प्रस्तुत पुस्तक में २७ लेखोंका संग्रह है। इन लेखोंमें सत्संग, विवेक, वैराग्य तथा प्रकृति, जीव, आत्मा और सच्चिदानन्दघन परमात्माका एवं मुक्तिका स्वरूप-विवेचन आदि ज्ञानयोगसम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण गूढ़ विषयोंको सरलरूपसे समझानेकी चेष्टा की गयी है, जो ज्ञानयोगके साधकोंके लिये बहुत ही उपादेय है। यद्यपि कहीं-कहीं एक लेखमें कही हुई बात दूसरे लेखमें भी आ गयी है; किंतु ज्ञानयोगका विषय अत्यन्त गहन होनेके कारण सभी साधकोंको भलीभाँति हृदयंगम करनेके लिये एक विषयको बार-बार समझना भी आवश्यक होता है; इसलिये पुनरुक्तिका दोष नहीं समझना चाहिये।
अत: ज्ञानयोगके साधकोंसे मेरा नम्र निवेदन है कि वे उचित समझें तो इन लेखोंको आत्मकल्याणकी इच्छासे पठन तथा मनन करनेकी कृपा करें और लेखोंमें बतलाये हुए विभिन्न प्रकारोंमेंसे किसी भी प्रकारसे नित्य-निरन्तर तत्परतापूर्वक साधन करें। इनसे उन्हें अपने साधनपथपर अग्रसर होनेमें सहायता प्राप्त हो सकती है।
- जयदयाल गोयन्दका