॥ श्रीहरि:॥

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ईशादि नौ उपनिषद्‌

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
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    ईशावास्योपनिषद्
    • शान्तिपाठ
    • (श्लोक १-२) सर्वव्यापक परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करते हुए निष्कामभावपूर्वक कर्म करनेका विधान
    • (श्लोक ३) उपर्युक्त मार्गके विपरीत चलनेवालोंकी दुर्गतिका कथन
    • (श्लोक ४-५) उपास्यदेव परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका प्रतिपादन
    • (श्लोक ६-८) परब्रह्म पुरुषोत्तमको जाननेवाले महापुरुषकी स्थिति तथा तत्त्वज्ञानके फलका निरूपण
    • (श्लोक ९-११) विद्या और अविद्याकी उपासनाके तत्त्वका निरूपण
    • (श्लोक १२-१४) सम्भूति और असम्भूतिकी उपासनाके तत्त्वका निरूपण
    • (श्लोक १५-१६) भक्तके लिये अन्तकालमें परमेश्वरकी प्रार्थना
    • (श्लोक १७) शरीरत्यागके समय प्रार्थना
    • (श्लोक १८) परमधाम जाते समय अर्चिमार्ग के अग्नि-अभिमानी देवतासे प्रार्थना
    • शान्तिपाठ
  • +
    केनोपनिषद्
    • शान्तिपाठ
    • प्रथम खण्ड
    • (श्लोक १) इन्द्रियादिकोंका प्रेरक कौन है—इस विषयमें शिष्यका प्रश्न
    • (श्लोक २-८ उत्तरमें गुरुद्वारा इन्द्रियादिकोंको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाले सर्वप्रेरक परब्रह्म परमात्माका निरूपण एवं संकेतसे उसकी अनिर्वचनीयताका प्रतिपादन)
    • द्वितीय खण्ड
    • (श्लोक १) 'जीवात्मा परमात्माका अंश है और सम्पूर्ण इन्द्रियादिमें जो शक्ति है, वह भी ब्रह्मकी ही है-' इतना जान लेना ही पूर्णज्ञान नहीं है-यह कहकर गुरुका ब्रह्मज्ञानकी विलक्षणताविषयक संकेत करना
    • (श्लोक २) शिष्यद्वारा विलक्षणतापूर्वक अपनी अनुभूतिका वर्णन
    • (श्लोक ३-४) गुरु-शिष्य-संवादका निष्कर्ष
    • (श्लोक ५) ब्रह्म-तत्त्वको इसी जन्ममें जान लेनेकी अत्यावश्यकताका प्रतिपादन
    • तृतीय खण्ड
    • (श्लोक १-२) परब्रह्म परमात्माकी महिमा न जाननेके कारण देवताओंका अभिमान और उसके नाशके लिये यक्षका प्रादुर्भाव
    • (श्लोक ३-६) यक्षको जाननेके लिये अग्निदेवका प्रयत्न और यक्षके द्वारा अग्निदेवके अभिमानका नाश
    • (श्लोक ७-१०) यक्षको जाननेके लिये वायुदेवका प्रयत्न और यक्षके द्वारा वायुदेवके अभिमानका नाश
    • (श्लोक ११-१२) यक्षको जाननेके लिये इन्द्रदेवका प्रयत्न, यक्षका अन्तर्धान होना तथा उमादेवीका प्राकट्य और उनसे इन्द्रका प्रश्न
    • चतुर्थ खण्ड
    • (श्लोक १-३) उमादेवीद्वारा यक्षरूपमें प्रकट परब्रह्मके तत्त्वका उपदेश, उपदेश पाकर इन्द्रको ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति तथा अग्नि, वायु और इन्द्रकी श्रेष्ठता एवं उनमें भी इन्द्रकी सर्वश्रेष्ठता निरूपण
    • (श्लोक ४) आधिदैविक दृष्टान्तसे ब्रह्मज्ञानकी पूर्वावस्थाके विषयमें सांकेतिक आदेश और उसका महत्त्व
    • (श्लोक ६) परब्रह्मकी उपासनाका प्रकार और फल
    • (श्लोक ७) उपसंहार
    • (श्लोक ८-९) ब्रह्मविद्याके साधनोंका वर्णन तथा ब्रह्मविद्याका रहस्य जाननेकी महिमा
    • शान्तिपाठ
  • +
    कठोपनिषद्
    • शान्तिपाठ
    • प्रथम अध्याय
    • (श्लोक १-४) महर्षि उद्दालकके द्वारा यज्ञ करनेके अनन्तर दक्षिणाके रूपमें गोधन देते समय नचिकेतामें आस्तिकताका आवेश और पिता-पुत्र-संवाद
    • (श्लोक ५-६) नचिकेताका धैर्यपूर्ण विचारपूर्वक पिताको आश्वासन देना
    • (श्लोक ७-८) नचिकेताका यमलोक जाना और यमराजपत्निद्वारा यमराजसे आतिथ्य-सत्कारके लिये प्रार्थना
    • (श्लोक ९) यमराजद्वारा नचिकेताका सत्कार और तीन वर माँगनेके लिये कहना
    • (श्लोक १०-११) नचिकेताद्वारा प्रथम वरमें पितृ-परितोषकी याचना और यमराजद्वारा उक्त वर-प्रदान
    • (श्लोक १२-१३) नचिकेताद्वारा द्वितीय वरमें स्वर्गकी साधनभूत अग्निविद्याकी याचना
    • (श्लोक १४-१९) यमराजद्वारा फलसहित "नाचिकेत" अग्निविद्याका वर्णन
    • (श्लोक २०-२२) नचिकेताद्वारा तृतीय वरमें आत्मज्ञानके लिये याचना और यमराजद्वारा आत्माके तत्त्वज्ञानकी कठिनताका प्रतिपादन तथा नचिकेताकी दृढ़ताका वर्णन
    • (श्लोक २३-२५) यमराजका नचिकेताको आत्मतत्त्वविषयक प्रश्नके बदलेमें भाँति-भाँतिके प्रलोभन देना
    • (श्लोक २६-२९) नचिकेताकी परम वैराग्यपूर्ण उक्ति तथा आत्मतत्त्व जाननेका अटल निश्चय
    • (श्लोक १-२) यमराजद्वारा ब्रह्मविद्याके उपदेशका आरम्भ और श्रेय-प्रेयका विवेचन
    • (श्लोक ३-६) आत्मविद्याभिलाषी नचिकेताके वैराग्यकी प्रशंसा तथा अविद्यामें रचे-पचे मनुष्योंकी दुर्दशाका कथन
    • (श्लोक ७-९) आत्मतत्त्वको जाननेवालोंकी महिमा तथा तत्त्वज्ञानीकी दुर्लभताका वर्णन और नचिकेताकी प्रशंसा
    • (श्लोक १०-११) यमराजद्वारा अपने उदारहरणसे निष्कामभावकी महिमाका वर्णन एवं नचिकेताकी निष्कामताका वर्णन
