा राजा शाल्वका वध
    • एकविंशोऽध्याय:
    • सात्यकिद्वारा क्षेमधूर्तिका वध, कृतवर्माका युद्ध और उसकी पराजय एवं कौरवसेनाका पलायन
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • दुर्योधनका पराक्रम और उभयपक्षकी सेनाओंका घोर संग्राम
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • कौरवपक्षके सात सौ रथियोंका वध, उभयपक्षकी सेनाओंका मर्यादाशून्य घोर संग्राम तथा शकुनिका कूट युद्ध और उसकी पराजय
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णके सम्मुख अर्जुनद्वारा दुर्योधनके दुराग्रहकी निन्दा और रथियोंकी सेनाका संहार
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • अर्जुन और भीमसेनद्वारा कौरवोंकी रथसेना एवं गजसेनाका संहार, अश्वत्थामा आदिके द्वारा दुर्योधनकी खोज, कौरवसेनाका पलायन तथा सात्यकिद्वारा संजयका पकड़ा जाना
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका और बहुत-सी चतुरंगिणी सेनाका वध
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत, अर्जुनद्वारा सत्यकर्मा, सत्येषु तथा पैंतालीस पुत्रों और सेनासहित सुशर्माका वध तथा भीमके द्वारा धृतराष्ट्रपुत्र सुदर्शनका अन्त
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • सहदेवके द्वारा उलूक और शकुनिका वध एवं बची हुई सेनासहित दुर्योधनका पलायन
    • ह्रदप्रवेशपर्व
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • बची हुई समस्त कौरव-सेनाका वध, संजयका कैदसे छूटना, दुर्योधनका सरोवरमें प्रवेश तथा युयुत्सुका राजमहिलाओंके साथ हस्तिनापुरमें जाना
    • गदापर्व
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्यका सरोवरपर जाकर दुर्योधनसे युद्ध करनेके विषयमें बातचीत करना, व्याधोंसे दुर्योधनका पता पाकर युधिष्ठिरका सेनासहित सरोवरपर जाना और कृपाचार्य आदिका दूर हट जाना
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका द्वैपायनसरोवरपर जाना, वहाँ युधिष्ठिर और श्रीकृष्णकी बातचीत तथा तालाबमें छिपे हुए दुर्योधनके साथ युधिष्ठिरका संवाद
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको फटकारना, भीमसेनकी प्रशंसा तथा भीम और दुर्योधनमें वाग्युद्ध
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • बलरामजीका आगमन और स्वागत तथा भीमसेन और दुर्योधनके युद्धका आरम्भ
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • उदपानतीर्थकी उत्पत्तिकी तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • कुमार कार्तिकेयका प्राकट्य और उनके अभिषेककी तैयारी
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • स्कन्दका अभिषेक और उनके महापार्षदोंके नाम, रूप आदिका वर्णन
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • मातृकाओंका परिचय तथा स्कन्ददेवकी रणयात्रा और उनके द्वारा तारकासुर, महिषासुर आदि दैत्योंका सेनासहित संहार
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • वरुणका अभिषेक तथा अग्नितीर्थ, ब्रह्मयोनि और कुबेरतीर्थकी उत्पत्तिका प्रसंग
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • बदरपाचनतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें श्रुतावती और अरुन्धतीके तपकी कथा
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • इन्द्रतीर्थ, रामतीर्थ, यमुनातीर्थ और आदित्यतीर्थकी महिमा
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • वृद्ध कन्याका चरित्र, शृंगवान‍्के साथ उसका विवाह और स्वर्गगमन तथा उस तीर्थका माहात्म्य
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • ऋषियोंद्वारा कुरुक्षेत्रकी सीमा और महिमाका वर्णन
    • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • प्लक्षप्रस्रवण आदि तीर्थों तथा सरस्वतीकी महिमा एवं नारदजीसे कौरवोंके विनाश और भीम तथा दुर्योधनके युद्धका समाचार सुनकर बलरामजीका उसे देखनेके लिये जाना
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • बलरामजीकी सलाहसे सबका कुरुक्षेत्रके समन्तपंचक तीर्थमें जाना और वहाँ भीम तथा दुर्योधनमें गदायुद्धकी तैयारी
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • दुर्योधनके लिये अपशकुन, भीमसेनका उत्साह तथा भीम और दुर्योधनमें वाग्युद्धके पश्चात् गदायुद्धका आरम्भ
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीमसेन और दुर्योधनका गदायुद्ध
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत तथा अर्जुनके संकेतके अनुसार भीमसेनका गदासे दुर्योधनकी जाँघें तोड़कर उसे धराशायी करना एवं भीषण उत्पातोंका प्रकट होना
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • भीमसेनके द्वारा दुर्योधनका तिरस्कार, युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाकर अन्यायसे रोकना और दुर्योधनको सान्त्वना देते हुए खेद प्रकट करना
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • क्रोधमें भरे हुए बलरामको श्रीकृष्णका समझाना और युुधिष्ठिरके साथ श्रीकृष्णकी तथा भीमसेनकी बातचीत
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • पाण्डव-सैनिकोंद्वारा भीमकी स्तुति, श्रीकृष्णका दुर्योधनपर आक्षेप, दुर्योधनका उत्तर तथा श्रीकृष्णके द्वारा पाण्डवोंका समाधान एवं शंखध्वनि
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका कौरव शिबिरमें पहुँचना, अर्जुनके रथका दग्ध होना और पाण्डवोंका भगवान् श्रीकृष्णको हस्तिनापुर भेजना
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी प्रेरणासे श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें जाकर धृतराष्ट्र और गान्धारीको आश्वासन दे पुन: पाण्डवोंके पास लौट आना
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनका संजयके सम्मुख विलाप और वाहकोंद्वारा अपने साथियोंको संदेश भेजना
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • दुर्योधनकी दशा देखकर अश्वत्थामाका विषाद, प्रतिज्ञा और सेनापतिके पदपर अभिषेक
  • +
    सौप्तिकपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना
    • तृतीयोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाका कृपाचार्य और कृतवर्माको उत्तर देते हुए उन्हें अपना क्रूरतापूर्ण निश्चय बताना
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • कृपाचार्यका कल प्रात:काल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवाद तथा तीनोंका पाण्डवोंके शिविरकी ओर प्रस्थान
    • षष्ठोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना
    • सप्तमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाके द्वारा रात्रिमें सोये हुए पांचाल आदि समस्त वीरोंका संहार तथा फाटकसे निकलकर भागते हुए योद्धाओंका कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा वध
    • नवमोऽध्याय:
    • दुर्योधनकी दशा देखकर कृपाचार्य और अश्वत्थामाका विलाप तथा उनके मुखसे पांचालोंके वधका वृत्तान्त जानकर दुर्योधनका प्रसन्न होकर प्राणत्याग करना
    • ऐषीकपर्व
    • दशमोऽध्याय:
    • धृष्टद्युम्नके सारथिके मुखसे पुत्रों और पांचालोंके वधका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरका विलाप, द्रौपदीको बुलानेके लिये नकुलको भेजना, सुहृदोंके साथ शिविरमें जाना तथा मारे हुए पुत्रादिको देखकर भाईसहित शोकातुर होना
    • एकादशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका शोकमें व्याकुल होना, द्रौपदीका विलाप तथा द्रोणकुमारके वधके लिये आग्रह, भीमसेनका अश्वत्थामाको मारनेके लिये प्रस्थान
    • द्वादशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका अश्वत्थामाकी चपलता एवं क्रूरताके प्रसंगमें सुदर्शनचक्र माँगनेकी बात सुनाते हुए उससे भीमसेनकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेका आदेश देना
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण, अर्जुन और युधिष्ठिरका भीमसेनके पीछे जाना, भीमका गंगातटपर पहुँचकर अश्वत्थामाको ललकारना और अश्वत्थामाके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • अश्वत्थामाके अस्त्रका निवारण करनेके लिये अर्जुनके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग एवं वेदव्यासजी और देवर्षि नारदका प्रकट होना
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना
    • षोडशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णसे शाप पाकर अश्वत्थामाका वनको प्रस्थान तथा पाण्डवोंका मणि देकर द्रौपदीको शान्त करना
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • अपने समस्त पुत्रों और सैनिकोंके मारे जानेके विषयमें युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे पूछना और उत्तरमें श्रीकृष्णके द्वारा महादेवजीकी महिमाका प्रतिपादन
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत‍्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना
  • +
    स्त्रीपर्व
    • जलप्रदानिकपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका विलाप और संजयका उनको सान्त्वना देना
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • विदुरजीका राजा धृतराष्ट्रको समझाकर उनको शोकका त्याग करनेके लिये कहना
    • तृतीयोऽध्याय:
    • विदुरजीका शरीरकी अनित्यता बताते हुए धृतराष्ट्रको शोक त्यागनेके लिये कहना
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • दु:खमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • गहन वनके दृष्टान्तसे संसारके भयंकर स्वरूपका वर्णन
    • षष्ठोऽध्याय:
    • संसाररूपी वनके रूपकका स्पष्टीकरण
    • सप्तमोऽध्याय:
    • संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • व्यासजीका संहारको अवश्यम्भावी बताकर धृतराष्ट्रको समझाना
    • नवमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका शोकातुर हो जाना और विदुरजीका उन्हें पुन: शोकनिवारणके लिये उपदेश
    • दशमोऽध्याय:
    • स्त्रियों और प्रजाके लोगोंके सहित राजा धृतराष्ट्रका रणभूमिमें जानेके लिये नगरसे बाहर निकलना
    • एकादशोऽध्याय:
    • राजा धृतराष्ट्रसे कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्माकी भेंट और कृपाचार्यका कौरव-पाण्डवोंकी सेनाके विनाशकी सूचना देना
    • द्वादशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका धृतराष्ट्रसे मिलना, धृतराष्ट्रके द्वारा भीमकी लोहमयी प्रतिमाका भंग होना और शोक करनेपर श्रीकृष्णका उन्हें समझाना
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका धृतराष्ट्रको फटकारकर उनका क्रोध शान्त करना और धृतराष्ट्रका पाण्डवोंको हृदयसे लगाना
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंको शाप देनेके लिये उद्यत हुई गान्धारीको व्यासजीका समझाना
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • भीमसेनका गान्धारीको अपनी सफाई देते हुए उनसे क्षमा माँगना, युधिष्ठिरका अपना अपराध स्वीकार करना, गान्धारीके दृष्टिपातसे युधिष्ठिरके पैरोंके नखोंका काला पड़ जाना, अर्जुनका भयभीत होकर श्रीकृष्णके पीछे छिप जाना, पाण्डवोंका अपनी मातासे मिलना, द्रौपदीका विलाप, कुन्तीका आश्वासन तथा गान्धारीका उन दोनोंको धीरज बँधाना
