गीता प्रेस के संस्थापक श्रद्धेय जयदयालजी गोयन्दका भगवान्से अधिकार प्राप्त पुरुष थे, ऐसी हमारी धारणा है। उनके दिन-रात लगन लगी रहती थी कि लोग सत्संगमें आयें, सत्संगकी बातें सुनें और उन्हें काममें लायें। इस उद्देश्यसे उनका सत्संगपर बड़ा जोर रहता था। वे स्वयं एक दिनमें आठ घंटेतक सत्संग कराते थे और संतोंको बुलाकर भी सत्संग कराते थे। वे कई स्थानोंपर जाकर सत्संग कराते थे। विशेषकर ग्रीष्म ऋतुमें स्वर्गाश्रम, ऋषिकेशमें ३-४ महीनोंतक सत्संगका आयोजन रहता था। वे प्रवचन संग्रहीत किये गये थे। उनको भगवत्कृपासे पुस्तकका रूप देनेका विचार हुआ कि सब लोग उन प्रवचनोंसे लाभ ले सकें। हमें आशा है पाठक लोग इन्हें मननपूर्वक पढ़ेंगे और अपने जीवनमें लानेका प्रयास करेंगे, जिससे जन्म-मरणसे छुटकारा मिल जाय और भगवान्की प्राप्तिका आनन्द मिले।