    • (श्लोक १२-१३) परब्रह्म परमात्माकी महिमा
    • (श्लोक १४) नचिकेताका सर्वातीत तत्त्वविषयक प्रश्न
    • (श्लोक १५-१७) यमराजद्वारा कारोपदेश, नाम-नामीका अभेद-निरूपण और नामकी महिमा
    • (श्लोक १८-१९) आत्माके स्वरूपका वर्णन
    • (श्लोक २०-२१) परमात्माके स्वरूपका वर्णन
    • (श्लोक २२) परमेश्वरकी महिमा समझनेवाले पुरुषकी पहिचान
    • (श्लोक २३) कृपानिर्भर साधकको परमेश्वरकी प्राप्तिका निरूपण
    • (श्लोक २४-२५) परमात्मा किसको और क्यों नहीं मिलते? इसका कथन
    • (श्लोक १) जीवात्मा और परमात्माका नित्य सम्बन्ध और प्राणियोंकी हृदय-गुफामें दोनोंके विकास-स्थानका निरूपण
    • (श्लोक २) प्रार्थनाको परमात्माकी प्राप्तिका सर्वोत्तम साधन बतलाना
    • (श्लोक ३-४) रथ और रथीके रूपकसे परमात्मप्राप्तिके उपायका कथन
    • (श्लोक ५-९) विवेकहीनकी विवशता तथा दुर्गति और विवेकशीलकी स्वाधीनता तथा परमगतिका प्रतिपादन
    • (श्लोक १०-११) इन्द्रियोंको असत्-मार्गसे रोककर भगवान‍्की ओर लगानेके प्रकारका तात्त्विक विवेचन
    • (श्लोक १२-१३) परमात्माकी प्राप्तिके महत्त्व और साधनका निरूपण
    • (श्लोक १४-१५) परमात्माकी प्राप्तिके लिये मनुष्योंको चेतावनी, परमात्माके स्वरूपका और उसके जाननेके फलका वर्णन
    • (श्लोक १६-१७) उपर्युक्त उपदेशमय आख्यानके श्र‍वण और वर्णनका फलसहित माहात्म्य
    • द्वितीय अध्याय
    • (श्लोक १) परमेश्वरके दर्शनमें इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता ही विघ्न है
    • (श्लोक २) अविवेकी और विवेकियोंका अन्तर
    • (श्लोक ३-५) जिनकी कृपाशक्तिसे इन्द्रियाँ और अन्तःकरण अपना-अपना कार्य करते हैं, उन सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके ज्ञानसे शोक-निन्दा आदि सब दोषोंकी निवृत्तिका कथन
    • (श्लोक ६-९) जगत‍्के कारणरूप परब्रह्मका अदितिदेवी, अग्नि और सूर्यके रूपमें वर्णन
    • (श्लोक १०-११) परमात्माकी सर्वव्यापकता और सर्वरूपताको न जाननेके कारण जो इसे नाना रूपोंमें देखते हैं, उनको बारंबार जन्म-मरणकी प्राप्ति होनेका कथन
    • (श्लोक १२-१५) हृदय-गुफामें स्थित परमेश्वरको अङ्गुष्ठपरिमाणवाला बताना और उस परमेश्वरके न जानने और जाननेके फलका वर्णन
    • (श्लोक १) परमेश्वरके ध्यानसे शोक-निवृत्ति तथा जीवन्मुक्ति और विदेह-मुक्तिका निरूपण
    • (श्लोक २-४) परमेश्वरकी स्वरूपता और सर्वत्र परिपूर्णताका प्रतिपादन
    • (श्लोक ५-६) यमराजद्वारा परमात्माका स्वरूप और जीवात्माकी गति बतानेकी प्रतिज्ञा
    • (श्लोक ७) जीवात्माकी गतिका प्रकरण
    • (श्लोक ८-११) परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन तथा अग्नि, वायु और सूर्यके दृष्टान्तसे परमेश्वरकी व्यापकता और निर्लेपता का कथन
    • (श्लोक १२-१३) समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका अपने हृदयमें दर्शन करनेवालेको परमानन्द और परम शान्तिकी प्राप्तिका निरूपण
    • (श्लोक १४) उक्त परमानन्दकी प्राप्ति किस प्रकार होती है–यह जाननेके लिये नचिकेताकी उत्कण्ठा
    • (श्लोक १५) यमराजद्वारा परब्रह्मकी सर्वप्रकाशकताका प्रतिपादन
    • (श्लोक १) संसाररूप अश्वत्थ-वृक्षका वर्णन
    • (श्लोक २) सबका शासन करनेवाले परमेश्वरके ज्ञानसे अमृतत्वप्राप्तिका उल्लेख
    • (श्लोक ३) प्रभुकी सर्वशासकताका प्रतिपादन
    • (श्लोक ४) मनुष्यशरीरके रहते-रहते परमेश्वरको न जान लेनेसे बारंबार पुनर्जन्म-प्राप्तिका कथन
    • (श्लोक ५) स्थान-भेदसे भगवान‍्के प्राकट्यमें तारतम्य
    • (श्लोक ६) इन्द्रियोंसे आत्माकी भिन्नता जाननेका फल
    • (श्लोक ७-९) तत्त्व-विचारके वर्णनमें आत्माको बुद्धिसे पर बतलाना और सर्वश्रेष्ठ, सबके आश्रय परमेश्वरको जान लेनेपर अमृतत्वकी प्राप्तिका कथन
    • (श्लोक १०-११) योगके स्वरूप और साधनका प्रकरण
    • (श्लोक १२-१३) भगद्विश्वाससे भगवत्प्राप्तिका कथन
    • (श्लोक १४-१५) निष्कामभावकी एवं संशयरहित निश्चयकी महिमा
    • (श्लोक १६) मरनेके बाद जीवकी गतिका विषय
    • (श्लोक १७) शरीर और आत्माके भीतर रहनेवाले परमेश्वरकी उन दोनोंसे विलक्षणता और उसके ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्तिका निरूपण
    • (श्लोक १८) उपर्युक्त ब्रह्मविद्या और योगविधिके द्वारा नचिकेताको ब्रह्मकी प्राप्ति होनेका कथन
    • शान्तिपाठ
  • +
    प्रश्नोपनिषद्
    • शान्तिपाठ
    • प्रथम प्रश्न
    • (श्लोक १-३) सुकेशादि ऋषियोंका महर्षि पिप्पलाद गुरुके पास जाना, गुरुकी आज्ञाके अनुसार तप करना और प्रजोत्पत्तिके विषयमें कबन्धीका प्रश्न
    • (श्लोक ४-८) परमेश्वरके संकल्पद्वारा प्राण और रयिके संयोगसे जगत‍्की उत्पत्तिका वर्णन एवं आदित्य और चन्द्रमामें प्राण और रयि-दृष्टिका कथन