    • स्त्रीविलापपर्व
    • षोडशोऽध्याय:
    • वेदव्यासजीके वरदानसे दिव्य दृष्टिसम्पन्न हुई गान्धारीका युद्धस्थलमें मारे गये योद्धाओं तथा रोती हुई बहुओंको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • दुर्योधन तथा उसके पास रोती हुई पुत्रवधूको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • अपने अन्य पुत्रों तथा दु:शासनको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • विकर्ण, दुर्मुख, चित्रसेन, विविंशति तथा दु:सहको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप
    • विंशोऽध्याय:
    • गान्धारीद्वारा श्रीकृष्णके प्रति उत्तरा और विराटकुलकी स्त्रियोंके शोक एवं विलापका वर्णन
    • एकविंशोऽध्याय:
    • गान्धारीके द्वारा कर्णको देखकर उसके शौर्य तथा उसकी स्त्रीके विलापका श्रीकृष्णके सम्मुख वर्णन
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • अपनी-अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए अवन्ती-नरेश और जयद्रथको देखकर तथा दु:शलापर दृष्टिपात करके गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • शल्य, भगदत्त, भीष्म और द्रोणको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख गान्धारीका विलाप
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • भूरिश्रवाके पास उसकी पत्नियोंका विलाप, उन सबको तथा शकुनिको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख शोेकोद्‍गार
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • अन्यान्य वीरोंको मरा हुआ देखकर गान्धारीका शोकातुर होकर विलाप करना और क्रोधपूर्वक श्रीकृष्णको यदुवंशविनाशविषयक शाप देना
    • श्राद्धपर्व
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • प्राप्त अनुस्मृतिविद्या और दिव्यदृष्टिके प्रभावसे युधिष्ठिरका महाभारतयुद्धमें मारे गये लोगोंकी संख्या और गतिका वर्णन तथा युधिष्ठिरकी आज्ञासे सबका दाह-संस्कार
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • सभी स्त्री-पुरुषोंका अपने मरे हुए सम्बन्धियोंको जलांजलि देना, कुन्तीका अपने गर्भसे कर्णके जन्म होनेका रहस्य प्रकट करना तथा युधिष्ठिरका कर्णके लिये शोक प्रकट करते हुए उनका प्रेतकृत्य सम्पन्न करना और स्त्रियोंके मनमें रहस्यकी बात न छिपनेका शाप देना
  • +
    शान्तिपर्व
    • राजधर्मानुशासनपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके पास नारद आदि महर्षियाेंका आगमन और युधिष्ठिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका वृत्तान्त पूछना
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • नारदजीका कर्णको शाप प्राप्त होनेका प्रसंग सुनाना
    • तृतीयोऽध्याय:
    • कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • कर्णकी सहायतासे समागत राजाओंको पराजित करके दुर्योधनद्वारा स्वयंवरसे कलिंगराजकी कन्याका अपहरण
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • कर्णके बल और पराक्रमका वर्णन, उसके द्वारा जरासंधकी पराजय और जरासंधका कर्णको अंगदेशमें मालिनी नगरीका राज्य प्रदान करना
    • षष्ठाेऽध्याय:
    • युधिष्ठिरकी चिन्ता, कुन्तीका उन्हें समझाना और स्त्रियोंको युधिष्ठिरका शाप
    • सप्तमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना
    • नवमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय
    • दशमोऽध्याय:
    • भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना
    • एकादशोऽध्याय:
    • अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना
    • द्वादशोऽध्याय:
    • नकुलका गृहस्थ-धर्मकी प्रशंसा करते हुए राजा युधिष्ठिरको समझाना
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • सहदेवका युधिष्ठिरको ममता और आसक्तिसे रहित होकर राज्य करनेकी सलाह देना
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • द्रौपदीका युधिष्ठिरको राजदण्डधारणपूर्वक पृथ्वीका शासन करनेके लिये प्रेरित करना
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन
    • षोडशोऽध्याय:
    • भीमसेनका राजाको भुक्त दु:खोंकी स्मृति कराते हुए मोह छोड़कर मनको काबूमें करके राज्यशासन और यज्ञके लिये प्रेरित करना
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरद्वारा भीमकी बातका विरोध करते हुए मुनिवृत्तिकी और ज्ञानी महात्माओंकी प्रशंसा
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • अर्जुनका राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देते हुए युधिष्ठिरको संन्यास ग्रहण करनेसे रोकना
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरद्वारा अपने मतकी यथार्थताका प्रतिपादन
    • विंशोऽध्याय:
    • मुनिवर देवस्थानका राजा युधिष्ठिरको यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना
    • एकविंशोऽध्याय:
    • देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • क्षत्रियधर्मकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनका पुन: राजा युधिष्ठिरको समझाना
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • व्यासजीका युधिष्ठिरको राजा हयग्रीवका चरित्र सुनाकर उन्हें राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये जोर देना
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • सेनजित् के उपदेशयुक्त उद्‍गारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • व्यासजी तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाराज युधिष्ठिरका नगरमें प्रवेश
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • नगर-प्रवेशके समय पुरवासियों तथा ब्राह्मणोंद्वारा राजा युधिष्ठिरका सत्कार और उनपर आक्षेप करनेवाले चार्वाकका ब्राह्मणोंद्वारा वध
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका श्रीकृष्णद्वारा वर्णन
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका राज्याभिषेक
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • राजा युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रके अधीन रहकर राज्यकी व्यवस्थाके लिये भाइयों तथा अन्य लोगोंको विभिन्न कार्योंपर नियुक्त करना
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • राजा युधिष्ठिर तथा धृतराष्ट्रका युद्धमें मारे गये सगे-सम्बन्धियों तथा अन्य राजाओंके लिये श्राद्धकर्म करना
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • महाराज युधिष्ठिरके दिये हुए विभिन्न भवनोंमें भीमसेन आदि सब भाइयोंका प्रवेश और विश्राम
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवाद, श्रीकृष्णद्वारा भीष्मकी प्रशंसा और युधिष्ठिरको उनके पास चलनेका आदेश
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • परशुरामजीद्वारा होनेवाले क्षत्रियसंहारके विषयमें राजा युधिष्ठिरका प्रश्न
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुन: उत्पन्न होनेकी कथा
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण-प्रभावका सविस्तर वर्णन
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीष्मके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका भीष्मकी प्रशंसा करते हुए उन्हें युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश करनेका आदेश
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना
    • चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मजीकी बातचीत
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीष्मका युधिष्ठिरके गुण कथनपूर्वक उनको प्रश्न करनेका आदेश देना, श्रीकृष्णका उनके लज्जित और भयभीत होनेका कारण बताना और भीष्मका आश्वासन पाकर युधिष्ठिरका उनके समीप जाना
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • वर्ण-धर्मका वर्णन
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • आश्रम-धर्मका वर्णन
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • राजधर्मकी श्रेष्ठताका वर्णन और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • राजधर्मके पालनसे चारों आश्रमोंके धर्मका फल मिलनेका कथन
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी हानि और होनेसे लाभका वर्णन
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • राजाके प्रधान कर्तव्योंका तथा दण्डनीतिके द्वारा युगोंके निर्माणका वर्णन
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • राजाको इहलोक और परलोकमें सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • राजाके लिये सदाचारी विद्वान् पुरोहितकी आवश्यकता तथा प्रजापालनका महत्त्व
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • ब्राह्मण और क्षत्रियके मेलसे लाभका प्रतिपादन करनेवाला मुचुकुन्दका उपाख्यान
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुन: राज्यकी महिमा सुनाना
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • उत्तम-अधम ब्राह्मणोंके साथ राजाका बर्ताव
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये वैश्यवृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा लुटेरोंसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शस्त्र धारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • ऋत्विजोंके लक्षण, यज्ञ और दक्षिणाका महत्त्व तथा तपकी श्रेष्ठता
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद
    • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
    • मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान
    • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
    • सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश
    • चतुरशीतितमोऽध्याय:
    • इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व
    • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
    • राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संघटन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण
    • षडशीतितमोऽध्याय:
    • राजाके निवासयोग्य नगर एवं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश
    • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
    • राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय
    • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
    • प्रजासे कर लेने तथा कोश-संग्रह करनेका प्रकार
    • एकोननवतितमोऽध्याय:
    • राजाके कर्तव्यका वर्णन
    • नवतितमोऽध्याय:
    • उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता
    • एकनवतितमोऽध्याय:
    • उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन
    • द्विनवतितमोऽध्याय:
    • राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश
    • त्रिनवतितमोऽध्याय:
    • वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन
    • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
