॥ श्रीहरि:॥

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जीवन सुधार की बातें

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

मनुष्य अनादिकालसे अनन्त योनियोंमें भटक रहा है। जीव प्रत्येक जन्म-मरणके समय महान् दु:ख पाता है और जीवनकालमें बड़े-बड़े दु:खों, व्याधियोंका शिकार होता है। जबतक यह जीव जन्म-मरणसे पिण्ड नहीं छुड़ा लेता तबतक उसकी यह दशा निरन्तर रहती है। इस दशाको देखकर भगवान् उसे मनुष्यशरीर प्रदान करते हैं। मनुष्यशरीर पाकर भी यह अपना उद्धार नहीं करता तब भगवान‍्को इसपर बड़ा तरस आता है। इस तरसको गीता अध्याय १६ श्लोक २०में माम् अप्राप्य पदसे भगवान‍्ने प्रकट किया है। नहीं तो आसुरी सम्पदावालोंके लिये अपनी प्राप्ति कहनेका प्रश्न नहीं उठता। भगवान‍्का अभिप्राय है कि मैंने इस जीवको मनुष्यशरीर देकर मेरे पास आनेका एक महान् दुर्लभ अवसर दिया, फिर भी यह दुर्गुण-दुराचारोंमें फँसकर मेरे पास नहीं आ सका, बल्कि और ज्यादा दु:खमय नरकोंकी तैयारी कर रहा है। 
भगवान‍्की अहैतुकी दया सभी जीवोंपर है, परन्तु इस विषयमें महापुरुष किसी अंशमें भगवान‍्से बढ़कर दयालु होते हैं। उनमें मनुष्योंके कल्याणका भाव बहुत अधिक होता है—‘राम ते अधिक राम कर दासा’। श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका भगवान‍्से अधिकारप्राप्त पुरुष थे, ऐसी हमारी धारणा है। उनके हर समय जीवोंके कल्याणका भाव बना रहता था। वे इस कार्यके लिये हर सम्भव प्रयास करते थे। उन्होंने अपना अधिकतर जीवन इस काममें तथा गीता-प्रचारमें लगाया। इसके लिये वे स्थान-स्थानपर घूमकर तथा ग्रीष्मकालमें गीताभवन स्वर्गाश्रममें तीन-चार महीने ठहरकर अपने अनुभवके आधारपर प्रवचन किया करते थे। किसी सज्जनने उन प्रवचनोंको संगृहीत कर लिया। उन प्रवचनोंको पुस्तकका रूप दिया जा रहा है। इन प्रवचनोंमें भगवन्नाम-जप, ध्यान, नि:स्वार्थ सेवा, अतिथि-सेवा, तीर्थोंमें नियमोंका पालन, तीर्थोंमें जाते समय अपने साथीपर विपत्ति आनेपर उसे किसी अवस्थामें न छोड़ना, पातिव्रतधर्मका पालन, दम्भी, पाखण्डी, धर्मध्वजी लोग जो कण्ठी धारण कराते फिरते हैं उनके पंजेमें न फँसना, हमारा जीवन कैसे सुधरे, इन बातोंपर बहुत जोर दिया है। इसके अलावा गीताजीके श्लोकोंके भाव खोले हैं।
भगवत्प्राप्तिके इच्छुक भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि इन लेखोंको मनोयोगपूर्वक अवश्य पढ़ें तथा अन्य भाई-बहनोंको भी पढ़नेके लिये प्रेरित करें। हमें आशा है कि यह पुस्तक सबके लिये जीवन ऊँचा उठाने तथा कल्याण-मार्गमें विशेष सहायक होगी।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • प्रेमका व्यवहार एवं सेवाकी महत्ता
  • स्वार्थ और ममता अनर्थकी जड़ है
  • पारमार्थिक प्रश्नोत्तर
  • भगवन्नाम ही भवरोगनाशके लिये सर्वोत्तम औषध है
  • महत्त्वपूर्ण कल्याणकारी बातें
  • काम, क्रोध, लोभ—ये तीनों यमके दूत हैं
  • जीवन भगवन्मय कैसे बने?
  • साधनको साध्यसे भी अधिक आदर दें
  • स्वार्थत्यागकी महत्त्वपूर्ण बातें
  • प्रेम तथा आनन्द
  • संसारकी असारता
  • सत्संगति मुक्तिसे भी बढ़कर है
  • भगवल्लीलामें रहस्य
  • निष्काम भगवत्प्रेमकी महत्ता
  • गीताकी बातका मूल्य है
  • पतिव्रताका पति नहीं मर सकता
  • प्रेमके लिये ही प्रेम
  • सर्वभावसे परमात्माकी शरण हो
  • भगवान‍्की अहैतुकी दया
  • भगवान‍्के भक्त भगवान‍्से बढ़कर हैं
  • सिद्धान्तकी अनमोल बातें
  • त्यागकी महिमा
  • अंतिम पृष्ठ

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