    • (श्लोक ९-११) प्राण और रयिके सम्बन्धसे परमेश्वरकी उपासनाके प्रकार और उसके फलके निरूपणमें संवत्सरादिमें प्रजापति-दृष्टिका वर्णन तथा सूर्यमें उसके आत्मस्वरूप परमेश्वरको उपास्यदेव बतलाना
    • (श्लोक १२) मासादिमें प्रजापति-दृष्टि करके उपासना करनेका प्रकार
    • (श्लोक १३) दिन-रातमें प्रजापति परमेश्वरकी दृष्टि करके उपासना करनेका प्रकार तथा दिनमें मैथुनका निषेध
    • (श्लोक १४) अन्नको प्रजापतिस्वरूप बताकर उसे प्रजाका कारण बताना
    • (श्लोक १५-१६) प्रजापति-व्रतका फल-प्रजाकी उत्पत्ति तथा ब्रह्मचर्य, तप और सत्य-पालनका एवं सब प्रकारके दोषोंसे रहित होनेका फल-ब्रह्मलोककी प्राप्ति
    • द्वितीय प्रश्न
    • (श्लोक १) प्रजाके आधारके विषयमें भार्गवके तीन प्रश्न
    • (श्लोक ५-६) प्राणरूपसे परमेश्वरकी उपासना करनेके लिये सर्वात्मरूपसे उसके महत्त्वका वर्णन
    • (श्लोक ७-१३) प्राणकी स्तुति
    • तृतीय प्रश्न
    • (श्लोक १) प्राणकी उत्पत्ति आदिके विषयमें आश्वलायनके छः प्रश्न
    • (श्लोक २-३) पिप्पलादमुनिद्वारा दो प्रश्नोंके उत्तरमें-परमात्मासे प्राणकी उत्पत्तिका और संकल्पसे प्राणके शरीरमें प्रवेश करनेका कथन
    • (श्लोक ४-६) तीसरे प्रश्नके उत्तरमें मुख्य प्राण, अपान, समानके वासस्थान और कार्यका तथा व्यानकी गतिका वर्णन
    • (श्लोक ७) चौथे प्रश्नके उत्तरमें उदानके स्थान और कार्यका एवं मृत्युके बाद परलोकमें ले जानेका कथन
    • (श्लोक ८-९) पाँचवें और छठे प्रश्नके उत्तरमें जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित दूसरे शरीरमें जानेका उल्लेख
    • (श्लोक १०) चौथे प्रश्नके उत्तरका पुनः स्पष्टीकरण
    • (श्लोक ११-१२) प्राणविषयक ज्ञानका लौकिक और पारलौकिक फल
    • चतुर्थ प्रश्न
    • (श्लोक १) गार्ग्यमुनिद्वारा जीवात्मा और परमात्माके विषयमें पाँच प्रश्न
    • (श्लोक २) पिप्लादमुनिद्वारा पहले प्रश्नके उत्तरमें सुषुप्तिके समय इन्द्रियोंके शयन (विलीन होने)-का स्थान मनको बतलाना
    • (श्लोक ३-४) दूसरे प्रश्नके उत्तरमें सुषुप्तिकालमें पाँच प्राणरूप अग्नियोंके जागते रहनेका कथन तथा मनकी स्थितिका वर्णन
    • (श्लोक ५) तीसरे प्रश्नके उत्तरमें स्वप्नावस्थामें जीवात्माके ही द्वारा घटनाओंके अनुभव करनेका उल्लेख
    • (श्लोक ६) चौथे प्रश्नके उत्तरमें जीवात्माद्वारा निद्राजनित सुखके अनुभव करनेका उल्लेख
    • (श्लोक ७-११) पाँचवें प्रश्नके उत्तरमें इन्द्रियादि सम्पूर्ण देवोंके तथा जीवात्माके भी परम आश्रय परमेश्वरका निरूपण और उनकी प्राप्तिसे परम शान्तिका कथन
    • पञ्चम प्रश्न
    • (श्लोक १) ॐकारोपासनाके विषयमें सत्यकामका प्रश्न
    • (श्लोक २) पिप्पलादका उत्तरमें ॐकारको ही पर और अपर ब्रह्मस्वरूप बताना तथा ॐकारोपासनासे साधकके इच्छानुसार दोनोंमेंसे एककी प्राप्तिरूप फल बतलाना
    • (श्लोक ३) एकमात्रसंयुक्त ॐकारोपासनासे पृथ्वीलोकमें महिमा पानेका उल्लेख
    • (श्लोक ४) द्विमात्रसंयुक्त ॐकारोपासनासे चन्द्रलोकमें ऐश्वर्यप्राप्तिका उल्लेख
    • (श्लोक ५-६) त्रिमात्रसंयुक्त ॐकारोपासनासे परम पुरुषके साक्षात्कार होनेका तथा तीनों मात्राओंसहित ॐकारकी उपासनाका रहस्य
    • (श्लोक ७) ॐकारोपासनाका उपसंहार
    • षष्ठ प्रश्न
    • (श्लोक १) सोलह कलावाले पुरुषके विषय सुकेशाका प्रश्न
    • (श्लोक २) पिप्पलादद्वारा उत्तरमें सोलह कलाके समुदायारूप जगत‍्के उत्पादक परमेश्वरका निरूपण
    • (श्लोक ३-५) पुरुषोत्तमका तत्त्व समझानेके लिये सृष्टि-क्रम और प्रलयका वर्णन
    • (श्लोक ६) सर्वाधार परमेश्वरके ज्ञानसे जन्म-मृत्युके अभावका उल्लेख
    • (श्लोक ७) उपदेशका उपसंहार
    • (श्लोक ८) शिष्योंद्वारा कृतज्ञताप्रकाश और ऋषि-वन्दना
    • शान्तिपाठ
  • +
    मुण्डकोपनिषद्
    • शान्तिपाठ
    • प्रथम मुण्डक
    • (श्लोक १-२) ब्रह्मविद्याके उपदेशकी परम्परा
    • (श्लोक ३) शौनकका महर्षि अङ्गिराके पास जाना और 'किसके जान लेनेपर सब कुछ जाना हुआ हो जाता है'-यह पूछना
    • (श्लोक ४) उत्तरमें अङ्गिराद्वारा परा और अपरा इन दो विद्याओंको जाननेयोग्य बताना
    • (श्लोक ५) संक्षेपमें परा और अपरा विद्याका स्वरूप
    • (श्लोक ७) परा विद्याद्वारा जाननेयोग्य अविनाशी ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन
    • (श्लोक ७) परमेश्वरसे सम्पूर्ण जगत‍्की उत्पत्तिमें तीन दृष्टान्त
    • (श्लोक ८) संक्षेपमें जगत‍्की उत्पत्तिका क्रम
    • (श्लोक ९) सर्वज्ञ परमेश्वरके संकल्पमात्रसे जगत‍्की उत्पत्तिका वर्णन
    • (श्लोक १) अपरा विद्याका स्वरूप और फल
    • (श्लोक २-३) अग्निहोत्रका वर्णन तथा उसके करनेयोग्य कर्म और विधिका उल्लेख
    • (श्लोक ४-६) अग्निकी लपटोंके प्रकारभेद तथा प्रदीप्त अग्निमें नित्य हवनका विधान एवं उसका स्वर्गप्राप्तिरूप फल
    • (श्लोक ७-१०) उपर्युक्त स्वर्गके साधनभूत यज्ञादि सकाम कर्मोंको सर्वोपरि माननेवाले पण्डिताभिमानी लोगोंकी निन्दा और उन कर्मोंका फल बासंबार जन्म-मृत्यु होनेका कथन