    • वामदेवके उपदेशमें राजा और राज्यके लिये हितकर बर्ताव
    • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
    • विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन
    • षण्णवतितमोऽध्याय:
    • राजाके छलरहित धर्मयुक्त बर्तावकी प्रशंसा
    • सप्तनवतितमोऽध्याय:
    • शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन
    • अष्टनवतितमोऽध्याय:
    • इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन
    • नवनवतितमोऽध्याय:
    • शूरवीरोंको स्वर्ग और कायरोंको नरककी प्राप्तिके विषयमें मिथिलेश्वर जनकका इतिहास
    • शततमोऽध्याय:
    • सैन्यसंचालनकी रीति-नीतिका वर्णन
    • एकाधिकशततमोऽध्याय:
    • भिन्न-भिन्न देशके योद्धाओंके स्वभाव, रूप, बल, आचरण और लक्षणोंका वर्णन
    • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
    • विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश
    • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद
    • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
    • राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश
    • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
    • कालकवृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्यकी प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन
    • षडधिकशततमोऽध्याय:
    • कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना
    • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
    • गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति
    • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
    • माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व
    • नवाधिकशततमोऽध्याय:
    • सत्य-असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन
    • दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • सदाचार और ईश्वरभक्ति आदिको दु:खोंसे छूटनेका उपाय बताना
    • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा
    • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य
    • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • शक्तिशाली शत्रुके सामने बेंतकी भाँति नतमस्तक होनेका उपदेश—सरिताओं और समुद्रका संवाद
    • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ
    • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा तथा राजसेवकोंके आवश्यक गुण
    • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
    • सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा
    • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुन: कुत्ता हो जाना
    • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ
    • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सेवकोंको उनके योग्य स्थानपर नियुक्त करने, कुलीन और सत्पुरुषोंका संग्रह करने, कोष बढ़ाने तथा सबकी देखभाल करनेके लिये राजाको प्रेरणा
    • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजधर्मका साररूपमें वर्णन
    • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन
    • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन
    • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद
    • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन
    • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना
    • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना
    • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • ऋषभका राजा सुमित्रको वीरद्युम्न और तनु मुनिका वृत्तान्त सुनाना
    • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना
    • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • यम और गौतमका संवाद
    • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • आपत्तिके समय राजाका धर्म
    • आपद्धर्मपर्व
    • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • आपत्तिग्रस्त राजाके कर्तव्यका वर्णन
    • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओंके धर्मका वर्णन तथा धर्मकी गतिको सूक्ष्म बताना
    • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • राजाके लिये कोशसंग्रहकी आवश्यकता, मर्यादाकी स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्तिकी निन्दा
    • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • बलकी महत्ता और पापसे छूटनेका प्रायश्चित्त
    • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्‍गतिका वर्णन
    • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • राजा किसका धन ले और किसका न ले तथा किसके साथ कैसा बर्ताव करे—इसका विचार
    • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • आने वाले संकटसे सावधान रहनेके लिये दूरदर्शी, तत्कालज्ञ और दीर्घसूत्री—इन तीन मत्स्योंका दृष्टान्त
    • अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान
    • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद
    • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश
    • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद
    • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश
    • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना
    • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कबूतरद्वारा अपनी भार्याका गुणगान तथा पतिव्रता स्त्रीकी प्रशंसा
    • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके लिये प्रार्थना
    • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग
    • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • बहेलियेका वैराग्य
    • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कबूतरीका विलाप और अग्निमें प्रवेश तथा उन दोनोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति
    • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • बहेलियेको स्वर्गलोककी प्राप्ति
    • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • इन्द्रोत मुनिका राजा जनमेजयको फटकारना
    • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना
    • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश
    • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • मृतककी पुनर्जीवनप्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता
    • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • नारदजीका सेमल-वृक्षसे प्रशंसापूर्वक प्रश्न
    • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना
    • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • नारदजीकी बात सुनकर वायुका सेमलको धमकाना और सेमलका वायुको तिरस्कृत करके विचारमग्न होना
    • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवान‍्के साथ वैर न करनेका उपदेश
    • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण
    • एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • अज्ञान और लोभको एक दूसरेका कारण बताकर दोनोंकी एकता करना और दोनोंको ही समस्त दोषोंका कारण सिद्ध करना
    • षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य
    • एकषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • तपकी महिमा
    • द्विषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन
    • त्रिषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय
    • चतु:षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • नृशंस अर्थात् अत्यन्त नीच पुरुषके लक्षण
    • पञ्चषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन
    • षट्षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन
    • सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय
    • अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ
    • एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • गौतमका समुद्रकी ओर प्रस्थान और संध्याके समय एक दिव्य बकपक्षीके घरपर अतिथि होना
    • सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश
    • एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना
    • द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना
    • त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • राजधर्मा और गौतमका पुन: जीवित होना
    • मोक्षधर्मपर्व
    • चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन
    • पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश
    • षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश
    • सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति
    • अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • जनककी उक्ति तथा राजा नहुषके प्रश्नोंके उत्तरमें बोध्यगीता
    • एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा
    • अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सद्‍बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद
    • एकाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन
    • द्वॺशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन
    • त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • आकाशसे अन्य चार स्थूल भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन
    • चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन
    • पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन
    • षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • जीवकी सत्तापर नाना प्रकारकी युक्तियोंसे शंका उपस्थित करना
    • सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • जीवकी सत्ता तथा नित्यताको युक्तियोंसे सिद्ध करना
    • अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • वर्णविभागपूर्वक मनुष्योंकी और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन
    • एकोननवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • चारों वर्णोंके अलग-अलग कर्मोंका और सदाचारका वर्णन तथा वैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्ति
    • नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • सत्यकी महिमा, असत्यके दोष तथा लोक और परलोकके सुख-दु:खका विवेचन
    • एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन
    • द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार
    • त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा
    • चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अध्यात्मज्ञानका निरूपण
    • पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • ध्यानयोगका वर्णन
    • षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल
    • सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • जापकमें दोष आनेके कारण उसे नरककी प्राप्ति
    • अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • परमधामके अधिकारी जापकके लिये देवलोक भी नरक-तुल्य हैं—इसका प्रतिपादन
    • नवनवत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन
    • द्विशततमोऽध्याय:
    • जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता
    • एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण
    • द्वॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय
    • त्र्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन
    • चतुरधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय तथा महत्त्व
    • पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • परब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय
    • षडधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति
    • सप्ताधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा उनकी महिमाका कथन
    • अष्टाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंके वंशका तथा प्रत्येक दिशामें निवास करनेवाले महर्षियोंका वर्णन
    • नवाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान् की स्तुति
    • दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन
    • एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • संसारचक्र और जीवात्माकी स्थितिका वर्णन
    • द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • निषिद्ध आचरणके त्याग, सत्त्व, रज और तमके कार्य एवं परिणामका तथा सत्त्वगुणके सेवनका उपदेश
    • त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जीवोत्पत्तिका वर्णन करते हुए दोषों और बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिये विषयासक्तिके त्यागका उपदेश
    • चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति
    • पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश
    • षोडशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें मनकी स्थिति तथा गुणातीत ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय
    • सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन
    • अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन
    • एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान
    • विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन
    • एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन
    • द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना
    • त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • इन्द्र और बलिका संवाद—इन्द्रके आक्षेपयुक्त वचनोंका बलिके द्वारा कठोर प्रत्युत्तर
    • चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना
    • पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • इन्द्र और लक्ष्मीका संवाद, बलिको त्यागकर आयी हुई लक्ष्मीकी इन्द्रके द्वारा प्रतिष्ठा
    • षड्‍‍विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • इन्द्र और नमुचिका संवाद
    • सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन
    • अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना
    • एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जैगीषव्यका असित-देवलको समत्वबुद्धिका उपदेश
    • त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवाद—नारदजीकी लोकप्रियताके हेतुभूत गुणोंका वर्णन
    • एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कालका स्वरूप बताना
    • द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश
    • त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मप्रलय एवं महाप्रलयका वर्णन
    • चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन
    • पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणके कर्तव्यका प्रतिपादन करते हुए कालरूप नदको पार करनेका उपाय बतलाना
    • षट्‍‍त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति
    • सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन
    • अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व
    • एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ज्ञानका साधन और उसकी महिमा
    • चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • योगसे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन
    • एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन
    • द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य-आश्रमका वर्णन
    • त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणोंके उपलक्षणसे गार्हस्थ्य-धर्मका वर्णन
    • चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन
    • पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा
    • षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय
    • सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन
    • अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विवेक
    • एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ज्ञानके साधन तथा ज्ञानीके लक्षण और महिमा
    • पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार-नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति
    • एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणके लक्षण और परब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय
    • द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शरीरमें पञ्चभूतोंके कार्य और गुणोंकी पहचान
    • त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे भिन्न जीवात्माका और परमात्माका योगके द्वारा साक्षात्कार करनेका प्रकार
    • चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन
    • पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पञ्चभूतोंके तथा मन और बुद्धिके गुणोंका विस्तृत वर्णन
    • षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका मृत्युविषयक प्रश्न, नारदजीका राजा अकम्पनसे मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाते हुए ब्रह्माजीकी रोषाग्निसे प्रजाके दग्ध होनेका वर्णन
    • सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति
    • अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना
    • एकोनषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय
    • षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना
    • एकषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना
    • द्विषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद
    • त्रिषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश
    • चतु:षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जाजलिको पक्षियोंका उपदेश
    • पञ्चषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा
    • षट्षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा
    • सप्तषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • द्युमत्सेन और सत्यवान‍्का संवाद—अहिंसापूर्वक राज्यशासनकी श्रेष्ठताका कथन
    • अष्टषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण
    • एकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद
    • सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन
    • एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा
    • द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा
    • त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर
    • चतु:सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • मोक्षके साधनका वर्णन
    • पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असितदेवलका संवाद
    • षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद
    • सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद
    • अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • हारीत मुनिके द्वारा प्रतिपादित संन्यासीके स्वभाव, आचरण और धर्मोंका वर्णन
    • एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ
    • अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण
    • एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन
    • द्वॺशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • वृत्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन
    • त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप
    • चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा
    • पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन
    • षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन
    • सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश
    • अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • अरिष्टनेमिका राजा सगरको वैराग्योत्पादक मोक्षविषयक उपदेश
    • एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • भृगुपुत्र उशनाका चरित्र और उन्हें शुक्र नामकी प्राप्ति
    • नवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराशरगीताका आरम्भ—पराशर मुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तिके साधनका उपदेश
    • एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ
    • द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ
    • त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराशरगीता—शूद्रके लिये सेवावृत्तिकी प्रधानता, सत्संगकी महिमा और चारों वर्णोंके धर्मपालनका महत्त्व
    • चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश
    • पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश
    • षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन
    • सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराशरगीता—नाना प्रकारके धर्म और कर्तव्योंका उपदेश
    • अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर
    • नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:
    • हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश
    • त्रिशततमोऽध्याय:
    • सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन
    • एकाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन
    • द्वॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • वसिष्ठ और करालजनकका संवाद—क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति
    • त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना
    • चतुरधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • प्रकृतिके संसर्गदोषसे जीवका पतन
    • पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर
    • षडधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति
    • सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन
    • अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार
    • नवाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • जनकवंशी वसुमान‍्को एक मुनिका धर्मविषयक उपदेश
    • दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • याज्ञवल्क्यका राजा जनकको उपदेश—सांख्यमतके अनुसार चौबीस तत्त्वों और नौ प्रकारके सर्गोंका निरूपण
    • एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार, मन और विषयोंकी कालसंख्याका एवं सृष्टिका वर्णन तथा इन्द्रियोंमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन
    • द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • संहारक्रमका वर्णन
    • त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा सात्त्विक, राजस और तामस भावोंके लक्षण
    • चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • सात्त्विक, राजस और तामस प्रकृतिके मनुष्योंकी गतिका वर्णन तथा राजा जनकके प्रश्न
    • पञ्चदशाधिकत्रिशततमोध्याय:
    • प्रकृति-पुरुषका विवेक और उसका फल
    • षोडशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति
    • सप्तदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • विभिन्न अंगोंसे प्राणोंके उत्क्रमणका फल तथा मृत्युसूचक लक्षणोंका वर्णन और मृत्युको जीतनेका उपाय
    • अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना
    • एकोनविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • जरा-मृत्युका उल्लंघन करनेके विषयमें पञ्चशिख और राजा जनकका संवाद
    • विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना
    • एकविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना
    • द्वाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन
    • त्रयोविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीकी पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या और भगवान् शंकरसे वरप्राप्ति
    • चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त
    • पञ्चविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना
    • षड्‍‍विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन
    • सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • शुकदेवजीका पिताके पास लौट आना तथा व्यासजीका अपने शिष्योंको स्वाध्यायकी विधि बताना
    • अष्टाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • शिष्योंके जानेके बाद व्यासजीके पास नारदजीका आगमन और व्यासजीको वेदपाठके लिये प्रेरित करना तथा व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण बताते हुए ‘प्रवह’ आदि सात वायुओंका परिचय देना
    • एकोनत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश
    • त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • शुकदेवको नारदजीका सदाचार और अध्यात्मविषयक उपदेश
    • एकत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय
    • द्वात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन
    • त्रयस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • शुकदेवजीकी परमपद-प्राप्ति तथा पुत्र-शोकसे व्याकुल व्यासजीको महादेवजीका आश्वासन देना
    • चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • बदरिकाश्रममें नारदजीके पूछनेपर भगवान् नारायणका परमदेव परमात्माको ही सर्वश्रेष्ठ पूजनीय बताना
    • पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग
    • षट्‍‍त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान् की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना
    • सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा
    • अष्टत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नारदजीका दो सौ नामोंद्वारा भगवान् की स्तुति करना
    • एकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य
    • चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना
    • एकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना
    • द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय
    • त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना
    • चतुश्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना
    • पञ्चचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना
    • षट्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नारायणकी महिमासम्बन्धी उपाख्यानका उपसंहार
    • सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन
    • अष्टचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा
    • एकोनपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा
    • पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • वैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मा और रुद्रका मिलन एवं ब्रह्माजीद्वारा परम पुरुष नारायणकी महिमाका वर्णन
    • एकपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्मा और रुद्रके संवादमें नारायणकी महिमाका विशेषरूपसे वर्णन
    • द्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नारदके द्वारा इन्द्रको उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणकी कथा सुनानेका उपक्रम
    • त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • महापद्मपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन
    • चतु:पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन
    • पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • अतिथिद्वारा नागराज पद्मनाभके सदाचार और सद्‍गुणोंका वर्णन तथा ब्राह्मणको उसके पास जानेके लिये प्रेरणा
    • षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • अतिथिके वचनोंसे संतुष्ट होकर ब्राह्मणका उसके कथनानुसार नागराजके घरकी ओर प्रस्थान
    • सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नागपत्नीके द्वारा ब्राह्मणका सत्कार और वार्तालापके बाद ब्राह्मणके द्वारा नागराजके आगमनकी प्रतीक्षा
    • अष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या तथा नागराजके परिवारवालोंका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना
    • एकोनषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध
    • षष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना
    • एकषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नागराज और ब्राह्मणका परस्पर मिलन तथा बातचीत
    • द्विषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नागराजका ब्राह्मणके पूछनेपर सूर्यमण्डलकी आश्चर्यजनक घटनाओंको सुनाना
    • त्रिषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • उञ्छ एवं शिलवृत्तिसे सिद्ध हुए पुरुषकी दिव्य गति
    • चतु:षष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणका नागराजसे बातचीत करके और उञ्छव्रतके पालनका निश्चय करके अपने घरको जानेके लिये नागराजसे विदा माँगना
    • पञ्चषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:
    • नागराजसे विदा ले ब्राह्मणका च्यवनमुनिसे उञ्छवृत्तिकी दीक्षा लेकर साधनपरायण होना और इस कथाकी परम्पराका वर्णन
    • महाभारत-सार
  • +
    अनुशासनपर्व
    • दान-धर्म-पर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना
    • तृतीयोऽध्याय:
    • विश्वामित्रको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति कैसे हुई—इस विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • आजमीढके वंशका वर्णन तथा विश्वामित्रके जन्मकी कथा और उनके पुत्रोंके नाम
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • स्वामिभक्त एवं दयालु पुरुषकी श्रेष्ठता बतानेके लिये इन्द्र और तोतेके संवादका उल्लेख
    • षष्ठोऽध्याय:
    • दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन
    • सप्तमोऽध्याय:
    • कर्मोंके फलका वर्णन
    • अष्टमोऽध्याय:
    • श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी महिमा
    • नवमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा
    • दशमोऽध्याय:
    • अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा
    • एकादशोऽध्याय:
    • लक्ष्मीके निवास करने और न करने योग्य पुरुष, स्त्री और स्थानोंका वर्णन
    • द्वादशोऽध्याय:
    • कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • शरीर, वाणी और मनसे होनेवाले पापोंके परित्यागका उपदेश
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • शिव और पार्वतीका श्रीकृष्णको वरदान और उपमन्युके द्वारा महादेवजीकी महिमा
    • षोडशोऽध्याय:
    • उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • शिवसहस्रनामके पाठकी महिमा तथा ऋषियोंका भगवान‍् शंकरकी कृपासे अभीष्ट सिद्धि होनेके विषयमें अपना-अपना अनुभव सुनाना और श्रीकृष्णके द्वारा भगवान‍् शिवजीकी महिमाका वर्णन
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद
    • विंशोऽध्याय:
    • अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवाद
    • एकविंशोऽध्याय:
    • अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवाद, अष्टावक्रका अपने घर लौटकर वदान्य ऋषिकी कन्याके साथ विवाह करना
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • ब्रह्महत्याके समान पापोंका निरूपण
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • ब्राह्मणत्वके लिये तपस्या करनेवाले मतङ्गकी इन्द्रसे बातचीत
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेका आग्रह छोड़कर दूसरा वर माँगनेके लिये इन्द्रका मतङ्गको समझाना
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • मतङ्गकी तपस्या और इन्द्रका उसे वरदान देना
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर-सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • राजर्षि वृषदर्भ (या उशीनर)-के द्वारा शरणागत कपोतकी रक्षा तथा उस पुण्यके प्रभावसे अक्षयलोककी प्राप्ति
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • ब्राह्मणके महत्त्वका वर्णन
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी प्रशंसा
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • ब्रह्माजीके द्वारा ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • ब्राह्मणकी प्रशंसाके विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवाद
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • दानपात्रकी परीक्षा
    • अष्टत्रिंशोऽध्याय:
    • पञ्चचूड़ा अप्सराका नारदजीसे स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन करना
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • स्त्रियोंकी रक्षाके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • कन्या-विवाहके सम्बन्धमें पात्रविषयक विभिन्न विचार
