॥ श्रीहरि:॥

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कल्याण कैसे हो?

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

मनुष्य इस संसारमें जन्म लेता है, बड़ा होता है, सन्तान पैदा करता है, धन कमाता है, बच्चोंको शिक्षा दिलाकर उनकी जीविकाकी व्यवस्था करता है। ये सब बातें होनेपर समझता है कि मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। वह बहुत बड़े अन्धेरेमें है। मनुष्यका वास्तविक कर्तव्य है जन्म-मरणसे पिण्ड छुड़ाकर भगवत्प्राप्ति कर लेना। इस बातकी जानकारी उन महापुरुषोंसे मिलती है जिन्होंने भगवत्प्राप्ति कर ली है और लोगोंको इस ओर लगानेमें ही अपना जीवन लगा रखा है। ऐसे महापुरुष हमें भगवत्कृपासे ही मिलते हैं। इन महापुरुषके एक ही भाव काम कर रहा था कि मनुष्यजन्म पाकर भी लोग भगवत्प्राप्तिसे वञ्चित रहें, यह कितनी बड़ी भूल है। वे जीवनभर मनुष्योंका ध्यान इसकी ओर दिलानेका भरसक प्रयास करते रहे। इस पुस्तक में गृहस्थ भाइयोंको ऐसी युक्तियाँ, बातें बतायी गयी हैं जिससे जीवनमें तत्काल परिवर्तन हो जाय। पापीसे पापीका भी कल्याण कैसे हो? श्रद्धा-विश्वास, प्रेमपर जोर दिया गया है। ​​​​
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • भगवन्नाम-जपमें प्रेमकी महिमा
  • गुह्य, गुह्यतर और गुह्यतमका रहस्य
  • कल्याण कैसे हो?
  • परमात्मप्राप्तिमें सिद्धियाँ बाधक
  • त्याग और प्रेमका तत्त्व
  • तीर्थयात्रा तथा यज्ञदानका रहस्य
  • पाप होनेमें हेतु—ईश्वर और परलोकमें शंका
  • ध्यान तथा भक्तिकी महिमा
  • भगवद्दर्शनमें विश्वासकी आवश्यकता
  • भगवान् का ध्यान
  • साधनको कभी कठिन न समझें
  • निष्कामकर्मकी श्रेणियाँ
  • उच्चभावसे हजारगुणा फल
  • श्रद्धाका स्वरूप
  • मानसिक पूजा
  • अन्तिम पृष्ठ

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