    • (श्लोक ११) सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्योंके आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन
    • (श्लोक १२) परमेश्वरको जाननेके लिये श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्‍गुरुके पास जानेका आदेश
    • (श्लोक १३) गुरुको अधिकारी शिष्यके प्रति तत्त्वविवेचनपूर्वक उपदेश देनेकी प्रेरणा
    • द्वितीय मुण्डक
    • (श्लोक १) अग्निसे चिनगारियोंकी भाँति ब्रह्मसे जगत‍्की उत्पत्ति और उसीमें उसके लय होनेका वर्णन
    • (श्लोक २-३) निराकार परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन तथा उससे साकार जगत‍्के सूक्ष्म तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार
    • (श्लोक ४-५) भगवान‍्के विराट्‍रूपका तथा प्रकारान्तरसे जगत‍्के उत्पत्तिक्रमका वर्णन
    • (श्लोक ६-९) परमेश्वरसे ही फलसहित यज्ञादि साधना, देवादि प्राणी और सदाचार आदि आध्यात्मिक वस्तुओंकी एवं पर्वत, नदी आदि बाह्य जगत‍्की उत्पत्तिका निरूपण
    • (श्लोक १०) परमेश्वरसे उत्पन्न समस्त भावोंको उन्हींका स्वरूप बताकर हृदयरूप गुहामें छिपे हुए उन अन्तर्यामी परमेश्वरको जाननेके फलका वर्णन
    • (श्लोक १) 'गुहाचर' नामसे प्रसिद्ध परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन और उसे जाननेका आदेश
    • (श्लोक २-४) परब्रह्मके स्वरूपका निर्देश तथा धनुष और बाणके रूपकद्वारा परब्रह्मरूपी लक्ष्यको वेधनेका प्रकार
    • (श्लोक ५-८) सबके आत्मरूप सर्वज्ञ परमेश्वरको जाननेके लिये अन्य सब बातोंको छोड़कर ध्यान करनेका आदेश तथा परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन एवं उसको जाननेके फलका निरूपण
    • (श्लोक ९-११) परब्रह्मके स्थान और स्वरूपका वर्णन, उन्हें जाननेका महत्त्व तथा उन स्वप्रकाश परमेश्वरकी सर्वप्रकाशकता और सर्वव्यापकताका कथन
    • तृतीय मुण्डक
    • (श्लोक १-२) एक वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षीके रूपकद्वारा जीव और ईश्वरकी भिन्नताका निरूपण तथा ईश्वरकी महिमा जाननेसे जीवके मोहजनित शोककी निवृत्तिका कथन
    • (श्लोक ३-४) परमेश्वरकी महिमाके दर्शनसे सर्वोत्तम समताकी प्राप्ति तथा उस ज्ञानी भक्तकी निरभिमानता और सर्वश्रेष्ठ स्थितिका वर्णन
    • (श्लोक ५-६) सत्य, तप, ज्ञान और ब्रह्मचर्यके साधनसे परमात्माकी प्राप्तिका कथन तथा सत्यकी महिमा
    • (श्लोक ७-८) परमात्माके अचिन्त्य दिव्य स्वरूपका वर्णन तथा चित्तशुद्धि और ध्यानको उनके दर्शनका उपाय बताना
    • (श्लोक ९) आत्माके स्वरूपका वर्णन और अन्तःकरणकी शुद्धिसे उसमें विशेष शक्तिके प्रकट होनेका कथन
    • (श्लोक १०) शुद्ध अन्तःकरणवाले आत्मज्ञानीकी इष्ट भोगों और लोकोंकी प्राप्तिका कथन तथा उस विवेकीका सत्कार करनेके लिये प्रेरणा
    • (श्लोक १-२) निष्कामभावकी प्रशंसा और सकामभावकी निन्दा एवं दोनोंका पृथक्-पृथक् फल
    • (श्लोक ३-४) तर्क, प्रमाद, निर्बलता और गुणहीनता आदिसे भगवत्प्राप्तिकी असम्भवता एवं भगवत्प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषावाले निष्काम प्रेमी साधकको भगवत्कृपासे उनके दर्शन होनेका कथन
    • (श्लोक ५) उपर्युक्त प्रकारसे परमात्माको प्राप्त महात्माओंका महत्त्व
    • (श्लोक ६) शरीर त्यागकर ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषोंकी मुक्तिका कथन
    • (श्लोक ७-८) जीवन्मुक्त महात्माकी अन्तकालीन स्थिति तथा नदी और समुद्रके दृष्टान्तसे उसकी ब्रह्मलीनताका निरूपण
    • (श्लोक ९) 'ब्रह्मवेता ब्रह्म ही है और उसके कुलमें कोई ब्रह्मको न जाननेवाला नहीं होता' यह कहकर उसकी मोक्षप्राप्तिका कथन
    • (श्लोक १०-११) ब्रह्मविद्याके दानकी विधि और उसके अधिकारीका निर्देश तथा उपदेशका उपसंहार एवं ऋषि-वन्दना
    • शान्तिपाठ
  • +
    माण्डूक्योपनिषद्
    • शान्तिपाठ
    • (श्लोक १) भूत, भविष्य, वर्तमान एवं तीनों कालोंसे अतीत, सब भावोंको ॐकारस्वरूप बताना
    • (श्लोक २) ॐकार और परब्रह्म परमात्माकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये उसके चार चरणोंका निरूपण
    • (श्लोक ३) परब्रह्मके पहले चरण स्थूल जगत्-रूप 'वैश्वानर' का वर्णन
    • (श्लोक ४) परब्रह्मके दूसरे चरण प्रकाशमय हिरण्यगर्भरूप 'तैजस'का वर्णन
    • (श्लोक ५) परब्रह्मके तीसरे चरण विज्ञान आनन्दमय 'प्राज्ञ' का वर्णन
    • (श्लोक ६) उक्त तीन पादोंद्वारा जिसके स्वरूपका लक्ष्य कराया गया है, उसे सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और सबका कारण बतलाना
    • (श्लोक ७) परब्रह्मके चतुर्थ चरण निर्गुण-निराकार निर्विशेष स्वरूपका वर्णन
    • (श्लोक ८) नामी-परब्रह्म परमात्माकी उनके नाम-प्रणवकी तीन मात्राओंके साथ तीनों पदोंकी एकताका निरूपण