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • कन्याके विवाहका तथा कन्या और दौहित्र आदिके उत्तराधिकारका विचार
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • स्त्रियोंके वस्त्राभूषणोंसे सत्कार करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • ब्राह्मण आदि वर्णोंकी दायभाग-विधिका वर्णन
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • नाना प्रकारके पुत्रोंका वर्णन
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सद्‍गति
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • राजा कुशिक और उनकी रानीके द्वारा महर्षि च्यवनकी सेवा
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना
    • चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • च्यवन ऋषिका भृगुवंशी और कुशिकवंशियोंके सम्बन्धका कारण बताकर तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • विविध प्रकारके तप और दानोंका फल
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • जलाशय बनानेका तथा बगीचे लगानेका फल
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान‍्को दान देनेका विशेष फल
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • अन्नदानका विशेष माहात्म्य
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • विभिन्न नक्षत्रोंके योगमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके दानका माहात्म्य
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • सुवर्ण और जल आदि विभिन्न वस्तुओंके दानकी महिमा
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • अन्न और जलके दानकी महिमा
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य—धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • गोदानकी महिमा तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षासे पुण्यकी प्राप्ति
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे होने वाली हानिके विषयमें दृष्टान्तके रूपमें राजा नृगका उपाख्यान
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • गौओंके लोक और गोदानविषयक युधिष्ठिर और इन्द्रके प्रश्न
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • गोदानकी विधि, गौओंसे प्रार्थना, गौओंके निष्क्रय और गोदान करनेवाले नरेशोंके नाम
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • वसिष्ठका सौदासको गोदानकी विधि एवं महिमा बताना
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • गौओंको तपस्याद्वारा अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उनके दानकी महिमा, विभिन्न प्रकारके गौओंके दानसे विभिन्न उत्तम लोकोंमें गमनका कथन
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • गौओं तथा गोदानकी महिमा
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन
    • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
    • लक्ष्मी और गौओंका संवाद तथा लक्ष्मीकी प्रार्थनापर गौओंके द्वारा गोबर और गोमूत्रमें लक्ष्मीको निवासके लिये स्थान दिया जाना
    • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
    • ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना
    • चतुरशीतितमोऽध्याय:
    • भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना
    • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
    • ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध
    • षडशीतितमोऽध्याय:
    • कार्तिकेयकी उत्पत्ति, पालन-पोषण और उनका देवसेनापति-पदपर अभिषेक, उनके द्वारा तारकासुरका वध
    • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
    • विविध तिथियोंमें श्राद्ध करनेका फल
    • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
    • श्राद्धमें पितरोंके तृप्तिविषयका वर्णन
    • एकोननवतितमोऽध्याय:
    • विभिन्न नक्षत्रोंमें श्राद्ध करनेका फल
    • नवतितमोऽध्याय:
    • श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन
    • एकनवतितमोऽध्याय:
    • शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन
    • द्विनवतितमोऽध्याय:
    • पितर और देवताओंका श्राद्धान्नसे अजीर्ण होकर ब्रह्माजीके पास जाना और अग्निके द्वारा अजीर्णका निवारण, श्राद्धसे तृप्त हुए पितरोंका आशीर्वाद
    • त्रिनवतितमोऽध्याय:
    • गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत
    • चतुर्नवतितमोऽध्याय:
    • ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना
    • पञ्चनवतितमोऽध्याय:
    • छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप
    • षण्णवतितमोऽध्याय:
    • छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानकी प्रशंसा
    • सप्तनवतितमोऽध्याय:
    • गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान‍् श्रीकृष्णका संवाद
    • अष्टनवतितमोऽध्याय:
    • तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य
    • नवनवतितमोऽध्याय:
    • नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत
    • शततमोऽध्याय:
    • नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा
    • एकाधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति
    • द्वॺधिकशततमोऽध्याय:
    • भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख
    • त्र्यधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा
    • चतुरधिकशततमोऽध्याय:
    • आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण
    • पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:
    • बड़े और छोटे भाईके पारस्परिक बर्ताव तथा माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंके गौरवका वर्णन
    • षडधिकशततमोऽध्याय:
    • मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन
    • सप्ताधिकशततमोऽध्याय:
    • दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन
    • अष्टाधिकशततमोऽध्याय:
    • मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता
    • नवाधिकशततमोऽध्याय:
    • प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको उपवास और भगवान‍् विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य
    • दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन
    • एकादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
    • द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • पापसे छूटनेके उपाय तथा अन्नदानकी विशेष महिमा
    • त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान
    • चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:
    • हिंसा और मांसभक्षणकी घोर निन्दा
    • पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन
    • षोडशाधिकशततमोऽध्याय:
    • मांस न खानेसे लाभ और अहिंसाधर्मकी प्रशंसा
    • सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:
    • शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना
    • अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:
    • कीड़ेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना
    • एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • कीड़ेका ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेकर ब्रह्मलोकमें जाकर सनातनब्रह्मको प्राप्त करना
    • विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • व्यास और मैत्रेयका संवाद—दानकी प्रशंसा और कर्मका रहस्य
    • एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • व्यास-मैत्रेय-संवाद—विद्वान् एवं सदाचारी ब्राह्मणको अन्नदानकी प्रशंसा
    • द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • व्यास-मैत्रेय-संवाद—तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश
    • त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • शाण्डिली और सुमनाका संवाद—पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्यका वर्णन
    • चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना
    • पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद
    • षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन
    • सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन
    • अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:
    • वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन
    • एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • लोमशद्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन
    • त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन
    • एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • प्रमथगणोंके द्वारा धर्माधर्मसम्बन्धी रहस्यका कथन
    • द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दिग्गजोंका धर्मसम्बन्धी रहस्य एवं प्रभाव
    • त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • महादेवजीका धर्मसम्बन्धी रहस्य
    • चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • स्कन्ददेवका धर्मसम्बन्धी रहस्य तथा भगवान‍् विष्णु और भीष्मजीके द्वारा माहात्म्यका वर्णन
    • पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य है और जिनका ग्रहण करने योग्य नहीं है, उन मनुष्योंका वर्णन
    • षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त
    • सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन
    • अष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • पाँच प्रकारके दानोंका वर्णन
    • एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना
    • चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना
    • एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण
    • द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा
    • त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन
    • चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन
    • पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन
    • षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन
    • सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • वंशपरम्पराका कथन और भगवान‍् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन
    • अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना
    • एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
    • पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे-शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन-माहात्म्य तथा गायत्रीजपका फल
    • एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन
    • द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजी से चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख
