॥ श्रीहरि:॥

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ज्ञानयोग का तत्त्व

ज्ञानयोग का तत्त्व

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

भाषा

हिन्दी/संस्कृत

प्रस्तुत पुस्तक में २७ लेखोंका संग्रह है। इन लेखोंमें सत्संग, विवेक, वैराग्य तथा प्रकृति, जीव, आत्मा और सच्चिदानन्दघन परमात्माका एवं मुक्तिका स्वरूप-विवेचन आदि ज्ञानयोगसम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण गूढ़ विषयोंको सरलरूपसे समझानेकी चेष्टा की गयी है, जो ज्ञानयोगके साधकोंके लिये बहुत ही उपादेय है। यद्यपि कहीं-कहीं एक लेखमें कही हुई बात दूसरे लेखमें भी आ गयी है; किंतु ज्ञानयोगका विषय अत्यन्त गहन होनेके कारण सभी साधकोंको भलीभाँति हृदयंगम करनेके लिये एक विषयको बार-बार समझना भी आवश्यक होता है; इसलिये पुनरुक्तिका दोष नहीं समझना चाहिये।
अत: ज्ञानयोगके साधकोंसे मेरा नम्र निवेदन है कि वे उचित समझें तो इन लेखोंको आत्मकल्याणकी इच्छासे पठन तथा मनन करनेकी कृपा करें और लेखोंमें बतलाये हुए विभिन्न प्रकारोंमेंसे किसी भी प्रकारसे नित्य-निरन्तर तत्परतापूर्वक साधन करें। इनसे उन्हें अपने साधनपथपर अग्रसर होनेमें सहायता प्राप्त हो सकती है।
- जयदयाल गोयन्दका
  • प्रथम पृष्ठ
  • नम्र निवेदन
  • सत्संग और महात्माओंका प्रभाव
  • वैराग्य
  • वैराग्य और उपरामता
  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना
  • तत्त्व-विचार
  • आत्माके सम्बन्धमें कुछ प्रश्नोत्तर
  • निराकार-साकार-तत्त्व
  • सच्चा सुख और उसकी प्राप्तिके उपाय
  • भगवान् क्या हैं?
  • अवतार और अधिकारी महापुरुषोंका अलौकिक प्रभाव
  • ज्ञानयोगके अनुसार विविध साधन
  • भ्रम अनादि और सान्त है
  • देश-काल-तत्त्व
  • प्रकृति-पुरुषका विवेचन
  • मैं कौन हूँ और मेरा क्या कर्तव्य है?
  • कल्याणका तत्त्व
  • ज्ञानकी दुर्लभता
  • परमात्माका तत्त्व-रहस्यसहित स्वरूप
  • चतु:श्लोकी भागवत
  • ज्ञानकी सात भूमिकाएँ
  • भगवान‍्के निराकार-तत्त्वका रहस्य
  • परमात्माके आनन्दमय स्वरूपका ध्यान
  • मुक्तिका स्वरूप-विवेचन
  • निर्गुण-निराकार ब्रह्मकी उपासना
  • ज्ञानीकी अनिर्वचनीय स्थिति
  • निर्गुण-निराकारका ध्यान
  • सत्संगके अमृत-कण
  • अन्तिम पृष्ठ

सच्ची सलाह

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ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप

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मनुष्य का परम कर्तव्य

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गीता के परम प्रचारक

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स्त्रियों के लिये कर्तव्य शिक्षा

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