    • (श्लोक ९) वैश्वानर नामक पहले चरणके साथ पहली मात्रा ‘अ’कारकी एकता और उसके ज्ञानसे सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्तिरूप फल
    • (श्लोक १०) तैजस नामक दूसरे चरणके साथ दूसरी मात्रा ‘उ’कारकी एकता और उसके ज्ञानसे सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्तिरूप फल
    • (श्लोक ११) प्राज्ञ नामक तीसरे चरणके साथ तीसरी मात्रा ‘म’कारकी एकता और उसके ज्ञानसे सम्पूर्ण जगत‍्का ज्ञान तथा सर्वत्र परब्रह्मदृष्टिरूप फल
    • (श्लोक १२) मात्रारहित ॐकारकी परमेश्वरके चौथे चरण-निर्विशेष रूपके साथ एकता और उसके ज्ञानमें परब्रह्मकी प्राप्तिरूप फल
    • शान्तिपाठ
  • +
    ऐतरेयोपनिषद्
    • शान्तिपाठ
    • प्रथम अध्याय
    • (श्लोक १) परमात्माके सृष्टिरचनाविषयक प्रथम संकल्पका वर्णन
    • (श्लोक २-४) परमात्माके द्वारा समस्त लोकोंकी और ब्रह्मा तथा अन्य लोकपालोंकी एवं वागादि इन्द्रियों और उनके अधिष्ठातृ-देवताओंकी उत्पत्तिका निरूपण
    • (श्लोक १) इन्द्रियों और उनके अधिष्ठाता देवताओंद्वारा वासस्थान और अन्नकी याचना
    • (श्लोक २) परमात्माद्वारा गौ तथा अश्व-शरीरकी रचना और देवताओंका उनको पसंद न करना
    • (श्लोक ३-४) परमात्माद्वारा मनुष्य-शरीरकी रचना, उसे देखकर देवताओंका प्रसन्न होना और उसके भीतर अपने-अपने स्थानोंमें प्रवेश करना
    • (श्लोक ५) देवताओंके अन्नमें क्षुधा और पिपासाको भी भाग-प्रदान
    • (श्लोक १-२) परमात्माद्वारा अन्नरचनाका विचार और अन्नकी सृष्टि
    • (श्लोक ३-९) अन्नका भाग जाना तथा पुरुषका उसे वाणी, प्राण, नेत्र, कान, त्वचा, मन और उपस्थके द्वारा पकड़नेका उद्योग एवं पकड़नेमें असफल होना
    • (श्लोक १०) अन्तमें अपानके द्वारा अन्नको पकड़ लेनेके कारण अपानकी महत्ताका उल्लेख
    • (श्लोक ११) परमात्माका मनुष्य-शरीरमें प्रवेश करनेका विचार
    • (श्लोक १२) परमात्माका 'विदृति' नामक मूर्द्धद्वारसे शरीरमें प्रवेश करना तथा उनके तीन स्थानों और तीन स्वप्नोंका निरूपण
    • (श्लोक १३) मनुष्यका सृष्टि-रचना देखकर आश्चर्ययुक्त होना और उसके बाद परमेश्वरके साक्षात्कारसे इसी शरीरमें उसके कृतकृत्य हो जानेका कथन
    • (श्लोक १४) परमेश्वरके 'इन्द्र' नामकी व्युत्पत्ति
    • द्वितीय अध्याय
    • (श्लोक १-२) पुरुषद्वारा माताके शरीरमें गर्भप्रवेशरूप उसका प्रथम जन्म तथा माताके द्वारा गर्भके पालन-पोषणका वर्णन
    • (श्लोक ३) माताके गर्भसे बाहर बालकरूपमें प्रकट होनारूप उसका दूसरा जन्म तथा पिता-पुत्रके सम्बन्ध और कर्तव्यका संकेत
    • (श्लोक ४) पिताद्वारा पुत्रपर वैदिक और लौकिक शुभ कर्मोंका भार देकर उऋण होनेका और मरनेके बाद अन्य योनिमें उत्पन्न होनारूप उसके तृतीय जन्मका कथन तथा इस प्रकरणका भा‍वार्थ-जन्म-मृत्युसे छूटनेके लिये प्रेरणा
    • (श्लोक ५-६) वामदेव ऋषिको गर्भमें ही ज्ञान होनेका उल्लेख तथा देहत्यागके पश्चात् उनको परमधाम प्राप्त होनेका निरूपण
    • तृतीय अध्याय
    • (श्लोक १) पूर्वोक्त परमात्मा और जीवात्मा इन दोनोंमेंसे उपास्यदेव कौन है? और किसके सहयोगसे मनुष्य रूप आदि विषयोंका अनुभव करता है? इसका निर्णयार्थ ऋषियोंका विचार
    • (श्लोक २) 'मनकी देखना, सुनना, मनन करना आदि शक्तियाँ ज्ञानरूप परमात्माके ही नाम हैं'-इस तथ्यके अनुशीलनसे परमात्माकी सत्ताके ज्ञान होनेका कथन
    • (श्लोक ३) समस्त जगत‍्के रचयिता, संचालक, रक्षक और आधारभूत प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं-इस प्रकार ऋषियोंका निश्चय करना
    • (श्लोक ४) उस प्रज्ञानस्वरूप परमेश्वरके ज्ञानसे शरीर-त्यागके अनन्तर परम धाममें जाकर अमर हो जानेका निरूपण
    • शान्तिपाठ
  • +
    तैत्तिरीयोपनिषद्
    • शान्तिपाठ
    • शीक्षा-वल्ली*
    • (श्लोक १) आचार्यद्वारा विभिन्न शक्तियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके नामसे परमेश्वरकी स्तुति-प्रार्थना करके उनकी वायुनामसे स्तुति और वन्दना
    • (श्लोक २) वेदमन्त्रोंके उच्चारणके नियमोंको कहनेकी प्रतिज्ञा करके उनका संक्षेपमें वर्णन
    • (श्लोक ३) लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और शरीरविषयक पाँच प्रकारकी संहितोपासनाके प्रकरणमें अभीष्ट लोकप्राप्तिके उपायका, ज्योतियोंके संयोगसे भौतिक पदार्थोंकी उन्नतिके रहस्यका, विद्याप्राप्तिके रहस्यका, संतानप्राप्तिके उपायका एवं वाणीद्वारा प्रार्थनासे शरीर की उन्नति और नामजपसे भगवत्प्राप्तिके उपायका तथा इन पाँचोंके ज्ञानसे पृथक्-पृथक् फल पानेका कथन
    • (श्लोक ४) साधनमें सहायक बौद्धिक और शारीरिक बलके लिये परमेश्वरसे ॐ कारद्वारा प्रार्थना करनेका प्रकार तथा ऐश्वर्य-प्राप्ति आदिके लिये किये जानेवाले हवनके मन्त्रोंका उल्लेख
    • (श्लोक ५) लोकों, ज्योतियों, वेदों और प्राणोंके विषयमें भूः भुवः स्वः महः-इन चार महाव्याहृतियोंके प्रयोगद्वारा उपासना करनेकी विधि और उनका पृथक्-पृथक् फल