    • त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • वायुद्वारा उदाहरणसहित ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन
    • चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्यके प्रभावका वर्णन
    • पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन
    • षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • अत्रि और च्यवन ऋषिके प्रभावका वर्णन
    • सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका उपसंहार
    • अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मजीके द्वारा भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन
    • एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना
    • षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णद्वारा भगवान‍् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन
    • एकषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • भगवान‍् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन
    • द्विषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण
    • त्रिषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका विद्या, बल और बुद्धिकी अपेक्षा भाग्यकी प्रधानता बताना और भीष्मजीद्वारा उसका उत्तर
    • चतु:षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना
    • पञ्चषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • नित्यस्मरणीय देवता, नदी, पर्वत, ऋषि और राजाओंके नाम-कीर्तनका माहात्म्य
    • षट्षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मकी अनुमति पाकर युधिष्ठिरका सपरिवार हस्तिनापुरको प्रस्थान
    • भीष्मस्वर्गारोहणपर्व
    • सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मके अन्त्येष्टि-संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देहत्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना
    • अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:
    • भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह-संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना
  • +
    आश्वमेधिकपर्व
    • अश्वमेधपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका शोकमग्न होकर गिरना और धृतराष्ट्रका उन्हें समझाना
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • श्रीकृष्ण और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना
    • तृतीयोऽध्याय:
    • व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • इन्द्रकी प्रेरणासे बृहस्पतिजीका मनुष्यको यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा करना
    • षष्ठोऽध्याय:
    • नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्तिके अनुसार संवर्तसे भेंट करना
    • सप्तमोऽध्याय:
    • संवर्त और मरुत्तकी बातचीत, मरुत्तके विशेष आग्रहपर संवर्तका यज्ञ करानेकी स्वीकृति देना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना
    • नवमोऽध्याय:
    • बृहस्पतिका इन्द्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना, इन्द्रकी आज्ञासे अग्निदेवका मरुत्तके पास उनका संदेश लेकर जाना और संवर्तके भयसे पुन: लौटकर इन्द्रसे ब्रह्मबलकी श्रेष्ठता बताना
    • दशमोऽध्याय:
    • इन्द्रका गन्धर्वराजको भेजकर मरुत्तको भय दिखाना और संवर्तका मन्त्रबलसे इन्द्रसहित सब देवताओंको बुलाकर मरुत्तका यज्ञ पूर्ण करना
    • एकादशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको इन्द्रद्वारा शरीरस्थ वृत्रासुरका संहार करनेका इतिहास सुनाकर समझाना
    • द्वादशोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको मनपर विजय करनेके लिये आदेश
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम-गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्मराज्यका वर्णन
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना
    • अनुगीतापर्व
    • षोडशोऽध्याय:
    • अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • काश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • जीवके गर्भ-प्रवेश,आचार-धर्म, कर्म-फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन
    • विंशोऽध्याय:
    • ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना
    • एकविंशोऽध्याय:
    • दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • मन-बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन-इन्द्रिय-संवादका वर्णन
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • प्राण, अपान आदिका संवाद और ब्रह्माजीका सबकी श्रेष्ठता बतलाना
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • चातुर्होम यज्ञका वर्णन
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • अन्तर्यामीकी प्रधानता
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • अध्यात्मविषयक महान् वनका वर्णन
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद*
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय-कुलका संहार
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • अलर्कके ध्यानयोगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • ब्राह्मणरूपधारी धर्म और जनकका ममत्वत्यागविषयक संवाद
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • ब्राह्मणका पत्नीके प्रति अपने ज्ञाननिष्ठ स्वरूपका परिचय देना
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मणगीताका उपसंहार
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • ब्रह्माजीके द्वारा तमोगुणका, उसके कार्यका और फलका वर्णन
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • रजोगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन
    • चत्वारिंशोऽध्याय:
    • महत्तत्त्वके नाम और परमात्मतत्त्वको जाननेकी महिमा
    • एकचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अहंकारकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका वर्णन
    • द्विचत्वारिंशोऽध्याय:
    • अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश
    • त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:
    • चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता
    • चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • सब पदार्थोंके आदि-अन्तका और ज्ञानकी नित्यताका वर्णन
    • पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:
    • देहरूपी कालचक्रका तथा गृहस्थ और ब्राह्मणके धर्मका कथन
    • षट्चत्वारिंशोऽध्याय:
    • ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन
    • सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:
    • मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन
    • अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:
    • आत्मा और परमात्माके स्वरूपका विवेचन
    • एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • धर्मका निर्णय जाननेके लिये ऋषियोंका प्रश्न
    • पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन
    • एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार
    • द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ हस्तिनापुर जाना और वहाँ सबसे मिलकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले सुभद्राके साथ द्वारकाको प्रस्थान करना
    • त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तङ्क मुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना
    • चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना
    • पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना
    • षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना
    • सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना
    • अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
    • कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना
    • एकोनषष्टितमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्णका द्वारकामें जाकर रैवतक पर्वतपर महोत्सवमें सम्मिलित होना और सबसे मिलना
    • षष्टितमोऽध्याय:
    • वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत-युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना
    • एकषष्टितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका सुभद्राके कहनेसे वसुदेवजीको अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनाना
    • द्विषष्टितमोऽध्याय:
    • वसुदेव आदि यादवोंका अभिमन्युके निमित्त श्राद्ध करना तथा व्यासजीका उत्तरा और अर्जुनको समझाकर युधिष्ठिरको अश्वमेधयज्ञ करनेकी आज्ञा देना
    • त्रिषष्टितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना
    • चतु:षष्टितमोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका हिमालयपर पहुँचकर वहाँ पड़ाव डालना और रातमें उपवासपूर्वक निवास करना
    • पञ्चषष्टितमोऽध्याय:
    • ब्राह्मणोंकी आज्ञासे भगवान‍् शिव और उनके पार्षद आदिकी पूजा करके युधिष्ठिरका उस धनराशिको खुदवाकर अपने साथ ले जाना
    • षट्षष्टितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें आगमन और उत्तराके मृत बालककोजिलानेके लियेकुन्तीकी उनसे प्रार्थना
    • सप्तषष्टितमोऽध्याय:
    • परीक्षित् को जिलानेके लिये सुभद्राकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना
    • अष्टषष्टितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णका प्रसूतिकागृहमें प्रवेश, उत्तराका विलाप और अपने पुत्रको जीवित करनेके लिये प्रार्थना
    • एकोनसप्ततितमोऽध्याय:
    • उत्तराका विलाप और भगवान‍् श्रीकृष्णका उसके मृत बालकको जीवन-दान देना
    • सप्ततितमोऽध्याय:
    • श्रीकृष्णद्वारा राजा परिक्षित् का नामकरण तथा पाण्डवोंका हस्तिनापुरके समीप आगमन
    • एकसप्ततितमोऽध्याय:
    • भगवान‍् श्रीकृष्ण और उनके साथियोंद्वारा पाण्डवोंका स्वागत, पाण्डवोंका नगरमें आकर सबसे मिलना और व्यासजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको यज्ञके लिये आज्ञा देना
    • द्विसप्ततितमोऽध्याय:
    • व्यासजीकी आज्ञासे अश्वकी रक्षाके लिये अर्जुनकी, राज्य और नगरकी रक्षाके लिये भीमसेन और नकुलकी तथा कुटुम्ब-पालनके लिये सहदेवकी नियुक्ति
    • त्रिसप्ततितमोऽध्याय:
    • सेनासहित अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरण
    • चतु:सप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय
    • पञ्चसप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका प्राग्ज्योतिषपुरके राजा वज्रदत्तके साथ युद्ध
    • षट्सप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनके द्वारा वज्रदत्तकी पराजय
    • सप्तसप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध
    • अष्टसप्ततितमोऽध्याय:
    • अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दु:शलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति
    • एकोनाशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध एवं अर्जुनकी मृत्यु
    • अशीतितमोऽध्याय:
    • चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्‍गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुन: जीवित होना
    • एकाशीतितमोऽध्याय:
    • उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुन: अश्वके पीछे जाना
    • द्वॺशीतितमोऽध्याय:
    • मगधराज मेघसन्धिकी पराजय
    • त्र्यशीतितमोऽध्याय:
    • दक्षिण और पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें होते हुए अश्वका द्वारका, पञ्चनद एवं गान्धार देशमें प्रवेश
    • चतुरशीतितमोऽध्याय:
    • शकुनिपुत्रकी पराजय
    • पञ्चाशीतितमोऽध्याय:
    • यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना
    • षडशीतितमोऽध्याय:
    • राजा युधिष्ठिरका भीमसेनको राजाओंकी पूजा करनेका आदेश और श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे अर्जुनका संदेश कहना
    • सप्ताशीतितमोऽध्याय:
    • अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्राङ्गदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन
    • अष्टाशीतितमोऽध्याय:
    • उलूपी और चित्राङ्गदाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न-आभूषण आदिसे सत्कार तथा अश्वमेध-यज्ञका आरम्भ
    • एकोननवतितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना
    • नवतितमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना
    • एकनवतितमोऽध्याय:
    • हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा
    • द्विनवतितमोऽध्याय:
    • महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा
    • वैष्णवधर्म-पर्व
    • युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन
    • चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय
    • व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्त्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्मणकी महिमा
    • बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन
    • यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय
    • जल-दान, अन्न-दान और अतिथि-सत्कारका माहात्म्य
    • भूमि-दान, तिल-दान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा
    • अनेक प्रकारके दानोंकी महिमा
    • पञ्चमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान‍् के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन
    • कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद
    • कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन
    • ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन
    • धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार, दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्न-दानकी प्रशंसा
    • भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध
    • आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन
    • अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन
    • चान्द्रायण-व्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन
    • सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति
    • विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त
    • उत्तम और अधम ब्राह्मणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा
    • भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन
  • +
    आश्रमवासिकपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • भाइयोंसहित युधिष्ठिर तथा कुन्ती आदि देवियोंके द्वारा धृतराष्ट्र और गान्धारीकी सेवा
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव
    • तृतीयोऽध्याय:
    • राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • व्यासजीके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रके द्वारा युधिष्ठिरको राजनीतिका उपदेश
    • षष्ठोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रद्वारा राजनीतिका उपदेश
    • सप्तमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके द्वारा राजनीतिका उपदेश
    • अष्टमोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना
    • नवमोऽध्याय:
    • प्रजाजनोंसे धृतराष्ट्रकी क्षमा-प्रार्थना
    • दशमोऽध्याय:
    • प्रजाकी ओरसे साम्ब नामक ब्राह्मणका धृतराष्ट्रको सान्त्वनापूर्ण उत्तर देना
    • एकादशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध
    • द्वादशोऽध्याय:
    • अर्जुनका भीमको समझाना और युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना
    • त्रयोदशोऽध्याय:
    • विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरका उदारतापूर्ण उत्तर सुनाना
    • चतुर्दशोऽध्याय:
    • राजा धृतराष्ट्रके द्वारा मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध एवं विशाल दान-यज्ञका अनुष्ठान
    • पञ्चदशोऽध्याय:
    • गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका वनको प्रस्थान
    • षोडशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना
    • सप्तदशोऽध्याय:
    • कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर
    • अष्टादशोऽध्याय:
    • पाण्डवोंका स्त्रियोंसहित निराश लौटना, कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका मार्गमें गंगातटपर निवास करना
    • एकोनविंशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र आदिका गङ्गातटपर निवास करके वहाँसे कुरुक्षेत्रमें जाना और शतयूपके आश्रमपर निवास करना
    • विंशोऽध्याय:
    • नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तप:सिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना
    • एकविंशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र आदिके लिये पाण्डवों तथा पुरवासियोंकी चिन्ता
    • द्वाविंशोऽध्याय:
    • माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान
    • त्रयोविंशोऽध्याय:
    • सेनासहित पाण्डवोंकी यात्रा और उनका कुरुक्षेत्रमें पहुँचना
    • चतुर्विंशोऽध्याय:
    • पाण्डवों तथा पुरवासियोंका कुन्ती, गान्धारी और धृतराष्ट्रके दर्शन करना
    • पञ्चविंशोऽध्याय:
    • संजयका ऋषियोंसे पाण्डवों, उनकी पत्नियों तथा अन्यान्य स्त्रियोंका परिचय देना
    • षड्‍‍विंशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश
    • सप्तविंशोऽध्याय:
    • युधिष्ठिर आदिका ऋषियोंके आश्रम देखना, कलश आदि बाँटना और धृतराष्ट्रके पास आकर बैठना, उन सबके पास अन्यान्य ऋषियोंसहित महर्षि व्यासका आगमन
    • अष्टाविंशोऽध्याय:
    • महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना
    • पुत्रदर्शनपर्व
    • एकोनत्रिंशोऽध्याय:
    • धृतराष्ट्रका मृत बान्धवोंके शोकसे दुखी होना तथा गान्धारी और कुन्तीका व्यासजीसे अपने मरे हुए पुत्रोंके दर्शन करनेका अनुरोध
    • त्रिंशोऽध्याय:
    • कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना
    • एकत्रिंशोऽध्याय:
    • व्यासजीके द्वारा धृतराष्ट्र आदिके पूर्वजन्मका परिचय तथा उनके कहनेसे सब लोगोंका गङ्गा-तटपर जाना
    • द्वात्रिंशोऽध्याय:
    • व्यासजीके प्रभावसे कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये कौरव-पाण्डववीरोंका गङ्गाजीके जलसे प्रकट होना
    • त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:
    • परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा
    • चतुस्त्रिंशोऽध्याय:
    • मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान
    • पञ्चत्रिंशोऽध्याय:
    • व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना
    • षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:
    • व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना
    • नारदागमनपर्व
    • सप्तत्रिंशोऽध्याय:
    • नारदजीसे धृतराष्ट्र आदिके दावानलमें दग्ध हो जानेका हाल जानकर युधिष्ठिर आदिका शोक करना
    • अष्टात्रिंशोऽध्याय:
    • नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन
    • एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:
    • राजा युधिष्ठिरद्वारा धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती—इन तीनोंकी हड्डियोंको गङ्गामें प्रवाहित कराना तथा श्राद्धकर्म करना
  • +
    मौसलपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका अपशकुन देखना, यादवोंके विनाशका समाचार सुनना, द्वारकामें ऋषियोंके शापवश साम्बके पेटसे मूसलकी उत्पत्ति तथा मदिराके निषेधकी कठोर आज्ञा
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • द्वारकामें भयंकर उत्पात देखकर भगवान‍् श्रीकृष्णका यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये आदेश देना
    • तृतीयोऽध्याय:
    • कृतवर्मा आदि समस्त यादवोंका परस्पर संहार
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • दारुकका अर्जुनको सूचना देनेके लिये हस्तिनापुर जाना, बभ्रुका देहावसान एवं बलराम और श्रीकृष्णका परमधाम-गमन
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • अर्जुनका द्वारकामें आना और द्वारका तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंकी दशा देखकर दुखी होना
    • षष्ठोऽध्याय:
    • द्वारकामें अर्जुन और वसुदेवजीकी बातचीत
    • सप्तमोऽध्याय:
    • वसुदेवजी तथा मौसलयुद्धमें मरे हुए यादवोंका अन्त्येष्टि संस्कार करके अर्जुनका द्वारकावासी स्त्री-पुरुषोंको अपने साथ ले जाना, समुद्रका द्वारकाको डुबो देना और मार्गमें अर्जुनपर डाकुओंका आक्रमण, अवशिष्ट यादवोंको अपनी राजधानीमें बसा देना
    • अष्टमोऽध्याय:
    • अर्जुन और व्यासजीकी बातचीत
  • +
    महाप्रस्थानिकपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • वृष्णिवंशियोंका श्राद्ध करके प्रजाजनोंकी अनुमति ले द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना
    • तृतीयोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना
  • +
    स्वर्गारोहणपर्व
    • प्रथमोऽध्याय:
    • स्वर्गमें नारद और युधिष्ठिरकी बातचीत
    • द्वितीयोऽध्याय:
    • देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना
    • तृतीयोऽध्याय:
    • इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना
    • चतुर्थोऽध्याय:
    • युधिष्ठिरका दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण, अर्जुन आदिका दर्शन करना
    • पञ्चमोऽध्याय:
    • भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य
    • महाभारतश्रवणविधि:
    • माहात्म्य, कथा सुननेकी विधि और उसका फल
    • महाभारत-माहात्म्य
    • सम्पूर्ण महाभारतकी श्लोकसंख्या (अनुष्टुप् छन्दके अनुसार)
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