॥ श्रीहरि:॥

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कल्याण प्राप्ति के उपाय

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

यह पुस्तक कुछ लेखोंका संग्रह है। श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीभगवन्नामके प्रभावसे मैंने जो कुछ समझा है, उसीका कुछ भाव इन लेखोंमें दिखलानेकी चेष्टा की गयी है। इस पुस्तकसे यदि किसी पाठकके चित्तमें तनिक भी ज्ञान, वैराग्य और सदाचारका संचार होगा, तनिक-सी भी भगवद्भक्तिकी भावना उत्पन्न होगी और मनके गम्भीर प्रश्नोंमें दो-एकका भी समाधान होगा तो बड़े आनन्दकी बात है।
- श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • विनय
  • ज्ञानीकी अनिर्वचनीय स्थिति
  • ज्ञानकी दुर्लभता
  • भ्रम अनादि और सान्त है
  • निराकार-साकार-तत्त्व
  • कल्याणका तत्त्व
  • कल्याण-प्राप्तिके उपाय
  • +
    भगवान् क्या हैं?
    • ध्यान कैसे करना चाहिये?
    • ध्यानकी दूसरी विधि
    • भक्तोंके लिये भगवान् साकार कैसे बनते हैं?
    • भगवान् गुणातीत हैं, बुरे-भले सभी गुणोंसे युक्त हैं और केवल सद्गुणसम्पन्न हैं
    • भगवान् का स्वरूप और निराकार-साकारकी एकता
  • +
    त्यागसे भगवत्-प्राप्ति
    • (१) निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग।
    • (२) काम्य कर्मोंका त्याग।
    • (३) तृष्णाका सर्वथा त्याग।
    • (४) स्वार्थके लिये दूसरोंसे सेवा करानेका त्याग।
    • (५) सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंमें आलस्य और फलकी इच्छाका सर्वथा त्याग।
    • (क) ईश्वर-भक्तिमें आलस्यका त्याग।
    • (ख) ईश्वर-भक्तिमें कामनाका त्याग।
    • (ग) देवताओंके पूजनमें आलस्य और कामनाका त्याग।
    • (घ) माता-पितादि गुरुजनोंकी सेवामें आलस्य और कामनाका त्याग।
    • (ङ) यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कर्मोंमें आलस्य और कामनाका त्याग।
    • (च) आजीविकाद्वारा गृहस्थ-निर्वाहके उपयुक्त कर्मोंमें आलस्य और कामनाका त्याग।
    • (छ) शरीरसम्बन्धी कर्मोंमें आलस्य और कामनाका त्याग।
    • (६) संसारके सम्पूर्ण पदार्थोंमें और कर्मोंमें ममता और आसक्तिका सर्वथा त्याग।
    • (७) संसार, शरीर और सम्पूर्ण कर्मोंमें सूक्ष्म वासना और अहंभावका सर्वथा त्याग।
    • उपसंहार
  • +
    शरणागति
    • सर्वस्व अर्पण
    • भगवान् के प्रत्येक विधानमें सन्तोष
    • भगवान् के आज्ञानुसार कर्म
    • भगवान् का निरन्तर चिन्तन
  • अनन्य प्रेम ही भक्ति है
  • गीतामें भक्ति
  • +
    श्रीप्रेम-भक्ति-प्रकाश
    • मानसिक पूजाकी विधि
  • +
    ईश्वर-साक्षात्कारके लिये नामजप सर्वोपरि साधन है
    • महिमाका दिग्दर्शन
    • मेरा अनुभव
    • नामजप किसलिये करना चाहिये?
    • नामजप कैसे करना चाहिये?
    • सत्संगसे ही नामजपमें श्रद्धा होती है !
    • नाममें पापनाशकी स्वाभाविक शक्ति है
    • नाम-भजनसे ही ज्ञान हो जाता है
    • नामकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये
    • नामजपमें प्रमाद और आलस्य करना उचित नहीं
  • भगवान् के दर्शन प्रत्यक्ष हो सकते हैं
  • प्रत्यक्ष भगवद्दर्शनके उपाय
  • उपासनाका तत्त्व
  • +
    सच्चा सुख और उसकी प्राप्तिके उपाय
    • भौतिक सुखसे हानि
    • सच्चा सुख
    • साधनमें क्यों नहीं लगते?
    • सच्चे सुखकी प्राप्तिके उपाय
    • अभेदोपासनाके अनुसार ध्यानकी विधि
    • अभेदोपासनाके ध्यानकी दूसरी युक्ति
    • विश्वरूप परमात्माके ध्यानकी विधि
    • श्रीविष्णुके चतुर्भुज रूपका ध्यान करनेकी विधि
    • दूसरी विधि
  • घर-घरमें भगवान् की पूजा
  • +
    वैराग्य
    • वैराग्यका महत्त्व
    • वैराग्यका स्वरूप
    • वैराग्य-प्राप्तिके उपाय
    • वैराग्यका फल
  • गीतासम्बन्धी प्रश्नोत्तर
  • गीतोक्त संन्यास या सांख्ययोग
  • धर्म क्या है?
  • +
    गीतोक्त निष्काम कर्मयोगका स्वरूप
    • सकाम कर्म—
    • निष्काम कर्म—
    • गीतामें निष्काम कर्मका आरम्भ
    • मदर्पण और मदर्थका भेद—
    • भगवत्प्राप्तिके लिये किया जानेवाला कर्म ही निष्काम कर्मयोग है
  • धर्म और उसका प्रचार
  • व्यापारसुधारकी आवश्यकता
  • व्यापारसे मुक्ति
  • मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है या परतन्त्र?
  • +
    कर्मका रहस्य
    • संचित
    • प्रारब्ध
    • क्रियमाण
    • त्रिविध कर्मोंका भोग बिना नाश होता है या नहीं?
    • कर्मका फल कौन देता है?
    • ईश्वरभजनकी आवश्यकता क्यों है?
  • मृत्यु-समयके उपचार
  • अन्तिम पृष्ठ

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