    • (श्लोक ६) परमेश्वरके हृदयाकाशमें रहनेका वर्णन तथा उन्हें प्रत्यक्ष देखनेवाले महापुरुषका क्रमशः भूः भुवः स्वः महःरूप लोकोंमें जाने और वहाँ स्वराट् बनकर प्रकृतिपर अधिकार प्राप्त कर लेनेका निरूपण एवं उन परब्रह्मका स्वरूप बतलाकर उनकी उपासनाके लिये आदेश
    • (श्लोक ७) लौकिक और पारलौकिक उन्नतिके लिये पाङ्‍‍क्तरूपसे वर्णित भौतिक और आध्यात्मिक पदार्थोंके सम्बन्ध और उपयोगका निरूपण
    • (श्लोक ८) ॐकारकी महिमाका वर्णन
    • (श्लोक ९) अध्ययनाध्यापन करनेवालोंके लिये ऋत आदि शास्त्रोक्त सदाचारके पालनकी अवश्यकर्तव्यताका विधान
    • (श्लोक १०) त्रिशङ्कु ऋषिके स्वानुभवके उद्‍गार बतलाकर भावनाशक्तिकी महिमाका दिग्दर्शन कराना
    • (श्लोक ११) आचार्यद्वारा स्नातकको गृहस्थधर्मपालनकी महत्त्वपूर्ण शिक्षा
    • (श्लोक १२) उपदेशकी समाप्तिमें पुनः विभिन्न शक्तियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके नामसे परमेश्वरकी स्तुति-प्रार्थना करके वायुनामसे स्तुति और वन्दना
    • ब्रह्मानन्दवल्ली
    • शान्तिपाठ
    • (श्लोक १) हृदयगुहामें छिपे हुए परमेश्वरको जाननेका फल, मनुष्यशरीरकी उत्पत्तिका प्रकार और पक्षीके रूपमें उसके अङ्गोंकी कल्पना
    • (श्लोक २) अन्नकी महिमा तथा प्राणमय शरीर और उसके अन्तरात्माका वर्णन
    • (श्लोक ३) प्राणकी महिमा तथा मनोमय शरीर और उसके अन्तरात्माका वर्णन
    • (श्लोक ४) मनोमय शरीरकी महिमा तथा विज्ञानमय जीवात्माके स्वरूपका वर्णन
    • (श्लोक ५) विज्ञानात्माकी महिमा और उससे भिन्न उसके अन्तरात्मा आनन्दमय परमपुरुषका वर्णन
    • (श्लोक ६) परब्रह्मकी सत्ता मानने और न माननेका परिणाम, ब्रह्मकी सत्ताके विषयमें अनुप्रश्न और उसके उत्तरमें ब्रह्मके स्वरूप और शक्तिका वर्णन करते हुए सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम-निरूपण
    • (श्लोक ७) स्वयं जगत्-रूपमें बननेवाले परमात्माकी सुकृतता तथा सबके जीवन और चेष्टाके आधारभूत उन परमात्माकी रसमयता एवं परमात्मप्राप्त पुरुषको निर्भयपद-प्राप्ति और उन परमात्मासे विमुख पुरुषको जन्म-मरणरूप भयकी प्राप्तिका उल्लेख
    • (श्लोक ८) परमात्माकी शासनशक्तिकी महिमामें एवं आनन्दकी मीमांसामें मानवजीवनकी अपेक्षा क्रमशः देवादिलोकोंके आनन्दकी उत्तरोत्तर अधिकता तथा निष्काम विरक्तके लिये उस आनन्दकी स्वभाव-सिद्धता और परमात्माके आनन्दकी निरतिशयता एवं उन आनन्दकेन्द्र सर्वान्तर्यामी परमेश्वरके ज्ञानसे उनकी प्राप्तिका निरूपण
    • (श्लोक ९) आनन्दमय परमात्माके ज्ञाताको निर्भयताकी प्राप्ति तथा पुण्य और पाप दोनों कर्मोंके प्रति रागद्वेषरहित उस महापुरुषकी शोकरहित स्थितिका परिचय
    • भृगुवल्ली*
    • (श्लोक १) भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मोपदेशके लिये प्रार्थना तथा वरुणद्वारा अन्न, प्राण, मन आदिको ब्रह्मप्राप्तिका द्वार बतलाकर 'सब कुछ ब्रह्म ही है' इस तत्त्वका उपदेश एवं भृगुका तप करना
    • (श्लोक २) 'अन्न ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना
    • (श्लोक ३) 'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिता के पास जाना और उनके उपदेश से पुनः तप करना
    • (श्लोक ४) 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना
    • (श्लोक ५) 'विज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना
    • (श्लोक ६) भृगुका आनन्दमय परमात्मा ही ब्रह्म है ऐसा निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल
    • (श्लोक ७) अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रतका निरूपण तथा प्राणको अन्न और शरीरको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना
    • (श्लोक ८) अन्नका दुरुपयोग न करनारूप व्रतका निरूपण तथा जलको अन्न और ज्योतिको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना
    • (श्लोक ९) अन्नकी वृद्धि करनारूप ब्रह्मका निरूपण तथा पृथ्वीको अन्न और आकाशको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना
    • (श्लोक १०) अतिथि-सेवाका महत्त्व और उसका श्रेष्ठ फल, वाणी आदि मानुषी और वर्षा आदि दैवी विभूतियोंके रूपमें परमात्माके सर्वत्र चिन्तनका प्रकार तथा विविध कामनाओंके भावसे की जानेवाली उपासनाका फलसहित निरूपण एवं परमात्माको सर्वत्र परिपूर्ण समझकर प्राप्त करनेका फल और भगवत्प्राप्त पुरुषकी स्थिति तथा उस महापुरुषके आनन्दमग्न मनसे निकले हुए समता और सर्वरूपताविषयक उद्‍गारों (समागान)-का वर्णन
    • शान्तिपाठ
  • +
    श्वेताश्वतरोपनिषद्
    • शान्तिपाठ
    • प्रथम अध्याय
    • (श्लोक १) जगत‍्के कारणकी, जीवनहेतुकी, स्थितिके कारणकी और सबके आधारकी खोज करनेवाले कुछ जिज्ञासुओंका परस्पर विचार-विमर्श
    • (श्लोक २) काल, स्वभाव, प्रारब्ध आदिकी जगत्कारणताका खण्डन
