॥ श्रीहरि:॥

gstlogo
हिन्दीarrowdown
जन्म-मरण से छुटकारा

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

गीता प्रेस के संस्थापक श्रद्धेय जयदयालजी गोयन्दका भगवान‍्से अधिकार प्राप्त पुरुष थे, ऐसी हमारी धारणा है। उनके दिन-रात लगन लगी रहती थी कि लोग सत्संगमें आयें, सत्संगकी बातें सुनें और उन्हें काममें लायें। इस उद्देश्यसे उनका सत्संगपर बड़ा जोर रहता था। वे स्वयं एक दिनमें आठ घंटेतक सत्संग कराते थे और संतोंको बुलाकर भी सत्संग कराते थे। वे कई स्थानोंपर जाकर सत्संग कराते थे। विशेषकर ग्रीष्म ऋतुमें स्वर्गाश्रम, ऋषिकेशमें ३-४ महीनोंतक सत्संगका आयोजन रहता था। वे प्रवचन संग्रहीत किये गये थे। उनको भगवत्कृपासे पुस्तकका रूप देनेका विचार हुआ कि सब लोग उन प्रवचनोंसे लाभ ले सकें। हमें आशा है पाठक लोग इन्हें मननपूर्वक पढ़ेंगे और अपने जीवनमें लानेका प्रयास करेंगे, जिससे जन्म-मरणसे छुटकारा मिल जाय और भगवान‍्की प्राप्तिका आनन्द मिले।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • कामको भगवान‍्की पूजा बनाये
  • प्राण त्याग दे, पर धर्म न त्यागे
  • स्वाँगको लजाये नहीं
  • भजन, ध्यान और सत्संग—तीनोंसे शीघ्र भगवत्प्राप्ति
  • सम्पूर्ण दु:खोंकी निवृत्तिका उपाय—भगवदाश्रय
  • शान्ति-प्राप्तिके उपाय
  • भगवत्प्राप्तिमें श्रद्धा ही प्रधान है
  • भगवान‍्के लिये सहन करे
  • भगवान‍्से मानसिक रमणकी विशेषता
  • साधु-संगकी महिमा
  • निष्काम प्रेम ही मूल्यवान् है
  • साधनकी प्रधान बाधा—अहंकार
  • क्रियामें भावकी प्रधानता
  • बहुत मूल्यवान् बातें
  • महात्माओंकी महिमा
  • साधनमें तत्पर हो
  • अन्तिम पृष्ठ

सम्बंधित ई-पुस्तकें

ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप

ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप

मनुष्य का परम कर्तव्य

मनुष्य का परम कर्तव्य

गीता के परम प्रचारक

गीता के परम प्रचारक

स्त्रियों के लिये कर्तव्य शिक्षा

स्त्रियों के लिये कर्तव्य शिक्षा

नल दमयन्ती

नल दमयन्ती