    • (श्लोक ३) ऋषियोंद्वारा ध्यानयोगसे जगत‍्के वास्तविक कारण परमेश्वरकी अचिन्त्य आत्मशक्तिके साक्षात्कारका कथन
    • (श्लोक ४-५) विश्वका चक्र और नदीके रूपमें वर्णन
    • (श्लोक ६-७) परमात्माद्वारा जीवात्माके कर्मानुसार संसार-चक्रमें घुमाये जानेका तथा अपनेको और सर्वप्रेरक परमात्माको पृथक्-पृथक् समझने और उनकी कृपाका अनुभव करनेसे अमृतत्व पाकर ब्रह्ममें लीन होनेका निरूपण
    • (श्लोक ८) परमात्माका स्वरूप न जाननेसे जीवात्माके बन्धन होने और जाननेसे मोक्ष होनेका वर्णन
    • (श्लोक ९-११) जीवात्मा, प्रकृति और इन दोनोंके शासक परमात्माके स्वरूपका प्रतिपादन तथा तीनोंके तत्त्वको जानकर परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे कैवल्यपदकी प्राप्तिका उल्लेख
    • (श्लोक १२) जाननेयोग्य प्रेरक परमात्मा, भोक्ता जीव और भोग्य जडवर्गको जान लेनेसे सब कुछ जान लेनेका कथन
    • (श्लोक १३-१४) ॐकारकी उपासनाद्वारा जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपकी उपलब्धिका निरूपण एवं अरणि-मन्थनके दृष्टान्तद्वारा वाणीसे नाम-जप और मनसे स्वरूप-चिन्तन करके परब्रह्म साक्षात्कार करनेका आदेश
    • (श्लोक १५-१६) तिलोंमें तेल, दहीमें घी आदिकी भाँति हृदय-गुहामें छिपे हुए और सर्वत्र परिपूर्ण परमात्माको सत्य और तप के द्वारा प्राप्त करनेके लिये प्रेरणा
    • द्वितीय अध्याय
    • (श्लोक १-५) प्रथमाध्यायमें वर्णित ध्यानकी सिद्धिके लिये परमेश्वरसे स्तुति-प्रार्थना करनेका निरूपण
    • (श्लोक ६-७) ध्यान-साधनसे मनके विशुद्ध होनेका कथन एवं साधकको परमात्माकी शरण लेनेकी प्रेरणा
    • (श्लोक ८) ध्यानयोगकी विधि और बैठनेके प्रकार-वर्णन
    • (श्लोक ९) प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता
    • (श्लोक १०) ध्यानके लिये उपयुक्त स्थान और भूमिका वर्णन
    • (श्लोक ११) योगसाधनकी उन्नतिके द्योतक लक्षणोंका दिग्दर्शन
    • (श्लोक १२-१३) योगसाधनसे भूतसम्बन्धी पाँच सिद्धियोंके तथा लघुता, नीरोगता प्रभृति अन्य सिद्धियोंके भी प्राकट्यका निरूपण
    • (श्लोक १४-१५) योगसाधन करके आत्मतत्त्वसे ब्रह्मतत्त्वको जाननेका फल, कृत-कृत्यता और समस्त बन्धनोंसे मुक्तिकी प्राप्ति
    • (श्लोक १६-१७) सर्वस्वरूप और सर्वत्र परिपूर्ण परमदेव परमात्माकी जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थिति बताकर उन्हें नमस्कार करना
    • तृतीय अध्याय
    • (श्लोक १-२) समस्त जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति, संचालन और विलयन करनेवाले परमेश्वरके ज्ञानसे अमृतत्व-प्राप्तिका कथन
    • (श्लोक ३) परमेश्वरके नेत्र, मुख, हाथ और पैरोंकी सर्वत्र विद्यमानता और भक्तके द्वारा उनकी अनुभूतिका प्रकार-निरूपण एवं परमेश्वरद्वारा ही सबको शक्ति दिये जानेका उल्लेख
    • (श्लोक ४-६) रुद्ररूप सर्वकारण सर्वज्ञ परमेश्वरसे शुभ बुद्धि और कल्याणदानके लिये प्रार्थना
    • (श्लोक ७-८) सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी महान् परमेश्वरके ज्ञानसे जन्म-मरणनाश तथा उस ज्ञानी महापुरुषके अनुभव और परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ताका प्रतिपादन
    • (श्लोक ९-१०) परमेश्वरकी सर्वश्रेष्ठता, महत्ता और सर्वत्र परिपूर्णताका तथा उन परमात्माके ज्ञानद्वारा दुःखोंसे छूटनेका कथन
    • (श्लोक ११-१७) सर्वव्यापी, सर्वप्रेरक, सर्वरूप, सर्वत्र हाथ, पैर आदि समस्त इन्द्रियोंसे युक्त, सब इन्द्रियोंसे रहित, सबके स्वामी और एकमात्र शरण्य भगवान‍्के सविशेष और निर्विशेष स्वरूपके तात्त्विक वर्णनमें उन परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिणामवाला बताकर उनके ज्ञानसे अमृतस्वरूप हो जानेका निरूपण करना
    • (श्लोक १८) नौ द्वारवाले पुरमें अन्तर्यामीरूपसे परमेश्वरकी स्थितिका वर्णन
    • (श्लोक १९) 'वे सर्वज्ञ परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंका कार्य करनेमें समर्थ हैं' इसका स्पष्टीकरण और उनकी महिमाका वर्णन
    • (श्लोक २०) परमेश्वरको अणुसे भी अणु और महान् से भी महान् बताना और उनकी कृपासे ही उनकी महिमाके ज्ञान होनेका निरूपण करना
    • (श्लोक २१) परमात्माको प्राप्त महात्माके स्वानुभव-वर्णन
    • चतुर्थ अध्याय
    • (श्लोक १) शुभ बुद्धिके लिये परमेश्वरसे अभ्यर्थना
    • (श्लोक २-४) परमेश्वरका जगत‍्के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुतिका प्रकार तथा अव्यक्त और जीवरूप दोनों प्रकृतियोंपर परमेश्वरके स्वामित्वका निरूपण
    • (श्लोक ५) उक्त दोनों अनादि प्रकृतियोंका स्पष्टीकरण
    • (श्लोक ६-७) एक वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षीके रूपकद्वारा जीवात्मा और परमेश्वरकी भिन्नताका प्रतिपादन तथा परमेश्वरकी महिमाके ज्ञानसे जीवके मोहजनित शोककी निवृत्तिका कथन
    • (श्लोक ८) दिव्य परमधाम और भगवान‍्के पार्षदोंका तत्त्व न जाननेवालेको वेद-शास्त्रोंसे कोई लाभ न होना तथा जाननेवालोंका परमधाममें निवास
    • (श्लोक ९) परमेश्वरके रचे हुए इस जगत‍्में ज्ञानी पुरुषोंसे भिन्न अज्ञानी जीवोंके बन्धनका उल्लेख
    • (श्लोक १०) माया और मायापति परमेश्वरको जाननेकी प्रेरणा
    • (श्लोक ११) समस्त कारणोंके अधिष्ठाता स्तवनीय परमेश्वरको जान लेनेसे शान्ति प्राप्त होनेका कथन
    • (श्लोक १२) सद्‍बुद्धिके लिये उन सर्वकारण सर्वज्ञ परमेश्वरसे पुनः प्रार्थना
    • (श्लोक १३) समस्त देवोंके अधिपति सबके आश्रयभूत परमेश्वरको भेंट-पूजा समर्पण करनेका समर्थन
    • (श्लोक १४-२०) अत्यन्त सूक्ष्म, सृष्टिकी रचना और रक्षा करनेवाले, सब मनुष्योंके हृदयमें विद्यमान, सर्वव्यापक, कल्याणमय, महान् यशस्वी और दिव्य चक्षुओंसे देखे जानेयोग्य परमदेव परमात्माके स्वरूपका उनकी प्राप्तिरूप फलसहित विस्तृत वर्णन
    • (श्लोक २१-२२) रुद्ररूप परमेश्वरसे मुक्तिके लिये तथा सांसारिक भयसे रक्षाके लिये प्रार्थना
    • पञ्चम अध्याय
    • (श्लोक १) विद्या और अविद्याकी परिभाषा एवं इन दोनोंपर शासन करनेवाले परमेश्वरकी विलक्षणता
    • (श्लोक २-४) उपास्यदेव भगवान‍्के आदिकारणता, सर्वाधिपतित्व, सर्वप्रकाशता, स्वयंप्रकाशमानता प्रभृति गुणगणोंका एवं उनकी अतर्क्य लीलाके रहस्यका निरूपण
    • (श्लोक ५) विश्वके शासक परमात्माद्वारा सब पदार्थोंके नाना रूपोंमें परिवर्तन और जीवोंके साथ गुणोंका यथायोग्य सम्बन्ध किये जानेका कथन
    • (श्लोक ६) वेदोंकी रहस्यभूत उपनिषद्-विद्याको जाननेवाले ब्रह्मा तथा देवता और ऋषिगणोंके अमृतरूप हो जानेका उल्लेख
    • (श्लोक ७) जीवात्माकी स्वकर्मानुसार देवयान, पितृयान और नाना योनियोंमें जन्म-मृत्युके चक्रमें घूमनारूप तीन गतियोंका प्रकरण
    • (श्लोक ८-१०) जीवात्माके स्वरूपका विवेचन
    • (श्लोक ११) मनुष्ययोनिमें अथवा विभिन्न योनियोंमें पृथक्-पृथक् संकल्प, स्पर्श, दृष्टि, मोह, भोजन, जलपान और वृष्टिसे सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होनेका उल्लेख
    • (श्लोक १२) जीवके आवागमनका कारण
    • (श्लोक १३) अनादिकालसे चले आते हुए जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटनेका उपाय
    • (श्लोक १४) अध्यायके उपसंहारमें परमात्माकी प्राप्तिके उपायका संकेत
    • षष्ठ अध्याय
    • (श्लोक १) पुनः स्वभाव और कालकी जगत्कारताका खण्डन तथा परमेश्वरकी महिमासे सृष्टिचक्रके संचालनका समर्थन
    • (श्लोक २) उन सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, कालके भी काल, सर्वगुण-सम्पन्न, सर्वशासक परमेश्वरके चिन्तनका आदेश
    • (श्लोक ३) परमात्माके द्वारा जीवात्माका गुण आदिके साथ सम्बन्ध कराये जानेका वर्णन
    • (श्लोक ४) भगवदर्पणरूप कर्मयोगके अनुष्ठानसे कर्मबन्धनके नाशका कथन
    • (श्लोक ५) भगवत्प्राप्तिके लिये उपासनारूप दूसरे साधनका वर्णन
    • (श्लोक ६) ज्ञानयोगरूप तीसरे साधनका फलसहित निरूपण
    • (श्लोक ७) प्रथम अध्यायमें कथित ध्यानके द्वारा परमेश्वरका साक्षात्कार करनेवाले महात्मा पुरुषोंके मुखसे जगत‍्के सर्वश्रेष्ठ कारणरूप परमात्माकी महिमाका कथन
    • (श्लोक ८-९) परमेश्वरकी असीम ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक विविध शक्तियोंका वर्णन तथा उनकी अतुलनीय महत्ताका प्रतिपादन
    • (श्लोक १०) जगत‍्के अभिन्न निमित्तोपादानस्वरूप परमात्माकी स्तुति करते हुए उनसे अपने ब्रह्मस्वरूपमें आश्रय देनेके लिये प्रार्थना
    • (श्लोक ११-१३) परब्रह्म परमात्माके सर्वव्यापी, अन्तर्यामी, साक्षी, चेतन एवं कारणस्वरूपका निरूपण एवं उनको जाननेवाले महापुरुषोंके लिये मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन
    • (श्लोक १४) सूर्य-चन्द्रादि ज्योतियोंकी परब्रह्मको प्रकाशित करनेमें असमर्थता तथा परमात्माके प्रकाशसे ही सबको प्रकाश प्राप्त होनेका उल्लेख
    • (श्लोक १५-१७) परमधामकी प्राप्तिके लिये अखिल कल्याणमय दिव्य गुणसम्पन्न सर्वेश्वरके स्वरूपका विशेषतासे वर्णन
    • (श्लोक १८) परमदेव पुरुषोत्तमको जानने और पानेके लिये उनकी शरण लेनेका प्रकार
    • (श्लोक १९) निर्गुण निराकार परमात्माके स्वरूपका निर्देश
    • (श्लोक २०) परमात्मज्ञानके बिना दुःख-निवृत्तिकी असम्भवता
    • (श्लोक २१) श्वेताश्वर ऋषिको तपसे और भगवत्कृपासे ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने तथा उसके द्वारा अधिकारियोंको उपदेश दिये जानेका कथन
    • (श्लोक २२) अशान्तचित्त अनधिकारीके प्रति उपदेश देनेका निषेध
    • (श्लोक २३) परमेश्वर और गुरुमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवालेको दिये हुए उपदेशकी सफलताका कथन
    • शान्तिपाठ
  • मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
  • अन्तिम पृष्ठ